ब्लू प्रिंट कैसे बनाते है | ब्ल्यू प्रिंट या नील पत्र | Blue Print

नील पत्र का अर्थ 

Meaning of Blue Print

    माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के अनुसार, "उद्देश्यों, उपइकाइयों तथा प्रश्नों के प्रकारों के विभिन्न पक्षों हेतु अंक भार सम्बन्धी किये गये निर्णयों को व्यावहारिक रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसे आधार पत्रक कहते हैं।" 

यह आधार पत्रक इकाई की जाँच करता है। शिक्षा के पूर्व निर्धारित उद्देश्यो का की जाँच हेतु जो प्रश्न-पत्र निर्मित किया जाता है तथा छात्रों द्वारा हल किया जाता है उसे इकाई परीक्षण कहते हैं। इसकी अवधि 35-40 मिनट की होती है तथा इसी मूल्याकन द्वारा यह पता लगाया जाता है कि उद्देश्यों की प्राप्ति किस सीमा तक हुई है ? 


प्रश्न-पत्र का निर्माण 

Paper Setting

प्रश्न-पत्र निर्माण शैली में कुछ परिवर्तन करना पड़ता है, जो निम्नलिखित प्रकार से दर्श गया है- 

(1) नमूने की तैयारी (Preparation of a design)

(2) नील पत्र की तैयारी (Prepa. ration of blue-print)

(3) प्रश्न निर्माण (Designing question)

(4) प्रश्न-पत्र का सम्पादन करना (Editing the question paper)

(5) अंकतालिका (Scoring key) और अंक प्रणाली (Marking scheme) तैयार करना तथा

(6) प्रश्नों के क्रम से पत्र का विश्लेषण करना (Questionwise Analysis)। 


1. नमूना तैयार करना (Preparation of a design)-

यह प्रश्न-पत्र बनाने का महत्त्वपूर्ण चरण है। इसमें निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान देना चाहिये 

(1) उद्देश्य अर्थात् उन लक्ष्यों को चुनना, जिनका परीक्षण करना है और महत्त्व के दृष्टिकोण से उनके अंक निश्चित करना।

(2) विषयवस्तु के विभिन्न पदों की ओर ध्यान देना।

(3) विभिन्न प्रकार के प्रश्नों की ओर ध्यान देना; जैसे-(निबन्धात्मक प्रश्न, लघु उत्तरीय प्रश्न एवं वस्तुनिष्ठ प्रश्न)।

(4) विकल्पों की योजना (Scheme of options) अर्थात् सारे प्रश्न-पत्र में समूचे तौर पर विकल्पों की व्यवस्था करना अथवा प्रत्येक प्रश्न को अलग-अलग रूप से विकल्प देना।

(5) प्रश्न-पत्र के भाग। 


2. नील पत्र की तैयारी (Preparation of blue-print)-

प्रश्न-पत्र के उपर्युक्त ढाँचे को ब्ल्यू-प्रिण्ट में ठोस रूप दिया जाता है। इसमें तीन तथ्य सम्मिलित होते हैं 

(1) उद्देश्य (Objectives)।

(2) विषयवस्तु (Subject matter), जिनकी परीक्षा होनी है।

(3) प्रश्नों के प्रकार (Types of questions)। 


3. प्रश्न निर्माण (Designing question)-

अब ब्ल्यू-प्रिण्ट के आधार पर प्रश्न बनाये जाने चाहिये। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित तथ्यों की ओर ध्यान देना बहुत आवश्यक है 

(1) उद्देश्यों को परिभाषित करना।।

(2) उद्देश्यों की विशिष्टताओं (Specification paper) में बदलना।

(3) विषयवस्तु का पूर्ण ज्ञान। 


4. प्रश्न-पत्र का सम्पादन (Editing the question-paper)-

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित तथ्य सम्मिलित किये गये हैं 

(1) प्रश्न के अलग-अलग भाग बनाकर उनका एकत्रीकरण करना। वस्तुनिष्ठ प्रश्न, लघुउत्तरीय प्रश्न तथा निबन्धात्मक प्रश्न निश्चित अनुपात में ही लेने चाहिये। 


5. अंक-तालिका तथा अंक लगाने की प्रणाली (Scoring key and marking scheme)-

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के लिये अंक-तालिका तथा उत्तर-तालिका तैयार की जाती है। अर लगाने की विधि का प्रयोग, निबन्धात्मक प्रश्नों तथा छोटे उत्तर वाले प्रश्नों के लिये किया जाता है। 


6. प्रश्नों के क्रम से प्रश्न-पत्र का विश्लेषण (Questionwise analysis)-

इस प्रकार से अब प्रश्न-पत्र का मूल्यांकन किया जाने लगा है। हममे प्रश्न पत्र निर्माता अपने प्रश्न-पत्र के गुण और दोषों को भी देख लेते हैं। 

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Blue Print Kaise teyar kre
 ब्लू प्रिंट आसानी से कैसे बनाते है?

नमस्कार साथियों,
    आप सभी अक्सर इससे यह पूछते हैं ब्लू प्रिंट क्या होती है? किस तरह से बनाई जाती है? इकाई परीक्षण क्या होता है? तो इन सभी सवालों के जवाब देने के लिए मैंने यह वीडियो बनाया है और इसमें मैंने बहुत ही आसान तरीके से यह बताया है कि आप अपना ब्लूप्रिंट किस तरह से तैयार कर सकते हैं, और ब्लूप्रिंट के जितने भी प्रारूप हैं उन सभी को मैंने प्रैक्टिकली यहां पर बनाकर समझाने का प्रयास किया है यह वीडियो को आप पूरा देखें-




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ब्ल्यू प्रिंट या नील पत्र
(Blue Print)


__ इकाई परख निर्माण करने का विशिष्ट ढंग है, जिसे अपनाने पर परख वैज्ञानिक ढंग से तैयार किया जा सकता है। यही ढंग अर्द्धवार्षिक और वार्षिक परीक्षाओं के लिए प्रश्न पत्र तैयार करने में अपनाया जा सकता है। इस विधि के निम्नांकित प्रमुख चरण हैं।

(1) अभिकल्प बनाना (To prepare design)

(2) रूप रेखा बनाना (To prepare blue print)

(3) इकाई परख बनाना (To prepare unit test)

(4) उत्तरतालिका एवं अंक योजना बनाना (To prepare scoring key & marking scheme) और

(5) प्रश्नवार विश्लेषण पत्रक तैयार करना (To prepare questionwise analysis

chart)
(1) अभिकल्प बनाना (To prepare design)

अभिकल्प द्वारा निम्नांकित आयामों की दृष्टि से सामान्य नीति निश्चित की जाती है

(अ) उद्देश्यों की दृष्टि से अंक प्रभार (Weightage to objectives)

(ब) विषय वस्तु की दृष्टि से अंक प्रभार (Weightage to content)

(स) प्रश्नों के प्रकार की दृष्टि से अंक प्रभार (Weightage to different forms of questions)

(द) विकल्पों की योजना (Scheme of options)

(य) खंडों की योजना (Scheme of sections)




उपर्युक्त आयामों की दृष्टि से अंक प्रभार निश्चित कर लेने पर सभी उद्देश्यों, विषय वस्तु के सभी अंशों एवं सभी प्रकार के प्रश्नों को परख निर्माण करने में समूहों का महत्व प्रदान किया जा सकता है।




बोर्ड की परीक्षाओं में यह निश्चय प्रत्येक विषय के विशेषज्ञ करते हैं। अभिकल्प वास्तव में परख निर्माण करने संबंधी स्वीकृत नीति होती है, जो कि प्रतिवर्ष नहीं बदलती। अभिकल्प ही रूप रेखा बनाने का आधार होता है। इस अभिकल्प के आधार पर अनेक रूप रेखाएं बनाई जा सकती हैं।

प्रत्येक विषय में अपने विषय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निम्न प्रकार से विभिन्न आयामों की दृष्टि से अभिकल्प बनाया जा सकता है।
(अ) उद्देश्यों की दृष्टि से अंक प्रभार (Weightage to objectives)--

इसके अन्तर्गत शिक्षण के विभिन्न उद्देश्यों का अंक प्रभार निश्चित किया जाता है। यहां यह ध्यातव्य है कि इकाई परख बनाते समय केवल चार उद्देश्यों-ज्ञान, अवबोध, ज्ञानोपयोग और कौशल का ही अंक प्रभार निश्चित किया जाता है क्योंकि लिखित परीक्षा द्वारा इन उद्देश्यों की ही जांच सम्भव है। अभिरुचियों, अभिवृत्तियों आदि की जांच लिखित परीक्षा द्वारा सामान्यतः सम्भव नहीं होती। उक्त चार उद्देश्यों का अंक प्रभार, शिक्षण के समय, जिसे उद्देश्य पर जितना बल दिया गया हो, उसी अनुपात में निश्चित किया जाना चाहिए। यदि इकाई शिक्षण में ज्ञान उद्देश्य पर ही विशेष बल दिया गया हो तो इकाई परख बनाते समय भी ज्ञान उद्देश्य को अधिक अंक देने होंगे। शिक्षार्थियों के प्रति यह. अन्याय होगा कि शिक्षक पढ़ाते समय तो केवल ज्ञान उद्देश्य को ध्यान में रखकर पढ़ाएँ और परख बनाते समय अवबोध, ज्ञानोपयोग आदि उद्देश्यों पर आधारित प्रश्न पूछे। उद्देश्यों की दृष्टि से अंक प्रभार निश्चित करने का एक नमूना निम्नानुसार हो सकता है
ब्ल्यू प्रिंट या नील पत्र (Blue Print)



(ब) विषय वस्तु की दृष्टि से अंक प्रभार (Weightage to content)

इसके अन्तर्गत इकाई में निहित उप इकाइयों तथा उनमें निहित प्रकरण के अनुसार अंकों का विभाजन किया जाता है। ध्यान यह रखा जाता है कि प्रत्येक उप इकाई में जितनी विषय वस्तु की मात्रा है, उसके अनुसार अंकों का विभाजन किया जा सके। विषय वस्तु के अंक प्रभार निश्चित करने का नमूना निम्नांकित है
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(स) प्रश्नों के प्रकार की दृष्टि से अंक प्रभार (Weightage to different forms of questions)-अभिकल्प बनाने के लिए तीसरा निर्णय यह करना होता है कि विभिन्न प्रकार के प्रश्नों में से प्रत्येक को कितना अंक भार देना है।

यहाँ यह ज्ञात करना समुचित होगा कि प्रश्न कितने प्रकार के होते हैं। मोटे रूप में प्रश्नों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

(1) मुक्त उत्तरात्मक प्रश्न और (2) निश्चित उत्तरात्मक प्रश्न


(1) मुस्त उत्तरात्मक प्रश्न (Free response questions)

इस प्रकार के प्रश्नों में वे प्रश्न होते हैं जिनका उत्तर अपनी भाषा में स्वतंत्र अभिव्यक्ति द्वारा दिया जा सकता है। निबन्धात्मक और लघुतरात्मक प्रश्न इसी प्रकार के प्रश्न होते हैं। निबन्धात्मक प्रश्नों में उत्तर की लम्बाई तीन चार पृष्ठ तक हो सकती है। जबकि लघु उत्तरात्मक प्रश्नों में उत्तर आधे पृष्ठ से अधिक नहीं होता।




(2) निश्चित उत्तरात्मक प्रश्न (Fixed response questions)-

इसके अंतर्गत वे प्रश्न आते हैं जिनके उत्तर निश्चित होते हैं। वस्तुनिष्ठ और अतिलघुतरात्मक प्रश्न इस श्रेणी में आते हैं। वस्तुनिष्ठ प्रश्न वे प्रश्न कहलाते हैं जिनमें शिक्षार्थियों को सही उत्तर दिए जाएं। विकल्पों में से किसी एक पर संकेत लगाकर चुनाव होता है। इस प्रकार के प्रश्नों में यह विशेषता होती है कि उत्तर चाहे जितने परीक्षकों द्वारा जांचा जाए, परिणाम में भिन्नता उत्पन्न नहीं होती।

अतिलघुत्तरात्मक प्रश्नों के उत्तर या तो एक शब्द में या एक वाक्यांश में दिए जाते हैं। इस प्रकार के प्रश्नों में उत्तर निश्चित होते हैं और जाँचने में भी वस्तुनिष्ठता विद्यमान रहती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उदाहरणः (Examples of objective based questions)-वस्तुनिष्ठ प्रश्न मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं

(1) सत्यासत्य प्रकार (True and false or right and wrong)

(2) तुल्यपद प्रकार (Matching type)

(3) बहुविकल्पात्मक प्रकार (Multiple choice form)

(4) रिक्त स्थान पूर्ति प्रकार (Fillup the gaps)




(1) सत्यासत्य प्रकार (True and false or right and wrong) 
इस प्रकार के प्रश्नों को एकान्तर प्रत्युत्तर प्रकार "हाँ" अथवा "नहीं" प्रकार भी कहा जाता है। इस प्रकार के प्रश्नों में दो विकल्पों में से एक को चुनना होता है। कुछ कथन दिए जाते हैं और उनमें से एक को चुनना होता है। उदाहरण

निम्नलिखित कथनों में से जो सत्य हों उनके आगे सत्य के ऊपर सही और असत्य हो तो असत्य के ऊपर सही लगाएँ।

(अ) चंद्रग्रहण पूर्णिमा को होता है। (सत्य/असत्य)

(ब) बंगाल में गेहूं अधिक पैदा होता है। (सत्या असत्य)

(स) बड़ौदा गुजरात राज्य की राजधानी है। (सत्य/असत्य)




(2) तुल्यपद प्रकार (Matching type)-
इस प्रकार के प्रश्नों में दो स्तम्भ होते हैं। प्रथम स्तम्भ में कुछ पद अथवा वाक्यांश होते हैं। दूसरे स्तम्भ में अव्यवस्थित रूप से प्रथम स्तम्भ से संबंधित पद अथवा वाक्यांश लिखे रहते हैं। परीक्षार्थी से उन्हें व्यवस्थित रूप से लिखने को कहा जाता है। उदाहरण

निम्नलिखित में से एक ओर कृषि उपजें हैं और दूसरे ओर राज्यों की सूची है। प्रत्येक कृषि की उपज के आगे रिक्त कोष्ठक में उस राज्य का क्रमांक अंकित कीजिए, जहाँ यह उपज सर्वाधिक होती हो
ब्ल्यू प्रिंट या नील पत्र (Blue Print)


(3) बहुविकल्पात्मक प्रकार (Multiple choice form) 
यह प्रकार वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में सर्वाधिक प्रचलित है। इस प्रकार के प्रश्नों में अनुमान से सही विकल्प चुनने की सम्भावना बहुत कम होती है। इसमें प्रश्न के दो भाग होते हैं। पहले भाग को कथन कहते हैं और दूसरे भाग को विकल्प । परीक्षार्थियों को कथन के अनुसार दिये हुए विकल्पों में से एक विकल्प चुनना होता है और विकल्प से संबंधित अक्षर सामने रिक्त कोष्ठ में लिखना होता है। उदाहरण

(1) सूर्य की किरणें 21 जून को कहाँ सीधी पड़ती हैं?

(अ) मकर रेखा पर

(ब) कर्क रेखा पर।

(स) उत्तरी ध्रुव वृत्त पर।

(द) भूमध्य रेखा पर।

(य) दक्षिणी ध्रुव वृत्त पर।।


(2) यदि पृथ्वी परिक्रमण के समय 66-1/2 डिग्री के स्थान पर अपनी कक्षा के साथ 70 डिग्री झुकी हुई होती तो कर्क रेखा का अक्षांश क्या होता?

(अ) 20° उत्तरी अक्षांश।

(ब) 23/2° उत्तरी अक्षांश।

(स) 25° उत्तरी अक्षांश।

(द) 30° उत्तरी अक्षांश।

(य) 22-1/2° उत्तरी अक्षांश।


(4) रिक्त स्थान पूर्ति प्रकार (Fillup the gaps)-
इन प्रश्नों में शिक्षार्थियों को अपूर्ण कथनों अथवा वाक्यांशों में रिक्त स्थान की पूर्ति करनी होती है। ज्ञान उद्देश्य की जांच के लिए इस प्रकार के प्रश्न उपयुक्त होते हैं तथा इन प्रश्नों में अनुसार से उत्तर देने की सम्भावना कम हो जाती है।

इकाई-जाँच पत्र में विभिन्न प्रकार के प्रश्नों को कितना अंक प्रभार देना है, यह तीसरा नीति संबंधी निर्णय अधिकल्प बनाते समय लेना होता है। एक नमूना अग्रांकित हो सकता है
     



(द) विकल्पों की योजना (Scheme of options)-
परखों में विकल्प देने की परम्परा लम्बे समय से है। सामान्यतः प्रश्न पत्रों में चार प्रकार से विकल्प दिया जाता

(1) सम्पूर्ण प्रश्न पत्र में समग्र विकल्प,

(2) प्रश्न पत्र के अलग-अलग खंडों में समग्र विकल्प

(3) किसी प्रश्न में आंतरिक समग्र विकल्प और

(4) किसी प्रश्न में आंतरिक एकान्तर विकल्प

प्रत्येक का स्पष्टीकरण करना उपयुक्त होगा।

(1) सम्पूर्ण प्रश्न पत्र में समग्र विकल्प

पारम्परिक प्रश्न पत्रों में इस प्रकार का विकल्प प्रायः दिया जाता रहा है। इस प्रकार के विकल्प में प्रश्न पत्र में आठ दस प्रश्न दिए हुए होते हैं और कोई से पांच अथवा छह प्रश्न के लिए परीक्षार्थियों को निर्देश दिया

जाता है। यह विकल्प योजना अच्छी नहीं मानी जाती क्योंकि इसमें परीक्षार्थी यदि आधा पाठ्यक्रम भी भली-भांति अध्ययन कर ले तो वह अच्छे अंक प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार के प्रश्न पत्रों के परिणामों के आधार पर शिक्षार्थियों की परस्पर तुलना करना भी अवैज्ञानिक है। अत: इस प्रकार की विकल्प योजना का नवीन परीक्षा पद्धति में कोई स्थान नहीं है।

(2) प्रश्न पत्र के अलग-अलग खंडों में समग्र विकल्प

यह योजना प्रथम योजना का सुधार हुआ रूप है। इसके अंतर्गत परीक्षक प्रश्न पत्र को दो या तीन खण्डों में विभाजित कर देता है और यदि पूरे प्रश्न पत्र में दस प्रश्न हों और छह प्रश्न करने हों तो वह निर्देश देता है कि प्रथम खण्ड में से दो प्रश्न और तृतीय खण्ड में से दो प्रश्न करना अनिवार्य है। इस योजना में परीक्षार्थियों को सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का अध्ययन करना होता है, परन्तु फिर भी प्रत्येक खण्ड में विकल्प होने के कारण उसकी सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की जाँच नहीं होती। इस विकल्प योजना के परिणामों के आधार पर भी परीक्षार्थियों की परस्पर तुलना करना अवैज्ञानिक होता है।

(3) किसी प्रश्न में आंतरिक समग्र विकल्प-

इस विकल्प योजना में प्रश्न तो सभी करने होते हैं, परन्तु किसी-किसी प्रश्न में आंतरिक समग्र विकल्प दे दिया जाता है, जैसे किसी प्रश्न में चार खण्ड दिए हुए हों तो निर्देश दिया जाता है कि कोई से दो कीजिए। इस योजना में विकल्प का प्रभाव प्रश्न विशेष तक ही सीमित रहता है और अन्य प्रश्न प्रभावित नहीं होते। यदि विकल्प देना आवश्यक हो तो इस प्रकार का विकल्प देने में विशेष हानि नहीं है।

(4) किसी प्रश्न में आंतरिक एकान्तर विकल्प

इस विकल्प योजना में कुछ प्रश्नों में आंतरिक एकांतर विकल्प दे दिया जाता है। ऐसी स्थिति में दो प्रश्नों के बीच में अथवा लिखा जाता है जिसका प्रयोजन यह होता है कि दोनों में से कोई भी प्रश्न किया जाए । सामान्यत: इस प्रकार के विकल्प में दोनों प्रश्न समान कठिनाई के होते हैं और एक ही प्रकार की विषय वस्तु पर आधारित होते हैं। इस प्रकार की विकल्प योजना से कोई हानि नहीं होती, यदि दोनों प्रश्न समान कठिनाई के हों तथा एक ही विषय वस्तु पर आधारित हों।

नवीन परीक्षा पद्धति में विकल्पों का समावेश नहीं किया जाता। अधिक से अधिक विकल्प देना हो तो वह आंतरिक एकांतर विकल्प होता है। अभिकल्प का निर्माण करते समय परीक्षक को यह ज्ञात होना चाहिए कि क्या उसे विकल्प देना है और देना है तो वह किस प्रकार का होगा।

(य) खंडों,की योजना (Scheme of Sections)-
इसके अन्तर्गत यह निश्चित किया जाता है कि प्रश्न पत्र में कितने खण्ड रखने हैं। सामान्यत: नवीन परीक्षा पद्धति में वस्तुनिष्ठ तथा अतिलघूतरात्मक प्रश्न एक खण्ड में तथा निबन्धात्मक तथा लघुत्तरात्मक दूसरे खण्ड में पूछे जाते हैं। ऐसा करने से जांचने में सुविधा रहती है।

(2) रूपरेखा बनाना (Formation of Outline)-
अभिकल्प निश्चित करने के पश्चात परख अथवा प्रश्न पत्र बनाने की दिशा में दूसरा मुख्य पद रूप रेखा बनाना है। रूपरेखा उस त्रिविमितीय चार्ट का नाम है जिसमें अभिकल्प के अनुसार उद्देश्य, विषय वस्तु, प्रश्नों के प्रकार एवं विकल्प को ध्यान में रखकर प्रश्नपत्र की सम्पूर्ण रूप रेखा बनाई जाती है। इस प्रकरण में दिए गए अभिकल्प के आधार पर इकाई प्रश्न पत्र की रूप रेखा बनाई जा सकती है। एक रूप रेखा अग्रांकित हो सकती है



रूपरेखा में काम में लिए गए संकेतों का स्पष्टीकरण

(1) कोष्ठक के अंदर का अंक प्रश्न संख्या तथा बाहर का अंक कुल अंकों का सूचक है।

(2) नि.= निबंधात्मक प्रश्न । ल. = लघुत्तरात्मक प्रश्न

अ.ल. = अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न व.- वस्तुनिष्ठ प्रश्न

(3) * यह चिह्न आंतरिक एकांतर विकल्प का सूचक है इसलिए इसके अंक

_योग में एक बार ही सम्मिलित किए गए हैं। उक्त रूपरेखा में उद्देश्यों के खंडों तथा प्रकरणों के खण्डों का योग अभिकरण में निर्धारित अंक प्रभार के अनुसार है। प्रश्नों के प्रकार का योग भी अभिकल्प के अनुसार है। इस प्रकार रूप रेखा अभिकल्प का क्रियात्मक पक्ष है।

(3) इकाई परख बनाना (Formation of Unit Test)-
प्रश्न पत्र की रूपरेखा बना लेने के पश्चात इकाई प्रश्न पत्र बनाया जाता है। सर्वप्रथम पहले प्रकरण में विभिन्न उद्देश्यों के अंतर्गत जिस प्रकार के प्रश्न बनाने होते हैं बनाये जाते हैं। इसी प्रकार अन्य प्रकरणों के अंतर्गत प्रश्न बनाए जाते हैं।

सभी प्रकरणों के अंतर्गत प्रश्न बना लेने के पश्चात एक-एक प्रकार के प्रश्नों को एक साथ लिख लिया जाता है, जैसे वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को एक साथ अतिलघुतरात्मक प्रश्नों को एक साथ आदि। एक-एक प्रकार के प्रश्नों को एक साथ लिखते समय उनको सरल से कठिनाई के क्रम में जमाया जाता है। ऐसा करने से परीक्षार्थियों में प्रश्न पत्र हल करने का उत्साह पैदा होता है, परन्तु यदि प्रारंभ में ही कठिन प्रश्न हुआ तो उनमें निराशा उत्पन्न हो सकती है।

(4) उत्तरतालिका एवं अंक योजना बनाना (Formation of Answersheet and Marks Planning)-
परीक्षक को प्रश्न पत्र बनाने के साथ ही साथ उत्तर तालिका तथा अंक योजना बना लेनी चाहिए। निश्चित उतरात्मक प्रश्नों के लिए उत्तर तालिका ही पर्याप्त होती है, परन्तु मुक्त उत्तरात्मक प्रश्नों के लिए उत्तरों को अंकित करने की योजना

बनाना आवश्यक होता है। उत्तर तालिका तथा अंक योजना बना लेने से एक से अधिक परीक्षक हों तो भी जांचने में समानता रखना सम्भव होता है। इससे जांचने की प्रक्रिया तर्क संगत एवं वैज्ञानिक हो जाती है।

प्रश्न पत्रों के साथ ही अंक योजना बना लेने से परीक्षक को उत्तर की सम्भावित लम्बाई ज्ञात हो जाती है और आवश्यकता हो तो वह अपने प्रश्न में वांछित सुधार भी कर सकता है।



(5) प्रश्नवार विश्लेषण पत्रक तैयार करना (Formation of Question Paper according to Questionwise) 
प्रश्नपत्र बनाने के कार्य को वैज्ञानिक बनाने की दृष्टि से यह आवश्यक होता है कि प्रश्नवार विश्लेषण पत्रक तैयार किया जाए। इसका प्रारूप निम्नानुसार होता है
ब्ल्यू प्रिंट या नील पत्र (Blue Print)



उक्त प्रकार के प्रारूप में प्रत्येक प्रश्नवार सूचना अंकित कर लेने के निम्नांकित लाभ हैं

(1) विभिन्न उद्देश्यों के अंतर्गत कौन-कौन से विशिष्टीकरणों को प्रश्न पत्र में सम्मिलित किया गया है, यह ज्ञात हो जाता है।

(2) पूरा प्रश्न पत्र हल करने में कितना समय लगेगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

(3) प्रश्न पत्र में कितने प्रश्न, सरल, कितने सामान्य तथा कितने कठिन हैं, इसका ज्ञान हो जाता है। अच्छे प्रश्न पत्रों में यह प्रतिशत 15,70 और 15 के लगभग होता है।


परीक्षण रचना के चरण (Steps of Test Construction).

परीक्षण रचना के अंतर्गत प्रश्नों अथवा पदों का पूर्ण रूप से मूल्यांकन कर उनको अंतिम रूप से परीक्षा में सम्मिलित किए जाने से हैं। इसके लिए सर्वप्रथम प्रश्न लिखे जाते हैं। उसके पश्चात इनकी विशेषज्ञों द्वारा जांच कर इनका एक समूह पर प्रशासन किया जाता है। पदों का विश्लेषण कर उनको अंतिम रूप से प्रश्न पत्र में सम्मिलित किये जाने के बारे में निर्णय लिया जाता है।

सामान्यत: परीक्षण रचना के सात चरण निम्न प्रकार से हैं

(1) परीक्षण की योजना तैयार करना (Planning the test)

(2) परीक्षण के प्रथम प्रारूप की रचना (Preparing first draft)

(3) प्रथम प्रारूप की जांच करना (Preliminary try out of first drafi)

(4) परीक्षण का मूल्यांकन (Evaluating the test)

(5) अंतिम रूप प्रदान करना (Final draft of the test)

(6) परीक्षण वैधता (Test validity)

(7) परीक्षण विश्वसनीयता (Test Reliability)



(1) परीक्षण की योजना तैयार करना (Planning the test)

परीक्षण के सफल निर्माण के लिए उसकी एक योजना बनाना आवश्यक है। योजना के तहत सर्वप्रथम उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है।

(अ) उद्देश्य निर्धारण-

जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है कि शिक्षण प्रक्रिया एंव मूल्यांकन एक दूसरे से संबंधित है। शिक्षण द्वारा शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है जबकि परीक्षण द्वारा यह ज्ञात होता है कि ये किस सीमा तक प्राप्त हो चुके हैं। परन्तु यह तभी संभव है जबकि शिक्षण उद्देश्यों को ठीक प्रकार से पूर्व स्पष्टीकरण कर लिया गया हो। उद्देश्यों को संक्षिप्त, स्पष्ट, व्यावहारिक एवं एकार्थ रूप में लिखा जाना

चाहिए।

परीक्षा का सीधा संबंध परीक्षार्थी के मूल्यांकन किए जाने से है अत: परीक्षा निर्माण से पूर्व यह तय कर लिया जाना आवश्यक है कि परीक्षा किस आयु स्तर, ग्रेड

आदि के लिए ली जानी है ताकि उसी स्तरानुसार इसमें प्रश्नों का निर्माण किया जा सके। शिक्षण उद्देश्यों का वर्गीकरण विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग प्रकार से किया है।

उद्देश्यों के कथन व्यवहार परख भाषा में लिखे जाने चाहिए ताकि इससे यह ज्ञात हो सके कि किस व्यवहारगत परिवर्तन का मापन किया जाना है। प्रश्न निर्माण तथा मूल्यांकन में इससे सहायता मिलेगी।


(ब) पाठ्यक्रम विश्लेषण-

उद्देश्यों के निर्धारण के उपरान्त यह निश्चित किया जाता है कि परीक्षण में कौन-कोन से प्रकरण किस सीमा तक सम्मिलित किए जाने हैं। परीक्षण पूर्णत: व्यापक हो अर्थात पाठ्यक्रम के अधिकांश भाग को सम्मिलित किए हुए हों इसके लिए यह आवश्यक है कि अध्यापक अधिगत की दृष्टि से सभी महत्वपूर्ण प्रकरणों की एक सूची निर्मित कर लेता है। पाठ्यक्रम के विश्लेषणार्थ वह निम्नांकित कार्य करता है।

(1) पाठ्य पुस्तकों तथा संदर्भ पुस्तकों का पूर्ण अध्ययन ।

(2) विषय वस्तु से संबंधित अधिगम अनुभवों का ज्ञान।

(3) विषाध्यापकों से वार्तालाप।

(4) विद्यार्थियों की दृष्टि से सरल एवं कठिन पाठ।

(5) ऐसे प्रकरण जो कि भावी अध्ययन या दैनिक जीवन की दृष्टि से उपयोगी हो।

(6) पूर्व में किये गये परीक्षणों के प्रतिवेदन।

। उपर्युक्त आधार पर पाठ्यवस्तु का विश्लेषण कर उसे अंक भार प्रदान किया जाता है। इसके साथ परीक्षण के स्वरूप पर भी परीक्षक को विचार कर लेना चाहिए। परीक्षा शाब्दिक होगा या अशाब्दिक अथवा दोनों। शाब्दिक परीक्षक का माध्यम, प्रश्न का आकार तथा प्रश्नों की संख्या, परीक्षा के लिए निर्धारित समय आदि का पूर्व निर्धारण किया जाना आवश्यक है।

(2) परीक्षण के प्रथम प्रारूप की रचना (Preparing of the first draft)-
(अ) पद रचना- सर्वप्रथम विषय वस्तु तथा शिक्षण उद्देश्यों को ध्यान में रखकर पदों का चयन करता है। परीक्षण में यदि एक ही प्रकार के पद हों तो परीक्षण अरुचिकर हो जाता है। इसलिए परीक्षा में विभिन्न प्रकार के पद सम्मिलित करने चाहिए, पदों के निर्माण से पूर्व पदों के प्रकारों की संख्या जो कि परीक्षण में सम्मिलित किये जाने हैं, पर विवेकपूर्ण निर्णय लिया जाना चाहिए। पद निम्न प्रकार के हो सकते हैं

(1) बहु विकल्पात्मक प्रश्न

(2) एकान्तर प्रत्युत्तर पद या गलत और सही वाले प्रश्न

(3) पूर्ति वाले पद

(4) तुल्यपद

(5) लघूतरात्मक पद

पद की रचना करते समय एक परीक्षक को निम्नांकित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए

(1) एक पद में यथासम्भव एक ही शिक्षण उद्देश्य की परख की जानी चाहिए।

(2) परीक्षण को व्यापक बनाने के लिए पदों की संख्या अधिक हो परन्तु संख्या वृद्धि की दृष्टि से परीक्षा में एक जैसे अथवा समान्तर पद सम्मिलित नहीं किए जाने चाहिए।

(3) परीक्षण में ऐसे पदों, जो मात्र स्मृति परीक्षण से संबंधित हों, की संख्या बहुत कम होनी चाहिए अन्यथा विद्यार्थियों की रटने की प्रवृत्ति को इससे बढ़ावा मिलेगा।

(4) पदों में ऐसे संकेतों या चिह्नों का प्रयोग न किया जाए जिसे विद्यार्थी समझ न

सकें।

(5) पद निर्माण करते समय पुस्तकों के वाक्यों अथवा पदांशों को ज्यों का त्यों प्रश्न पत्र में नहीं लिया जाना चाहिए, इससे विद्यार्थियों में सूझ का परीक्षण नहीं हो पायेगा।

(6) परीक्षण में सत्य/असत्य प्रकार के प्रश्न सम्मिलित नहीं किये जाने चाहिए क्योंकि इससे अनुमान लगाकर उत्तर निकालने की संभावना अधिक है।

(7) परीक्षा में ऐसे पद न हों जिन्हें पढ़कर विद्यार्थी अन्य पदों के उत्तर का अनुमान कर सके।

(8) प्रारंभिक प्रारूप में पदों की संख्या प्रश्नपत्र के अंतिम प्रारूप में रखे जाने वाले पदों की संख्या से दुगुनी होनी चाहिए।

(9) सामान्य जानकारी से संबंधित पद अर्थात वे पद जिनका उत्तर बिना पुस्तक पढ़े ही दिया जा सके, सम्मिलित नहीं किये जाने चाहिए।

(10) पद की भाषा सरल एवं बोधगम्य होनी चाहिए।

(11) परीक्षण पदों के सम्मुख उत्तर लिखने के लिए पर्याप्त स्थान छोड़ा जाना चाहिए।

(12) पदों को सरल से कठिन स्तरानुसार व्यवस्थित किया जाना चाहिए।

(13) यदि आवश्यक हो (भाषा तो) तो महत्वपूर्ण वाक्यों को रेखांकित किया जाना

चाहिए।

(14) पदों, के उत्तर किसी निश्चित क्रम में न होकर अव्यवस्थित क्रम में होने चाहिए ताकि बालक उत्तर का अनुमान न लगा सके।
पदों की प्रथम रचना करने के पश्चात इनकी प्रथम जांच विशेषज्ञों द्वारा की जाती है। ये पद की विषय वस्तु तथा प्रयुक्त तकनीक दोनों का मूल्यांकन कर पद की उपयुक्तता के बारे में निर्णय लेते हैं, उनमें आवश्यक संशोधन करते हैं तथा आवश्यकतानुसार उनको परीक्षण में सम्मिलित किये जाने अथवा नये पद बनाये जाने के संबंध में निर्णय लेते हैं।

(ब) निर्देश परीक्षण में बालक को प्रश्नों के उत्तर किस प्रकार देने हैं तथा समय सीमा क्या है आदि के बारे में प्रश्न पत्र के प्रारंभ में ही सूचना दे दी जाती है। इन्हें निर्देश कहते हैं। प्रश्न पत्र में कौन सा प्रश्न कितने अंक का है तथा विकल्प कितने दिए हैं आदि की जानकारी भी निर्देश में दी जाती है। ..

यदि बालक वस्तुनिष्ठ परीक्षण प्रथम बार दे रहे हों तो उन्हें अभ्यासार्थ एक या दो प्रश्न निर्देश में ही दिये जाते हैं ताकि वह पदों के उत्तर किस प्रकार देने हैं, यह भली

भाँति समझ ले।




(3) परीक्षण का प्रथम मूल्यांकन करना (First Evaluation of Experiment)

परीक्षण को अंतिम रूप प्रदान करने से पूर्व एक प्रारंभिक परीक्षण किया जाता है जिसके चरण निम्नलिखित हैं

(अ) परीक्षण का प्रशासन-

प्रश्नपत्र को चक्रांकित कर एक समूह को इसे हल करने के लिए दिया जाता है। यह समूह ऐसे विद्यार्थियों का हो जिनका शैक्षिक स्तर प्रश्न पत्र के स्तर जैसा हो तथा इसमें सभी तरह के विद्यार्थी अर्थात उच्च, सामान्य व निम्न योग्यता वाले विद्यार्थी हों। इस हेतु सामान्यत: किसी भी विद्यालय में एक कक्षा के सभी विद्यार्थी लिये जा सकते हैं। विद्यार्थियों की संख्या 30 से कम तथा 60 से अधिक नहीं होनी चाहिए।

प्रशासन के समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सभी विद्यार्थियों के लिए परीक्षा देने की परिस्थितियां एक जैसी हों। इनकी बैठक व्यवस्था उचित एवं आरामदायक हो तथा रोशनी व हवा की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए। विद्यार्थियों को प्रश्न हल करने के लिए समय पर्याप्त मात्रा में दिया जाना चाहिए। ताकि वे सभी प्रश्नों को हल कर लें अर्थात किसी प्रश्न को बिना हल किये न छोड़े। इसके पद विश्लेषण में सहायता मिलेगी।

(ब) अंक प्रदान करना-परीक्षा के सफल प्रशासन के बाद उत्तर पुस्तिकाओं का अंकन किया जाता है। अधिकांश वस्तुनिष्ठ प्रश्न पत्रों के उत्तर प्रश्न पत्र पर ही लिखाये जाते हैं, अत: इनमें लिखे उत्तरों की जाँच की जाती है। अंक प्रदान करने के लिए परीक्षण पूर्व में ही एक अंक योजना का निर्माण कर लेता है। परीक्षक अंक तालिका की सहायता से अंक प्रदान करता है। प्रश्नों का उत्तर ठीक होने पर पूरे अंक तथा गलत होने पर शून्य प्रदान कर दिया जाता है। प्राप्तांकों का योग कर कुछ प्राप्तांक लिख दिये जाते हैं।


(4) परीक्षा प्रश्न पत्र का मूल्यांकन (Evaluation of Exam Question Paper) प्रश्न पत्र कितने प्रभावी रूप से उद्देश्यों की परख कर रहा है, यह उसमें सम्मिलित पदों की विशेषता पर निर्भर करता है। यदि परीक्षण को प्रभावशाली बनाना है तो यह आवश्यक है कि प्रश्नपत्र निर्माता प्रश्नपत्र के सब पदों का अलग-अलग बारीकी से अध्ययन करें। इसे पद विश्लेषण कहते हैं।

परीक्षण के प्रथम प्रारूप का निर्माण करते समय हमने अंतिम रूप में रखे जाने वाले पदों की दुगुनी संख्या ली थी। अत: अब परीक्षण की प्रथम जांच व फलांकन के बाद उन पदों में से कौन-कौन से पद अंतिम रूप से परीक्षण में रखे जाने योग्य हैं, इसका निर्णय पद विश्लेषण द्वारा किया जाता है। पद विश्लेषण में प्रमुख रूप से दो बातों को ज्ञात किया जाता है, जो कि निम्नांकित हैं

(क) प्रत्येक पद का कठिनाई स्तर

(ख) प्रत्येक पद की विभेदकारी शक्ति।
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(क) प्रत्येक पद का कठिनाई स्तर-किसी समूह से जब कोई प्रश्न हल कराया जाता है तो कुछ उसे गलत हल करते हैं तथा शेष सही करते हैं । सामान्यत: सही रूप से हल करने वालों का प्रतिशत ज्ञात कर लिया जाता है। यदि किसी प्रश्न को 25 में से 24 छात्र सही हल करते हैं तथा दूसरे प्रश्न का 25 में से 2 छात्र सही उत्तर देते हैं तो प्रथम प्रश्न तथा द्वितीय प्रश्न में सही उत्तर देने वालों का प्रतिशत क्रमश: 96 प्रतिशत तथा 8 प्रतिशत रहा। सामान्यत: हम कहते हैं कि प्रथम प्रश्न बहुत सरल तथा. द्वितीय प्रश्न वस्तुत: कठिन है। प्रश्न का कठिनाई स्तर इसी भावना को इंगित करता है।

(ख) परीक्षण के पदों की विभेदकारी शक्ति-यदि कोई पद उच्च समूह या निम्न समूह के विद्यार्थी के मध्य विभेद करता है तो वह परीक्षा में रखने लायक होगा। उदाहरण के लिए यदि किसी पद का योग्य विद्यार्थी अधिकांशत: सही उत्तर देते हैं और अयोग्य विद्यार्थी (निम्न समूह) में अधिकांश उसे गलत करते हैं तो यह पद विभेदकारी है अर्थात हम इस पद द्वारा योग्य एवं अयोग्य, विद्यार्थियों में स्पष्टत: अलग-अलग भेद कर सकते हैं।

परीक्षण के प्रत्येक पद की विभेदकारी शक्ति ज्ञात करने के लिए हम निम्नविधि अपनाते हैं

(1) सभी उत्तर पुस्तिकओं की जाँच कर प्राप्तांकों को इस प्रकार जमा कि सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाला सबसे ऊपर तथा अन्य उत्तर पुस्तिकाएँ प्राप्तांकों के घटते क्रम में नीचे रखी जावें। सबसे कम अंक वाली उत्तर पुस्तिका सबसे नीचे हो।

(2) कुल उत्तर पुस्तिकाओं का 27 प्रतिशत ऊपर से लें। यह उच्च समूह होगा। इसी प्रकार नीचे के 27 प्रतिशत लें, ये निम्न समूह होगा बीच की उत्तर पुस्तिका अलग रख दें इनका उपयोग यहाँ नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए एक परीक्षण में 60 विद्यार्थियों ने भाग लिया। इनकी उत्तर पुस्तिकाओं को प्राप्तांकों के घटते क्रम में व्यवस्थिति कर ऊपर की 16 उत्तर पुस्तिकाएँ उच्च समूह के लिए तथा अंत की 16 उत्तर पुस्तिकाएँ निम्न समूह के लिए ले ली गईं।

(3) अब यह पता लगाया जाएगा कि प्रत्येक पद को कितने प्रतिशत विद्यार्थियों ने उच्च समूह में तथा कितने प्रतिशत विद्यार्थियों ने निम्न समूह के पद का शुद्ध हल किया परीक्षण की वैधता प्रत्येक परीक्षण के सर्वप्रथम उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं तथा इसके पश्चात उसका मापन किया जाता है। यदि वह परीक्षण उद्देश्यों के अनुरूप मापन कर रहा है तो वह वैध होगा। साधारण शब्दों में यदि कोई परीक्षण शुद्धता तथा प्रभावी रूप से उसी बात का मापन कर रहा है जिसके लिए यह बनाया गया था तो यह परख वैध है। उदाहरण के लिए हमने एक बुद्धि परीक्षण तैयार किया। यदि यह परीक्षण वास्तव में बुद्धि का ही मापन करे तो यह वैध बुद्धि परीक्षण है।

वैधता ज्ञात करने की विधि-वैधता ज्ञात करने की अनेक विधियों में सरलतम विधि सहसंबंध गुणांक निकालना है। उदाहरण के लिए एक परीक्षण बुद्धि मापन हेतु बनाया। इस पर विद्यार्थियों के प्राप्तांक ज्ञात किये गये हैं। इन्हीं विद्यार्थियों को कोई मानकीकृत परख जैसे सामूहिक मानसिक योग्यता परीक्षण जो कि जलोटा द्वारा निर्मित है, दिया गया। दोनों परीक्षणों के मध्य सह संबंध निकाला जाता है जो कि वैधता को प्रदर्शित करेगा।
विश्वसनीयता (Reliability) एक परीक्षण तभी उत्तम माना जाता है जबकि वह वैध होने के साथ-साथ विश्वसनीय भी हो। विश्वसनीयता परीक्षण का एक महत्वपूर्ण गुण है। यदि परीक्षण विश्वसनीय नहीं है तो उससे प्राप्त अंक भी विश्वसनीय नहीं होंगे तथा ऐसे अंकों से किसी प्रकार का निष्कर्ष निकाला जाना तर्कसंगत नहीं होगा।

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