वुड का घोषणा-पत्र 1854 : महत्त्वपूर्ण सिफारिशें, मूल्यांकन, गुण-दोष

वुड के घोषणा-पत्र 1854 की मुख्य सिफारिशों की व्याख्या

"वुड का घोषणा-पत्र भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक महाधिकार-पत्र के रूप में जाना जाता है।
वुड का घोषणा-पत्र
वुड का घोषणा-पत्र


वुड का घोषणा-पत्र, 1854(Woods Despatch-1854) 

कम्पनी शासन ने 20 वर्ष के बाद घोषणा करने की नीति बनाई थी। सन् 1813 के बाद सन् 1833 में कम्पनी ने शिक्षा सम्बधी घोषणा की आवश्यकता अनुभव की। विलियम बैंटिंक ने सन् 1835 की विज्ञप्ति में अंग्रेजी भाषा के प्रसार करने की घोषणा की थी। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अंग्रेज मिशनरियों द्वारा भारत में अनेक नई संस्थाएँ खोली गयीं। ब्रिटिश संसद को यह अनुभूति हो चुकी थी कि भारतीय शिक्षा नीति में कुछ परिवर्तन किया जाना चाहिए एवं एक स्थायी नीति का निर्माण किया जाना चाहिए। इसलिए ब्रिटिश संसद ने एक संसदीय समिति नियुक्त की तथा इस समिति द्वारा प्रस्तुत कुछ आधारभूत सिद्धान्तों के आधार पर सन् 1854 में शिक्षा सम्बन्धी एक घोषणा पत्र प्रस्तुत किया गया जिसे संचालन समिति के अध्यक्ष सर चार्ल्स वुड के नाम पर 'वुड का घोषणा-पत्र' (Wood's Despatch) कहा जाता है। इस घोषणा-पत्र में तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था के पुनरीक्षण तथा भविष्य में शैक्षिक पुनर्निर्माण हेतु सुनिश्चित तथा बहु-आयामी नीति को सूचीबद्ध करने का प्रयास किया गया था। घोषणा-पत्र द्वारा भारत की भावी शिक्षा हेतु योजना में अखिल भारतीय आधार पर शिक्षा की नियामक पद्धति का गठन किया गया। इसे प्रायःभारतीय शिक्षा का मैग्ना कार्टा कहा जाता है।

'वुड-घोषणा-पत्र' की सिफारिशें-इस घोषणा-पत्र की कुछ महत्त्वपूर्ण सिफारिशें निम्नलिखित थीं

(1) शिक्षा का उद्देश्य 

शिक्षा के उद्देश्य को भारतवासियों तथा अंग्रेजी राज्य के हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित किया गया। घोषणा-पत्र' में यह बात स्पष्ट कर दी गई कि शिक्षा द्वारा भारतीयों की बौद्धिक एवं चारित्रिक उन्नति करने के साथ ही ऐसे व्यक्तियों को उत्पन्न करना था, जो राज्य को सुदृढ़ बना सकें और विश्वास के साथ राजपदों पर नियुक्त किए जा सके।

(2) शिक्षाक्रम/पाठ्यक्रम 

शिक्षाक्रम/पाठ्यक्रम के लिए भारतीय भाषाओं के साहित्य को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया। कानून की दृष्टि से भी इस साहित्य का महत्व स्वीकार किया गया। इस प्रकार संस्कृत, अरबी एवं फारसी की उपयोगिता स्वीकार करके उन्हें शिक्षाक्रम/पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया, परन्तु पाश्चात्य साहित्य एवं विज्ञानों का अध्ययन ही भारतीयों के लिए उपयुक्त समझा गया। इस आज्ञा-पत्र में मैकाले की भाँति भारतीय भाषाओं एवं भारतीय ज्ञान-विज्ञान की निन्दा तो नहीं की गई, पर निश्चय यही व्यक्त किया गया कि 'हम भारत में जिस शिक्षा का प्रसार करना चाहते हैं वह ऐसी शिक्षा है जिसका लक्ष्य यूरोप में कला, विज्ञान, दर्शनशास्त्र एवं साहित्य का प्रसार करना है। 'संक्षेप में, यूरोपीय ज्ञान का प्रसार करना है।

(3) शिक्षा का माध्यम–

'घोषणा-पत्र' में बताया गया कि देशी भाषाओं में पुस्तकों का अभाव होने के कारण अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाना आवश्यक है। परन्तु यह बात स्पष्ट कर दी गई कि अंग्रेजी का माध्यम केवल उन व्यक्तियों के लिए होगा, जो इस भाषा का समुचित ज्ञान रखते हों और जो इसके द्वारा पाश्चात्य साहित्य एवं विज्ञान की शिक्षा प्राप्त कर सकें । अन्य व्यक्तियों के लिए शिक्षा का माध्यम देशी भाषाएँ होंगी। इस प्रकार,अंग्रेजी तथा देशी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम स्वीकार कर लिया गया। देशी भाषाओं में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के ग्रन्थों का अनुवाद किया जाए- यह इच्छा भी व्यक्त की गई। यूरोपीय ज्ञान के प्रसार के लिए हम अंग्रेजी भाषा तथा भारत की देशी भाषाओं की ओर शिक्षा के माध्यम के रूप में देखते हैं, और भारत के समस्त स्कूलों में उनको साथ-साथ फलते-फूलते देखने की हमारी अभिलाषा है।'

(4) लोक-शिक्षा-विभाग की स्थापना—

'घोषणा-पत्र' में आदेश दिया गया कि भारत के प्रत्येक प्रान्त बंगाल, मद्रास, बम्बई, पंजाब और उत्तर-पश्चिम प्रान्त में एक लोक शिक्षा-विभाग' (Department of Public Instruction) स्थापित किया जाए और उसका सर्वोच्च अधिकारी 'जन-शिक्षा-निदेशक'/संचालक (Director) हो। उसकी सहायता के लिए उपशिक्षा-संचालक, निरीक्षक (Inspector) तथा सहायक निरीक्षक नियुक्त किए जाएं। प्रान्त की शिक्षा की ल 'स्था एवं उसके संचालन का भार शिक्षा-संचालक (निदेशकों) पर होगा और वह प्रति वर्ष २. को शिक्षा-विषयक रिपोर्ट भेजेगा।

(5)विश्वविद्यालयों की स्थापना 

'घोषणा-पत्र' में कहा गया कि उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए कलकत्ता, बम्बई और यदि आवश्यकता हो तो मद्रास तथा अन्य स्थानों में विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएँ। इन विश्वविद्यालयों का निर्माण लन्दन विश्वविद्यालय को आदर्श मानकर किया गया। प्रत्येक विश्वविद्यालय के लिए कुलपति (Chancellor), उपकुलपति (Vice-Chancellor)तथा अभिसदस्य (Fellows) होंगे, जो सरकार के द्वारा मनोनीत किए जाएंगे। विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग, कानून, देशी भाषाओं, संस्कृत, अरबी एवं फारसी की शिक्षा का प्रबन्ध करने के लिए विशेष रूप से उल्लेख किया गया। इस प्रकार 'घोषणा-पत्र' में प्राच्य भाषाओं के विकास की ओर समुचित ध्यान दिया गया परन्तु अंग्रेजी शिक्षा की माँग होने के कारण उनकी अपेक्षित प्रगति न हो सकी।

(6) क्रमबद्ध विद्यालयों की स्थापना 

'घोषणा-पत्र' में सम्पूर्ण भारत में क्रमबद्ध विद्यालयों (Graded Schools)की योजना पर बल दिया गया। इस योजना का स्पष्टीकरण करते हुए 'घोषणा-पत्र' में अंकित किया गया कि- शिक्षा का ढाँचा इस प्रकार का हो, जिसके आधार में प्राथमिक विद्यालय हों और फिर मिडिल स्कूल, हाई स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालय हों। 

(7)जन-शिक्षा-प्रसार—

'घोषणा-पत्र' में निस्यन्दन-सिद्धान्त के अनुसरण किए जाने पर असन्तोष प्रकट किया गया और यह स्वीकार किया गया कि जन-साधारण की शिक्षा पूर्ण रूप से अवहेलना की गई थी। अभी तक कम्पनी के अधिकारियों का ध्यान वर्ग-विशेष की शिक्षा की ओर था और उसी पर राज-कोष का अधिकांश भाग व्यय किया जाता था। अत: 'घोषणा-पत्र' में कहा गया कि जन-साधारण को व्यावहारिक एवं लाभदायक शिक्षा देने की व्यवस्था की जाए।

(8) सहायता अनुदान-

पद्धति-जन-शिक्षा-प्रसार की योजना तो उत्तम थी, परन्तु उसे कार्यान्वित करने के लिए कम्पनी को अत्यधिक धन व्यय करना पड़ता। अत: 'घोषणा-पत्र' में सहायता-अनुदान (Grant-in-Aid) का सुझाव दिया गया। इस पद्धति से चिर-परिचित होने के कारण भारतीयों को इसे स्वीकार करने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं थी। इसे शिक्षित एवं धनी वर्गों का उदारता एवं प्रयासों को प्रोत्साहन प्राप्त हो सकता था, और शिक्षा की तीव्र प्रगति भी सम्भव थी। प्रत्येक प्रान्तीय सरकार, सहायता-अनुदान सम्बन्धी कुछ नियम बनाएँ और सहायता-अनुदान उन्हीं शिक्षा-संस्थाओं को दिया जाए, जो निम्नांकित शर्तों को स्वीकार करें

1.विद्यालय में बिना किसी भेदभाव के अच्छी और धर्म-निरपेक्ष लौकिक शिक्षा देना। 
2. विद्यालय का स्थानीय व्यक्तियों की प्रबन्धकारिणी समिति के द्वारा कुशलतापूर्वक संचालन किया जाना। 
3. विद्यालय के विद्यार्थियों से शुल्क के रूप में कुछ धन लेना। 
4. विद्यालय के प्रबन्धकों द्वारा सरकारी निरीक्षण तथा सहायता-अनुदान सम्बन्धी नियमों का पालन किया जाना। 
'घोषणा-पत्र' में उल्लेख किया गया कि प्रान्तीय सरकारें, इंग्लैण्ड की सहायता-अनुदान प्रणाली का अनुसरण करें और शिक्षकों के वेतन, छात्रवृत्तियों, पुस्तकालयों, वाचनालयों, प्रयोगशालाओं, विज्ञान एवं कला-कक्षाओं तथा भवन निर्माण आदि के लिए अलग-अलग अनुदान देने की व्यवस्था करें। अनुदान सब प्रकार के विद्यालयों को दिया जाए। इस अनुदान प्रणाली को अपनाकर व्यक्तिगत विद्यालयों की वृद्धि होगी और कुछ समय पश्चात् उनकी संख्या इतनी हो जाएगी कि सरकार स्कूलों को चलाने के व्यय-भार से मुक्त हो जाएगी।

(9) अध्यापकों का प्रशिक्षण 

वुड के 'घोषणा-पत्र' द्वारा कम्पनी के संचालकों ने यह इच्छा व्यक्त की कि इंग्लैण्ड के ढंग पर भारत के प्रत्येक प्रान्त में अति शीघ्र प्रशिक्षण विद्यालय निर्मित किए जाएँ। औषध-शास्त्र, इंजीनियरिंग तथा कानून आदि में भी प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए। संचालकों ने यह भी आशा प्रकट की कि छात्राध्यापकों को छात्रवृत्तियाँ एवं शिक्षकों को अधिक वेतन देकर शिक्षा विभाग को उतना ही आकर्षक बनाया जाए, जितने कि अन्य राजकीय विभाग थे।

(10) स्त्री-शिक्षा—

'घोषणा-पत्र' में स्त्री-शिक्षा के लिए धन देने वाले व्यक्तियों की सराहना की गई और आदेश दिया गया कि उदारतापूर्ण नीति का अनुसरण करके उनको इस परम पुनीत कार्य के लिए अधिक प्रेरणा दी जाए। यह भी कहा गया कि स्त्री-शिक्षा के विद्यालय को सहायता-अनुदान दिया जाए।

(11) व्यावसायिक शिक्षा—

'घोषणा-पत्र' में व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) की ओर संकेत करते हुए लिखा गया कि ऐसे कॉलेजों और स्कूलों का निर्माण किया जाए, जिनमें भारतीय, विभिन्न व्यवसायों की शिक्षा प्राप्त कर सकें। व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने में संचालकों के दो उद्देश्य थे–(i) इस शिक्षा को प्राप्त करके बेकार व्यक्ति कार्य में लग जाएंगे और सरकार का आभार मानेंगे, (ii)व्यावसायिक विद्यालयों की स्थापना से भारतीयों का हित भी सम्भव होगा और सरकार को राजनिष्ठ भी मिल जाएंगे।

(12) प्राच्य साहित्य को प्रोत्साहन 

'घोषणा-पत्र' में प्राच्य साहित्य को प्रोत्साहन देने की सिफारिश की गई। यह सुझाव दिया गया कि पाश्चात्य साहित्य एवं विज्ञान की पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराया जाए। इसके अतिरिक्त, देशी भाषाओं में पुस्तकें लिखवाई जाएँ और लेखकों को सुन्दर पुरस्कार दिए जाएं।

(13) शिक्षा और रोजगार—

'घोषणा-पत्र' में शिक्षित व्यक्तियों को सरकारी नौकरियाँ देने का आदेश दिया गया। यह बात स्पष्ट कर दी गई कि नियुक्तियाँ करते समय व्यक्तियों की शिक्षा पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाए और उन व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाए, जिनकी शिक्षा योग्यता अन्य व्यक्तियों से अधिक है। इस नीति को अपनाने से न केवल शिक्षा का प्रसार होगा, अपितु शिक्षा प्राप्त करके जनता में मानवीय गुण का विकास होगा, जिसके फलस्वरूप उनका जीवन अधिक सफल होगा।

इस प्रकार, वुड के घोषणा-पत्र में यूरोपीय ज्ञान के प्रसार, अंग्रेजी एवं देशी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम ,लोक-शिक्षा-विभाग, विश्वविद्यालयों और क्रमबद्ध विद्यालयों की स्थापना, जन-शिक्षा-प्रसार, सहायता-अनुदान, अध्यापकों के प्रशिक्षण, स्त्री एवं व्यावसायिक शिक्षा, प्राच्य-साहित्य के प्रोत्साहन तथा शिक्षित व्यक्तियों को सरकारी नौकरियाँ देने की सिफारिश की गई।

उपर्युक्त सिफारिशों से स्पष्ट है कि ' वुड के घोषणा-पत्र' का भारतीय शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह पहला घोषणा-पत्र था जिसने ब्रिटिश कालीन शिक्षा को प्रारम्भिक ढाँचा प्रदान किया। वुड के घोषणा-पत्र के सम्बन्ध में ए०एन० बसु ने लिखा है किए, "वुड का घोषणा-पत्र भारतीय शिक्षा का शिलाधार था।"

वुड के घोषणा पत्र, 1854 का मूल्यांकन गुण-दोष


वुड घोषणा-पत्र'का मूल्यांकन (Evaluation of Wood Despatch) घोषणा-पत्र यद्यपि उच्च कोटि के विद्वानों के गहन अध्ययन और परिश्रम का फल था, पर वह न तो गुणों का कोष था और न अवगुणों की खान था।वह सर्वगुण-सम्पन्न और दोषरहित न था और यह आशा भी उन विद्वानों से करना उचित न थी, क्योंकि उनके संस्कार भारतीय न थे। फिर भी इन विद्वानों ने घोषणा-पत्र के रूप में एक महत्त्वपूर्ण उपहार भारतीय शिक्षा-जगत को दिया।

अतः इसके गुण-दोषों का सूक्ष्म विवेचन आवश्यक हो जाता है

वुड-घोषणा-पत्र के गुण (Merits of Wood's Despatch)


1. घोषणा-पत्र ने भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक नवीन युग का प्रारम्भ किया। 
2. घोषणा-पत्र ने भारतीय शिक्षा की नीति का निर्धारण कर उसे वैधानिक स्वरूप . प्रदान किया। अर्थात् शिक्षा के उद्देश्य का स्पष्टीकरण किया गया। 
3. इसके द्वारा शिक्षा का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व सरकार पर रखा गया। 
4. इसमें सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा व्यवस्था (प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक) का अध्ययन और समीक्षा की गई और सभी समस्याओं पर ध्यान दिया गया। 
5. शिक्षा में क्रमबद्धता लाई गई। अर्थात् क्रमबद्ध विद्यालयों की स्थापना द्वारा शिक्षा प्रसार कार्य को सम्पन्न बनाया गया। 
6. भारतीय साहित्य, संस्कृति और ज्ञान को उपयोगी मानकर उसे मान्यता दी गई तथा प्राच्य साहित्य को प्रोत्साहन दिया गया। 
7. ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत प्रत्येक प्रान्त में शिक्षा का प्रशासनिक ढाँचा तैयार किया गया। शिक्षा संचालक, (निदेशक), उप-संचालकों और निरीक्षकों की नियुक्ति की गई और प्रत्येक में शिक्षा विभाग स्थापित किया गया। 
8. शिक्षा को सार्वजनिक स्वरूप देकर 'निस्यंदन सिद्धान्त' को समाप्त (अस्वीकृति) किया गया। शिक्षा केवल उच्च वर्गों तक ही सीमित न रही, वरन्  सर्वसाधारण के लिए भी शिक्षा के द्वार खुल गए। 
9. शोचनीय दशा में पड़ी हुई प्राचीन शिक्षा-संस्थाओं का जीर्णोद्धार (पुनरुत्थान) किया गया और उन्हें मजबूत आधार पर खड़ा करने के प्रयास किए गए। 
10. इस घोषणा-पत्र के आधार पर विश्वविद्यालयों की स्थापना कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में की गई तथा उच्च और माध्यमिक शिक्षा के अधिक स्कूल खोल कर इस कोटि की शिक्षा का प्रसार किया गया। 
11. भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं तथा संस्कृत, अरबी और फारसी को उचित सम्मान और मान्यता मिली। इन भाषाओं के प्रति जो अब तक उपेक्षित थी, उदारता की नीति अपनाई गई। 
12. मेधावी और योग्य गरीब छात्रों को छात्रवृत्तियाँ दी गई, ताकि वे शिक्षा प्राप्त कर अपना भविष्य बनाए। 13. अध्यापकों की आर्थिक दशा को सुधारने के लिए उनका वेतन बढ़ाया गया। इससे अधिक योग्य व्यक्तियों को शिक्षा के क्षेत्र में आने का अवसर और प्रोत्साहन मिला। 
14. शिक्षा के क्षेत्र में अनुदान की व्यवस्था हुई और अधिक संख्या में स्कूलों को लाभ हुआ। इस व्यवस्था से शिक्षा के क्षेत्र में वैयक्तिक प्रयासों को प्रोत्साहन मिला और शिक्षा का द्रुतगति से प्रसार हुआ। 
15. शिक्षित व्यक्तियों को अधिक वेतन पर राज्य की नौकरियों में वरीयता देने के कारण लोगों की रुचि शिक्षा की ओर बढ़ी।
16. शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई और प्रत्येक प्रान्त में प्रशिक्षण विद्यालय खोले गए। . 
17. घोषणा-पत्र में स्त्री-शिक्षा, जो अभी तक उपेक्षित थी, पुनर्जीवित हुई। अर्थात्ना री-शिक्षा को प्रोत्साहित करने का निश्चय किया गया। 
18. व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था हुई जिसके फलस्वरूप बेकारी की समस्या को दूर करने का प्रयास किया गया और भारतीय जनता को स्वावलम्बी बनने का अवसर प्राप्त हुआ। 
19. लार्ड डलहौजी ने वुड के घोषणा-पत्र की भूरि-भूरि सराहना की और उसे भारतीय शिक्षा के इतिहास में दूरदर्शी और साहसिक प्रयास कहा। 

वुड-घोषणा-पत्र के अवगुण (Demerits of Wood's Despatch)—

वुड का घोषणा-पत्र जहाँ एक ओर भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के लिए वरदान सिद्ध हुआ, वहीं उसमें अनेक दोष भी प्रकट हुए जिनके कारण भारतीय शिक्षा को हानि पहुँची। अतः घोषणा-पत्र की प्रमुख दोषों की समीक्षा भी आवश्यक है

1. यद्यपि सैद्धान्तिक रूप में तो घोषणा-पत्र ने शिक्षा को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया, परन्तु व्यावहारिक रूप में उसका उद्देश्य केवल जीविका का उपार्जन ही रहा है। 
2. वुड का घोषणा-पत्र पक्षपात युक्त शैक्षिक नीति पर आधारित था। 
3. इस घोषणा-पत्र में नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा समाप्त कर दी गयी जिसके कारण भारतीय संस्कृति को आघात पहुँचा और पूरी भारतीय शिक्षा-पद्धति का ढाँचा हिल गया। 
4. शिक्षा परीक्षा-केन्द्रित बन गयी अर्थात् परीक्षा का स्थान सर्वोपरि होना। 
5. वुड के घोषणा-पत्र में भारत के साहित्य को उपेक्षापूर्ण दृष्टि से देखा गया। 
6. माध्यम के रूप में अंग्रेजी भाषा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किय, गया। इसके परिणामस्वरूप प्राचीन व भारतीय भाषाओं का महत्त्व नगण्य हो गया, जिससे पाश्चात्य सभ्यता के प्रचार को बल मिला तथा प्राच्य साहित्य का महत्व कम हो गया। 
7. नौकरी प्राप्त करने का अंग्रेजी शिक्षा को एक साधन मात्र (शिक्षा का मुख्य उद्देश्य) बना दिया। 
8. घोषणा-पत्र के अनुसार प्रान्तों में शिक्षा विभागों की स्थापना के फलस्वरूप शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण का शिकंजा कस गया। शिक्षा मशीनी प्रक्रिया के समान हो गई। उसके लचीलेपन और स्वच्छन्द गति में पर्याप्त कमी आ गई। 
9. धार्मिक शिक्षा की उपेक्षा के कारण भारतीय आध्यात्मवाद का विकास अवरूद्ध हो गया और वह अन्धकार के गर्त की ओर तेज गति से बढ़ता गया। 
10. व्यावहारिक रूप में व्यावसायिक शिक्षा नगण्य रही। उसका उद्देश्य नौकरी पाना रहा,न कि भारतीयों को स्वावलम्बी बनाना। 
11. विश्वविद्यालयों का स्वरूप भारतीय न होकर अंग्रेजी था। सीनेट के सदस्यों के शासन द्वारा मनोनीत किए जाने के फलस्वरूप उच्च शिक्षा पर पूर्ण सरकारी आधिपत्य हो गया।
12. पत्रक में प्राच्य साहित्य और संस्कृति के लिए मैकाले की भाषा का प्रयोग नहीं किया गया था, परन्तु भावनाओं में अधिक अन्तर नहीं था। पत्रक के अनुसार शिक्षा का मूल उद्देश्य पाश्चात्यवादी ज्ञान का प्रसार ही था। 
13. घोषणा-पत्र ने शिक्षा को साम्प्रदायिक भावनाओं से ऊपर रखने की यद्यपि संस्तुति की थी, परन्तु ईसाई धर्म की शिक्षा के प्रति समिति ने कोमल भावनाओं का प्रदर्शन किया। अर्थात् इस शिक्षा के प्रति निष्पक्ष न रहना। 
14. इस घोषणा-पत्र के अनुसार शिक्षा का बजट अंग्रेजी शिक्षा पर व्यय किया जाता था जिसके कारण अंग्रेजी शिक्षा का अधिक प्रसार होता था और अंग्रेजी स्कूलों की माँग में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती थी। 
15. वुड का घोषणा-पत्र भारतीय-शिक्षा के क्षेत्र में अब तक चले आए असन्तुलन को दूर न कर सका। अनुदान केवल उन्हीं को मिलता था जो पचास प्रतिशत व्यय की स्वयं व्यवस्था करते थे। 
16. शिक्षा ज्ञान के लिए नहीं, वरन् परीक्षा में उत्तीर्ण होकर नौकरी पाने का माध्यम मात्र बन कर रह गई। 
17. शिक्षा का ढाँचा पूर्णतः विदेशी ही रहा। 
18. अंग्रेजी माध्यम होने से विद्यार्थियों का बिना समझे विषय-वस्तु को रटना।

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