IGNOU BHIE 144 Solved Assignment in Hindi 2025-26 | भारत में इतिहास लेखन की परम्पराएँ

IGNOU BHIE 144 Solved Assignment in Hindi 2025-26 | भारत में इतिहास लेखन की परम्पराएँ (Free Answers)

इग्नू के छात्रों के लिए BHIE 144 Solved Assignment (भारत में इतिहास लेखन की परम्पराएँ) के सटीक और 100% सही उत्तर हिंदी में। IGNOU BA History (BAG/BAHIH) 2025-26 सत्र के लिए फ्री असाइनमेंट हल यहाँ प्राप्त करें।#IGNOU, #BHIE144, #SolvedAssignment, #IGNOUBAHistory, #IGNOU2025_26, #HistoryAssignment, #BHIE144Hindi, #IgnouHelp

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क्या आप इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के कला स्नातक (इतिहास) बी.ए. सामान्य (BAG) या बी.ए. ऑनर्स (BAHIH) के छात्र हैं? क्या आप BHIE 144 Solved Assignment in Hindi की तलाश कर रहे हैं? अगर हाँ, तो आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं।

इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपके लिए पाठ्यक्रम कोड बी.एच.आई.ई.-144 (BHIE-144: भारत में इतिहास लेखन की परम्पराएँ) का पूरा सत्रीय कार्य (Assignment) हल लेकर आए हैं। ये उत्तर नवीनतम सत्र 2025-26 के लिए तैयार किए गए हैं। हमने इन उत्तरों को बहुत ही सरल, व्यावहारिक और विश्लेषणात्मक शैली में लिखा है ताकि आपको परीक्षा और असाइनमेंट में अधिकतम अंक मिल सकें।

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आइए देखते हैं BHIE 144 Solved Assignment के सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर:


सत्रीय कार्य - I (BHIE 144 Assignment Part 1)

(निम्नलिखित वर्णनात्मक श्रेणी प्रश्नों के उत्तर लगभग 500 शब्दों में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 20 अंकों का है।)

प्रश्न 1: कालिदास और उनकी साहित्यिक कृतियों के बारे में आप क्या जानते हैं?

उत्तर:
प्राचीन भारत के इतिहास और साहित्य की बात हो, तो कालिदास का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्हें भारत का शेक्सपियर कहा जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, कालिदास गुप्त काल (लगभग चौथी-पाँचवीं शताब्दी ईस्वी) में चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के दरबार के 'नवरत्नों' में से एक थे। BHIE 144 के इस महत्वपूर्ण विषय के संदर्भ में, यह जानना जरूरी है कि कालिदास ने प्रत्यक्ष रूप से कोई 'इतिहास' की किताब नहीं लिखी, लेकिन उनकी कृतियों में तत्कालीन समाज, राजनीति, भूगोल और संस्कृति का जो सजीव चित्रण मिलता है, वह इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

कालिदास की साहित्यिक कृतियों को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है:

1. महाकाव्य:

  • रघुवंशम्: यह कालिदास का एक उत्कृष्ट महाकाव्य है जिसमें इक्ष्वाकु वंश (भगवान राम के वंश) के राजाओं का वर्णन है। राजा दिलीप से लेकर अग्नि वर्ण तक की वंशावली के माध्यम से कालिदास ने एक आदर्श राजा के कर्तव्यों (राजधर्म) को समझाया है। यह गुप्तकालीन राजनीतिक आदर्शों को समझने में मदद करता है।

  • कुमारसंभवम्: इसमें भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह और कार्तिकेय के जन्म की कथा है, जो तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं का सुंदर वर्णन प्रस्तुत करती है।

2. नाटक (रुपक):

  • अभिज्ञानशाकुंतलम: यह कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचना है। दुष्यंत और शकुंतला की कहानी के जरिए उन्होंने आश्रम व्यवस्था, राजदरबार की कार्यप्रणाली और सामाजिक नियमों का बेहतरीन चित्रण किया है।

  • मालविकाग्निमित्रम्: यह एक ऐतिहासिक नाटक है जो शुंग वंश के राजा अग्निमित्र की कहानी पर आधारित है। यह नाटक मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल की प्रामाणिक जानकारी देता है।

  • विक्रमोर्वशीयम्: यह तत्कालीन सामाजिक ताने-बाने और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को दर्शाने वाली पुरुरवा और उर्वशी की प्रेम कथा है।

3. खण्डकाव्य (गीतिकाव्य):

  • मेघदूतम्: ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से यह कृति बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें रामगिरि से लेकर अलकापुरी (हिमालय) तक के रास्तों, नदियों और नगरों का अचूक वर्णन है।

  • ऋतुसंहारम्: इसमें भारत की छह ऋतुओं का सजीव वर्णन है।

निष्कर्ष: एक इतिहासकार के नजरिए से कालिदास की कृतियाँ केवल कोरी कल्पनाएँ नहीं हैं। उनमें गुप्त काल की समृद्धि, नगर जीवन, महिलाओं की स्थिति, व्यापार, कला और प्रशासन की झलक साफ दिखाई देती है।


प्रश्न 2: "इतिहास नैतिक उपदेश प्रदान करता है" राजतरंगिणी के संदर्भ में टिप्पणी कीजिए।

उत्तर:
BHIE 144 (भारत में इतिहास लेखन की परम्पराएँ) में कल्हण का नाम इतिहास लेखन के जनक के रूप में पढ़ाया जाता है। 12वीं शताब्दी (1148-50 ई.) में कल्हण द्वारा रचित 'राजतरंगिणी' (राजाओं की नदी) को भारत का पहला प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है।

कल्हण का मानना था कि "इतिहास एक शिक्षक है, जो हमें अतीत की गलतियों से सीखकर भविष्य संवारने का नैतिक उपदेश देता है।" इस कथन को राजतरंगिणी के संदर्भ में निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है:

1. कर्मों का फल और नियति: कल्हण स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि अच्छे कर्मों का परिणाम अच्छा और बुरे कर्मों का परिणाम विनाशकारी होता है। उन्होंने राजा हर्ष जैसे क्रूर राजाओं के पतन का यथार्थवादी वर्णन इसलिए किया ताकि आने वाले शासक यह सबक लें कि सत्ता का घमंड पतन की ओर ले जाता है।

2. इतिहासकार एक निष्पक्ष न्यायाधीश के रूप में: कल्हण का मानना था कि एक सच्चे इतिहासकार को राग-द्वेष से मुक्त होना चाहिए। उन्होंने राजाओं की अच्छाइयों के साथ उनकी क्रूरता और कमजोरियों को भी लिखा, जो शासकों को यह नैतिक उपदेश देता है कि इतिहास सब कुछ दर्ज करता है।

3. शांत रस की प्रधानता: राजतरंगिणी का मुख्य रस 'शांत रस' है। कल्हण दिखाते हैं कि बड़े-बड़े साम्राज्य समय के साथ नष्ट हो जाते हैं। यह विचार राजाओं को संदेश देता है कि सत्ता स्थायी नहीं है, इसलिए प्रजा की भलाई में जीवन लगाना चाहिए।

4. भ्रष्टाचार का पर्दाफाश: कल्हण ने लालची और भ्रष्ट अधिकारियों (कायस्थों) की कड़ी आलोचना की है। वे राजाओं को चेतावनी देते हैं कि चापलूसों पर अंधा विश्वास राज्य के पतन का कारण बनता है।

निष्कर्ष: राजतरंगिणी सिर्फ कश्मीर का इतिहास नहीं है, बल्कि राजनीति विज्ञान और नैतिकता का दर्पण है, जो भारतीय इतिहास लेखन की परम्पराओं की गहराई को दर्शाता है।


सत्रीय कार्य - II (BHIE 144 Assignment Part 2)

(निम्नलिखित मध्यम श्रेणी प्रश्नों के उत्तर लगभग 250 शब्दों में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।)

प्रश्न 3: 'संतचरित लेखन' का आशय स्पष्ट कीजिए और संतचरित साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तर:
'संतचरित लेखन' (Hagiography) का अर्थ है संतों, सूफियों या धार्मिक महापुरुषों की जीवनियाँ लिखना। आधुनिक जीवनियों (Biographies) के विपरीत, संतचरित का मुख्य उद्देश्य तथ्यों की सटीकता से ज्यादा संत के प्रति श्रद्धा और भक्ति पैदा करना होता है।

संतचरित साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. चमत्कारों की प्रधानता: इस साहित्य में संतों के जीवन को चमत्कारों और अलौकिक घटनाओं से जोड़कर पेश किया जाता है ताकि जनता के मन में अटूट विश्वास जगे।

  2. आध्यात्मिक सत्य पर जोर: इसमें संत के उपदेशों और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को ऐतिहासिक तिथियों से ज्यादा महत्व दिया जाता है।

  3. सामाजिक इतिहास का स्रोत: BHIE-144 इतिहास लेखन में संतचरित सामाजिक इतिहास के लिए बहुत कीमती हैं। सूफी संतों के 'तजकिरा' से हमें उस समय के आम आदमी के जीवन, जाति व्यवस्था और लोक-संस्कृति का पता चलता है।

  4. श्रद्धा का साहित्य: चूँकि यह अनुयायियों द्वारा लिखा जाता है, इसलिए इसमें आलोचनात्मक दृष्टिकोण की कमी होती है और संत को एक आदर्श के रूप में चित्रित किया जाता है।

प्रश्न 4: क्या आप इस तर्क से सहमत है कि कुछ महत्वपूर्ण मामलों में बरनी ने बाद के इतिहासकारों को लगभग गुमराह किया है?

उत्तर:
हाँ, इग्नू के BHIE 144 पाठ्यक्रम के अनुसार, इस तर्क से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है कि जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तक 'तारीख-ए-फिरोजशाही' में बाद के इतिहासकारों को गुमराह किया। बरनी के अंदर कुछ गहरे पूर्वाग्रह (Biases) थे:

  1. कुलीनवर्गीय मानसिकता (Ashraf Bias): बरनी खुद को उच्च वर्ग (अशरफ) का मानता था। जब मोहम्मद बिन तुगलक ने योग्यता के आधार पर आम लोगों को पद दिए, तो बरनी ने उसे 'पागल' बता दिया। बाद के इतिहासकारों ने बिना जाँचे यही मान लिया।

  2. कट्टर धार्मिक दृष्टिकोण: बरनी के अनुसार राज्य शरिया के अनुसार चलना चाहिए। जो सुल्तान उलेमाओं की बात मानता (जैसे फिरोजशाह तुगलक), बरनी उसकी झूठी तारीफें करता था।

  3. कालक्रम की अशुद्धियाँ: बुढ़ापे में कमजोर याददाश्त के कारण बरनी ने घटनाओं की तारीखें और क्रम कई जगह गलत लिखे हैं।

निष्कर्षतः, बरनी का इतिहास 'तथ्यात्मक' कम और 'व्यक्तिगत नज़रिया' ज्यादा है, इसलिए इसका उपयोग सावधानी से करना चाहिए।

प्रश्न 5: डोमिंगो पायस द्वारा दिए गये विजयनगर के विवरण की चर्चा कीजिए।

उत्तर:
डोमिंगो पायस (Domingo Paes) एक पुर्तगाली यात्री था, जिसने 1520 ईसवी के आसपास राजा कृष्णदेवराय के शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य की यात्रा की थी। उसका यात्रा वृत्तांत विजयनगर के स्वर्ण युग का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है:

  1. शहर की भव्यता: पायस ने विजयनगर को रोम के समान विशाल, सुंदर और दुनिया के सबसे अमीर शहरों में से एक बताया।

  2. बाजार और अर्थव्यवस्था: उसने विजयनगर के बाजारों की तारीफ की जहाँ दुनिया भर का सामान (रेशम, घोड़े, मसाले) बिकता था।

  3. कृष्णदेवराय का व्यक्तित्व: पायस ने कृष्णदेवराय को एक आदर्श शासक, महान योद्धा और न्यायप्रिय बताया। उसने राजा की शारीरिक बनावट का भी सटीक वर्णन किया।

  4. वास्तुकला: पायस ने विजयनगर में पानी की व्यवस्था (टैंक और नहरें) और महानवमी डिब्बा जैसे विशाल निर्माणों का आँखों देखा हाल लिखा है।

यह विवरण विजयनगर की अपार समृद्धि और सांस्कृतिक ऊंचाई की पुष्टि करता है।


सत्रीय कार्य - III (BHIE 144 Assignment Part 3)

(निम्नलिखित लघु श्रेणी प्रश्नों के उत्तर लगभग 100 शब्दों में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 6 अंकों का है।)

6) मलफूजात साहित्य
'मलफूजात' अरबी शब्द है जिसका अर्थ है "कहे गए शब्द"। सूफी संतों और उनके शिष्यों के बीच की बातचीत के संकलन को मलफूजात साहित्य कहा जाता है (जैसे 'फवाइद-उल-फुआद')। BHIE 144 के संदर्भ में, यह दिल्ली सल्तनत के समय के आम लोगों के सामाजिक जीवन, समस्याओं और लोक-संस्कृति को जानने का एक बेहतरीन ऐतिहासिक स्रोत है।

7) बखर
'बखर' मराठी भाषा में लिखे गए ऐतिहासिक वृत्तांत हैं, जिनका विकास मराठा साम्राज्य (शिवाजी महाराज से पेशवा काल तक) के दौरान हुआ। इनमें राजाओं की वंशावली, युद्ध और बहादुरी के किस्से मिलते हैं (जैसे 'सभासद बखर')। अतिशयोक्ति के बावजूद, मराठा इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए बखर साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

8) इब्न बतूता
इब्न बतूता एक मोरक्कन यात्री था, जो 14वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में भारत आया। उसने अरबी भाषा में अपना यात्रा वृत्तांत 'रेहला' लिखा। उसका विवरण तत्कालीन भारत की डाक व्यवस्था, परिवहन, सती प्रथा, कृषि और सुल्तान के चरित्र को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।

9) सबाल्टर्न इतिहास लेखन
सबाल्टर्न (उपाश्रित) इतिहास लेखन की शुरुआत 1980 के दशक में रणजीत गुहा ने की थी। इसे "नीचे से इतिहास" भी कहा जाता है। पारंपरिक इतिहास के विपरीत, यह किसान, मजदूर, आदिवासी, दलित और महिलाओं की भूमिका और उनके संघर्षों को इतिहास के केंद्र में लाता है और आम जनता की भूमिका को महत्व देता है।

10) श्रम इतिहास
श्रम इतिहास (Labour History) इतिहास लेखन की वह शाखा है जो मजदूर वर्ग, उनके जीवन, संघर्षों और ट्रेड यूनियनों के विकास पर केंद्रित है। यह मानती है कि उद्योगों और अर्थव्यवस्था को खड़ा करने में असली भूमिका मजदूरों की है। इसमें काम के घंटे, मजदूरी और हड़तालों का अध्ययन किया जाता है।


निष्कर्ष (Conclusion)

प्रिय छात्रों, हमें उम्मीद है कि आपको यह IGNOU BHIE 144 Solved Assignment in Hindi (2025-26) काफी मददगार लगा होगा। इस ब्लॉग पोस्ट में दी गई 'भारत में इतिहास लेखन की परम्पराएँ' से जुड़ी सभी जानकारियाँ सटीक और IGNOU के मानकों के अनुसार तैयार की गई हैं।

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