समायोजन एवं कूसमायोजन : मनोविज्ञान (Psychology)

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मनोविज्ञान (Psychology) 

समायोजन एवं कूसमायोजन ( ADJUSTMENT ) 


•सामाजिक वातावरण के धरातल पर कई बार हमारे सामने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं जो हमें किसी न किसी रूप में मानसिक रूप से विचलित कर देती है । ऐसी परिस्थितियों के समय जब एक व्यक्ति अपने आप को सामजस्य में बनाए रखने की कोशिश करता है और नवीन प्रकार के व्यवहार को ग्रहण कर लेता है या सीख लेता है तो इसे समायोजन कहते हैं ।

समायोजन
सम= भली - भाति / अच्छी तरह से
आयोजन = व्यवस्था करना 

* अच्छी तरह से व्यवस्था कर परिस्थितियों के अनुकूल सांमजस्य स्थापित करने की प्रक्रिया है । 

समायोजन की परिभाषाएँ 

* बी एफ स्किनर - " समायोजन एक अधिगम प्रक्रिया है । " 
* एडलर - " समायोजन श्रेष्ठता प्राप्ति का आधार है । " 
* एच.सी. स्मिथ - अच्छा समायोजन यथार्थवादी व सन्तोषप्रद दोनों होते हैं । 
गेट्स व अन्य -6 
1. " समायोजन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने एवं वातावरण के मध्य सन्तुलन बनाये रखने के लिए अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है । " 
2. " असमायोजन , व्यक्ति और वातावरण में असन्तुलन का उल्लेख करता है । " 
* बोरिंग , लैगफील्ड एवं वेल्ड - " समायोजन वह प्रक्रिया है , जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और इन आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों में सन्तुलन रखता है । " 
* कुप्पुस्वामी - " समायोजन के फलस्वरूप प्रसन्नता होती है क्योंकि इससे संवेगात्मक द्वन्द्व और तनाव दूर हो जाते हैं । " 
* कौलमैन - " समायोजन तनाव के साथ व्यवहार करने व वातावरण के साथ सुसंगत संबधों को बनाने का प्रयास है । " 
* आइनजैक - " समायोजन वह अवस्था है जिसमें एक ओर व्यक्ति की आवश्यकता व दूसरी ओर वातावरण के अधिकारों में पूर्ण सन्तुष्टि होती है । " 
* ट्रेक्सल - " वह अवस्था जिसमें व्यक्ति जीवन के सभी पहलुओं से परिपूर्ण प्रसन्न व सन्तुष्ट रहता है । " 

समायोजन की प्रमुख विशेषताएँ 

* समायोजन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है । समायोजन व्यक्ति की आवश्यकता या अभिप्रेरणा से आरम्भ होती है । 
* समायोजन की प्रक्रिया व्यक्ति से सम्बन्धित होती है । 
* समायोजन जीवन की सबसे बड़ी सफलता है । 
* व्यक्ति की सफलता समायोजन पर निर्भर करती है । 
* समायोजन राष्ट्र , भाषा , संस्कृति , सभ्यता आदि पर निर्भर करता है । 
* समायोजन व्यक्ति को संवेदी समझ प्रदान करता है । 
* समायोजन में अनुकूलता और लोचशीलता पाई जाती है । 
* समायोजन एक गत्यात्मक ( गतिशील ) प्रक्रिया है । 
*समायोजन में परिस्थिति , व्यक्ति , वातावरण व आवश्यकता की भूमिका होती है । 

समायोजन के प्रकार 


* रचनात्मक समायोजन- इसमें व्यक्ति रचनात्मक क्रिया जैसे चित्र बनाकर समायोजन स्थापित करता है । 
उदा.- किसी व्यक्ति का समायोजन धार्मिक क्षेत्र गड़बड़ हो जाता है तो समाज में उपकारार्थ कुछ रचनात्मक कार्य करके अपना समायोजन कर लेता है । इस प्रकार व्यक्ति द्वारा लक्ष्यों को प्रतिस्थापन का तरीका प्रत्यक्ष समायोजन कहलाता है । 

* मानसिक मनोरचना समायोजन- अवांछनीय लक्षणों को वांछनीय लक्षणों में बदलना । कुछ ऐसी मानसिक मनोरचनाएँ होती है जिनके द्वारा समायोजन का कार्य प्रायः सभी सामान्य तथा असामान्य व्यक्ति करते है । 

* स्थानापन्न समायोजन- एक क्षेत्र में समायोजन स्थापित न कर पाने की स्थिति में व्यक्ति अपनी असफलता को दूसरो पर थोप देता है 
जैसे- आलसी छात्र परीक्षा असफल होने पर या तो अध्यापकों को दोष देगा कि उन्होंने ठीक से नहीं पढ़ाया या परीक्षक के दोषारोपण करेगा कि उन्हें ठीक से उत्तर पुस्तिकायें नहीं जांची होगी । ऐसा समायोजन अल्पकालिक संतोष प्रदान करता है । दैनिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के सामने निम्न प्रकार की परिस्थितियाँ आती रहती है । इन परिस्थितियों के समय यदि कोई व्यक्ति समायोजन नहीं कर पाता है तब वह पागल , असामाजिक , मनोरोगी या कुसमायोजित हो सकता है , इससे बचने के लिए समायोजन करना होता है । 
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समायोजन तन्त्र 

दैनिक जीवन में आने वाली परिस्थितिया निम्न हैं 
1. दबाव - जब कोई व्यक्ति अपने परिणाम या मान सम्मान को लेकर सोचता है तो वह बाह्य वातावरण या लोगों के विचारों से दबाव महसूस करने लगता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति का काम में अवथान नही हो पाता और उसका मन - मस्तिष्क अस्थिर हो जाता है । 

2. तनाव ( TENSION ) - गेट्स व अन्य - " तनाव असन्तुलन की दशा है जो व्यक्ति को अपनी उत्तेजित दशा का अंत करने के लिए प्रेरित करती है । " जब कोई व्यक्ति अपने किसी कार्य को समय पर पूरा नहीं करता तो उस कार्य के होने का दिन या समय जैसे - जैसे समीप आता जाता है तब उस व्यक्ति का तनाव बढ़ने लगता है । तनाव के समय व्यक्ति में सूझ कमजोर पड़ जाती है और वह क्रोध करने लगता है । 

3. द्वन्ध ( संघर्ष ) CONFLICTS - जब व्यक्ति दो अलग - अलग परिस्थितियों में फंस जाता है तब वह मानसिक संघर्ष में आ जाता है और निर्णय नहीं ले पाता कि क्या करे और क्या नहीं करे । जैसे कहावत भी है ' इधर गिरे तो कुआं और उधर गिरे तो खाई । द्वन्द्व की स्थिति में व्यक्ति को अन्तिम रूप से किसी एक परिस्थिति को चुनना आवश्यक हो जाता है । जैसे - एक लड़की को साड़ी और सूट दोनों पहनना पसन्द है लेकिन अन्तिम रूप से वह साड़ी और सूट में से पहनने के लिए किसी एक को चुनती है । 

सिग्मंड फ्रायड - “ ID.EGO तथा SUPER EGO में समन्वय का अभाव द्वन्द्व कहलाता है । " - 

उपागम - उपागम द्वंद्व / ग्राहा - प्राय अन्तःद्वन्द्व ( APPROACH - APPROACH CONFLICT ) - जब व्यक्ति के सामने दो ऐसे लक्ष्य आ जायें जो उसे समान रूप से आकर्षित करते हैं लेकिन चयन किसी एक का ही करना है , तब उपागम - उपागम द्वंद्व पैदा होता हैं । जैसे - उपन्यास / मूवी में से एक को चुनना । विवाह के लिए कई सुन्दर प्रस्तावों में से एक को चुनना । 
+    -

उपागम- परिहार द्वंद्व ( APPROACH - AVIDANCE CONFLICT ) - जब व्यक्ति के सामने ऐसा लक्ष्य आ जाये , जो जितना आकर्षित करता है , उतना भयभीत भी करता है । आकर्षण के कारण स्वीकार कर लिया जाये या भय के कारण छोड़ दिया जाये । इसको उपागम - परिहार द्वंद्व कहते हैं । जैसे- प्रेम विवाह और परिवार की अनुमति से किया गया विवाह ।
+     -
परिहार - परिहार द्वंद्व ( AVOIDANCE -AVOIDANCE CONFLICT ) - जब व्यक्ति के सामने दो ऐसे लक्ष्य आ जायें जिसे वह लेना नहीं चाहता लेकिन उसे एक लेना आवश्यक हो , तब परिहार - परिहार बंद होता है । जैसे- गणित में अरूचि लोने के कारण गणित को अनिवार्य विषय के रूप में लेने की इच्छा नही हैं परन्तु माता - पिता उसे इंजीनियर कोर्स में भेजने की इच्छा रखने के कारण उसे गणित दिलाना चाहते है । ( इथर गिर तो कुंआ उधर गिरे तो खाई ) 
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-क्रो एंव को - " द्वन्द्व इस स्थिति को व्यक्त करता है जब वातावरण में ऐसी शक्तियों का सामना करना पड़ता है जो इसकी इच्छा के विपरीत हो । " 
- डगलस व हौलेण्ड - " दो विरोधी विचार तथा विरोथी उद्देश्यों की वजह से उत्पन्न होने वाली कष्टदायक संवेगात्मक दशा द्वन्द्व है । 
- कर्षविन - " मानसिक द्वन्द्व अभिप्रेरणा का टकराव होता है । " 

4. दुश्चिता ( ANIKITY ) - जब अचेतन मन की बातें चेतन मन में आ जाती हैं तो व्यक्ति को पुरानी घटनाएं याद आने लगती है और उसके मन में मस्तिष्क में चिन्ता पैदा हो जाती हैं , इसे ही दुश्चिता कहते हैं । दुश्चिता के समय व्यक्ति अकेला नहीं रह पाता और वह समीपता के प्रयास करता है । चेतन तथा अचेतन के मध्य उत्पन्न होने वाली संघर्ष की स्थिति दुशिचत भग्नाशा की होगी  कहलाती है । अचेतन मन की स्मृति चेतन मन में नही आती है तब भी बालक दुश्चिता का शिकार होता है । जैसे - बालक समायोजन एवं कूसमायोजन ... को हिन्दी में कोई एक अवकाश पत्र याद था ( अचेतन मन ) अब यह अवकाश पत्र वाला प्रश्न पेपर में आ जाता है , ( चेतन मन ) तो उसे यह अवकाश पत्र याद नही आ रहा है तो बालक की स्थिति दुश्चिता की हो गई । 

- भग्नाशा / अवसाद / कुण्ठा ( FRUSTRATION ) - लक्ष्य में बाधा बनना भग्नाशा कहलाता है । जैसे - एक परीक्षार्थी रीट के पेपर में उत्तीर्ण हो जाता है अगले दिन राज्य सरकार का आदेश आता है कि Exam दोबारा होगा , तो बालक की स्थिति 
- कार्टर गुड - " किसी इच्छा या आवश्यकता की पूर्ति में बाधा के आने से उत्पन्न संवेगात्मक तनाव भग्नाशा कहलाता है । -कैरोल - " किसी अभिप्रेरक की सन्तुष्टि में आने वाली बाधा के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली स्थिति कुण्ठा है । " 
• जब किसी व्यक्ति को किसी कार्य के होने की पूरी उम्मीद या आशा होती है तब व्यक्ति उसके परिणाम के इंतजार में रहता हैं परन्तु कभी - कभी उसे सकारात्मक परिणामों की प्राप्ति नहीं होती तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को आशा या उम्मीद टूटने से भग्नाशा हो जाती है और वह कुण्ठित हो जाता है । कुण्ठित व्यक्ति अपने भाग्य को दोष देने लगता है और यह पागलपन की शुरूआत होती है । 
• उपर्युक्त परिस्थितियों के समय व्यक्ति को समायोजन ( ADJUSTMENT ) करने की आवश्यकता होती है क्योंकि समायोजन नहीं करने पर वह असामाजिक या पागल हो सकता है । 
• इसलिए मनोविज्ञान में समायोजन के उपाय प्रस्तुत किए गए हैं जिन्हें समायोजन तंत्र कहते हैं । 
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समायोजन के प्रत्यक्ष उपाय 
बाधा निवारण - जब एक व्यक्ति यह सोचता है कि मेरे कार्यों में कोई बाधा आ रही है तो वह व्यक्ति उस बाधा का निवारण करने के लिए कुछ ऐसे उपाय काम में लेता है जो एक प्रकार से अंधविश्वास के रूप में होते हैं लेकिन इनका उपयोग करने से व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त हो जाती है । जैसे -
छोटे बच्चों को काले मोतियों का नजरिया ( नजरबंद ) पहनावा , 
माथे पर काला टीका लगाना , 
घर पर काला कपड़ा या टायर टांग देना आदि । 
* मार्ग परिवर्तन - जब कोई एक व्यक्ति किसी कार्य में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो वह अपना प्रयास करता है और यदि अपने किसी प्रयास में सफल नहीं हो पाता तो वह उसी कार्य के लिए कोई दूसरा रास्ता चुनता हैं और सफलता प्राप्त करता है । जैसे- स्वाध्याय ( Scir Study ) से सफल नहीं होने पर प्रतियोगी कोचिंग को ज्वाइन कर लेता है । 
* लक्ष्य प्रतिस्थापना - जब एक व्यक्ति किसी बड़े लक्ष्य को लेकर प्रयास करता है परन्तु उसमें सफल नहीं हो पाता तो वह व्यक्ति उसी प्रकृति का छोटा लक्ष्य अपनाकर समायोजन करते हुए मानसिक शांति को प्राप्त करता है । जैसे -प्रथम श्रेणी शिक्षक भर्ती में असफल व्यक्ति द्वितीय श्रेणी शिक्षक बनकर संतोष की प्राप्ति कर लेता है । -IAS में चयनित न होने पर वह राज्य लोक सेवा आयोग में चयनित होकर संतोष की प्राप्ति कर लेता है । 
* निष्कर्ष निर्णय - जब व्यक्ति के समक्ष दो परिस्थितियां होती हैं और उनमें से किसी एक ही परिस्थिति को चुनना होता है , तब व्यक्ति एक परिस्थिति को चुनने का निर्णय लेता है और एक परिस्थिति को चुनने का निर्णय लेता है और एक परिस्थिति को छोड़ देता है । जैसे 
* एक ही दिन दो परीक्षाएं होने पर प्रतियोगी उस परीक्षा का चुनाव करता है जिसकी तैयारी उसने ज्यादा अच्छी तरह से की हुई - 
एक विषय की दो समान किताबें होती है और उनमें से वह उसको चुनता हो जो समझने में सरल हो और मूल्य भी कम हो । 

समायोजन के अप्रत्यक्ष उपाय - 

1.दमन ( REPRESSION ) - जब एक व्यक्ति अपनी इच्छाओं का दमन करते हुए समायोजन करता है । जैसे- एक बीमार व्यक्ति खाने पीने की कई वस्तुओं से परहेज रखता है । जैसे- एक परीक्षार्थी घर से बाहर किसी बड़े शहर में कोचिंग क्लासेज जॉइन करना चाहता है , परन्तु घर की आर्थिक स्थिति ठीक नही होने से वह घर पर ही रहकर Exam की तैयारी करता है । 
2.शमन ( SUPRESSION ) - जब एक व्यक्ति पूरी नहीं होने वाली इच्छाओं को भूलने का प्रयास करते हुए समायोजन करता है । जैसे- एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं मिली , तब वह यह कहकर भूल जाने का प्रयास करता है कि शायद मेरी किस्मत में सरकारी नौकरी है ही नहीं । 
3.दिवास्वप्न / मनतरंग / कल्पनातरंग ( DAYDREAMING ) - जाग्रत अवस्था में स्वप्न देखना / हवाई किले बनाना । इसके अन्तर्गत हम कल्पना में वह प्राप्त करने का प्रयास करते हैं जो वास्तविक रूप में प्राप्त नहीं कर पाते हैं । हकीकत में जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती कल्पना के माध्यम से क्षणिक सन्तुष्टि या सुख प्राप्त कर लेना ही दिवास्वप्न कहलाता है । 
4. नकारना - जब एक व्यक्ति यह सोचता है कि कोई कार्य या व्यवहार करने में वह सामर्थ्यवान नही है तो वह उस कार्य या प्रस्थिति ( पद ) को नकारते हुए समायोजन करता है । जैसे- एक प्रतियोगी REET / CTET को पास नही कर पाने के कारण प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक बनने को नकार देता है । 
5. उदातीकरण ( SUBLIMATION ) शोधनमार्गन्तीकरण / शुद्धिकरण मार्गन्तीकरण - जब बालक का कार्य असामाजिक हो और इस कार्य सामाजिक बन जाये तो उसे उदात्तीकरण कहते है । जैसे - रत्नाकर डाकू का वाल्मीकी बनना । कलिंग युद्ध के बाद अशोक का बौद्ध धर्म अपनाना । पत्नी प्रेम को तुलसीदास ने राम प्रेम में बदल दिया । पत्नी द्वारा अपमानित होने पर कालिदास ने दिल विख्यात साहित्य का सर्जन किया । 
-शृंगार तथा रसिक प्रवृत्ति से युक्त बालक बालिकाओं को उदात्तीकरण का सहारा लेकर अच्छे चित्रकार , मूर्तिकार , नाटककार , अभिनेता तथा अभिनेत्री , गायक एवं नृत्यांगना के रूप में प्रतिष्ठित होते अच्छी तरह देखा जा सकता है । 
• जब कोई सामाजिक व्यवस्था हमें अनुकूल प्रतीत नहीं होती तो हम उन सामाजिक व्यवस्थाओं में बदलाव करते हुए नवीन प्रकार के व्यवहार को अपना लेते हैं । जैसे  पहले समाज में अर्न्तजातीय विवाह नही होते थे परन्तु वर्तमान में इन्हें सरकारी तौर पर मान्यतायें हैं । 
• लड़ाई - झगड़ा करने वाला बालक मुक्केबाज / पहलवान बन जाता है । 
6. प्रक्षेपण ( PROJECTION ) - प्रक्षेपण का वास्तविक अर्थ है फेंकना , इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सिंगमण्ड फ्रायड ने किया , जब एक व्यक्ति अपनी गलती दूसरों पर आरोपित करते हुए समायोजन का प्रयास करता है , यह प्रक्षेपण कहलाता है । प्रक्षेपण की में स्थितियों होती है 
1. बालक कार्य नहीं करेगा और तर्क दे देगा । जैसे नाच न जाने ऑगन टेढ़ा । 
2 बालक कार्य करेगा और तर्क नही देगा । जैसे - सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के मैदान पर शून्य रन पर आउट हो जाता है तो और को जमीन पर मारता है । ( अपनी गलतियों को दूसरे पर आरोपित करना ) । 
-अन्य उदाहरण 
1. एक बालक स्वयं पढ़ाई अच्छे से नहीं करता और परीक्षा के बाद कहता है कि प्रश्न - पत्र पाठ्यक्रम से बाहर का आ गया 
2. एक कुरूप व्यक्ति को दूसरे में कुरूपता दिखाई देती है । 
3. नकल करते हुए पकड़ा जाने वाला विद्यार्थी यह कहकर अपने को बचाने का प्रयत्न करता है कि दूसरे भी नकल कर रहे है । 
7. प्रतिगमन ( प्रत्यावर्तन ) REGRESSION- जब व्यक्ति गम या अवसाद में होता है तो वह भूतकाल में जाकर ऐसे व्यवहार को अपनाता है जिससे कि उसका गम दूर हो जाए । 
- मार्गन - " जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए बाल्यावस्था में लौटने की प्रवृत्ति है । " जैसे - 
1 ) एक बुजर्ग व्यक्ति अपने पौते के साथ घुटने के बल चलता है । 
2 ) एक 11 वर्ष के बालक का अंगूठा चूसना , बिस्तर पर पेशाब करना । 
3 ) एक स्त्री का बच्चे जैसा रोना । 
4 ) एक व्यक्ति प्रेम विवाह में असफल हो जाने पर गुड़ियो के साथ खेलता है और उन्हें सजाने का प्रयत्न करता है । 8. प्रत्यागमन - जब एक व्यक्ति परिस्थितियों से दूर जाकर समायोजन करता है तो प्रत्यागमन कहलाता है । प्रत्यागमन 3 प्रकार का होता है - 
( a ) पलायन - विशिष्ट परिस्थिति को देखकर भागना अर्थात् जब व्यक्ति हमेशा - हमेशा के लिए किसी परिस्थितियों से दूर जाकर समायोजन करता है । जैसे गाँव में आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं । - पत्नी के मरने पर पति का संन्यासी बनना । - पुलिस की गाड़ी को देखकर चोर का भाग जाना । 
( b ) पृथक्करण - किसी परिस्थिति या विवाद के कारण कुछ समय के लिए परिस्थिति से दूर हो जाना । जैसे- सास - बहू के विवाद हो जाने पर जो समझदार होती है , कुछ समय के लिए इधर - उधर हो जाती है । 
( c ) विस्थापन - विस्थापन दो परिस्थितियों में होता है , 
1 ) जब व्यक्ति किसी के व्यवहार से दुःखी होकर कुछ समय के लिए बातचीत करना बन्द कर देता है । जैसे- दो मित्रों ने विवाद हो जाने पर कुछ समय के लिए बातचीत व मिलना - जुलना बन्द कर देते हैं । 
2 ) जब व्यक्ति अपने विचारों या भावनाओं को उच्च व्यक्तियों पर करने में असमर्थ होता है । तब वह अपने विचारों या भावनाओं को अपने निम्न या कमजोर व्यक्तियों पर करता है । तो विस्थापन कहलाता है । जैसे- एक अध्यापिका अपने बड़े अधिकारियों की डांट को घर पर अपने बच्चों पर मार - पीट कर निकालने का प्रयत्न करती है । मां - बाप की डांट को बालक आक्रोश से बगीचे के फूलों को माध्यम बनाता है । सास से झगड़ा होने पर बहु गुस्सा बर्तनो पर उतारती है । 
9 . प्रतिक्रिया निर्माण ( REACTION FOR MATION ) / मनोरचन - विपरीतात्मक निर्माण ( अपने कार्य को मनवाने के लिए बहाने बनाना । ) जब कोई व्यक्ति अपनी मौलिकता से हटकर किसी प्रतिक्रिया का निर्माण करता है । जैसे- बगुला भगत होना , मुंह में राम बगल में छुरी , बालक सुंदर नही बनने पर काली सुंदरता का प्रशंसा करता है , किशोरी बाल लंबे न होने पर बाब हेयर अपना लेती है । 
10.युक्तिकरण ( RATIONALIZATION ) / औचित्य स्थापन / तार्किककरण / परिमेयकरण / तर्क सगतिकरण / पुष्टिकरण - कार्य करने पर मिली असफलता तर्क संगतिकरण कहलाती है । - अपनी असफलता के पीछे तर्क संगत कारण तलाश करना और औचित्य स्थापित करना / जब एक व्यक्ति को अपना मान - सम्मान गिरते हुए नजर आता है तो वह संबधित कार्य या लक्ष्य में ही खोट बता देता है । जैसे 
1 ) नीबू मीठे हैं । 
2 ) अपनी पसंद की लड़की ने शादी के लिए मना किया तो उसी लड़की में कमी बताना । 
3 ) अंगूर खट्टे है । 
4 ) सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के मैदान पर शून्य रन पर आउट हो जाते हैं , तो उनसे पूछा गया आपने रन क्यों बनाये तो तेंदुलकर कहते है मैदान सही नहीं था । 
5 ) एक बैंक क्लर्क प्रमोशन न मिलने पर यह कहता है कि अच्छा है मैनेजर बनने में तो फंस ही जाता अब देखो मेरे उपर कोई जिम्मेदारी नही है , अपने तो मजे ही मजे है । 
6 ) एक नेता विधानसभा चुनाव हार जाने पर कहता है कि राजनीति बड़ी गंदी चीज है , क्योंकि यह जातिवाद पर आधारित है । 
11.आत्मीकरण / तावात्मीकरण ( IDENTIFICATION ) - इसका वास्तविक अर्थ बड़े व्यक्ति जैसा व्यवहार करना । जब कोई व्यक्ति किसी एक क्षेत्र में बार - बार असफल होता है तो वह अपने आप को प्रकार के किसी दूसरे व्यक्ति से जोड़कर बताने लगता है । जैसे- एक 10 वीं कक्षा में बार - बार अनुत्तीर्ण विद्यार्थी अपने आपकी तुलना सचिन तेदुलकर से करने लगता है और कहता है कि सचिन भी 10 वीं फैल है । इसमें व्यक्ति समायोजन स्थापित करने के लिए अपना परिचय किसी ऐसे व्यक्ति से स्थापित करता है जिसकी समाज में कोई पद या प्रतिष्ठा होती है । जैसे- मेरे चाचा विधायक है और मैं उनका भतीजा हूँ । तेरे नाम मूवी देखकर कई किशोरों ने अभिनेता सलमान खान की तरह अपने लंबे बाल रख लिये । 
नोट किशोरावस्था में इस युक्ति का सर्वाधिक प्रयोग देखा जाता है । 
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,क्षतिपूरक ( Compensation ) 
* जब एक व्यक्ति में किसी प्रकार की कोई कमी होती है तो उस कमी की पूर्ति के लिए वह जो उपाय काम में लेता है । जैसे- एक कम ऊँचाई की लड़की ऊंची हील के सैंडल पहनना पसन्द करती है । क्षतिपूरक उपाय दो प्रकार के होते हैं 
1. प्रत्यक्ष सतिपूरक उपाय - जब एक व्यक्ति , जिस क्षेत्र की कमी है , उसी क्षेत्र से पूरी करता है । जैसे - अंग्रेजी में कमजोर विद्यार्थी अंग्रेजी में ही अधिक मेहनत करते हुए अच्छे अंक प्राप्त करता है । 
2. अप्रत्यक क्षतिपूरक उपाय - जब व्यक्ति एक क्षेत्र की कमी दूसरे क्षेत्र से पूरी करता है । जैसे- अंग्रेजी की कमी की पूर्ति के लिए गणित में अधिक अंक लाकर अंग्रेजी की कमी पूरी करता है । - विकलांग बालक कक्षा में प्रथम स्थान लाकर समायोजन स्थापित करता है । - रविन्द्र जैन अंधे थे लेकिन उन्होने इसकी क्षतिपूर्ति संगीत में प्रसिद्धि पाके पूरी की । 

आक्रामकता ( Aggression ) 

* इसका शाब्दिक अर्थ सीधे - सीधे किसी पर हावी होना जब एक व्यक्ति क्रोथ की स्थिति में होता है तो वह अपने क्रोध को शांति करने के लिए जो उपाय काम में लेता है , आक्रामक उपाय कहलाते हैं - 
1. प्रत्यक्ष आक्रामक उपाय - जिस परिस्थिति के द्वारा क्रोध उत्पन्न होता है उसी परिस्थिति पर अपना क्रोध उतारते हुए समायोजन करना । जैसे - 
दो बालकों में विवाद हो जाने पर दोनों एक - दूसरे को मारने पीटने लगते हैं । -
ईट का जवाब पत्थर से 
2. अप्रत्यक्ष आक्रामक उपाय - जिस परिस्थिति के कारण व्यक्ति में क्रोध उत्पन्न होता है , उसका मुकाबला नही कर पाने पर किसी अन्य परिस्थिति पर क्रोध उतारना । जैसे - अध्यापक के डॉटने पर विद्यार्थी का उस समय कुछ न कहना और बाद में उनकी गाड़ी पिंचर कर देना । ( इस स्थिति को विस्थापन में भी अपना सकते है । ) 

* अस्वीकरण ( Denial ) - इसका वास्तविक अर्थ एक व्यक्ति पूरी तरह से वास्तविकता को स्वीकार करना नकार देता है । जैसे- नशीले पदार्थ का सेवन करने वाला व्यक्ति शादी से पहले अपने दोषों को छिपाता है । HIV एड्स से ग्रसित रोगी पूरी तरह से अपने रोग को नकार देता है । 

* रूपान्तीरकरण ( Conversion ) - ब्राउन ने अनुसार " रूपान्तीकरण के माध्यम से दमित मूल प्रवृत्ति की शक्तियां शारीरिक रोगो से क्रियात्मक लक्षणों के रूप में प्रकट होती है । " किसी क्षेत्र में असफलता के भय के कारण अचेतन मन की सहायता से हम ऐसी परिस्थितियों पैदा कर देते कि वे असफलता के प्रति कोई सशक्त बहाना मिल जाता है । जैसे- परीक्षा के ठीक बुखारा आ जाना 

* अन्तःक्षेपण ( Introjection ) - दूसरे की विशेषताओं को अपने अंदर देखना । जैसे- मैं ही ईश्वर हूँ । * विलोपन / प्रत्याहार / विनिर्मित व्यवहार ( With Drawaly- आने वाली असफलताओं से डरकर उसी स्थिति से अपने आप को अलग कर देना । जैसे- परीक्षा में असफलता के भय से परीक्षा देने न जाना । 

* प्रतिस्थापन ( Subsititution ) - इसमें मूल लक्ष्य या इच्छा के स्थान पर अन्य लक्ष्य या इच्छा को अपनाना । जैसे- एक व्यक्ति S.I. बनने का लक्ष्य बनाता है , असफल होने पर कांस्टेबल बनकर संतुष्टि प्राप्त करता है । एक व्यक्ति डॉक्टर बनने का लक्ष्य बनाता है असफल होने पर कंपाउडर बनकर संतुष्टि प्राप्त करता है । 
नोट रक्षा युक्तियां का प्रयोग अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है । 
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कुसमायोजन ( Mal Adjustment ) 

* समायोजन की विपरीत स्थिति कुसमायोजन या विसमायोजन की स्थिति कहलाती है । 
* यह अंग्रेजी के दो शब्दों Mal + Adjustment से मिलकर बना है । Mal का अर्थ बुरा तथा Adjustment का अर्थ है समायोजन 
* समायोजन के विरूद्ध इस स्थिति में जीवित प्राणी अपनी आवश्यकताओं और उन आवश्यकताओं की दृष्टि को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों में संतुलन नही रख पाता है । इस स्थिति में ऐसी प्रतिक्रियायें दिखलाई पड़ती है । इस स्थिति में ऐसी प्रतिक्रियायें दिखलाई पड़ती है । जिनमें यह संतुलन बनने की उपेक्षा और भी बिगड़ता है । इस प्रकार की प्रतिक्रियाओं में वे सभी व्यवहार आते है जो असामान्य कहे जा सकते है । 
* गेट्स एवं अन्य - " असमायोजन व्यक्ति और उसके वातावरण में असन्तुलन का उल्लेख करता है । " 

कुसमायोजन की विशेषताए 

* मानसिक रूप से अस्वस्थ 
* इर्ष्या , द्वेष बदले की भावना का शिकार नकारात्मक सोच 
* कुण्ठा व निराशा का शिकार 
* आकांक्षा की कमी 
* मानसिक रोगों का शिकार 
* बाधाओं को देखकर घबरा जाना 
* व्यवहार में असमान्यता 

कुसमायोजन के लक्षण

* हकलाना 
* सिर व चेहरे को नोचना या मुँह को सिकोड़ना 
* नाखून कुतरना ( काटना ) व अंगुलियां चटखाना 
* पैर हिलाना या पैरों को ठोकर मारना 
* बैचैनी ( पसीना आना ) 
* आकमणकारी प्रवृत्ति 
* नकारात्मक विचार धारा  
* अत्यधिक चिन्ताग्रस्त 
* भय हीनता का भाव या बाह्य रूप डरपोक 
* घृणा का भाव 
* तनाव 
* निरन्तर दुश्चिन्ता 

कुसमायोजन के कारण 

* शारीरिक कारण- 
( 1 ) कमजोरी , ( 2 ) भद्दापन , ( 3 ) संवेदनशीलता , ( 4 ) बाधा प्रस्तता , ( 5 ) लम्बी बीमारी व चोट , ( 6 ) व्यक्तिगत विभिन्नताएँ का अभाव , ( 7 ) भावात्मक धक्का । 

* सामाजिक कारण- ( 1 ) धार्मिक विश्वास व आस्था , ( 2 ) विघटित परिवार , ( 3 ) माता - पिता का व्यवहार , ( 4 ) दस्तक संतान , ( 5 ) माता - पिता के बीच सम्बन्ध , ( 6 ) भाई - बहिनों के बीच सम्बन्ध , ( 7 ) निर्धनता , ( 8 ) रोजगार की असुरक्षा , ( 9 ) जातिगत विभेद । 

विद्यालयी कारण- ( 1 ) कक्षा का वातावरण , ( 2 ) विद्यालय के सदस्यों का आपसी सम्बन्ध , ( 3 ) परीक्षा पद्धति , ( 4 ) शिक्षकों की दलबंदी , ( 5 ) पाठ्यक्रम संबंधी खामियां , ( 6 ) शिक्षकों के प्रशिक्षण में दक्षता का अभाव , निर्धनता , ( 8 ) रोजगार की असुरक्षा , ( 9 ) जातिगत विभेद 

समायोजन में अध्यापक की भूमिका 

- शिक्षा प्रणाली में सुधार 
-परीक्षा - प्रणाली में सुधार 
श्रमदान व रचनात्मक कार्यों का आयोजन करना
विद्यालय को राजनीतिक गुटबन्धी से अलग करना 
शिक्षक - अभिभावक सम्पर्क 
क्रियात्मक एंव खेलविधि द्वारा शिक्षण कार्य कराना 
नैतिक एंव मूल्य शिक्षा 
विद्यालय में स्वस्थ वातावरण का निर्माण 
छात्रों के विचारों एवं भावनाओं को महत्व देना 
निष्पक्ष एवं लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाना 
बिना कारणों के जाने छात्रों को दण्डित न करना 
सहयोग एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना  
छात्रों द्वारा किये गये कार्यों की प्रशंसा व सराहना करना
पाठ्यसहगामी कियाओं का आयोजन करना 
विद्यार्थियों को संवेग नियंत्रण एवं समायोजन की शिक्षा देना । 
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