कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर : Computer Software

कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर 
( Computer Software ) 

कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर Computer Software, हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर Hardware & Software, सॉफ्टवेयर के प्रकार Types of Software, सिस्टम सॉफ्टवेयर System Software, सिस्टम सॉफ्टवेयर के कार्य , ऑपरेटिंग सिस्टम Operating System, यूटिलिटी प्रोग्राम (Utility Program,प्रोग्रामिंग भाषाएं ( Programming Languages, भाषा संसाधक Language Translator, कम्पाइलर, इन्टरप्रेटर, असेम्बलर, वर्ड प्रोसेसर ( Word Processor, यूटिलिटी सॉफ्टवेयर Utility Software, फोल्डर / फाइल मैनेजमेन्ट टूल , विण्डो एक्सप्लोरर , डिस्क मैनेजमेन्ट टूल ( Disk Management Tool, डिस्क को डिफ्रेगमेन्ट Defragment ) करना, स्कैनडिस्क दूल Scandisk Tool, वायरस स्कैनर / क्लीनर Virus Scanner / Cleaner, वायरस आने की संभावना, एंटीवायरस प्रोग्राम Antivirus Program, कम्प्रेशिंग Compressing, इनक्रिप्शन / डिक्रिप्शन टूल ( Encryption / Decryption Tools
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कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर : Computer Software


प्रस्तावना ( Introduction ) 
विगत वर्षों मे व्यावसायिक प्रोग्रामिंग ने विभिन्न उन्नत किस्म के सॉफ्टवेयर एवं प्रोग्राम की सहायता से हमारे डेस्कटॉप कम्प्यूटरों को किसी भी प्रकार का कार्य करने की सक्षमता प्रदान की है । यह पाठ समर्पित है सॉफ्टवेयर को जिसने कम्प्यूटर को एक घरेलू नाम देने का उत्कृष्ट कार्य किया है । कम्प्यूटर का कार्य दो भागो से संचालित होता है ।  कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, computer software in hindi, 
हार्डवेयर ( Hardware ) 
सॉफ्टवेयर ( Software ) 

हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर ( Hardware & Software )
हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर मिलकर एक सम्पूर्ण तन्त्र का निर्माण करते हैं । कम्प्यूटर तन्त्र के अन्तर्गत जो भी उपकरण , वस्तुएँ , प्रोग्राम आदि आते है , वे सभी या तो हार्डवेयर के अन्तर्गत आते हैं या फिर सॉफ्टवेयर के अन्तर्गत । अतः इन दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है । कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, computer software in hindi,

हार्डवेयर ( Hardware ) : - कम्प्यूटर सिस्टम के वे सभी भौतिक ( Physical ) एवं मूर्त ( Tangible ) भाग जिन्हें हम देख सकते हैं तथा छू भी सकते हैं , हार्डवेयर कहलाते हैं । सी.पी.यू. , की - बोर्ड , माउस , प्रिन्टर , स्पीकर आदि हार्डवेयर के उदाहरण है । इन सभी भागों को हम देखने के साथ - साथ छू भी सकते हैं । कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, computer software in hindi,
सॉफ्टवेयर ( Software ) : - कम्प्यूटर से कार्य करवाने के लिए हमें कम्प्यूटर को बताना होगा कि उसे क्या करना है । इस कार्य के लिए हमें कम्प्यूटर को निर्देश देने पड़ते हैं । इन निर्देशों को ही सॉफ्टवेयर कहा जाता है । इन निर्देशों के समूह को प्रोग्राम भी कहा जाता है । कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, computer software in hindi,
सॉफ्टवेयर ही हार्डवेयर को क्रियाशील बनाता है । कोई भी हार्डवेयर तभी कार्य करता है , जब उसे उससे सम्बन्धित सॉफ्टवेयर से निर्देश मिलते है । सॉफ्टवेयर इलेक्ट्रॉनिक रूप में होते है जिन्हें देखा या छुआ नहीं जा सकता । कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, computer software in hindi,

सॉफ्टवेयर के प्रकार ( Types of Software ) 
सॉफ्टवेयर का उपयोग कम्प्यूटर तथा उपयोगकर्ता के मध्य की क्रियाओं को संचालित करने के लिये किया जाता है तथा इनका उपयोग किसी कार्य को कम्प्यूटराइज्ड करने के लिये भी किया जाता है । ये तीन प्रकार के होते हैं
1 सिस्टम सॉफ्टवेयर ( System Software ) 
2 एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर ( Application Software ) 
3 यूटिलिटी सॉफ्टवेयर ( Utility Software ) 

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सॉफ्टवेयर के प्रकार

सिस्टम सॉफ्टवेयर

एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर

1 ऑपरेटिंग सिस्टम

(Ms-Dos, Windows, Unix)

यूटिलिटी प्रोग्राम

(Disk Recovery Program, Data Backup Program )

प्रोग्रामिंग भाषाएं 

(बेसिक , कोबोल , फोरट्रान , पास्कल , सी , जावा , ऑरेकल)

भाषा संसाधक

(कम्पाइलर, इन्टरप्रेटर, असेम्बलर)

( 1 ) वर्ड स्टार (Word Star)

( 2 ) एम . एस . वर्ड (M.S. Word)

( 3 )  वर्ड परफेक्ट (Word Perfect) 

( 4 ) सॉफ्टवर्ड (Soft Word) 

( 5 ) अक्षर (Akshar)

सिस्टम सॉफ्टवेयर ( System Software ) 
कम्प्यूटर को संचालित करने वाले सॉफ्टवेयर , जो कम्प्यूटर पर किसी प्रोग्राम के क्रियान्वन के लिए आवश्यक होते हैं , सिस्टम सॉफ्टवेयर कहलाते हैं । ये कम्प्यूटर को अधिक प्रभावशाली एवं उपयोगी बनाते हैं।सिस्टम सॉफ्टवेयर प्रोग्रामो का वह समूह है जो कि कम्प्यूटर के भौतिक भागों तथा सॉफ्टवेयर को नियन्त्रित करता है । सिस्टम सॉफ्टवेयर के अभाव में कम्प्यूटर पर एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग नहीं किया जा सकता है । सिस्टम सॉफ्टवेयर कम्प्यूटर विशेषज्ञों द्वारा तैयार किये जाते हैं । ये कम्प्यूटर तन्त्र का एक अत्यावश्यक भाग है।यह कम्प्यूटर उपयोगकर्ता तथा कम्प्यूटर हार्डवेयर के मध्य की क्रियाओं को नियन्त्रित करता है तथा यह एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर को भी क्रियान्वित करता है इसलिये इसे एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का आधार भी कहा जाता है ।कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, computer software in hindi, 

सिस्टम सॉफ्टवेयर के कार्य
1 सिस्टम सॉफ्टवेयर अन्य सभी सॉफ्टवेयरों का निष्पादन करता है । 
2 यह उपयोगकर्ता तथा कम्प्यूटर हार्डवेयर के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता है । 
3 इसका उपयोग विभिन्न सॉफ्टवेयरों के निर्माण के लिये किया जाता है । 
4 कम्प्यूटर स्त्रोतों जैसे मैमोरी , प्रोसेसर , इनपुट आउटपुट डिवाइस को नियन्त्रित करता है । 
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सिस्टम सॉफ्टवेयर में अग्रलिखित प्रोग्राम सम्मिलित होते हैं : 
1 ऑपरेटिंग सिस्टम ( Operating System ) 
2 यूटिलिटी प्रोग्राम ( Utility Program ) 
3 प्रोग्रामिंग भाषाएं ( Programming Languages ) 
4 भाषा संसाधक ( Language Translator ) 
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ऑपरेटिंग सिस्टम ( Operating System ) : 
ऐसे प्रोग्रामों का समूह जो कम्प्यूटर के समस्त कार्यों का संचालन करता है , ऑपरेटिंग सिस्टम कहलाता है । यह कम्प्यूटर और उपयोगकर्ता ( User ) के बीच योजक कड़ी भी होता है । जैसे ही यूजर कम्प्यूटर ऑन करता है , ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर की मैमोरी में संग्रहित हो जाता है और फिर कम्प्यूटर की समस्त क्रियाओं का संचालन करता है । MS - DOS , WINDOWS , UNIX आदि कुछ प्रचलित ऑपरेटिंग सिस्टम हैं । 
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सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम ( Single User Operating System ) - वे ऑपरेटिंग सिस्टम जो एक उपयोगकर्ता ( यूजर ) का प्रबन्धन रखते है सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम कहलाते है जैसे डॉस ( DOS ) , विन्डोज ।
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मल्टीयूजर ऑपरेटिंग सिस्टम ( Multi User Operating System ) वे ऑपरेटिंग सिस्टम जो कि एक से अधिक उपयोगकर्ताओ ( मल्टीयूजर ) का प्रबन्धन रखते है मल्टीयूजर ऑपरेटिंग सिस्टम कहलाते है जैसे यूनिक्स । 
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ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रमुख कार्य ( Main Functions of Operating System ) 
1. स्मृति प्रबन्धन ( Memory Management ) - किसी भी प्रोग्राम तथा उससे समबन्धित डाटा को मैमोरी में कहाँ रखना है तथा कहाँ से लाना है इसका निर्धारण ऑपरेटिंग सिस्टम ही करता है । 
2 फाइल प्रबन्धन ( File Management ) - इसके अन्तर्गत फाइल को उसके नाम से संग्रह तथा वापिस लाने का कार्य किया जाता है । 
3 निवेश निर्गम प्रबन्धन ( Input Output Management ) - इसके अन्तर्गत कम्प्यूटर में डाटा देने अथवा कम्प्यूटर से डाटा लेने के लिये काम आने वाली युक्तियों ( Devices ) का प्रबन्धन रखता है । 
4 यूजर इन्टरफेस ( User Interface ) - इसके अन्तर्गत ऑपरेटिंग सिस्टम उपयोगकर्ता के साथ समबन्ध रखता है जिससे उपयोगकर्ता का काम सरल हो जाता है । 
5 यूटिलिटीज ( Utilities ) - ये प्रोग्राम उपयोगकर्ता को कार्यों की जटिलताओं से दूर करवा देते हैं । 
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यूटिलिटी प्रोग्राम ( Utility Program ) : ये प्रोग्राम कम्प्यूटर के विभिन्न भागों के रख - रखाव तथा मरम्मत का कार्य करते हैं । उदाहरण - डिस्क रिकवरी प्रोग्राम , डाटा बैकअप प्रोग्राम आदि । 
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प्रोग्रामिंग भाषाएं ( Programming Languages ) : कम्प्यूटर को दिए जाने वाले निर्देश कम्प्यूटर की भाषा में ही दिए जाते हैं , क्योंकि कम्प्यूटर अपनी भाषा ही समझता है , मनुष्य की भाषा नहीं । आज विभिन्न विशेषताओं वाली विविध कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाएं उपलब्ध हैं । प्रत्येक भाषा के अपने मानक और विशिष्ट नियम हैं । बेसिक , कोबोल , फोरट्रान , पास्कल , सी , जावा , ऑरेकल आदि प्रोग्रामिंग भाषाओं के कुछ उदाहरण है । 
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भाषा संसाधक ( Language Translator ) ये ऐसे प्रोग्राम हैं जो एक भाषा में निर्देश स्वीकार कर अन्य भाषा में उसके समतुल्य निर्देश तैयार करते हैं।कम्पाइलर ( Compiler ) , इन्टरप्रेटर ( Interpreter ) , असेम्बलर ( Assembler ) भाषा संसाधक के कुछ उदाहरण है । 
कम्पाइलर - यह एक सिस्टम सॉफ्टवेयर है जिसका उपयोग उच्च स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषा को मशीनी भाषा मे परिवर्तित करने के लिये किया जाता है कम्पाइलर पूरे प्रोगाम को एक साथ कम्पाइल करता है तथा विभिन्न त्रुटियों को उनके लाइन नम्बर के साथ प्रदर्शित करता है कम्पाइलर द्वारा प्रोग्राम निष्पादन के समय प्रोग्राम का मैमोरी मे होना जरुरी नहीं है । 
इन्टरप्रेटर वे भाषा प्रोसेसर जो उच्च स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषा को पंक्ति दर पंक्ति मशीनी भाष मे परिवर्तित करते हैं इन्टरप्रेटर कहलाते हैं । किसी भी पंक्ति मे त्रुटि होने पर वह तत्काल प्रदर्शितकर देता है । इन्टप्रेटर द्वारा प्रोग्राम निष्पादन के समय प्रोग्राम का मैमोरी में होना आवश्यक है । 
 - यह असेम्बली भाषा में लिखे प्रोग्राम को मशीनी भाषा में परिवर्तित करता है । 
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एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर ( Application Software ) 
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों का वह समूह है जो किसी विशेष तथा निश्चित कार्यों को करने के उद्देश्य से बनाए गए हो । कार्य के आधार पर इनका निर्माण किसी भी भाषा में किया जा सकता है । डॉक्टर , इंजीनियर , डिजाइनर , एडवोकेट आदि को अपनी भिन्न आवश्यकताओं हेतु भिन्न - भिन्न प्रकार के प्रोग्रामों की आवश्यकता होती है । ये पेशेवर व्यक्ति एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के प्रयोग से अपने कार्यों का निष्पादन बहुत ही बेहतर ढंग से कर सकते हैं । आज बैंकिंग , बीमा , फैक्टरी , अस्पताल , इंजीनियरिंग आदि में इनका काफी उपयोग होने लगा है । शिक्षा बोर्ड एवं विश्वविद्यालयों द्वारा परीक्षा परिणाम तैयार करने , कार्यालयों में वेतन बिल बनाने के लिए भी विभिन्न एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाता है । ये प्रोग्राम कम्प्यूटर को विशिष्ट कार्य करने की सक्षमता प्रदान करते है जैसे वर्ड प्रोसेसिंग , इन्वेन्ट्री कन्ट्रोल , पे - रोल , रेल्वे आरक्षण आदि ये सभी सॉफ्टवेयर इस श्रेणी के अन्तर्गत आते है । 
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वर्ड प्रोसेसर ( Word Processor ) 
    वर्ड प्रोसेसर एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो शब्दों में लिखे गधांश के ऊपर कार्य कर सकें । किसी भी पत्र अथवा गद्यांश को टाइप करके इस प्रकार से प्रदर्शित करना कि वह सुन्दर दिखे साथ ही साथ पढ़ने में भी आसान हो । ये कार्य वर्ड प्रोसेसर द्वारा किये जाते है । कम्प्यूटर की सहायता से वर्ड प्रोसेसर द्वारा हम वे सभी कार्य कर सकते हैं जो कि एक व्यक्ति पैन , कागज , शब्दकोष , द्वारा कर सकता है । ये कार्य कम्प्यूटर द्वारा तीव्र गति से सम्पादित किये जा सकते हैं । कम्प्यूटर पर वर्ड प्रोसेसर द्वारा टाइप किये पत्र का प्रारूप अच्छा दिखेगा , पढ़ने योग्य या पढ़ने में आसान होगा । बाजार में कई प्रकार के प्रोग्राम उपलब्ध हैं जो पत्र टाइप करने अथवा पत्र को व्याकरण के अनुसार अच्छे तरीके से लिखने में मदद करते हैं । 
    वर्ड प्रोसेसर में साधारणतः निम्न प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध होती हैं जो आवश्यकतानुसार उपयोग में ली जा सकती हैं । 
( 1 ) टाइप किये गये शब्दों का रंग , आकार व आकृति बदलना । 
( 2 ) शब्दों के नीचे रेखा खींचना , शब्दों को गहरे करना अथवा शब्दों को तिरछे कर देना । 
( 3 ) विभिन्न पंक्तियों के प्रथम अक्षरों या अन्तिम अक्षरों को एक सीध में रखना या अक्षरों को पंक्ति के बिल्कुल मध्य में रखना । 
(4) शब्दों की स्पेलिंग की गलतियाँ दूर करना करने की क्षमता । 
( 5 ) पेज के चारों तरफ बॉर्डर बनाना ।
( 6 ) विभिन्न पंक्तियो को वर्णक्रमानुसार व्यवस्थित करना । 
(7) प्रत्येक पेज पर हैडर या फुटर डालना । 
( 8 ) विभिन्न प्रकार के चित्र / ग्राफ डालना आदि । 

    इसके अतिरिक्त भी विभिन्न प्रकार की सुविधाएं होती हैं । जिनके बारे में हम माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में पढ़ेंगे । इन सुविधाओं का उपयोग कर हम विभिन्न प्रकार के कार्य जैसे व्यवसायिक पत्र लेखन , समाचार पत्र का सम्पादन , साधारण पत्र लेखन आदि कार्य आसानी से कर सकते हैं ।बाजार में विभिन्न प्रकार के वर्ड प्रोसेसर उपलब्ध हैं । उनमें कुछ मुख्य निम्न है-
( 1 ) वर्ड स्टार ( Word Star )
( 2 ) एम . एस . वर्ड ( M.S. Word )
( 3 )  वर्ड परफेक्ट ( Word Perfect ) 
( 4 ) सॉफ्टवर्ड ( Soft Word ) 
( 5 ) अक्षर ( Akshar )  

यूटिलिटी सॉफ्टवेयर ( Utility Software ) 
    वे प्रोग्राम जो कम्प्यूटर सिस्टम और सॉफ्टवेयर के रख - रखाव तथा मरम्मत के लिये विकसित किये जाते है यूटिलिटी सॉफटवेयर कहलाते है । ये प्रोग्रामों में एडिटिंग करने , उनकी त्रुटियाँ दूर करने आदि कार्य करते है । यूटिलिटी प्रोग्राम को सर्वर ( Server ) प्रोग्राम भी कहते है । 
    ये सॉफ्टवेयर समय - समय पर कम्प्यूटर पर चलकर कम्प्यूटर की मैमोरी को गतिशील व अधिक आंकड़े ग्रहण करने लायक बना सकते हैं । इन सॉफ्टवेयर के द्वारा आवश्यक आंकडों को बैकअप बनाकर रख सकते है । उन्हें पुनः प्रयोग कर सकते हैं आदि । विण्डो -98 ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ ये सॉफ्टवेयर ( टूल ) भी शामिल हैं । यदि ये टूल अपनी आवश्यकता को पूरा नहीं कर पा रहें हो तो हम अन्य सॉफ्टवेयर को उपयोग में ले सकते हैं । जैसे नॉरटन यूटिलिटि , Mcaffee , Quick Heal आदि । 
    ये सभी सॉफ्टवेयर कम्प्यूटर पर किसी न किसी प्रकार की सुविधा प्रदान करते हैं अतः इन्हें यूटिलिटी सॉफ्टवेयर ( Utility Software ) कहते हैं । ये यूटिलिटी सॉफ्टवेयर सामान्यतः निम्न कार्यों के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं : 
( 1 ) हार्ड डिस्क को सही रखने के लिए स्कैन डिस्क । 
( 2 ) हार्डडिस्क को गतिशील बनाये रखने के लिए डिस्क डीफ्रेगमेन्टर 
( 3 ) फाइलों को बैकअप लेने व बैकअप को पुनः कम्प्यूटर पर डालने के लिए रिस्टोर प्रोग्राम । 
( 4 ) डिस्क पर अधिक आंकड़े भण्डारित करने के लिए कम्प्रेसिंग प्रोग्राम । 
( 5 ) कम्प्यूटर पर वायरस की जांच करने व उसे हटाने के लिए एन्टी वायरस प्रोग्राम आदि । 

फोल्डर / फाइल मैनेजमेन्ट टूल 
    फाइल मैनेजमेन्ट टूल का अर्थ उन सॉफ्टवेयर से है जो फाइल व फोल्डरों को व्यवस्थित करने के लिए प्रयुक्त होते हैं । विभिन्न कम्प्यूटर उपयोगकर्ता अलग - अलग तरीकों से फाइलों को व्यवस्थित रखते हैं । विण्डो में विण्डो एक्सप्लोरर तथा माई कम्प्यूटर नामक दो सॉफ्टवेयर उपलब्ध है जिनका प्रयोग कर हम फाइलों , फोल्डरों आदि को इच्छानुसार व्यवस्थित कर सकते हैं । 

विण्डो एक्सप्लोरर 
    यह एक ऐसा प्रोग्राम है जिसका उपयोग कर हम फ्लॉपी , हार्ड डिस्क या अन्य डिस्क पर उपस्थित फाइल , व फोल्डरों को देख सकते हैं व उन्हें व्यवस्थित कर सकते हैं । इस प्रोग्राम से फाइल को एक स्थान से अन्य स्थान पर कॉपी कर सकते हैं , स्थानान्तरित कर सकते हैं , हटा सकते हैं आदि । 

डिस्क मैनेजमेन्ट टूल ( Disk Management Tool ) 
    डिस्क मैनेजमेन्ट टूल उन सॉफ्टवेयरों को कहते हैं जो हमारी हार्ड डिस्क , फ्लॉपी डिस्क आदि को व्यवस्थित करने के काम आते हैं । जिससे कि हार्ड डिस्क या अन्य डिस्क तीव्र गति से कार्य करने में सक्षम रह सकें । बाजार में इस कार्य के लिए विभिन्न सॉफ्टवेयर उपलब्ध है । इनमें से कुछ सॉफ्टवेयर जैसे स्कैन डिस्क , डिफ्रेगमेन्टर आदि आसानी से कम कीमत पर प्राप्त किये जा सकते हैं हम केवल स्कैन डिस्क व डिफ्रेगमेन्टर के बारे में पढेगें । 

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डिस्क को डिफ्रेगमेन्ट ( Defragment ) करना : 
    विण्डो ऑपरेटिंग सिस्टम भी अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम की तरह डिस्क पर जहां भी खाली स्थान होता है वहीं पर आंकड़े लिख देता है । अर्थात् आंकड़े मैमोरी में लगातार स्थानों पर भण्डारित नहीं रहते । जब हम किसी फाइल या आंकड़ों को मैमोरी पर भण्डारित करते हैं तो फाइल के अलग - अलग भाग अलग - अलग खाली स्थानो पर भंडारित हो जाते है परन्तु ऑपरेटिंग सिस्टम को यह ध्यान रहता है कि एक फाइल के विभिन्न भाग मैमोरी में कहाँ - कहाँ पर हैं और उनका क्रम क्या हैं । अतः फाइल को पढ़ने पर कोई भी परेशानी नहीं होती । 
    जब हम फाइल को पढना चाहें तो ऑपरेटिग सिस्टम फाइल के विभिन्न भागों को मैमोरी में अलग - अलग स्थान पर भण्डारित होने के कारण फाइल को पढ़ने में अधिक समय लगता है । फाइल को अलग - अलग स्थानों पर टुकड़ों में भण्डारित होना फ्रेगमेन्टशन ( fragmentation ) कहलाता है । जितने अधिक फ्रेगमेन्ट ( fragment ) होंगे उतनी ही कम्प्यूटर की गति धीमी होगी ।

स्कैनडिस्क टूल  : ( Scandisk Tool ) 
    जैसा कि हम जानते है कि कम्प्यूटर अपने आप में एक कठिन ( कॉम्पलेक्स ) सिस्टम है । कम्प्यूटर पर कार्य करने के दौरान कम्प्यूटर में विभिन्न प्रकार के आन्तरिक क्रियाएं सम्पन्न होती हैं । इन क्रियाओं के बारे मे हमें जानकारी भी नहीं होती है जैसे विभिन्न फाइलों को प्राथमिक मैमोरी में डालना , इनको क्रमानुसार निष्पादित करना , अनावश्यक फाइलों को प्राथमिक मैमोरी से द्वितीयक मैमोरी में डालना आदि । इन क्रियाओं के सम्पादन के दौरान कम्प्यूटर में गलतियां होने की सम्भावना बनी रहती है । यदि समय - समय पर इन गलतियों को सुधारा न जाये तो गम्भीर परिणाम हो सकते हैं । इन गलतियों से बचने के लिए या गलतियों के कारण होने वाले परिणामों से बचने के लिए स्कैनडिस्क सॉफ्टवेयर का उपयोग करना चाहिये । यह सॉफ्टवेयर हार्डडिस्क को सुरक्षित रखता है । जिस प्रकार डॉस ऑपरेटिंग सिस्टम में चैक डिस्क कमाण्ड कार्य करता था । उसी प्रकार स्कैन डिस्क विण्डो ऑपरेटिंग सिस्टम में कार्य करता है । 


वायरस स्कैनर / क्लीनर ( Virus Scanner / Cleaner ) 
वायरस ( Virus ) 
    जीव विज्ञान में वायरस का अर्थ कीटाणुओं से होता है जो यदि शरीर के अन्दर प्रवेश कर जायें तो शरीर सामान्य कार्य नही कर पाता । इसी प्रकार कम्प्यूटर विषय में वायरस का अर्थ उन प्रोग्रामों से होता है जो यदि कम्प्यूटर में प्रवेश कर जायें तो कम्यूटर में वायरस के प्रवेश के कारण विभिन्न प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो सकती है । अतः वायरस एक विशेष प्रकार के प्रोग्राम हैं जो वैसे तो अन्य सॉफ्टवेयर प्रोग्राम की तरह ही होते हैं । परन्तु ये प्रोग्राम कम्प्यूटर व उसमें भण्डारित आंकड़ों को नुकसान पहुंचाने के लिए होते हैं । ये वायरस कम्प्यूटर की अन्य फाइलों के साथ मिलकर कम्प्यूटर की सामान्य कार्य प्रणाली को बाधित कर देते है । 
    इन वायरस प्रोग्राम की विशेषता ये होती है कि ये स्वतः ही अपनी प्रतिलिपि तैयार कर सकते है तथा साधारणतः ये किसी अन्य फाइल के साथ जुड़कर संग्रहित होते हैं । अर्थात यदि हम इन वायरस प्रोग्राम की फाइल ढूंढे तो ये फाइलें नही मिलेगी । 


वायरस आने की संभावना : 
    किसी भी कम्प्यूटर में वायरस का प्रवेश उस प्रकार नही हो सकता जिस प्रकार शरीर में कीटाणुओं का प्रवेश संभव है । जैसा कि हम पढ़ चुक हैं कि वायरस एक प्रोग्राम होता है अतः प्रोग्राम किसी कम्प्यूटर में तब तक नहीं जायेगा जब तक कि हम स्वयं ऐसी फाइल अथवा प्रोग्राम को न चलायें जिसमें वायरस है । अर्थात् कम्प्यूटर में वायरस स्वतः ही नहीं आता है , बल्कि उन फाइलों को चलाने से आता है जिनमें वायरस है । 

वायरस से सुरक्षा के तरीके 
अवाछनीय लोगो के कम्प्यूटर प्रयोग पर प्रतिबंध होना चाहिये । 
कम्प्यूटर को चालू करें तो सबसे पहले एंटी वायरस प्रोग्राम चलाएं . यदि कम्प्यूटर में वायरस हो तो उसे निकालें ।
समय - समय पर डिस्क पर उपस्थित छुपी ( Hidden ) फाइलों की संख्या पर निगरानी रखें । इनकी संख्या कम होनी चाहिये ।
महत्वपूर्ण फाइलों की बैकअप बनाकर रखें । 
पाइरेटेड सॉफ्टवेयर का उपयोग न करें । 
कम्प्यूटर पर बाहर की फ्लॉपी का प्रयोग करने से पूर्व इस फ्लॉपी की जॉच कर ले कि उसमें वायरस न हो । 
इन्टरनेट की उन साइटों को न खोलें जिन पर वायरस होने की सम्भावना हो ।
अनजान व्यक्तियों से प्राप्त E - mail न खोलें । 
एन्टी वायरस प्रोग्राम को हमेशा अपडेट करते रहें । 

एंटीवायरस प्रोग्राम ( Antivirus Program ) 
    जिस प्रकार वायरस एक प्रोग्राम है और इसकी एक विशेष प्रकार के कार्य करने की क्षमता है । उसी प्रकार बाजार में ऐसे प्रोग्राम भी उपलब्ध हैं जो इन वायरस प्रोग्राम की उपस्थिति को जांच सकते हैं और इन्हे कम्प्यूटर में से हटा सकते हैं । परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि कोई भी एंटी वायरस प्रोग्राम सभी प्रकार के वायरस की उपस्थिति की जांच कर सकते हों और उन्हें हटा सकते हों । 
    जैसा हम पढ़ चुके हैं कि ये वायरस प्रोग्राम होते है तो इनकी एक विशेष कार्य विधि भी होगी । इस विशेष कार्य विधि के आधार पर ही इनकी उपस्थिति की जांच सम्भव है । यदि वायरस की कार्य विधि इस प्रकार की हो कि एंटी वायरस उसकी पहचान कर सके तो एंटी वायरस उस वायरस की न तो उपस्थिति बतायेगा और न ही उसे निकाल पायेगा । अतः यह आवश्यक है कि एंटी वायरस ऐसा होना चाहिये जो गभग सभी प्रचलित वायरस की पहचान करने की क्षमता रखता हो । हालांकि यह सम्भव नहीं है कि एक एंटी वायरस सभी वायरस को पहचान सके । पर जितना अधिक संम्भव हो एंटी वायरस समयानुसार अपडेटेड करते रहना चाहिए जिससे कि यह प्रचलित वायरस की पहचान कर सकें ।
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कम्प्रेशिंग ( Compressing ) 
    हार्डडिस्क पर आंकडे ग्रहण करने की क्षमता निश्चित होती है यह क्षमता उस हार्डडिस्क की सचंय क्षमता कहलाती है जैसे 100 GB , 500 GB , 1000 GB इत्यादि । अकिडे हार्डडिस्क पर किसी विशेष कोड के अनुसार भण्डारित रहते हैं । यदि हम इन्हें इस प्रकार के कोड में परिवर्तित कर सकें कि उतने ही स्थान पर अधिक आंकड़े भण्डारित कर सकें तो इसे कम्प्रेसन करना कहते है । इस प्रकार हम हार्ड डिस्क में भण्डारित आंकड़ो को कम्प्रेसिंग कर अधिक आंकड़े भण्डारित कर सकते हैं । इस प्रकार की तकनीक का प्रयोग उस समय आरम्भ किया गया था जबकि हार्ड डिस्क पर आंकडे भण्डारित करना महंगा पड़ता था । पहले हार्ड डिस्क पर आंकडे भण्डारित करने की कीमत लगभग 100 / -रु . प्रति मेगाबाइट थी । अब यह कीमत बहुत कम हो गई । अतः अब आंकडों को कम्प्रेशन करना विशेष लाभदायक नहीं होता । 

इनक्रिप्शन / डिक्रिप्शन टूल ( Encryption / Decryption Tools ) 
यह संदेशों को तार से टेप किया जाने से रोकता है । परम्परागत इनक्रिप्शन में दो पक्ष एक ही इनक्रिप्शन / डिक्रिप्शन चाबी का प्रयोग करते हैं । परम्परागत इनक्रिप्शन में चाबियों के वितरण तथा सुरक्षा में दिक्कत आती है । सार्वजनिक चाबी ( Public key ) इनक्रिप्शन प्रणाली में दो चाबियाँ होती हैं- एक इनक्रिप्शन के लिए और दूसरी डिक्रिप्शन के लिए । इनमें से चाबी का जोड़ा बनाने वाला पक्ष एक चाबी निजी रखता है तथा दूसरी को सार्वजनिक कर देता है 
Kkr Kishan Regar

Dear friends, I am Kkr Kishan Regar, an enthusiast in the field of education and technology. I constantly explore numerous books and various websites to enhance my knowledge in these domains. Through this blog, I share informative posts on education, technological advancements, study materials, notes, and the latest news. I sincerely hope that you find my posts valuable and enjoyable. Best regards, Kkr Kishan Regar/ Education : B.A., B.Ed., M.A.Ed., M.S.W., M.A. in HINDI, P.G.D.C.A.

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