इंटरनेट का परिचय : Introduction of Internet

इंटरनेट का परिचय
(Introduction of Internet)


इकाई की रूपरेखा (Structure)
1 प्रस्तावना 2 इंटरनेट की संकल्पना 3 इंटरनेट का इतिहास 4 इंटरनेट की कार्य प्रणाली 5 इंटरनेट के तत्व 6 इंटरनेट के उपयोग 7 क्लाइंट सर्वर तकनीक
 उद्देश्य (Objectives)
1. इंटरनेट का अर्थ 2. इंटरनेट लगाने के लिए क्या जरूरी है 3. इंटरनेट की उपयोगिता 4 इंटरनेट के विभिन्न उपयोग
इंटरनेट का परिचय  : Introduction of Internet
इंटरनेट का परिचय  : Introduction of Internet


1 प्रस्तावना (Introduction)
अन्तः सम्बन्धी जालों के समूह को इन्टरनेटवर्क या इंटरनेट कहते है।
(A Collection of Intercon nected Networks is called an Internetwork or just Internet)

इंटरनेट कई LANs का एक समूह है जो कि आपस में WAN से जुड़े हुए हैं। वास्तव में इंटरनेट US सेना का एक प्रोजेक्ट था जो कि एक बड़े रिसर्च नेटवर्क में बदल गया। आम जनता में सूचना एवं व्यापार के लिये नेटवर्क इसका उपयोग पिछले चार-पाँच वर्षों में तेजी से बढ़ा है। 

2 इंटरनेट की संकल्पना (Concept & Standard of Internet)
इंटरनेट एक ऐसी धारणा है कि जिसे दुनिया भर के लाखों कम्प्यूटर आपस में नेटवर्क से जुड़े है परन्तु कोई भी इंटरनेट का मालिक या स्वामी नहीं कहलाया जा सकता। जिस तरह से रेल, हवाई जहाज या टेलीफोन कम्पनियों कार्य करती है एवं जिस प्रकार एक बड़ा निजी Corporation या स्टेट उसका नियंत्रण एवं मालिकाना हक रखता है वैसा कुछ भी इंटरनेट में नहीं है। विभिन्न राष्ट्रो ने अपने अपने देश के नागरिकों के लिये इंटरनेट से सम्बन्धित कुछ नियम बनाए हैं परन्तु वे नियम दूसरे देश के नागरिकों पर लागू नहीं होते है। अतः यह एक तरह से व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है इसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी इच्छानुसार इंटरनेट पर कार्य कर सकता है अथवा इंटरनेट पर सर्फिग (Surfing) कर सकता है।

3 इंटरनेट का इतिहास (History of Internet)
इंटरनेट का आगमन अमेरिका में एक सैनिक प्रोजेक्ट के रूप में 1969 में हुआ जब उन्होंने एक ऐसा नेटवर्क बनाने का फैसला किया जिसका कन्ट्रोल कई तरीकों से किया जा सके ताकि परमाणु युद्ध होने की दशा में अगर एक नेटवर्क नष्ट भी हो जाए तो दूसरे समान्तर नेटवर्क एवं लिंक्स की सहायता से सेना अपनी प्रहारक क्षमता बनाए रखे। सन् 1972 एंव इसके बाद अमेरिकन रिसर्च विश्वविद्यालयों ने आपस में ई-मेल जैसी सुविधाओं के लिये कुछ नेटवर्क बनाए । इस तरह के नेटवर्क की एक सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अलग-अलग रिसर्च ग्रुप अलग-अलग ऑपरेटिंग सिस्टम का उपयोग करते थे। अतः उनमें संचार करना मुश्किल हो रहा था। तब 1983 में उन्होने एक मानक प्रोटोकॉल बनाया जिसे TCP/IP प्रोटोकॉल कहते है। TCP/IP प्रोटोकॉल में कई अनुप्रयोग प्रोटोकॉल (appli cation protocol) या FTP, e-mail प्रोटोकॉल (SMTP) एवं रिमोट लोग-इन सुविधा (Telnet)|

इन सब के बावजूद एक ऐसी व्यवस्था की कमी अखर रही थी जो इस सूचनाओं को जोड़ सके उसी समय CERN प्रयोगशाला, जेनेवा में कुछ वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसा इंटरनेट.टूल बनाया जो कि कई वैज्ञानिकों द्वारा ज्ञात सूचनाओं व्यवस्थित कर उपलब्ध कर सके। इस टूल ने विभिन्न वैज्ञानिकों एवं कम्प्यूटरों से प्राप्त textual information को आपस में सम्ब) करने का मार्ग प्रशस्त किया । कम्प्यूटर की आपसी असंगतता (incompatibility) को दूर कर उनमें लिंक स्थापित करने के लिए hypertext का जन्म हुआ। अब सूचना को श्रेणीबद्ध एवं पदानुक्रम करने की बजाय एक जाल नुमा (web-like) ढॉचा दिया जा सकता था जिसमें सभी सूचनाएँ एक दूसरे से जुड़ी थी। इन तकनीकी विकासों के परिणामस्वरूप अब कुछ नये नाम लोगों को समझ में आने लगे थे जैसे :

WWW=World Wide Web

HTML = Hyper Text Mark-up Language

HTTP = Hyper Text Transfei Protocol

4. इंटरनेट की कार्य प्रणाली (Working of Internet)
इंटरनेट कई छोटे कम्प्यूटर नेटवर्क का एक बड़ा नेटवर्क है जो पुरी दुनिया भर में फैला हुआ है। इसम कई नेटवर्क, केबल, उपग्रह, मॉडम युक्तियों की सहायता से आपस में जुड़े है। इंटरनेट पर कार्य करने वाले प्रत्येक कम्प्यूटर की एक अलग पहचान (unique identity) होती है जिससे उस कम्प्यूटर को दूसरे कम्प्यूटरों के बीच में पहचाना जा सके।

इंटरनेट पर भी वांछित कम्प्यूटर, जिससे सूचना प्राप्त करनी है या जिस पर सूचना प्रेषित करनी होती है कुछ इसी तरह ही पहुंचा जाता है। जब हम कोई संदेश इंटरनेट पर प्रेषित करना या प्राप्त करना चाहते है वह सूचना सर्वप्रथम कम्प्यूटर के सबसे नजदीकी सर्वर तक पहुचती है। इस सर्वर के साथ उपलब्ध राउटर (ROUTER), इसे इंटरनेट पते के आधार पर उसके नजदीकी सर्वर को प्रेषित करता है। यहां पर उपलब्ध राउटर पुनः उसे और नजदीकी सर्वर पर प्रेषित कर देता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि सूचना वांछित कम्प्यूटर तक नहीं पहुंच जाती है। सूचना का आदान-प्रदान पैकेटों (कुछ बाइटों का समूह) के रूप में होता है अर्थात सूचना पैकेटों में विभक्त हो जाती है। फिर सर्वर-सर्वर होते हुए वांछित स्थान पर पहुंच जाती है। यहां यह कतई आव यक नहीं है कि सभी पैकेट एक ही मार्ग से होते हुए वांछित स्थान पर पहुंचे। सूचना के ये पैकेट जो भी खाली मार्ग उपलब्ध होता है उसी का उपयोग करते हुये वांछित स्थान पर पहुंच जाते हैं।

1 आईएसपी.(ISP)
कोई दो कम्प्यूटर या कम्प्यूटर समूह की यह अलग पहचान इंटरनेट नियंत्रण संगठन द्वारा दी जाती त है। इस संगठन की वेब साइट का पता www.internic.net है। इस संगठन ने प्रत्येक देश के कुछ

इंटरनेट सेवा प्रदायक (Internet Service Provider) नियुक्त किये है जिन्हें ISP भी कहा जाता है। वर्तमान में कई प्राईवेट इंटरनेट सेवा प्रदायक भी कार्यरत है जो इंटरनिक संस्था से सम्ब) है। ये ISP अपने उपभोक्ताओं को इंटरनेट सेवाएं प्रदान कराते है। भारत में VSNL इस तरह की सेवा प्रदान करता है।

ऐसा करने के लिए इंटरनिक प्रत्येक ISP को कुछ IP एड्रेस क्षेत्र (range) देता है एवं उनका एक नाम देता है। ये ISP पुनः दूसरे ISP को कुल आवंटित ISP में से कुछ IP आवंटित कर देते है। सभी ISP जब अपने उपभोक्ता को कनेक्शन देते हैं तो उन्हें एक पहचान नाम भी दिया जाता है। सामान्यतयाः दो प्रकार के कनेक्शन उपभोक्ताओं को दिये जाते है।

आई एस पी से इन्टरनेट कनेक्शन (ISP Internet Connection):

(1) लीज लाईन (Lease Line) - लीज लाइन लेने वाले ग्राहक बड़े कम्पनी समूह होते है जो अपनी स्वयं की इंटरनेट साइट भी बनाना चाहते है। इसके अलावा वे 24 घण्टे नेटवर्क से जुड़े रहना चाहते है। इसके लिये उन्हें स्थाई IP नम्बर आवंटित करवाना होता है अन्यथा उनका इंटरनेट सर्वर हर समय नेटवर्क पर उपलब्ध नहीं रह पाएगा। यह सुविध बहुत मंहगी है एवं इसका वार्षिक खर्च कई लाख रूपये तक हो सकता है।

(2) डॉयल-अप (Dial-up) - डॉयल-अप सर्विस सबसे ज्यादा उपयोग में आ रही है। इसमें प्रत्येक उपयोगकर्ता अपने कम्प्यूटर पर एक मॉडम लगाकर लोकल ISP डॉयल करता है। ISP का सर्वर तब प्रयोगकर्ता को एक अस्थाई IP नम्बर प्रदान कर दिया जाता है। अब यह कम्प्यूटर नेटवर्क से जुड़ जाता है।

(3) ग्राड बैंड (Broad Band)- ब्राड बैड से अब तेज गति से इन्टरनेट चलने लगा है। इसमें एक अलग तरह का मोडेम लगाना पड़ता है। यह डायल-अप करनेक्श से थोड़ा मंहगा है परन्तु लीज लाइन से काफी सस्ता एवं समान गति का है। अतः लीज लाइन के विकल्प के रूप में उभर कर आ रहा है।

एक बार कम्प्यूटर से जुड़ने के बाद हम किसी भी वेब साइट का पता लिखकर वहाँ तक जा सकते है अथवा इंटरनेट पर मनोरंजन कर सकते है या सर्किल करके समय निकाल सकते है।

2 इंटरनेट का आकार (Size of InterNet)

इंटरनेट का कोई भौतिक आकार नहीं है। यह पूरे विश्व में फैला हुआ है। मात्र चार कम्प्यूटरों से आरम्भ हुआ यह नेटवर्क आज लगभग 10 मिलियन कम्प्यूटरों तक पहुंच चुका है।

यह 10 मिलियन कम्प्यूटरों का आंकड़ा भी एक अनुमान मात्र है। शुरू में चूंकि यह सीमित क्षेत्र में फैला नेटवर्क था। अतः कम्प्यूटरों की सही संख्या पता थी। लेकिन, अब इससे जुड़े कम्प्यूटरों की संख्या काफी अधिक हो गई है और वे पूरे संसार में फैले हुए है। लगातार इंटरनेट से जुड़ने वाले कम्प्यूटरों की संख्या बढ़ती जा रही है। अतः सही संख्या का अनुमान ही लगाया जा सकता है। यहां दो

और बातें ध्यान में रखने योग्य है :

- किसी भी समय विशेष पर इंटरनेट से जुड़े प्रत्येक कम्प्यूटरों को लगभग 1 प्रतिशत ही वास्तव में इंटरनेट का उपयोग कर रहा होता है।

एक अन्य अनुमान के अनुसार इंटरनेट से जुड़े प्रत्येक कम्प्यूटर में औसत 10 उपयोगकर्ता, इंटरनेट सुविधा का उपयोग करते है इस तरह से इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या (10x 10 मिलियन) लगभग 100 मिलियन है।

3 इंटरनेट कनेक्शन (Internet Connection)

कोई भी कम्प्यूटर उपयोगकर्ता यदि इंटरनेट से जुड़ना चाहता है तो उसे इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी (Internet Service Provider Company) से इंटरनेट कनेक्शन प्राप्त करना होता है। इंटरनेट कनेक्शन लेने से पूर्व यह तय कर लेना व्यवहारिक होता है कि हमें इंटरनेट का उपयोग किस उद्देश्य की पूर्ति हेतु करना है। इंटरनेट को किस कार्य में प्रयुक्त करना है, यह व्यक्ति से व्यक्ति बदलता रहता है।

इंटरनेट कनेक्शन लेने का उद्देश्य कुछ भी हो, परन्तु आपके कम्प्यूटर तथा इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी के सर्वर के बीच संचार का माध्यम अवश्य होना चाहिए। इंटरनेट के जरिए डाटा संचार के लिए आवश्यक माध्यम हेतु निम्नलिखित विकल्प उपलब्ध है :

टेलीफोन (Telephone)

वी सेट कनेक्शन (VSAT Connection)

टेलीफोन (Telephone) :जब उपयोगकर्ता के कम्प्यूटर व इंटरनेट सर्वर के मध्य डाटा आदान-प्रदान के लिए टेलीफोन लाइन का उपयोग किया जाता है, तब उपयोगकर्ता को एक मोडेम भी लगाना होता है, जो कम्प्यूटर के डाटा को उस प्रकार के संकेतो में परिवर्तित करता है जो टेलिफोन लाइन पर संचारित हो सके। वैसे यह माध्यम वर्तमान में सर्वाधिक उपयोगी माध्यम है।

वी सेट कनेक्शन (Very SmalIAparture Terminal orVSAT ) : वी सेट कनेक्शन के अंतर्गत उपयोगकर्ता के कम्प्यूटर से डाटा सीधे उपग्रह पर पहुंचता है। वहां से इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) कम्पनी के कम्प्यूटर पर सीधे पहंचता है और इसी तरह वापस भी प्राप्त होता है। इस प्रकार के कनेक्शन अत्यंत सीमित संख्या में प्रदान किये जाते है तथा इनकी लागत भी काफी अधिक होती है।

5 इंटरनेट के तत्व (Elements of Internet) अध्याय के प्रारम्भ मे स्पष्ट किया गया है कि इंटरनेट विश्व भर के नेटवर्को का नेटवर्क है और इस वाइड ऐरिया नेटवर्क (WAN) में अनेक नोड और लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) होते हैं। लेकिन इंटरनेट को एक नेटवर्क मानकर इसके निम्नलिखित तत्व परिभाषित किये जा सकते हैं -

(1) क्लाइन्ट कम्प्यूटर (Client Computer)- जब कोई कम्प्यूटर टेलीफोन लाइन या केबल के माध यम से इंटरनेट से कनेक्ट होता है तो इस अवस्था में यह कम्प्यूटर क्लाइट कम्प्यूटर कहलाता है। क्लाइंट कम्प्यूटर इंटरनेट के माध्यम से सर्वर कम्प्यूटर से इंटरनेट पर उपलब्ध सेवाएं प्राप्त करता है।

(2) सर्वर कम्प्यूटर (Server Computer)- ये इंटरनेट पर चौबीसों घंटे कार्यशील रहने वाले शक्तिशाली कम्प्यूटर होते हैं। क्लाइंट कम्प्यूटर टेलिफोन लाइन या केबल के माध्यम से इंटरनेट से कनेक्ट होकर सर्वर से विभिन्न प्रकार के डाटा और सूचनाएं, वेब साइट या अन्य किसी साधन से प्राप्त करता है। सर्वर एक ही समय मे अनेक क्लाइन्ट कम्प्यूटरों द्वारा मांगी गई सूचनाएं और वेब साइटों को एक साथ प्रदान करने में सक्षम होता है।

(3) नोड (Node)- इंटरनेट पर स्थित किसी क्लाइन्ट, सर्वर या नेटवर्क को नोड (Node) कहते हैं।

यूनीफॉर्म रिसोर्स लोकेटर (URL - Uniform Resource Locator).

इंटरनेट पर किसी सर्वर या सेवा के नाम को व्यक्त करने वाला एक अद्वितीय पता (unique address) यूआरएल URL कहलाता है। यह URL ही इंटरनेट पर किसी सेवा, संस्था, या सर्वर के ठिकाने को खोजने का साधन होता है। जैसे : http://www.yahoo.com एक URL है। URL के सिंटैक्स में निम्नलिखित भाग होते हैं :

- टी.सी.पी./आई.पी.(TCP/IP) a TCP/IP प्रोटोकॉल्स का एक ऐसा समूह है जो नेटवर्क में उपस्थित संसाधनों (resources) का साझा (share) करने के लिए कम्प्यूटरों में सामंजस्य स्थापित करता है। अनेक नेटवर्को के सामंजस्य की बाट समस्या को दूर करने के लिए सन् 1974 में केर्फ (Cerf) और काहन (Cahn) ने TCDP/IP मॉडल और प्रोटोकॉल का आविष्कार किया। TCP/IP विशेष रूप से अन्तरनेटवर्को (intermetworks) पर अच्छे संवाद (communication) के लिए विकसित किया गया था। यह एक महत्वूपर्ण आविष्कार था क्योंकि आज तक भी इंटरनेट में TCP/IP की विशेष भूमिका बनी हुई है।

TCP/IP में दो प्रोटोकॉल हैं :

TCP (Transmission Control Protocol) : यह एक नेटवर्क के कम्प्यूटर से भेजे गये संदेशों को डाटाग्राम्स (datagrams) में विभक्त करता है और प्राप्तकर्ता कम्प्यूटर मे विभक्त डाटाग्राम्स को पुनर्गठित (Reassembling) करके संदेश का रूप देता है। TCP डाटाग्राम्स को IP से आदान प्रदान करता है।

IP (Internet Protocol) : यह TCP से प्राप्त संदेशों के डाटाग्राम्स (datagrams) को प्राप्त करता है

और डाटाग्राम्स में उपस्थित प्राप्तकर्ता (receiver) कम्प्यूटर के पते (address) का नेटवर्क में पता लगाता है और प्रेषित कर देता है। इंटरनेट पर इस प्रकार के कम्प्यूटर पते को “IP एड्रेस" कहते है।
मुख्य बिन्दु :

1. कम्प्यूटर प्रणालियों को परस्पर जोड़कर सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए कम्प्यूटर नेटवर्क तैयार किया जाता है।

2. इंटरनेट हजारों कम्प्यूटर नेटवर्कों का नेटवर्क है।

3. दिसम्बर 1969 से सितम्बर 1972 तक ARPNET नेटवर्क में लगातार अनेक केन्द्र या नोड (node) सम्मिलित होते गए, जेसे - SRI, UCLA, UCSB, Utah वि वविद्यालय BBN आदि।

4. भारत में BSNL (Bharat Sanchar Nigam Limited) ने इंटरनेट कनेक्शन देकर ISP (इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर) के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे देश में इंटरनेट का क्रांतिकारी विकास हुआ।

5. इंटरनेट के क्षेत्रीय और राष्ट्रीय नोडों (nodes) तथा नेटवर्को को परस्पर जोड़ने वाली उच्चगति की संचार (communication) लाइनों के समूह को बैकबोन (backbone) कहते है।

यूनीफॉर्म रिसोर्स लोकेटर (URL-Uniform Resource Locater)

किसी इंटरनेट डाक्यूमेंट (Document) को प्रयोग करने के लिये address की आवश्यकता होती है। डाक्यूमेंट (Document) का प्रयोग पूरे संसार मे वितरित करने के लिए लोकेटर्स (Locaters) का प्रयोग करता है। एक URL निश्चित मापक है। जो कि किसी सूचना को इंटरनेट पर व्यक्त करता है। URL के चार भाग होते हैं।

1. Method 
2. Host computer 
3. Port 
4. Path 
प्रोटोकाल (Protocol) द्वारा किसी डाक्यूमेंट को वापिस करने के लिये यह तरीका प्रयोग किया जाता है, जैसे कि HTTP (Hyper Text Transfer protocol)। सूचना, होस्ट, कम्प्यूटर पर स्थित होती है। Web pages प्रायः कम्प्यूटर में स्थित होते हैं और कम्प्यूटर इस प्रकार के alias नाम देते हैं, जो प्रायः "www" से शुरू होते हैं। URL (Uniform Resource Locater) Server का पोर्ट (Port) नम्बर लिखता है और यह किसी होस्ट कम्प्यूटर के द्वारा अलग रहता है। पाथ फाइल का वह पाथ नेम है जहाँ पर सूचना संग्रहित रहती है।

फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल (File Transfer Protocol - FTP) यह सभी जानते है कि सूचना या डाटा को फाइल के रूप में स्टोर रखा जाता है। इंटरनेट पर एक कम्प्यूटर से सूचना को दूसरे कम्प्यूटर पर भेजने या कॉपी के लिये एक सर्विस प्रयोग में लायी जाती है, जिसे FTP (File Transfer Protocol) कहते है। FTP एक ऐसी सर्विस या टूल है जिसके द्वारा आप फाइल आसानी के साथ जल्दी कॉपी कर सकते है। यह तकनीक ज्यादा प्रभावी है। यदि आप उस फाइल का नाम, डाइयरेक्ट्री का नाम तथा उस कम्प्यूटर के इंटरनेट नाम को जानते है तो आप बहुत आसानी के साथ उस फाइल को कॉपी कर सकते है। यह प्रोटोकॉल आपको एक ऐसी सुविधा प्रदान करता है जिसके द्वारा आप फाइलों को आसानी से विभिन्न प्रकार के बहुत सारे कम्प्यूटरों से कॉपी कर सकते हैं।

निम्न विषयों का वर्णन  :

* ऐनोनिमस FTP site के साथ संबंध स्थापन तथा फाइल रिट्राइव करना (Connecting to an Anonymous FTP site and Retrieving files)

* सामान्य FTP कमाण्ड (Common FTP Command)

* विभिन्न फाइलों के साथ कार्य करना (Working with Different Types of File)

E-mail Access to FTP Archievers

FTP उस समय बनाया गया था जब अधिकतर इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं को कम्प्यूटर का उपयोग करने की तथा इंटरनेट के द्वारा सूचना का आदान-प्रदान करने की जानकारी थी। अत: FTP बहुत ज्यादा यूजर फेंडली इंटरफेस (User Friencly Interface) प्रदान नहीं करता है।

Archie: यह उन फाइलों को सर्च करता है जो Anonymous FTP द्वारा उपलब्ध करायी जाती है। Archic उस फाइल को लाखों करोड़ों फाइलों में से जो कि Anonymous FTP द्वारा उपलब्ध कराया जाती है, सर्च करता है। यह उस फाइल को युजर के द्वारा प्रोवाइड किये गये नाम के माध्यम से सर्च करता है।

फाइल प्राप्ती के लिए FTP का प्रयोग (Using Ftp to Retrieve a File) अब हम anonymous FTP द्वारा इंटरनेट साइट nic.merit.edu को एक्सेस प्राप्त करेगें या भेजेगें। जिस पर इंटरनेट के बारे में तरह-तरह की जानकारी उपलब्ध है। 

चैटिंग (Chatting) - चैटिंग तुरन्त कम्यूनिकेशन (Communication) करने की सुविधा प्रदान करता है। जब आप किसी चैट (Chat) प्रोग्राम की सहायता से बातचीत में संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे होते हैं। यह टेलीफोन (Telephone) पर बात करने जैसा नहीं होता है। चैटिंग में कई व्यक्ति आपस में संदेशों का आदान-प्रदान करते है। चैटिंग करने के लिये कई प्रोग्राम विभिन्न साइटों पर उपलबध है जिनको आप इंटरनेट से डाउनलोड (Download) कर सकते हैं। चैंटिंग करने की सुविध I कई इंटरनेट साइटों द्वारा प्रदान की जाती है। जैसे - Yahoo (याहू) साइट पर उपलब्ध चैंटिंग की सुविधा प्राप्त करने के लिये आपको yahoo नाम messanger नाम चैंटिंग प्रोग्राम डाउनलोड करना होगा।

चैट में सूचनाओं का सिनक्रोनस ट्रान्समीशन (Synchronous Transmetion) होता है। इसमें सभी भाग लेने वाले व्यक्तियों के संदेशों को तुरन्त ट्रान्समिट किया जाता है एवं उनके बीच में कोई समय अन्तराल नहीं होता है। जबकि ई-मेल ऐसिन्क्रोनस ट्रान्समीशन (Asynchronous Transmeition) होता है जिसमें सूचना को विभिन्न समय अन्तरालों के बीच ट्रान्समिट किया जाता है। वॉइस मेल (Voice mail) में भी सूचनाओं का एसिन्क्रोनस ट्रान्समीशन होता है।

चैटिंग दो तरह की होती है -

1. टैक्सट चेट (Text Chat)

2. वॉइस चेट (Voice Chat)

टैक्स्ट चैट (Text Chat)- टेक्स्ट चैटिंग में सूचनाओं का आदान-प्रदान टेक्स्ट या शब्दों के रूप में होता है। टैक्स्ट चैट में चैटिंग करने वाले व्यक्ति की स्क्रीन पर संदेश टेक्स्ट के रूप में दिखाई देते है तथा वह की-बोर्ड की सहायता से संदेश को लिखकर ट्रान्समिट करता है। चैट प्रोग्राम में दो तरह की विन्डोज होती है। एक विन्डों में संदेश प्राप्त होते है तथा दूसरी विंडों पर संदेश को टाइप करके उसे Send बटन को दबाकर भेजते है। इंटरनेट के माध्यम से संदेशों का तुरन्त आदान-प्रदान करना चैटिंग कहलाता है। यह सूचनाओं या संदेशों को एक बहुत बड़े नेटवर्क पर आदान-प्रदान करने का एक सशक्त तथा उपयोगी माध्यम है।

वॉइस चैट (Voice Chat) – यह चैटिंग करने का बहुत अच्छा तरीका है। इसमें चैटिंग करने वाले व्यक्ति को संदेशों को माइक्रोफोन की सहायता से कम्प्यूटर में वेब (Web) फाइलों के रूप में परिवर्तित करके उनका आदान-प्रदान करते है। यह वॉइस चैट की सुविधा प्रदान करने वाली साइट तथा प्रोग्राम का कार्य होता है। वॉइस चैट में भी सिनक्रोनस ट्रान्समिशन होता है। वॉइस चैट में संदेश सुनाई देते है और आप संदेशों को बोलकर प्रसारित करते है। वॉइस चैट की सुविधा कई साइट प्रदान कर रही है जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं -

* www.gmail.com

* www.yahoo.com

* www.hotmail.com

* www.rediff.com

वेब साइट (Web Site) - वेब साइट साधारण रूप से वेब पेजों (Web pages) से मिलकर बनी होती है। अपने व्यवहार के । अनुसार वेब एक पेज से दूसरे के मध्य link प्रदान करता है। जो कि चाहे अलग-अलग पेजों में ही क्यों न हो। एक पेज दूसरे अलग पेजों से link बना सकता है चाहे उनमें फोटो, कार्टून या कोई सामग्री हो।

इस प्रकार हम कह सकते है कि web site एक दूसरे से जुड़े हुए पेजों से मिलकर बना होता है। इसके कुछ उदाहरण निम्न है :

(1) ____ http://www.sancharmet.in

(2) http://www.rediffmail.com,

(3) http://www.msn.comdi

(4) http://www.hotmail.com

(5) http://www.siffy.com



वेब सॉफ्टवेयर, संरचना को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। वेब क्लाइंट एक प्रोग्राम है जो सूचना प्राप्त करने के लिये किसी सर्वर पर अपनी प्रार्थना भेजता है। वेब सर्वर भी एक प्रोग्राम है जो क्लाइन्ट द्वारा मांगे गये का विवरण को वापस भेजता है। वितरित संरचना (distributed structure) का अर्थ यह है कि कोई क्लाइट प्रोग्राम किसी भी सर्वर से जुड़े अन्य कम्प्यूटर पर क्रियान्वित हो सकता है, संभवतः दूसरे कमरे या दूसरे देश में। सारे प्रोग्राम अपने-अपने कार्यों पर केन्द्रित करते है तथा स्वंतंत्र रूप से कार्यों को आगे बढ़ाते है क्योंकि सर्वर सिर्फ उसी समय कार्य करता है जब कोई क्लाइंट किसी डॉक्यूमेंट की मांग करता है। www वेब प्रक्रिया की निम्नलिखित कार्यविधि होती है :

(1) किसी प्रोग्राम पर कार्य करते समय यूजर किसी के माध्यम से किसी दूसरे डाक्यूमेंट से जुड़ सकता है।

(2) वेब क्लाइंट किसी हाइपरलिंक के माध्यम से किसी एड्रेस का उपयोग करता है जो हमें किसी निश्चित नेटवर्क पर स्थित वेब सर्वर से जोड़ता है तथा हमें उसके बारे में बताता है।

(3) सर्वर अपनी प्रतिक्रिया किसी को भेजकर तथा उस टेक्स्ट मे पिक्चर, साउन्ड या मूवी को क्लाइंट तक भेजकर व्यक्त करता है।

वेब ब्राउजर (Web Browser)

वेब ब्राउजर एक ऐसा क्लाइंट (client) प्रोग्राम है जिसमें www पर उपलब्ध सभी प्रकार की वेब साइट और वेब पेज खोले जा सकते हैं। इसका प्रयोग इंटरनेट पर उपलब्ध सारी सुविधाओं तथा स्त्रोतों को वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से ऐक्सेस करने में किया जाता है।

वेब ब्राउजर, एक वर्ल्ड वाइड वेब क्लाइंट एप्लीकेशन प्रोग्राम है जिसका उपयोग हाइपरटेक्स्ट डॉक्यूमेंट तथा वेब पर उपलब्ध अन्य html प्रलेखों को लिंक के माध्यम से प्राप्त करने में किया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वेब ब्राउजर एक ऐसा प्रोग्राम है जिसके माध्यम से इंटरनेट सर्किंग (surfing) करते हैं। वर्ल्ड वाइड वेब की विशेषता यह है कि वह किसी भी वेब ब्राउजर पर खुल सकता है। इसलिए हम अपने कम्प्यूटर में कोई सा भी वेब ब्राउजर प्रयोग कर सकते है। कुछ प्रचलित वेब ब्राउजर के बारे में विवरण आगे दिया गया है।

6 इंटरनेट के उपयोग (Usage of Internet)

इंटरनेट पर उपलब्ध प्रमख सेवाएँ निम्नलिखित होती है :-

1. इलेक्ट्रोनिक मेल या ई-मेल (E-mail)- इंटरनेट पर जब यूजर एक कम्प्यूटर में से दूरस्थ स्थित दूसरे कम्प्यूटर में पत्र भेजता है तो इसे ई-मेल कहते हैं। यह सुविधा इंटरनेट पर सर्वाधिक प्रयुक्त की जाती है। इस सेवा का प्रारम्भ सन् 1970 में माना जाता है।

2. न्यूज ग्रुप (News Group) - इटरनेट पर सार्वजनिक संवाद (public communication) के 34000 से अधिक समुदाय (forums) हैं जो विभिन्न प्रकार के विषयों पर समाचारों का आदान-प्रदान करते हैं, इन्हें न्यूज गुप (news group) कहते हैं। ये न्यूज ग्रुप लगभग सभी प्रकार के तकनीकी और गैर तकनीकी विषयों जैसे विज्ञान, खेल, राजनीति, कम्प्यूटर विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि पर सामग्री उपलब्ध करवाते है। न्यूज ग्रुपों के इस समूह को यूजनेट (Usenet) कहते हैं। यूजनेट या न्यूजग्रुप का चलन सन् 1979 से प्रारम्भ हुआ था।

3. फाइल ट्रांसफर (File Transfer) - एक कम्प्यूटर में उपस्थित फाइल को किसी दूसरे शहर में स्थित कम्प्यूटर में इंटरनेट के माध्यम से कॉपी कर सकते हैं, इस क्रिया को फाइल ट्रांसफर कहते हैं। इसके लिए इंटरनेट पर एक प्रोटोकॉल क्रियाशील होता है जिसे फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल (FTP) कहते हैं।

4. वर्ल्ड वाइड वेब (www)- इस अनुप्रयोग का आविष्कार अंग्रेज कम्प्यूटर विज्ञानी टिम बर्नर्स-ली (Tim Berners Lee) ने फेंच-स्विस सीमा पर जिनेवा के पास यूरोपीयन लेबोरेटरी फॉर पार्टीकल फिजिक्स (CERN) में भौतिक शास्त्रियों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक सूचनाओं के विनिमय के लिए किया था। किसी साइट पर टैक्स्ट, चित्र, ध्वनि और वीडियो के साथ सूचना को अनेक पेजों (वेब पेज) में www की सहायता से इंटरनेट पर प्रदर्षित करना सुगम हो जाता है। इस सेवा की विशेषता यह है कि इसके द्वारा वेब साइटों में लिंक (links) के जरिये अन्य वेब साइट पर एक माउस के क्लिक करने भर से जाया जा सकता है| www के आ जाने से इंटरनेट पर वेब पब्लिशिंग पर मल्टीमीडिया सहित सूचनाओ को वेब पेजों (web pages) में प्रस्तुत करना आसान हो गया है। वैब पेज HTML, Java Script, VRML, VB Script और Java भाषाओं में लिखे जाते हैं।

5. रिमोट लॉगिन (Remote login) Telnet - जैसी सेवाओं के द्वारा हम इंटरनेट पर किसी भी स्थान से दूरस्थ किसी भी कम्प्यूटर में कार्य कर सकते है, ऐसी क्रिया रिमोट लॉगिन कहलाती है।

1 ई-मेल (E-mail)

ई-मेल वर्तमान में संदेशों के आदान-प्रदान का तीव्रतम साधन है। इसकी सहायता से दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए अपने मित्र या सहपाठी अथवा व्यापारिक सौदों के लिये कम्पनी या व्यापारी को हम संदेश भेज सकते है जो उसे कुछ ही क्षणों में मिल जाता है। इतनी तुरन्त. सेवा ने सूचना जगत में एक क्रांति सी ला दी है। ई-मेल संदेश बहुत कम समय में टाइप करके भेजा जा सकता है एवं इसके पाने वाले को वहां उपस्थित रहना भी जरूरी नहीं है जो कि टेलिफोन से संदेश देने के लिए आव यक हैं। यह संदेश गंतव्य कम्प्यूटर नेटवर्क के सर्वर पर जाकर सुरक्षित हो जाता है। जब निध रित व्यक्ति अपने कम्प्यूटर पर लॉग-इन करता है तो उसे यह सूचना मिल जाती है कि उसके लिये कोई संदेश है। जब वह व्यक्ति अपनी सुविधानुसार उस संदेश को पढ़ सकता है।
2 सर्च इंजिन (Search Engine)

सर्च-ईजन किसी एक साधन का नाम नहीं है, बल्कि उन साधनों का समूह है जो वांछित सामग्री को इंटरनेट पर खोज सकते है और उस सामग्री को HOST कम्प्यूटर से प्राप्त भी कर सकते है।

सर्च इंजन में एक जगह पर हमें वो सूचना देनी होती है जिसे हम इन्टरनेट पर खोजना चाहते है। सर्च-ईजन पर वांछित सामग्री का कोई भाग या शब्द टाइप कर उसे खोज करने का आदेश दिया जाता है। आदेश मिलते ही वह सर्च-ईजन समस्त इंटरनेट HOST कम्प्यूटरों पर उस सामग्री को सोलेगा जिसमें टाइप किया गया भाग या शब्द उपस्थित हों। तत्प चात वह स्क्रीन पर उन समस्त जानकारियों की सूची प्रदर्शित करेगा। माउस की सहायता से वांछित सामग्री पर पहुंच कर वहां 'क्लिक (Click) कर पूरी सामग्री प्राप्त की जा सकती है।

हम अपनी वेब साइट बनाना चाहते हैं पहले हमें उसका नाम रजिस्टर करवाना होता है। दुनिया में इस तरह के नामों को इंटरनिक (internic) संस्था रजिस्टर करती है। वर्तमान में (internic) ने सभी देशों में कई संस्थाओं को नाम रजिस्ट्री करने की स्वीकृति दे रखी है।

एक बार नाम रजिस्टर हो जाने के बाद हमें एक वेब सर्वर बनाना होता है। यह वेब सर्वर वह कम्प्यूटर होगा जिस पर हम अपनी वेब साइट बनाऐगें । सामान्यतया इंटरनेट पर प्रयोग के लिए इस कम्प्यूटर का नाम www रखा जाता है। अगर हमने अपना नाम 'xyz.com' (काल्पनिक नाम) नाम से रजिस्टर

करवाया है एंव अगर हमने अपने वेब सर्वर का नाम www रखा है तो पूरी में कहीं से भी हम वेब - ब्राउजर में www.xyz.com नाम से इस नेटवर्क की वेब साइट को खोल सकेगें।

सूचनाएं प्राप्त करने के लिये सर्च इंजिन पूरे वेब को इंडेक्स (Index) करता है। जब कोई व्यक्ति वेब साइट बनाता है तो वो कुछ सूचनाएं सर्च इंजिन के लिये अपनी साइट के कोड में डालता है। सर्च इंजिन सामान्यतया <TITLE> एवं <META> टेग के अन्तर्गत लिखे गये शब्दों से अपनी इंडेक्स बनाता है। एक बार मुख्य पेज मिलने के बाद उससे जुड़े हुए सभी लिंग को सर्च इंजिन साथ-साथ ही इंडेक्स कर देता है।

इस समय निम्न सर्च इंजिन बहुतायत से उपयोग में लाए जा रहे हैं। ,

याहू = www.yahoo.com

अल्टाविस्टा = www.altavista.com

इन्फोसिंक = www.infoseek.com

एक्साइट = www.excite.com

लाइकोस = www.lycos.com

होटबोट = www.hotbot.com :

गूगल = • www.google.com शाम को शक नए



3 वर्ल्ड वाइड वेब (Worldwide web)

वर्ल्ड वाइड वेब सूचना स्त्रोतों का एक जाल है। सामान्यतया इसे www या वेब नाम से भी जाना जाता है। इन सूचना स्त्रोतों को आसानी से उपलबध कराने के लिये वेब निम्न बातों पर निर्भर करता

1. समान नामकरण विधि (e.g. Universal Resources Identifieror URI)

2. प्रोटोकॉल (e.g. http)

3. हारपरटेक्स्ट (e.g. HTML)



1. स्त्रोत तक पहुंचने का नामकरण विधि

2. स्त्रोत का मेजबान कम्प्यूटर या मशीन का नाम

3. स्त्रोत का नाम

वर्ल्ड वाइड वेब जिसे कि www, w3 या वेब के नाम से भी जाना जाता है, इंटरनेट पर जानकारी वितरित करने या इंटरनेट से जानकारी प्राप्त करने का सर्वाधिक प्रचलित साधन है। वर्ल्ड वाईड वेब के अंतर्गत पाठ्य, ग्राफ, संगीत, तस्वीर, फिल्म आदि सभी संग्रहित कर, इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के लिये सुलभ कराये जा सकते है।

वेब साईट पर उपलब्ध किसी भी संस्था की जानकारी के प्रथम पृष्ठ को उस संस्था का होम पेज (HOME-PAGE) कहा जाता है तथा इस होम पेज के इंटरनेट पते को यूनिवर्सल रिसोर्स लोकेटर (URL) के नाम से जाना जाता है। जब भी कोई इंटरनेट उपयोगकर्ता किसी www साईट का चयन कर उसे लिंक करता है तब वर्ल्ड वाईड वेब, उपयोगकर्ता को वांछित www सर्वर से जोड़कर उस साईट विशेष का प्रथम पृष्ठ अर्थात होम पेज का पृष्ठ स्क्रीन पर उपलबध करा देता है।

4 वेब ब्राउसर (Web Browser)

यह HTML प्रोग्राम को रन करता है। वे सॉफ्टवेयर जो किसी इंटरनेट उपयोगकर्ता को किसी www को कनेक्ट करने व उस पर रखी सामग्री को देखने, सुनने, पढ़ने व प्राप्त करने की सुविधा उपलडा | कराते हैं, वेब ब्राउसर कहलाते है। इन दिनों जो वेब ब्राउसर बाजार में उपलब्ध है, इनमें प्रमुख है :

- यूनिक्स ऑपरेटिंग के तहत्

1. WLYNX

-विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम के तहत

1. CELLO

2. WINWEB

3. NETSCAPE

4. EXPLORER

- मैक () ऑपरेटिंग सिस्टम के तहत

1. SAMBA तथा MACWEB

वेब ब्राउसर इंटरनेट पर चाही गयी जानकारी के लिए वेब सर्वर कम्प्यूटर को संदेश (Request) भेजता है। वेब सर्वर कम्प्यूटर के पोर्ट 80 पर चल रहा HTTPD प्रोग्राम इस संदेश को ग्रहण करता है। यह प्रोग्राम तदनुसार प्रक्रिया कर वापस वेब ब्राउसर को वांछित जानकारी भेज देता है। वेब सर्वर से प्राप्त हो रही इस जानकारी को वेब ब्राउसर, पैकेज के रूप में प्राप्त कर एकत्रित करता है तथा इन प्राप्त पैकेटों को व्यवस्थित (Assemble) कर स्क्रीन पर जानकारी (वेब पेज) डिस्प्ले कर देता है।



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