डिसलेक्सिक का अर्थ, लक्षण कारण एवं शैक्षणिक उपाय

डिसलेक्सिक का अर्थ, लक्षण कारण एवं शैक्षणिक उपाय
डिसलेक्सिक का अर्थ, लक्षण कारण एवं शैक्षणिक उपाय
डिसलेक्सिक का अर्थ, लक्षण कारण एवं शैक्षणिक उपाय
डिसलेक्सिसक अधिगमकता (Dyslesic, learmer) डिसलेक्सिक अधिगमकर्ता ऐसे छात्र हैं, जो डिसलेक्सिया बीमारी से पीड़ित है। डिसलेक्सिया मस्तिष्क का ऐसा असन्तुलन (Disorder) हैं, जिसमें बालक को अध्ययन में परेशानी होती है तथा वे मानसिक कमी के कारण त्रुटि करते हैं।

डिसलेक्सिया का अर्थ (Meaning of Dyslexia) डिसलेक्सिया एक प्रकार की अधिगम निर्योग्यता (Learning Disability) हैं। जब तक पता नहीं चले कि अमुख बालक इससे पीड़ित है, ऐसे बालकों को समझ पाना काफी कठिन होता है।

डिसलेक्सिया का व्यक्ति की बुद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं होता है, जिस कारण डिसलेक्सिया से पीड़ित बच्चों के अभिभावक सामान्यतया ऊहा-पोह (Confused) में रहते हैं। वे यह नहीं । समझ पाते कि-

*क्यों उनका बालक विद्यालय में कमजोर प्रदर्शन कर रहा है?
*क्या बालक आलसी है? 
*क्या बालक का कक्षा में ध्यान नहीं हैं?
*क्यों वह अन्य छात्रों की तरह नहीं है?
*जैसा स्मार्ट वह दिखता है, वैसा प्रदर्शन क्यों नहीं कर रहा है?
*क्यों एक साधारण किताब पढ़ने में भी उसे संघर्ष करना पड़ता है?

ऐसे कई सवाल इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के अभिभावक अपने आप से पूछते हैं, जब वे अपने बालक को उसके अन्य सहपाठियों की अपेक्षा पढ़ाई में संघर्ष करता हुआ पाते हैं।

डिसलेक्सिया से पीड़ित छात्र (Student Suffered with Dyslexia) विभिन्न अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि लगभग सभी विद्यालयों में 5% से 10% विद्यार्थी विभिन्न प्रकार की अधिगम निर्योग्यताओं से ग्रसित होते हैं। इनमें से डिसलेक्सिया एक मुख्य कारण है। इस बीमारी से पीड़ित विद्यार्थी को अपनी भाषा के अक्षरों को समझने में परेशान होती है। इसके कारण पढ़ने में, भाषा को लिखने में कठिनाई होती है। डिसलेक्सिया से पीड़ित छात्र को भाषा के मूलभूत कौशलों में निपुणता प्राप्त करने में कठिनाई होती है।

    डिसलेक्सिया से पीड़ित छात्र को सूचना को समझने व क्रियान्वित करने में कठिनाई होती है। सामान्यतया डिसलेक्सिक बालक को किसी विशेष वर्ण की ध्वनि या ध्वनियों के संयोजन को समझने में समस्या आती हैं अथवा विभिन्न वर्गों की ध्वनियाँ,जो कि शब्द की रचना करती हैं,का अर्थ समझने में परेशान आती है। इसी कारण से डिसलेक्सिक बालक को लिखने, बोलने व गणित में समस्या आती है।

    इसमें बालक लिखते समय प्रायः विविध प्रकार की त्रुटियों को भ्रमवश करते हैं; जैसे b,d,n-u, m-w,b-p साथ ही शब्दों को who-how, lost-losts, saw-was, girl-gril के रूप में लिखते हैं।

    ऐसे बालक अपनी भाषा के अक्षरों को समझ नहीं पाते हैं और उसको उलट-पलट कर लिखते हैं। उदाहरण के लिए, जैसा कि ऊपर बताया गया है,d को उल्टा कर b लिख देते हैं, m और w में भी गड़बड़ करते हैं। शब्द में अक्षरों के क्रम में गड़बड कर देते हैं; जैसे—girl को gril, bear को baer आदि। शब्द को उल्टा लिख देते हैं; जैसे-Top को pot, saw को was आदि। शब्द में अक्षर कम या ज्यादा लिख देते हैं; जैसे— school को schol, happy को hapy, good को god, was को wass, man को maan आदि।

    बालक में डिसलेक्सिया के चिह्न व लक्षण (Signs and Symptoms of Dyslexia in Children) डिसलेक्सिक अधिगमकर्ता की पहचान के प्रमुख चिह्न व लक्षण निम्नलिखित हैं

1. देर से बोलना। 
2. उच्चारण सम्बन्धी समस्या। 
3. लयबद्ध शब्दों में कठिनाई।
4. वर्णमाला, रंग, संख्या आदि के अधिगम में कठिनाई। 
5. सुलेख में समस्या। 
6. गामक क्रियाओं में कठिनाई। 
7. एक जैसे दिखने वाले वर्गों में भ्रम; जैसे—b-d,p-d, m-w,n-u, म-भ, ध-घ, ड-इ आदि।
8. शब्द में अक्षरों के क्रम में गड़बड़; जैसे—how को who, girl को gril, बकरी को बरकी, कमल को कलम आदि। 
9. वर्ण एवं उससे सम्बन्धित ध्वनि के संयोजन को समझने में कठिनाई । 
10. दिशा ज्ञान में समस्या। 
11. विद्यालयी कार्य में कठिनाई।

डिसलेक्सिया के कारण (Causes of Dyslexia) डिसलेक्सिया मस्तिष्क के द्वारा सूचना के संसाधन में असन्तुलन का परिणाम है।

    विशेषज्ञ डिसलेक्सिया के बारे में अधिक गहराई से नहीं जानते हैं तथा इस दिशा में अनेक शोध व अनुसंधान जारी हैं। वर्तमान अध्ययनों से यह अवश्य ज्ञात होता है कि वंशानुक्रम का इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अगर माता-पिता में से किसी एक को भी डिसलेक्सिया है, तो सन्तान में इसके होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। कुछ अन्य अध्ययनों में गर्भावस्था के दौरान माता के अत्यधिक तनाव में रहने को भी इसका प्रमुख कारण माना गया है।

डिसलेक्सिक अभिगमकर्ता के लिए शिक्षा (Education for Dyslexic Learner) डिसलेक्सिया वैसे तो जीवन पर्यन्त रहने वाली समस्या है, फिर भी कई प्रकार के शैक्षिक कार्यक्रम/व्यवधान (Educational Interventions) उपलब्ध हैं जो कि इससे पीड़ित छात्रों की मदद कर सकते हैं। शैक्षिक व्यवधान की मात्रा एवं प्रकार इस बात पर निर्भर करते हैं कि डिसलेक्सिया की गम्भीरता कितनी है। बहुत से मामलों में एक विशेष क्रियात्मक योजना बनाई जा सकती है जो कि विद्यालय द्वारा प्रयोग में लाई जाती है। डिसलेक्सिया के अधिकांश बालकों को अपने नियमित विद्यालयी अध्ययन के अलावा प्रतिदिन कुछ ही घण्टों का विशेष व्यक्तिगत अनुदेशन अथवा लघु समूह शिक्षण लाभदायक सिद्ध होता है। बहुत कम मामलों में डिसलेक्सिक बालकों को विशेष विद्यालय में भेजने की आवश्यकता पड़ती है।

प्रारम्भिक शैक्षिक व्यवधान (Early Educational Interventions)—विभिन्न अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि ऐसे मामलों में प्रारम्भिक शैक्षिक व्यवधान अत्यन्त लाभकारी हैं। बालक की उम्र सात या आठ साल पूर्ण होने से पूर्व ही इस प्रकार की व्यवस्था से दीर्घकालीन सुधारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं तथा पढ़ने एवं लिखने की अधिगम निर्योग्यता को दूर करने में मदद मिलती है।

    डिसलेक्सिक बालकों के शिक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के शैक्षिक व्यवधान कार्यक्रम उपलब्ध हैं, जिनमें से परिस्थिति और गम्भीरता के अनुसार उत्तम का चयन किया जाना चाहिए।

    विभिन्न प्रकार के उपलब्ध शैक्षिक व्यवधान कार्यक्रमों में से ध्वनिशास्त्र से सम्बन्धित कौशलों के उन्नयन के कार्यक्रम अधिक सहायक सिद्ध होते हैं । इस प्रकार के शैक्षिक व्यवधान में ध्वनि से सम्बन्धित मूल तत्त्वों का ज्ञान बालक को पुनः पुनः करा कर पारंगत किया जाता है। जिससे बालक के पठन व लेखन में काफी हद तक सुधार होता है। विशेष बात यह है कि इस प्रकार के कार्यक्रम अन्य बालकों के लिए भी सहज ही इस्तेमाल किये जा सकते हैं।

ध्वनि शिक्षा के मूल तत्त्व (Core Elements of Phonics) इस प्रकार के शैक्षिक व्यवधान के मुख्य रूप से निम्नलिखित छः तत्त्व हैं


1.ध्वनि के प्रति जागरूकता (Phonemic Awareness) इसके अन्तर्गत बालक को विभिन्न ध्वनियों को पहचानने के प्रति जागरूक किया जाता है। किसी भी शब्द के निर्माण में जिन-जिन वनियों का संयोग है, उन्हें अलग-अलग कर के बताया जाता है; जैसे—hat को htatt; कमल को क् + अ + म्+अ+ल+अ आदि।

    इसी क्रम में छात्रों को कुछ ध्वनियों में परिवर्तन करके नवीन शब्द बनाना भी सिखाया जाता है जो कि उसके पूर्व ज्ञान पर आधारित होना चाहिए; जैसे-उपर्युक्त उदाहरण में h को c से बदल कर नवीन शब्द cat का ज्ञान कराया जा सकता है।

2. ध्वनि अनुदेशन (Phonics Instruction)-इसके अन्तर्गत छात्रों को छपे हुए शब्दों को पहचानना सिखाया जाता है। छपे हुए शब्द की प्रत्येक ध्वनि को अलग-अलग बता कर, सामूहिक रूप से शब्द व उससे संबंधित ध्वनि का सम्बन्ध स्थापित कर सही उच्चारण पर ध्यान दिया जाता है।

    सरल शब्दों को समझाने के बाद, जटिल शब्दों पर ध्यान दिया जाता है, जो कि पूर्व ज्ञान पर आधारित होना चाहिये; जैसे—(1) चल, नल, कल आदि। (2) कमल, सड़क, पतंग आदि। (3) थरमस, तरबूज, पुस्तक आदि। (4) कमल नल पर चल आदि।

3.शब्द-विन्यास एवं लेखन अनुदेशन (Spelling and writing Instruction) उपर्युक्त सोपान के पश्चात् छात्र को शब्द-विन्यास एवं लेखन के प्रति प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे बालक विभिन्न अक्षरों के मेल से शब्द की रचना करना और सम्बन्धित ध्वनि को समझाता है। सरल शब्दों की रचना समझने के पश्चात् जटिल शब्द एवं उसके पश्चात् वाक्य बनाना सीखता है।

4.धाराप्रवाह अनुदेशन (Fluency Instruction) इसके अन्तर्गत छात्र को पठन का अभ्यास कराया जाता है। इस सोपान का मुख्य उद्देश्य छात्र को उचित लय व गति से पठन में पारंगत करना है।

5.शब्द-कोश अनुदेशन (Vocabulary Instruction)—इसके अन्तर्गत छात्र को उन शब्दों को पहचानना सिखाया जाता है, जो वो पढ़ रहे हैं। साथ ही साथ नवीन शब्दों की रचना का भी ज्ञान कराया जाता है।

6.ज्ञान-कोश अनुदेशन (Comprehension Instruction) इसके अन्तर्गत छात्रों को स्वयं की समझ का प्रबोधन (Monitor) करना सिखाया जाता है। उनको अपने आप से प्रश्न पूछने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। उन्हें लगे कि उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है, कहीं कोई कमी है ङ्केतो वह तुरन्त उसमें सुधार कर लें। साथ ही साथ यह अपेक्षा की जाती है कि कोई भी नवीन ज्ञान सीखते समय उसे पूर्व ज्ञान से जोड़ कर, समझ कर सीखे, जिससे अधिगम स्थाई हो सके।

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