शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध | Teaching and Learning

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध 
शिक्षण और अधिगम में पाये जाने वाले सम्बन्ध 
शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध
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शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध (Relationship between Teaching and Learning)- 
    शिक्षा का मुख्य लक्ष्य अधिगम को प्रभावित करना है। जहाँ शिक्षण किया जाता है वहाँ अधिगम क्रियाएँ अवश्य होती हैं। शिक्षण के जरिए विद्यार्थियों को सीखने की सुविधा मिलती है। आधुनिक विद्वानों के विचारानुसार शिक्षण अधिगम एक ही प्रत्यय है। शिक्षण तब तक अधूरा है जब तक अधिगम प्रत्यय का उसके साथ सम्बन्ध न जोड़ा जाये। निम्न वर्णित विभिन्न विद्वानों के विचारों से शिक्षण तथा अधिगम के प्रत्यय को और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है--

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

बी.ओ.स्मिथ के अनुसार, "शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा अधिगम का जन्म होता है। जहाँ शिक्षण है वहाँ अधिगम जरूर होगा, परन्तु यह जरूरी नहीं कि जहाँ अधिगम हो वहाँ शिक्षण भी हो। स्मिथ महोदय शिक्षण तथा अधिगम को दो अलग-अलग प्रत्यय मानते हैं लेकिन साथ-साथ उनका ऐसा भी विचार है कि शिक्षण की क्रियाओं का विश्लेषण अधिगम के स्वरूपों के अभाव में सम्भव नहीं है।"

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

क्लार्क महोदय के अनुसार, "अधिगम के द्वारा व्यवहार में स्थायी परिवर्तन किए जा सकते हैं, जिस पर परिपक्वता एवं अभिप्रेरणा का प्रभाव नहीं होता। उन्होंने शिक्षण को एक ऐसी प्रक्रिया बताया है जिसके द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाया जा सकता है। इसलिए शिक्षण की उपलब्धि का आधार अधिगम ही है।"

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

एन. एल. गेज के मतानुसार, "शिक्षण तथा अधिगम के प्रत्ययों में अन्तर किया जा सकता है लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि जब तक शिक्षण की प्रक्रिया का समन्वय अधिगम के साथ नहीं होगा तब तक उसे प्रभावशाली नहीं बनाया जा सकता। इसलिए शिक्षण अधिगम को एक प्रत्यय ही मानकर चलना चाहिए।"

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

बी. एस. ब्लूम की यह धारणा है कि,"शिक्षण की क्रियाओं, गृह-कार्य, वाद-विवाद, व्याख्यानों आदि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के क्रियात्मक, ज्ञानात्मक एवं भावात्मक पक्षों के स्तरों को विकसित करना होता है।"

इस प्रकार का विकास अधिगम का ही स्वरूप होता है। इसलिए शिक्षण के लिए अधिगम आवश्यक प्रत्यय है और प्रभावशाली शिक्षण के लिए अधिगम के स्वरूपों को ध्यान में रखना जरूरी है।

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

बर्टन और गेज (Burton and Gage) के अनुसार सीखने के सिद्धान्त स्वयं में पूर्ण भी नहीं हैं। क्रोनबैक (Cronback) ने सीखने के 7 तत्त्वों (Seven Elements) की चर्चा की है और इन्हीं तत्त्वों के आधार पर शिक्षण (Teaching) के सिद्धान्तों को निर्धारित किया जाता है। ये तत्त्व हैं-1. स्थिति, 2. व्यक्तिगत विशेषतायें (Personal Characteristics), 3. लक्ष्य (Coal),4. व्याख्या (Interpretation), 5. कार्य (Action), 6. परिणाम (Consequences),7.विरोध पर प्रतिक्रिया (Reaction to thwarting)। यदि विद्यार्थी अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं करता तो वह उस क्रिया या शिक्षण का विरोध करेगा। इससे उसके मन में तनाव होगा। अत: अध्यापक उनकी कठिनाइयों को समझने और उन्हें सुलझाने में उनकी सहायता कर सकता है।

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध


Teaching and Learning
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इसी प्रकार ब्लूम के उद्देश्य (Bloom's objectives) शिक्षण और अधिगम में सम्बन्ध स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। ब्लूम के उद्देश्यों और बिगे (Bigge's) के शिक्षण स्तरों का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है। ये शिक्षण स्तर हैं स्मृति स्तर, (Memory Level), बोध .. स्तर (Understanding Level) और विमर्शपूर्ण स्तर (Reflective Level)| ब्लूम द्वारा बताये गए उद्देश्य हैं-ज्ञान का उद्देश्य, बुद्धि का उद्देश्य (Comprehensive), प्रयोग (Application), विश्लेषण (Analysis), संश्लेषण (Synthesis), और मूल्यांकन (Evaluation)।

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

    अधिगम और शिक्षक, दोनों का ही लक्ष्य बालक के व्यवहार में आवश्यक परिवर्तन लाकर उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना होता है। इन दोनों प्रतिक्रियाओं को अलग अलग रखना अनुचित होगा। शिक्षण की प्रक्रिया इस प्रकार से आयोजित की जाए कि जिससे अधिक से अधिक अधिगम हो सके।

    शिक्षण-अधिगम के सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए उपागम-प्रणाली (System Ap proach) की सहायता भी ली जा सकती है। मैक्डानल्ड (McDonald) ने भी इस सम्बन्ध में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को चार उप क्रियाओं या भागों में बाँटकर शिक्षण और अधिगम को सम्बन्धित करने का प्रयास किया है। ये उप क्रियाएँ हैं-() पाठ्यक्रम (Curriculum), शिक्षण (Teaching), (ii) अनुदेशन (Instruction), (iii) अधिगम (Learning) - 
    महान् शिक्षाशास्त्री किलपैट्रिक ने कहा है कि "जब तब बच्चा सीखता नहीं, शिक्षक ने पढ़ाया नहीं।" उन्होंने शिक्षण और अधिगम के सम्बन्ध की तुलना किसी वस्तु के बेचने और खरीदने के सम्बन्ध के साथ की है। जब साधारण रूप में इस पर विचार करते हैं तो इसमें सत्यता झलकती है, परन्तु जब गम्भीरता से सोचते हैं तो यह कथन पूर्णतया सत्य नहीं लगता। बेचने खरीदने और शिक्षण अधिगम के बीच समानता के विश्लेषण से यह जानकारी मिलती है कि बेचने और खरीदने की प्रक्रिया में चार तत्त्व सम्मिलित हैं—(क) एक बेचने वाला, (ख) एक खरीदने वाला, (ग) बेचने की प्रक्रिया और (घ) अधिगम की प्रक्रिया। निष्कर्ष में हम यह कह सकते हैं कि बेचने खरीदने की प्रक्रिया में बेचने वाले तथा खरीदने वाले के हितों में समानता नहीं होती। दोनों अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहते हैं जिसके लिए दोनों पक्षों में स्वार्थों की होड़ है, परन्तु शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में इस प्रकार का मुकाबला नहीं है बल्कि इसके विपरीत शिक्षार्थी का सर्वांगीण विकास करना मुख्य उद्देश्य है।

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

    शिक्षण का अर्थ है 'सिखाना' और अधिगम का अर्थ है 'सीखना'। इन दोनों के प्रत्यय अलग-अलग हैं, इनकी विशेषताएँ एवं प्रकृति भी भिन्न हैं फिर भी इन दोनों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। शिक्षण एवं अधिगम के सम्बन्धों की विस्तृत जानकारी निम्न तथ्यों के अध्ययन से की जा सकती हैं 

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

1.अधिगम मानसिक क्षमताओं के विकास की एक प्रक्रिया है, जो मनुष्य को समायोजन में मदद करती है। यह प्रक्रिया भी है तथा परिणाम भी। जब भी मनुष्य को शिक्षण मिलता है अधिगम अवश्य होता है। शिक्षा तथा अधिगम में अन्तर है। शिक्षण के अन्तर्गत कई क्रियाओं का समन्वय है, इसका उद्देश्य दूसरों को प्रभावित करना है, दूसरों के लिए सहायक होना तथा दूसरों के व्यवहार को संशोधित एवं परिवर्द्धित करना है।

2.अधिगम अकेली क्रिया है जिसका उद्देश्य निजी हित में नवीन व्यवहार अर्जित करना है। यह व्यक्तिगत क्रिया है जबकि शिक्षण सामाजिक क्रिया है। अधिगम में या तो विद्यार्थी सीखता है अथवा वह सीख नहीं पाता।

3. अधिगम में एक ही क्रिया करनी पड़ती है, जबकि शिक्षण में बहुत-सी क्रियायें करनी पड़ती हैं, परन्तु शिक्षण की क्रियाओं का आयोजन अधिगम के लिए किया जाता है। शिक्षण की सभी क्रियाओं के समन्वय के परिणामस्वरूप ही अधिगम होता है। इसलिए इनका परस्पर गहरा सम्बन्ध है।

4. शिक्षण कारक, कारण या साधन है अतएव यह प्रक्रिया है। अधिगम परिणाम अथवा प्रतिफल है। इसे हम साध्य भी कह सकते हैं।

5. शिक्षण में कार्य का बोध होता है, इसमें लक्ष्य की ओर बढ़ने का आशय है। इसे अध्यापक कुशलतापूर्वक ध्यान से और सफलतापूर्वक पूरा करता है। अधिगम शब्द सफलता सूचक है। इस प्रकार शिक्षण व्यापक शब्द है और अधिगम संकुचित । अधिगम के लिए शिक्षण की योजना बनाना आवश्यक है।

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

6.शिक्षण नये ज्ञान देने की प्रक्रिया है और अधिगम नये ज्ञान को ग्रहण करने की प्रक्रिया है। एक प्रत्यय का कार्य है ज्ञान देना जबकि दूसरे का कार्य है ज्ञान को प्राप्त करना लेकिन ये दोनों कार्य तभी सम्भव हो सकते हैं जब ये दोनों क्रियाशील हों। इसलिए दोनों में परस्पर नजदीकी का सम्बन्ध है।

7.अधिगम को उपलब्धि क्रिया माना है जबकि शिक्षण एक उद्देश्यमुखी क्रिया है। शिक्षण के उद्देश्य अधिगम के लिए भी बताये जाते हैं। शिक्षण के उद्देश्यों का निर्माण होता है और अधिगम में उनकी प्राप्ति होती है। इसलिए इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता।

8. शिक्षण एवं अधिगम दोनों क्रियायें एक-दूसरे की पूरक हैं, जैसे कि क्लार्क ने शिक्षण को इस प्रकार परिभाषित किया है कि,"शिक्षण क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था है, जिससे छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन होता है। इसलिए इन दोनों का आपस में गहरा सम्बन्ध है।"

9. शिक्षण को स्वतंत्र चर माना जाता है, जबकि छात्र को आश्रित चर माना जाता है। शिक्षक का कार्य शिक्षण है जबकि छात्र का काम सीखना (अधिगम) है। अध्यापक स्वतन्त्र होकर छात्र के मानसिक स्तर के अनुसार उनके ज्ञान में वृद्धि करने की क्रियाओं का आयोजन करता है और छात्र को शिक्षक के अनुसार सीखना पड़ता है इसलिए यह दोनों कार्य साथ-साथ चलते हैं। इसलिए इनका परस्पर गहरा सम्बन्ध है।

10. थामसन ग्रीन (Thomson Green) ने अपनी पुस्तक 'Activities of Teaching' में लिखा है कि शिक्षण के बिना अधिगम नहीं हो सकता लेकिन अधिगम के बिना शिक्षण सम्भव है। शिक्षण का लक्ष्य अधिगम हो सकता है, लेकिन शिक्षण से अधिगम हो, यह आवश्यक नहीं हैं। उदाहरण के लिए, डॉक्टर रोगी का इलाज इस उद्देश्य से करता है कि वह ठीक हो जाए। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि रोगी उस डॉक्टर की बताई हुई दवा से ठीक हो जाए। इस प्रकार अध्यापक विद्यार्थियों में परिवर्तन करना चाहता है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि उन सभी में परिवर्तन हो और वे सीख सकें। इस प्रकार अधिगम की प्रक्रिया शिक्षण की अनुपस्थिति में सम्भव नहीं और हर प्रकार के शिक्षण से यह आवश्यक नहीं कि अधिगम अवश्य हो।

शिक्षण एवं अधिगम में सम्बन्ध

11. क्लार्क (Clark) ने शिक्षण व अधिगम में सम्बन्ध स्थापित करते हुए लिखा है कि शिक्षण प्रक्रिया की व्यवस्था इसलिए की जाती है जिससे कि विद्यार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन हो सकें। अधिगम की प्रक्रिया द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार शिक्षण व अधिगम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन लाना है ताकि वे वातावरण में प्रभावशाली ढंग से समायोजन स्थापित कर सके। शिक्षण की उपलब्धि का मानदण्ड अधिगम ही है। एक प्रक्रिया के बिना दूसरी अधूरी है। इस प्रकार शिक्षण व अधिगम .. की प्रक्रिया आपस में घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है।

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