राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत तथा मौलिक कर्तव्य

राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत तथा मौलिक कर्तव्य

    राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को संविधान के भाग (IV) में सम्मिलित किया गया है। संविधान के निर्माताओं ने सामाजिक और आर्थिक समानता लाने के विशेष उद्देश्य से संविधान में इन्हे सम्मिलित किया। ये सिद्धांत राज्यों (सरकारों) को लोगों की सामूहिक भलाई के लिए नीति और कानून बनाने के निर्देश देते हैं। ये सिद्धांत न्याययोग्य नहीं हैं और इन्हें न्यायालय द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। फिर भी देश की सरकार को चलाने के ये मूल आधार हैं।
राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत तथा मौलिक कर्तव्य


इनको चार वर्गों में बांटते है -
(1). सामाजिक और आर्थिक
(2) गांधीवादी 
(3) अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा 
(4) विविध
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    नीति-निर्देशक सिद्धांत शिक्षा की व्यापकता, बाल मजदूरी का उन्मूलन तथा स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने पर जोर देते हैं। एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना और आर्थिक सामाजिक लोकतंत्र का ढांचा बनाते हैं।
    मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक सिद्धांतों में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं। मौलिक अधिकार न्याययोग्य होते हुए भी नकारात्मक हैं जबकि नीति-निर्देशक सिद्धांत न्याययोग्य नहीं हैं और फिर भी स्वाभाविक रूप से सकारात्मक हैं।
    इन दोनों में गहरा संबंध होता है। ये दोनों ही सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अब उच्चतम न्यायालय ने भी इन नीति-निर्देशक सिद्धांतो पर जोर दिया है।

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों की प्रकृति का मत्यांकन कीजिए। इनके पीछे क्या शक्ति है।

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों की प्रकृति एवं शक्ति

नीति निर्देशक सिद्धांत आयरलैंड के संविधान से लिये गए हैं।  ये वे सिद्धांत हैं जिनकी अपेक्षा हम राज्य से करते हैं। राज्य को अपनी नीति बनाने के लिए ये सामान्य निर्देश हैं। इन्हें निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है-
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नीति निर्देशक सिद्धांतों का उद्देश्य – 

संविधान निर्माताओं की इच्छा थी कि राज्य एक ऐसी व्यवस्था को जन्म दें जिससे नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त हो सके। नीति निर्देश सिद्धांतों के माध्यम से उन्होंने समाजवादी के अतिरिक्त गांधीवादी आदर्शों को भी हमारे समक्ष रखा है। इन सिद्धांतों में हमारे सामाजिक व आर्थिक लक्ष्य निहित हैं। इन्हें लागू करने पर देश में शीघ्र ही एक अहिंसक सामाजिक क्रांति लाई जा सकती है। साधारण से साधारण व्यक्ति को भी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकेगी। इस निर्देशक सिद्धातों के क्षेत्र में सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, शिक्षा, राजनीतिक व प्रशासनिक कानून सुधार, शांति आदि शामिल है।

नीति निर्देशक सिद्धांतों की प्रकृति-

नीति निर्देशक सिद्धांतों के स्वरूप के विषय मे न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता।  राज्य इन सिद्धांतों का पालन करने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य नही होगा।

मौलिक स्थान - 

नीति निर्देशक सिद्धांत का देश के शासन में मौलिक स्थान है। विधान मण्डल और कार्यपालिका को उनका अनुसरण करना चाहिए। अदालतों को कानूनों की व्याख्या करते समय या कोई निर्णय देते समय इन सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए। 10 मई 1985 के अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने सभी नागरिकों  के लिए समान नागरिक संहिता बनाये जाने पर बल दिया। 

नीति निर्देशक सिद्धान्त के पीछे शक्ति - 

निर्देशक सिद्धांतों को क्रियान्वित करने के लिए यदि कोई कानून बनाया जाता है तो उसे इस आधार अवैध घोषित नहीं किया जा सकता है कि अनुच्छेद 14 व 19 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों में रहा है। इस कानूनी मान्यता के अतिरिक्त निर्देशक सिद्धांतों के पीछे एक संसद और राज्य विधान सभाओं की शक्ति है। संविधान में कहा गया है कि नीति निर्देशक सिद्धांत देश के शासन में मौलिक स्थान रखते हैं और कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को प्रयोग में लाना राज्य का कर्तव्य होगा। नीति निर्देशक सिद्धांतों के पीछे जनमत की शक्ति है।
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राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के वर्गीकरण की विवेचना कीजिए।

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के वर्गीकरण

    भारत के संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 में 51 तक राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का प्रावधान है। ये लोककल्याण कारी राज्य की कल्पना को साकार रूप देने, समता पर आधारित समाज का निर्माण करने, विकास हेतु सभी को समान अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से संविधान में समाहित किये गए हैं। इन्हें निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है -
(क) आर्थिक सुरक्षा संबंधी निर्देशक तत्व सामाजिक हित और शिक्षा संबंधी निर्देशक तत्व 
(ग) पंचायती राज, प्राचीन स्मारक तथा न्याय संबंधी निर्देशक तत्व 
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा संबंधी 

(क) आर्थिक सुरक्षा संबंधी तत्व निमलिखित हैं

स्त्री पुरुष सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो। 

समुदाय के भौतिक साधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामुहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो।  

सम्पति और उत्पादन के साधनों का इस प्रकार केन्द्रीकरण न हो कि सार्वजनिक हित को बाधा पहुंचे।

स्त्री-पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाय।

श्रमिक पुरुषों और स्त्रियों के स्वास्थ्य तथा शक्ति एवं बालकों की सुकुमार अवस्था का आर्थिक दुरूपयोग न हो। . राज्य के द्वारा बच्चों के स्वस्थ रूप से विकास के लिए अवसर

और सुविधाएं प्रदान की जाएंगी, बच्चों के शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परिवेदना से रक्षा की जायेगी।

प्रत्येक बक्ति को योग्यतानुसार रोजगार, शिक्षा एवं बेकारी वृद्धावस्था, बीमारी तथा अंगहीन होने की दशा में सार्वजनिक सहायता देने का प्रयास राज्य करेगा।

राज्य काम के लिए यथोचित और मानवोचित दशाओं का प्रबंध करेगा तथा ऐसी व्यवस्था करेगा जिससे स्त्रियों को प्रसूतावस्था में कार्य न करना पडे।

राज्य कानून द्वारा ऐसी व्यवस्था करेगा जिससे उद्योग एवं कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को यथोचित वेतन मिल सके। '. उनका जीवन स्तर ऊंचा उठ सके। वे अवकाश का सदुपयोग कर सके।

राज्य ग्रामीण कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देगा। 

राज्य कमजोरवर्गों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करायेगा।

उद्योगों के प्रबन्ध में कर्मचारियों को भागीदार बनाने की व्यवस्था करेगा।

गो नस्ल वध को रोकने का प्रयास करेगा एवं उसका सुधार, पशुपालन का वैज्ञानिक प्रबन्धं को अपनाएगा।

विभिन्न व्यवस्थाओं में लगे व्यक्तियों के बीच आय संबंधी अन्तर को कम करने का प्रयास करेगा। 
राज्य के नीति निदेशक तत्व
नीति निदेशक तत्व का क्या उद्देश्य है

(ख) सामाजिक हित और शिक्षा संबंधी निर्देशक तत्व-


राज्य देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान आचार संहिता बनाने का प्रयल करेगा।

राज्य संविधान लागू होने के 10 वर्ष के अन्दर 14 वर्ष की आयु तक के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करेगा।

राज्य अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछडे वर्ग के विकास का प्रयल करेगा और सामाजिक अन्याय व शोषण से रक्षा करेगा।

राज्य लोगों के स्वास्थ्य एवं जीवन स्तर को उँचा उठाने का प्रयास करेगा। मादक पदार्थों के सेवन पर रोक लगायेगा।

राज्य पर्यावरण की रक्षा एवं उसमें सुधार करने तथा देश के वन्य जीव और वनों की सुरक्षा का प्रयल करेगा। 

(ग) पंचायती राज, प्राचीन स्मारकों तथा न्याय से संबंधी निर्देशक तत्व-

राष्ट्रीय महत्व की कलात्मक, प्राचीन ऐतिहासिक स्मारकों को नष्ट होने से बचायेगा।

राज्य न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का प्रयल करेगा। 

(घ) अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा संबंधी सिद्धांत-

राज्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की वृद्धि का प्रयल करेगा।

राज्य संसार के विभिन्न राष्ट्रों के मध्य न्यायपूर्ण व सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाये रखने का प्रयल करेगा।

अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों एवं कानून का पालन करेगा। अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता से सुलझाने का प्रयास करेगा।

इन सिद्धांतों के कारण भारत संविधान की प्रस्तावना के अनुसार एक लोक कल्याणकारी राज्य बन सकेगा।
नीति निर्देशक तत्व कितने हैं
मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के बीच संबंध
शिक्षा की सार्वभौमिकता के नीति निर्देशक सिद्धांत को किस तरह लागू किया गया है?

शिक्षा की सार्वभौमिकता के नीति निर्देशक सिद्धांत

नीति निर्देशक सिद्धांत (भाग-4 के अनुच्छेद 45 के अनुसार राज्य संविधान लागू होने के 10 वर्ष के अन्दर 14 वर्ष की आयु . तक के बालकों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करेगा। इस हेतु राज्य ने महत्वपूर्ण प्रयास किये हैं। भारत सरकार के प्रयासों को निम्नलिखित प्रकार है-मूल कर्तव्यों में समावेश - 86वें संविधान संशोधन के माध्यम से मूल कर्तव्यों में भी शिक्षा के प्रावधान को समावेश किया गया है। इसे अनुच्छेद 51 (क) के त धारा में इस प्रकार जोडा गया है- 6 से 14 वर्ष के बच्चों को उनके अभिभावक अथवा संरक्षण या प्रतिपालक जैसी भी स्थिति हो शिक्षा के अवसर प्रदान करें। निरक्षरता की समस्या का समाधान-भारत के स्वतंत्र होने पर 14 प्रतिशत जनसंख्या ही मात्र शिक्षित थी। हमारी सरकार ने शिक्षा के महत्व को समझा और लोगों तक शिक्षा पहुंचाने पर जोर दिया। अब शिक्षा की दर बढकर 52 प्रतिशत हो गई है। इस प्रकार अभी भी हमारी जनसंख्या का लगभग आधा भाग अशिक्षित है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा छोड जाने (डाप आउट) बच्चों के कारण 15 से 35 वर्ष की आयु के निरक्षरों की आयु बढती जा रही है। यदि ऐसा ही रहा तो शीघ्र ही अशिक्षितओं की संख्या बढकर 50 करोड हो जायेगी। राष्ट्रीयता शिक्षा नीति- 1986 की राष्ट्रीयता नीति के अनुसार साधारण लोगों तक 5. प्राथमिक शिक्षा पहुंचाने हेतु राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा ऑपरेशन - ब्लेक बोर्ड जैसे प्रोजेक्ट शुरू किये गये। यह सामूहिक शिक्षा का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम के अनुसार हर गांव में एक स्कूल हो, जिसमें श्यामपट्ट और अध्यापक हो- और प्रौढ शिक्षा के माध्यम से और प्रौढ शिक्षा स्कूल खोलकर प्रौढों को साक्षर बनाया गया। इनके पीछे यह धारणा थी कि एक अनपढ को पढाकर राष्ट्रीय कर्तव्य का निर्वाह किया जाय।

    इस प्रकार नीति निर्देशक सिद्धांत अनुच्छेद 45 शिक्षा की सार्वभौमिकता को लागू करनेके लिए सरकार ने डी.पी.ई.पी. तथा

सर्वशिक्षा अभियान आदि के माध्यम सेअलख जगा दिया। 

बाल मजदूरी उन्मूलन | महिलाओं के स्तर में सुधार

बाल मजदूरी उन्मूलन -

    नीति निर्देशक सिद्धांतोंकि के अनुच्छेद 39 (छ) में कहा गया है कि राज्य के द्वारा बच्चों के स्वस्थ रूप से विकास के लिए अवसर और सुविधाएं प्रदान की जायेंगीं। उन्हें : स्वतंत्रता से समान की स्थिति प्राप्त होगी तथा बच्चों और युवकों की शोषण से तथा नैतिक तथा आर्थिक परित्याग से रक्षा की जायेगी।

    इसी प्रकार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को जोखिम पूर्ण : कार्यों (खानों एवं कारखानों) में नियक्त करना भी मूल अधिकार के .. अनुच्छेद 24 में प्रतिबंधित है। इस सब के पीछे मूल भावना यह है कि .. बच्चों को शोषण, अवहेलना और दुरपयोग से बचाने का प्रयास किया : जाय।

मानव अधिकार आयोग के सुझाव - 

एन.एच.आर.सी. । राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी बाल मजदूर, बाल शोषण जैसे कानून का उल्लंघन कर्ता संस्थानों को दण्डित करना प्रारम्भ कर दिया गया है। जिन क्षेत्रों को उनकी शिक्षा संबंधी अधिकार से वंचित रखकर बाल मजदूरी में लगाने का प्रयास किया वहां इसने सरकार को ऐसी स्थिति में तुरंत सुधार लाने को कहा है। ताकि इसे चंगुल से निकलकर आए बच्चों के लिए मौलिक शिक्षा का प्रबन्ध हो। तथापि इस संबंध में स्थिति निराशाजनक है। दण्डनीय परिस्थितियों में बाल मजदूरों को जी दूर करने में मां-बाप का रवैया सहायक सिद्ध नहीं हुआ। वे बच्चे को पैसा कमाने के लिए काम करने पर बाध्य करते हैं ताकि परिवार की आय बढे। निः संदेह गरीबी भी एक बड़ा कारण है।
राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों की आलोचना
भारत में कुल कितने नीति निर्देशक तत्व?

महिलाओं के स्तर में सुधार - 

नीति निर्देशक सिद्धांतों अनच्छेद 12 मे कहा गया है कि राज्य काम के लिए यथोचितऔर मानवोचित दशाओं का प्रबन्ध करेगा तथा ऐसी व्यवस्था करेगा जिससे स्त्रियोंको प्रसूतवस्था में कार्य न करना पडे।

. मानवीय समाज पुरुष प्रधान समाज है इसलिए पुरुष की अपेक्षा सी की स्थिति कमजोर है। सभी रीति-रिवाज,धना संपत्ति उत्तराधिकार, विवाह संबंधी मान्यताएं सुरुष के पक्ष में हो जाती है। खियां कुरीतियों और धार्मिक कुप्रथाओं जैसे सतीप्रथा, पर्दा और दहेज जैसी कुप्रथाओं के कारण दुख सहती रहती हैं।

मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक सिद्धांतों में काफी सीमा तक अब महिलाओं को राहत दी गई है। लैंगिक आधार पर अब स्त्री पुरुष में भेदभाव नहीं किया जा सकता। नीति निर्देशक तत्वों में भी समान पारिश्रमिक की बात कही गई है। मौलिक कर्तव्यों में भी इस बात पर बल दिया गया है कि भारत का प्रत्येक नागरिक नारी को हीनं भावना से दूर कर उसका मान-सम्मान को ऊंचा उठाने का प्रयास करें।

विभिन्न कानून- 

    महिलाओं को सुरक्षा एवं सम्पत्ति में भागीरी हेतु कई कानून बनाये गए।
    दहेज विरोधी कानून से महिलाओं को काफी राहत मिली है। भ्रुण जाँच एवं बालिका हत्या को रोकने, लज्ञडका-लडकी में भेद-भाव खत्म करने, बाल विवाह निषेध हेतु सरकारी कदम सराहनीय हैं। आरक्षरण-महिलजा सशक्तिकरण को बढावा देने के लिए नगरपालिका. एवं पंचायतों में 1/3 स्थान आरक्षित किये गए हैं। इसी प्रकार संसद और विधान मण्डलों के चुनाव में इसी तरह का प्रस्ताव है।
    फिर भी महिलाओं की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। अभी और प्रयास किये जाने बाकी हैं। .

नीति निर्देशक सिद्धांतों को क्रियान्वित करने में राज्य की क्या भूमिका है।

नीति निर्देशक सिद्धांतों को क्रियान्वित करने में राज्य की क्या भूमिका 

संविधान निर्माताओं ने गांधी जी के आदर्शों को नीति निर्देशक सिद्धांतों में समाहित करने का प्रयास किया। जैसे-राम राज्य, लोकान, गण राज्य, पंचायतीराज के माध्यम से विकेन्द्रीकरण, गौ 'संवर्धन आदि। संविधान में प्रदत्त होने के कारण नीति निर्देशक सिद्धांतों का प्रावधान स्थायी है। सरकार चाहे जिस दल की भी हो उसे इन सिद्धांतों का पालन करना ही पड़ता है। सरकार (राज्य ) की इन सिद्धांतों के क्रियान्वयन में भूमिका का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से कर सकते हैं
भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व कहाँ से लिए गए?
राज्य के नीति निर्देशक तत्व कितने प्रकार के होते हैं?
(1) पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से
(2) समाजवाद व आर्थिक कल्याण 
(3) सामाजिक न्याय व जनकल्याण
(4) सत्ता का विकेन्द्रीकरण 

(1) पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यय से -

राज्य ने आर्थिक क्षेत्र में रूस के पैटर्न पर पंचवर्षीय योजना लाग करके विकास के, रोजगार के, गरीबी उन्मूलन के आयाम स्थापित किये हैं। जिससे गरीब अमीर के बीच भेदभाव कम हुआ है। 

(2) समाजवाद व आर्थिक कल्याण -

इस दृष्टि से निम्नलिखित नीति अपनाई गई है - 
जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानूनों के द्वारा संपत्ति के उचित विभाजन का प्रयास किया गया है। भूमिहीनों को भमि भी वितरित की गई।
बैंकों और बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण धन सवेदकरण को रोकने की दृष्टि से उठाया गया एक महत्वपूर्ण कम था।
राज्य के नीति निदेशक तत्व के उद्देश्य क्या है?
राज्य के नीति निदेशक तत्व का महत्व बताइए
अर्थ व्यवस्था को प्रतियोगिता प्रधान बनाया जा रहा है।

नये उद्योगों की स्थापना और पुराने उद्योगों के विस्तार के लिए . लाइसेंस प्रणाली को समाप्त किया गया है।

(3) सामाजिक याय और जन कल्याण -

(i) अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग का गठन किया गया। जिसने इनके उन्नयन हेतु प्रयास किये।
(ii) पिछडे वर्गो और विशेषकर अनुसूचित जातियों के विकास की ओर ध्यान दिया गया। .
(iii) उन्हें शिक्षा, छात्रवृतियां व रोजगार देने, लाइसेंस और . परमिट आदि देने में सरकार ने उदारता की नीति अपनाई है।
(iv) हर दस वर्ष वाद पिछडे वर्गों की सूची में संशोधन करना केन्द्र सरकार के लिए अनिवार्य होगा। 
(v) राष्ट्रीय पिछडा वर्ग आयोग उनलोगों के निवेनों की जांच . करेगा जो इस वर्ग में शामिल होनेके लिए आवेदन करेंगे।

(4) सत्ता का विकेन्द्रीकरण : 

ग्राम पंचायतों का गठन कर सत्ता का शीर्ष से ग्राम स्तर (वार्ड पंच) तक बंटवारा किया गया। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के अधीन यह व्यवस्था की गई है कि पंचायतों में समाज के कमजोर वर्गों और महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व मिले तथा उन्हें पर्याप्त शक्तियां व वित्तीय साधन प्रदान किये जाएं। महिलाओं को 30 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं।

मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के पारस्परिक संबंध

मूल अधिकार यद्यपि न्याययोग्य है और नीति निर्देशक सिद्धांतों के पीछे यह शक्ति नहीं है फिर भी दोनों ही सासमाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समानता के माध्यम से लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कल्याणकारी राज्य तभी स्थापित हो सकता है जब सरकार इन निर्देशकों का पालन करें। '
राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों का वर्णन कीजिए
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गोलकनाथ वाद - 

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि सरकार का कर्तव्य है कि नीति निर्देशक तत्वों को लागू करें। उसका यह भी कर्तव्य है कि वे बिना मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के ऐसा करें।

    किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि नीति निर्देशक तत्वों को मूल अधिकारों पर वरीयता प्रदान करना संविधान की भावना के विपरीत है।

शिक्षा के मूल अधिकार को नीति निर्देशक तत्व अनुच्छेद 45 से जोडा गया है।

नीति निर्देशक तत्वों के पीछे शक्ति - 

यद्यपि इन तत्वों के पीछे न्यायालय की शक्ति नहीं है फिर भी अंतिम स्वीकृति तो लोगों जनमत के पास है। जिससे प्रत्येक सरकार डरती है। सरकार इनकी अवहेलना नहीं कर सकती। अपने हर कार्य के लिए सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी है। जब जनता को यह मालुम हो जाता है कि ये सिद्धांत उनके कल्याण के लिए है तब वह इन सिद्धान्तों को क्रियान्वित कराने के लिए सरकार पर संघों के माध्यम से दबाव डालती है।

 इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक सिक्के के दो पहलू हैं। इनमें परस्पर सामंजस्य तथा समरसता (Harmony) का सिद्धांत लागू होता है। 

हमारे संवधिान में वर्णित मौलिक कर्तव्यों को सूचीबद्ध करे।

मौलिक कर्तव्य

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने यह महसूस किया कि भारत के नागरिकों को मूल अधिकार के साथ मूल कर्तव्य भी होने चाहिए ताकि देश के प्रति उनका समर्पण बढ सके। 42वें संविधान संशोधन 1976 में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 51 में क से ज तक 10 मूल कर्तव्य जुडवाये। 86वें संविधान संशोधन में 11वां मूल कर्तव्य जोडा गया। कुल 11 मूल कर्तव्य वर्तमान में हैं। जिनका वर्णन अंकित हैं- भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह -
राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
राज्य के नीति निर्देशक तत्व का वर्णन कीजिए
(क) संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करें। ' (ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये और उनका पालन करें।

(ग) भारत की संप्रभुत्ता,एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाये रखे।

(घ) देश की रक्षा करे और आहान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।

(ङ) भारत के सभी लोगों में समरसताऔर समान भ्रातत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभावों से परे हों, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो महिलाओं के सम्मान का विरुद्ध हो।

(च) हमारी सामाजजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का मतलब समझे और उसका परिरक्षण करें।

(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं रक्षा करें। और उनका संवर्धन करें तथा प्राणीमात्र के प्रति दया भाव रखें।

(ज) वैज्ञानिक दृष्किोण, मानववाद और जार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।

(झ) साार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।

(अ) व्यक्तिगत और सामुहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर उठनने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हए प्रयल और उपलब्धियों की उंचाइयों को छू सके।

(त) 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को उनके अभिभावक अथवा संरक्षक या प्रतिपालक जैसी भी स्थिति हो, शिक्षा के अवसर प्रदान करें।

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