शिक्षा का अर्थ || शिक्षा की अवधारणा || शिक्षा का दृष्टिकोण || शिक्षा के लक्ष्य एवं उद्देश्य

शिक्षा की अवधारणा (Concept of Education) 

    "Shiksha" का बड़ा व्यापक अर्थ है। कुछ व्यक्ति मात्र विद्यालयों में मिलने वाली "Shiksha" को ही "Shiksha" का वास्तविक अर्थ समझते हैं, किन्तु उसका व्यापक तथा सर्वमान्य अर्थ जान लेने पर भी एक निश्चित परिभाषा बना सकना असम्भव सा प्रतीत होता है। इसे हम मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है। व्यापक तथा संकुचित। किसी समाज सुधार को शिक्षक मान लेना "Shiksha" के व्यापक अर्थ का द्योतक है और विद्यालय के अध्यापक द्वारा "Shiksha" देना उसके संकुचित अर्थ का प्रतीक है। संसार का प्रत्येक प्राणी शिक्षक तथा शिक्षार्थी है। "Shiksha ka arth"
इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध लेखक और अन्वेषक एडीसन नामक सज्जन ने "Shiksha" के विषय में लिखा है, "मैं समझता हूँ कि बिना "Shiksha" के मनुष्य की आभा खान से निकले हुए हीरे के समान है। जिस तरह खान से निकला हुआ हीरा तराशा और बनाया जाता है तब उसका मूल्य और आभा का अंकन किया जाता है ठीक इसी प्रकार मनुष्य "Shiksha" के बाद निखार की स्थिति में आता है।" "Shik sha ka arth"

    
shiskha ka arth
shiskha ka arth

    बच्चा जब पैदा होता है तो कितना असहाय होता है वह चलने-फिरने, बोलने तथा किसी भी काम के लायक नहीं होता। यदि उसे "Shiksha" न मिले तो वह कभी भी बोलने लायक नहीं होगा, और न चल सकेगा, न कोई काम कर सकेगा। इसके अलावा मनुष्य का अपने वातावरण से गहरा सम्बन्ध होता है, अगर उसने अपने आपको अपने वातावरण के अनुरूप बना लिया, तो उसका जीवन कायम रहेगा और अगर उसने ऐसा न किया तो वह समाप्त हो जाएगा। जो व्यक्ति अपने आपको वातावरण के अधिक से अधिक अनुरूप बना लेता है वह उतना ही सफल होता है। यह काम "Shiksha" के जरिए पूरा हो सकता है। "Shiksha" हमको अपने वातावरण के अनुकूलन बनाने में, मदद करती है और हम वातावरण पर विजय प्राप्त करते हैं। "Shiksha ka arth"

मनुष्य का जीवन छोटा होता है और वह बिना किसी की मदद के सब फायदेमन्द वस्तुओं का ज्ञान अपने आप नहीं हासिल कर सकता। "Shiksha" उसको संसार का ज्ञान प्राप्त कराती है तथा उसको योग्य नागरिक बनाती है। "Shiksha ka arth" 

    अब "Shiksha" का अर्थ केवल शिक्षालयों में प्राप्त होने वाले ज्ञान से ही नहीं लेना चाहिए। "Shiksha" का तात्पर्य यह नहीं है कि अध्यापक जो कुछ भी जानता है उसे जैसे का तैसा बच्चों को प्रदान कर दे। इस प्रकार की "Shiksha" को इस आधुनिक युग में वास्तविक "Shiksha" नहीं कहा जा सकता। "Shiksha ka arth" वास्तविक "Shiksha" वही है जिसमें बालकों की प्रमुख आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाता है। जिससे बालकों को अपनी अन्तर्निहित शक्तियों के विकास का अवसर मिलता है। "Shiksha" शब्द के समकक्ष अंग्रेजी शब्द से भी यही ध्वनित होता है। अंग्रेजी शब्द 'एजूकेशन' (Education) की उत्पत्ति लैटिन भाषा के एजूकेटम (Educatum) शब्द से हुई है जिसका अर्थ शिक्षित करना है। 'ए' का अर्थ है 'अन्दरस' तथा 'जूक का अर्थ है अग्रगति देना। अत: एजूकेशन शब्द के विश्लेषण से सिद्ध हो जाता है कि शिक्षा का तात्पर्य संचित ज्ञानकोष को हस्तान्तरित करना नहीं है, अपित शिक्षार्थी की अन्तर्निहित शक्तियों का सर्वांगीण विकास करना है। "Shiksha ka arth"

    विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से "Shiksha" की परिभाषाएँ दी हैं। "Shiksha" के प्रसिद्ध शिक्षा-शास्त्री प्रोफेसर जे.जे. फ़िन्डले ने "Shiksha" की परिभाषा इन शब्दों में की है, "जाति की बड़ी आयु वाले सज्जन जो परिवार, राजनीति, धार्मिक और दूसरी संस्थाओं में संगठित होते हैं, उठती हुई जाति की शुभकामना के इच्छुक होते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह कुछ बुद्धि विषयक प्रभावों को प्रयोग में लाते हैं और यह प्रभाव सभ्यता और वातावरण के उन अटल प्रभावों के अलावा प्रयोग में लाए जाते हैं जो कि सभी मनुष्यों के जीवन पर लागू होते हैं। इन विशेष प्रभावों को "Shiksha" कहते हैं और जो लोग इन प्रभावों को काम में लाते हैं (चाहे पेशे के लिहाज से, चाहे किसी रूप में) वे शिक्षक कहलाते हैं। जो "Shiksha" के प्रभावों को ग्रहण करते हैं उनको विद्यार्थी कहते हैं।" "Shiksha ka arth"

    अमरीका के प्रसिद्ध शिक्षा-विद्वान डिवी की राय है कि, "Shiksha" किसी व्यक्ति की उन तमाम शक्तियों के विकास का नाम है जो उस व्यक्ति को अपने वातावरण पर नियन्त्रण करने लायक बना देता है और उसका अपना जीवन भली-भाँति व्यतीत करने योग्य हो जाता है। "Shiksha ka arth"

शिक्षा का शाब्दिक दृष्टिकोण (Etymological or Derivative Approach) 

    एक दृष्टिकोण के अनुसार 'Education' शब्द लातीनी भाषा के शब्द 'educare' से निकला है, जिसका अर्थ है 'पालन-पोषण' (To bring up or to nourish)।

    "Shiksha" इसका अर्थ है कि बच्चे का पालन-पोषण कुछ उद्देश्यों तथा आदर्शों को सामने रख कर किया जाता है।

    एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार 'Education' शब्द लातीनी भाषा के शब्द 'Educere' से निकला है जिसका अर्थ है विकसित करना अथवा निकालना (To lead out or to draw our)। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ बच्चे तथा मनुष्य में से सर्वोत्तम प्राप्त करना अथवा उसका मार्ग-दर्शन करना है।

    तीसरे दृष्टिकोण के अनुसार 'Education' शब्द लातीनी भाषा के शब्द 'Educatum' से निकला है, जिसका अर्थ है 'पढ़ाने अथवा सिखाने की क्रिया' (The act of teaching or learning)

'एजूकेयर' एवं 'एजूसीयर' जिनका अर्थ निम्नलिखित है "Shiksha ka arth"
1. एजूकेटम (Educatum) प्रशिक्षण, शिक्षण 
2. एजूकेयर (Educare) शिक्षित करना, बाहर निकालना, आगे बढ़ाना, विकास करना। .
3. एजूसीयर (Educere) विकसित करना, बाहर निकालना।

अवकल दृष्टिकोण (Differential Approach) 

"Shiksha" के स्पष्ट तथा अधिक निश्चित स्वरूप को जानने के लिए "Shiksha" तथा अनुदेश, शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर जानना आवश्यक है। "Shiksha ka arth"

1. शिक्षा तथा अनुदेश (Education and Instruction)-

अनुदेश में हम विद्यार्थी को एक विषय विशेष का ज्ञान व्यवस्थित, आयोजित तथा तर्क-युक्त विधि से प्रदान करते हैं। निस्संदेह हम इसे "Shiksha" में ही शामिल करते हैं। परन्तु हमें किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता होती है। हो सकता है कि एक व्यक्ति का सामान्य ज्ञान काफी हो परन्तु वह एक सुशिक्षित व्यक्ति न हो। "Shiksha" अनुदेश से अधिक कुछ और भी है क्योंकि इसमें ज्ञान तथा अनुभव प्राप्ति के साथ-साथ ऐसी कुशलताओं, आदतों तथा रुझानों को विकसित करने की आवश्यकता होती है, जोकि व्यक्ति को पूर्ण तथा सुखी जीवन व्यतीत करने में सहायक होते हैं। यह विद्यार्थी के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास है। "Shiksha ka arth"

2. शिक्षा तथा प्रशिक्षण (Education and Training)-

प्रशिक्षण औपचारिक रूप से दिया जाता है क्योंकि यह नियमों तथा सिद्धान्तों के निश्चित ढाँचे के अनुसार निगरानी में दिया जाता है। "Shiksha" औपचारिक तथा अनौपचारिक रूप से दी जा सकती है। प्रशिक्षण "Shiksha" का एक भाग या प्रकार है। "Shiksha ka arth"

3. शिक्षा तथा शिक्षण (Education and Schooling)-

इसमें सन्देह नहीं कि "Shiksha" शिक्षण से अधिक विस्तृत शब्द है क्योंकि इसमें कक्षा के कमरे में दिये जाने वाले अनुदेश के अतिरिक्त अथवा दी गई जानकारी के अलावा शैक्षिक सरगर्मियाँ और प्रोग्राम आते हैं। शिक्षक ट्रिप, सामाजिक सेवा कैंप, समुदाय कार्य तथा शुगल जैसी सह पाठ्यचर्या सरगर्मियाँ शिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण भाग हैं। परन्तु ये अनुदेश के क्षेत्र में शामिल नहीं की जाती। '"Shiksha"' शिक्षण से भी विस्तृत मद है। शिक्षण उस समय तक सीमित रहता है जब तक एक बच्चा किसी संस्था में रहता है, परन्तु "Shiksha" एक आजीवन प्रक्रिया है। यह उस समय आरम्भ होती है जब बच्चा पैदा होता है और उसके जीवन के अन्तिम क्षण तक जारी रहती है। "Shiksha ka arth"

    अतः "Shiksha" को अनुदेश, प्रशिक्षण तथा शिक्षण के साथ समानता नहीं दी जा सकती। यह आयोजित तथा आयोजन रहित, संगठित तथा असंगठित, औपचारिक तथा अनौपचारिक भी हो सकती है। अनुदेश, प्रशिक्षण तथा शिक्षण आयोजित, संगठित तथा औपचारिक उद्यम तक सीमित रहते हैं। "Shiksha ka arth"

शिक्षा का दृष्टिकोण (View of Education)


1. भारतीय दृष्टिकोण (Indian View)
2. पाश्चात्य दृष्टिकोण (Western View)  

भारतीय दृष्टिकोण (Indian Views)

    विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग रिपोर्ट के शब्दों में, "भारतीय परम्पराओं के अनुसार "Shiksha" रोजी कमाने का साधन मात्र ही नहीं है, न ही विचारों का पालन-पोषण है और न ही नागरिकता की पाठशाला। यह आत्मा के जीवन का आरम्भ है, मानवीय आत्मा के सत्य की खोज के लिए प्रशिक्षण है और नेकी का अभ्यास है। यह दूसरा जन्म, दिव्यत्म जन्मा है।"

    “Education according to the Indian traditions, is not merely a means of earning a living; nor it is only a nursery of thought or a school for citizenship. It is initiation into the life of spirit, a training of human soul in the pursuit of truth and the practice of virtue. It is a second birth, divitiyam janma."
-University Education Commission Report 

 

महात्मा गाँधी के अनुसार, "शिक्षा का तात्पर्य बालक तथा व्यक्ति के शरीर, मन तथा आत्मा की सर्वोत्तमता का सर्वांगीण प्रकटीकरण है।"
"Education mean, an all-round drawing out of the best in child and man-body mind and spirit."
-M. K. Gandhi 

 

श्री अरबिन्दु के अनुसार, अन्तर्निहित ज्योति की उपलब्धि के लिये शिक्षा विकासशील आत्मा की प्रेरणादायी शक्ति है।
"Education is helping the growing soul to draw out that is in itself."
-Aurbindo

 

वैदान्तिक दृष्टिकोण के अनुसार, मनुष्य आध्यात्मिकता का सार है। "हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान आध्यात्मिकता की आवश्यकता को तीव्र, सजीव तथा प्रकाशमान करे।"
The essence of man is spirituality. "We need an education that quickens, that vivifies, that kindles the urge of spirituality inherent in every mind."
-Vedantic view 

 

विवेकानन्द के कथनानुसार, 'शिक्षा मनुष्य से पहले से मौजूद दैवी पूर्णता का प्रत्यक्षीकरण है।' वे आगे कहते हैं, 'हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो हमारा आचरण बनाये, हमारे मानसिक बल को बढ़ाये, बौद्धिकता का विकास करे और जिसके द्वारा मनुष्य आत्मनिर्भर हो जाये।'
“Education is the manifestation of divine perfection already existing in man. We want that education by which character is formed, strength of mind is increased, the intellect is expanded , and by which one can stand on one's own feet." - Vivekananda

 

प्रसिद्ध भारतीय व्याकरण आचार्य पाणिनि का मत है,  "मानवीय शिक्षा से अर्थ वह प्रशिक्षण है जो मनुष्य प्रकृति से प्राप्त करता है।"
"Human education means the training which one gets from nature."- Panini 

 

उपनिषद के अनुसार, "शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य निर्वाण है।" 
"Education is that whose end product is salvation." -Upnishads 

 

डॉ. जाकिर हुसैन के अनुसार, "शिक्षा सम्पूर्ण जीवन का कार्य है। यह जन्म से लेकर मृत्यु तक जारी रहता है।"
“Education is the work of the whole life. It begins from the time of birth and continues till the last moment of death." -Zakir Hussain 

 

प्रसिद्ध भारतीय अर्थशास्त्री कौटिल्य के अनुसार, “शिक्षा का अर्थ है देश के लिए प्रशिक्षण और राष्ट्र के प्रति प्यार।"
"Education means training for the country and love for the nation." -Kautilya

 

टैगोर का मानना है कि शिक्षा वह है जो जीवन की सम्पूर्ण सत्ता के साथ समन्वय स्थापित करने की शक्ति देती है।
Education makes our life in hormony with existence. -Tagore 

पाश्चात्य दृष्टिकोण (Western Views)

रेमाण्ट के विचारानुसार, "शिक्षा विकास की शिशुकाल से प्रौढ़ता तक वह प्रक्रिया है जिससे मनुष्य अपने आप को भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक वातावरण के अनुसार ढालता है।"
"Education is a process of development from infancy to maturity, the process by which the adopts himself gradually in various ways of his physical, social and spiritual environment."
-Raymont

हरबर्ट के मतानुसार, "शिक्षा अच्छे नैतिक आचरण के विकास का नाम है।"
"Education is the development of good moral character." -Herbart

टी.पी. नन एक और अंग्रेज शिक्षा शास्त्री इस प्रकार कहता है, “शिक्षा-व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास है जिसकी सहायता से मनुष्य मानव जीवन में अपनी उत्तम शक्ति के अनुसार मौलिक योगदान देता है।"
"Education is the complete development of individuality so that he makes an original contribution to human life according to the best of his capacity." -Nunn

जैडम के मतानुसार, "शिक्षा एक ऐसी चेतन और विवेकशील प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्तित्व दूसरे व्यक्तित्व के विकास में सुधार करने के लिये ज्ञान के संचार और । प्रचार द्वारा अपना प्रभाव डालता है।"

"Education is a conscious and deliberate process in which one personality acts upon an other in order to modify the development of that other by the communication and manipulation of knowledge." -Adam

मिल्टन के कथनानुसार, "मेरे विचार में एक सम्पूर्ण तथा उदार शिक्षा वह है जो मनुष्य को सभी कर्तव्य, न्याय-संगत विधि, कुशलता तथा उदार हृदय से सम्पन्न करती है, चाहे वे निजी हों या सार्वजनिक, युद्ध से सम्बन्धित हों या शान्ति से।"
"I call, therefore, a complete and generous education that which fit a man to perform justly, skilfully and magnanimously all the offices, both private and public, of peace and war." -Milton

पेस्टालॉजी के अनुसार, ""शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, समरूप तथा प्रगतिशील विकास है।"
“Education is a natural, harmonious and progressive development of man's innate powers." -Pestalozzi

एच. एम. हार्न के मतानुसार, “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, समरूप तथा प्रगतिशील विकास है।"
"Education should be thought of as the process of man's reciprocal adjustment to nature, to his hellows, and to the estimate nature of the cosmos.". -Horne


प्लेटो के मतानुसार, "एक ही क्षण में सुख तथा दुःख का अनुभव करने की योग्यता का नाम शिक्षा है। यह शिष्य के शरीर तथा आत्मा में सारे सौन्दर्य तथा सम्पूर्णता को उसकी योग्यता के अनुसार विकसित करती है।"
"Education is the capacity to feel pleasure and pain at the right moment. It develops in the body and in the soul of the pupil. all the beauty and all the perfection, of which he is capable it.”-Plato

प्लेटो के शिष्य अरस्तू के मतानुसार, "शिक्षा मनुष्य की योग्यता को-विशेष रूप से उसके मन को-इस प्रकार विकसित करती है कि वह परम सत्य, नेकी तथा सौन्दर्य के चिंतन से आनन्द प्राप्त करने के योग्य हो, जिसमें सम्पूर्ण प्रसन्नता विद्यमान होती है।" उसने संक्षिप्त तौर पर बताया है कि "शिक्षा का कार्य स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निर्माण करना है।"
"Education develops man's faculty especially his mind so that he may be able to enjoy the contemplation of supreme truth, goodness and beauty in which perfect happiness essentially consists." Aristotle briefly explained education as "the creation of a sound mind in a sound body."- Aristotle

फ्राबेल महोदय का कहना है कि "शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक की जन्मजात शक्तियाँ बाहर प्रकट होती हैं।"
"Education is a process by which the child makes it external.” : -Forebel

सुकरात के मतानुसार, "शिक्षा का अर्थ है संसार के उन सर्वमान्य विचारों को प्रकाश में लाना जो कि प्रत्येक मानव के मस्तिष्क में अदृश्य रूप में निहित होते हैं।"
"Education means the bringing out of the ideas of universal 'validity which are latent in the mind of everyman." -Socrates

ऊपर दिये गये दृष्टिकोणों का संक्षिप्त विवरण इस विचार पर प्रकाश डालेगा

1. समरूप विकास (Harmonious development)-

समरूप विकास से हमारा अभिप्राय है सर्वमुखी विकास अर्थात् शारीरिक, बौद्धिक सौन्दर्य सम्बन्धी, नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास संतुलित ढंग से न हो। "Shiksha ka arth"

2. समाज के प्रति उत्तरदायित्व (Responsibilities in the society) 

समाज के प्रति उत्तरदायित्व से भाव है माता-पिता, अन्य सम्बन्धियों, पड़ोसियों, मित्रों, अध्यापकों तथा राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी। "Shiksha ka arth"

3. शक्तियाँ (Powers)-

शक्तियों से हमारा भाव व्यक्ति की कुशलताओं, योग्यताओं, सम्भावनाओं तथा रुझानों से है। व्यक्ति में ज्ञान-सम्बन्धी, उत्तेजित करने वाली, इच्छा-सम्बन्धी तथा विचार सम्बन्धी शक्तियाँ होती हैं। "Shiksha ka arth"

4. व्यक्तिगत अस्तित्व का सार्वभौमिक व्यक्तित्व में लीन करना (Merger of the individual self with the Universal Self)-

व्यक्तिगत अस्तित्व के सार्वभौमिक अस्तित्व में लीन करने से भाव है आत्म-ज्ञान, छुटकारा, मुक्ति अर्थात् परमानन्द की प्राप्ति। "Shiksha ka arth"

शिक्षा के तीन अर्थ (Three Meaning of Education)

1. संकुचित अर्थ (Narrow Meaning)

2. व्यापक अर्थ (Wider Meaning)

3. वास्तविक अर्थ (Actual Meaning) 

1. शिक्षा का संकुचित अर्थ (Narrow Meaning of Education)

    संकुचित "Shiksha" का आशय "Shiksha" के एक सप्रयोजन प्रभाव से है जिसकी विचारपूर्वक योजना बालक के विकास के प्रत्यक्ष प्रयोजन से की जाती है। इस "Shiksha" में निश्चित समय में, निश्चित पाठ्यक्रमानुसार, निश्चित शिक्षकों द्वारा, निश्चित विधियों द्वारा ज्ञान प्राप्त करवाया जाता है जो सप्रयोजन होती है जिसकी योजना का उद्देश्य मात्र बालक के विकास का प्रत्यक्ष प्रयोजन है और विद्यालय एक द्विमुखी प्रक्रिया है।
"Shiksha ka arth"
    "Shiksha" की संकुचित अर्थ में परिभाषा देते समय जे.एस. मैकेन्जी ने लिखा है कि "संकुचित अर्थ में "Shiksha" से अभिप्राय-हमारी शक्तियों के विकास तथा उन्नति के . लिये किये गये सचेतन प्रयास है।"
"Shiksha ka arth"
“In narrow sense, education may be taken to mean any consciously directed effort to develop and cultivate our powers.”
"Shiksha ka arth"
-J. S. Mackenzie - जी. एच. थामसन के अनुसार, "शिक्षा एक ऐसा विशिष्ठ वातावरण है जिसके प्रभाव से बालक के चिन्तन, दृष्टिकोण, व्यवहार की आदतों को स्थायी रूप से परिवर्तित किया जाता है।"

"The influence of the environment on the individual with a view to producing a permanent change in his habits of behaviour of thought and attitude."

G. H. Thomson प्रोफेसर ड्रेवर के अनुसार, "शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसमें बालक के ज्ञान, चरित्र तथा व्यवहार को एक विशेष साँचे में ढाला जाता है।"

"Education is a process in which and by which the knowledge, character and behaviour of the young are shaped and moulded."

-Prof. Drever जॉन स्टूअर्ट मिल के अनुसार, "संस्कृति जो प्रत्येक पीढ़ी अपने उत्तराधिकारियों को सप्रयोजन प्रदान करती है जिससे कि वे सुरक्षित हो जाएँ और संभव हो सके तो प्राप्त प्रगति के स्तर को ऊपर उठा सकें।"

"Culture which each generation purposely gives to those who are to be its successors, in order to quality them for at least keeping up and it possible for raising the level of improvement which has been attained." - John Stuart Mill


टी. रेमण्ट के अनुसार, "शिक्षा से अभिप्राय उन विशेष प्रभावों से है जो समाज के अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा जानबूझकर नियोजित रूप में अथवा निश्चित योजना द्वारा अपने से छोटों पर डाले जाते हैं। ये प्रभावित करने वाले परिवार धर्म, राज्य आदि से संबंधित हो सकते हैं।"

उक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि संकुचित शिक्षा निश्चित अवधि में विद्यालयों द्वारा दी जाने वाली विद्यालयी शिक्षा है जो सैद्धान्तिक ज्ञान प्रदान करती है, व्यावहारिक एवं प्रायोगिक पक्ष पर बल नहीं देती है वरन् उपाधियों से अलंकृत करती है। इस प्रकार शिक्षा व्यक्ति को आत्मसन्तुष्टि प्रदान कर अन्य व्यक्तियों से विशिष्टतम बना देती है। अतः कुछ लोग इसमें शिक्षा के अन्य सम्प्रत्ययों को भी इसी में सम्मिलित कर लेते हैं. यथा-विद्यालयीकरण एवं निर्देश अध्ययन को भी शिक्षा में सम्मिलित कर लिया जाता है। विद्वानों का तो यह भी मानना है कि इस प्रकार शिक्षा द्वारा समाज एवं संस्कृति का हस्तान्तरण तथा परिमार्जन करते हुये परिष्कार किया जा सकता है। 

2. शिक्षा का व्यापक अर्थ (Wider Meaning of Education)


व्यापक अर्थ में "Shiksha" आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है। इस "Shiksha" के अन्तर्गत मानव के व्यवहार को परिष्कृत करना है जिससे बालक को उसके वातावरण से समायोजन करने योग्य बनाया जा सके।

इसलिये यह "Shiksha" व्यावहारिक तथा उपयोगी होती है। विद्यालयी "Shiksha" भी व्यापक "Shiksha" का ही एक अंग है। "Shiksha" पर्यावरण से समायोजन सिखाती है।

प्रो. डम्बिल का कहना है कि "शिक्षा के व्यापक अर्थ में वे सभी. प्रभाव आ जाते हैं जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त प्रभावित करते हैं।"

"Education in its widest sense includes all the influences which acts upon an individual during his passage from the cradle to the grave."

Dumvile मैकेन्जी का कहना है कि "व्यापक अर्थ में "Shiksha" एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन- पर्यन्त चलती रहती है तथा जीवन का प्रत्येक अनुभव उसके भण्डार में वृद्धि करता है।"

"In a wider sense it is a process that goes on throughout life and is promoted by almost every experience life." -Mackenzie  

एडवर्ड थिंग के अनुसार "एक जीवित प्राणी द्वारा एक जीवित प्राणी को जीवन प्रदान करना ही शिक्षा है।"
"Education is the transmission of life, by the living, to the living." -Edward Thring

लाज के अनुसार, "सारे अनुभव को शिक्षा-दायक कहा जाता है। 
    मच्छर के काटने, तरबूज का मजा चखने, एक छोटी नौका में बाढ़ में फंसने, इस प्रकार के अनभव का शिक्षा-प्रद प्रभाव पड़ता है। एक बच्चा अपने माता-पिता को शिक्षित करता है. एक शिष्य अपने अध्यापक को हम जो कुछ कहते, सोचते या करते हैं उसी प्रकार "Shiksha" देते हैं, सजीव और निर्जीव व्यक्ति भी हमें "Shiksha" देते हैं। विशाल अर्थों में "Shiksha" जीवन और जीवन शिक्षा है। जो कुछ हमारे दृष्टिकोण को विशाल करता है, सूझ बूझ को तीव्र करता है, हमारी प्रतिक्रियाओं को शुद्ध करता है, हमारे विचारों तथा भावनाओं को उत्तेजित करता है, हमें शिक्षा प्रदान करता है।"

    मार्क हापकिनज के अनुसार, “शिक्षा से भाव उन सब पदार्थों से है जो रचनात्मक प्रभाव डालते हैं।"
"Education in its sense includes everything that exerts a formative influence."
-Mark Hopkins 

    इसे अनौपचारिक शिक्षा भी कहा जाता है जिसका प्रमुख उद्देश्य सैद्धान्तिक रूप से बालक का विकास करना है। ऐसी शिक्षा जीवनपर्यन्त चलती रहती है। इसके लिए किसी विशेष स्थान, समय, विशेष व्यक्ति आदि की सीमाएँ नहीं होती, न ही इसकी कोई पूर्व योजना, पाठ्यक्रम व शिक्षण-विधि आदि होती है। यह शिक्षा जीवन के प्रत्येक अनुभव द्वारा व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि करती है। परिवार, समुदाय, राज्य सभी इसमें अभिकरण है और यह बालक की अन्तर्निहित शक्तियों का अधिकतम विकास करती है। 

3. शिक्षा का वास्तविक अर्थ (Actual Meaning of Education)

    "Shiksha" के वास्तविक अर्थ को निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है ""Shiksha" वह गतिशील एवं सामाजिक प्रक्रिया है जो मनुष्य की आंतरिक शक्तियों का सर्वांगीण विकास करने में सहायता देती है, उसे विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों से सामन्जस्य करने में योग देती है, उसे जीवन एवं नागरिकता के कर्तव्यों व दायित्वों को पूर्ण करने के लिए तैयार करती है तथा उसमें ऐसा विवेक जाग्रत करती है जिससे वह अपने समाज, राष्ट्र, विश्व और सम्पूर्ण मानवता के हित में चिन्तन, संकल्प और कार्य कर सके।"

    इस दृष्टि से जॉन डीवी एवं रेमण्ट के विचारों को बल मिलता है किन्तु उनके मतानुसार शिक्षा को शैशवावस्था से प्रौढ़ावस्था तक विकास के नाम से जोड़ना शिक्षा की सार्वभौमिकता को सिद्ध नहीं करता है। फिर भी हम इन सभी विचारों एवं परिभाषाओं के आधार पर कह सकते हैं कि शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक की . जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक विकास इस प्रकार होता है कि उसके साथ उसके व्यक्तित्व का तो विकास हो ही, वह अपना और अपने समाज का कल्याण करते हुये सम्पूर्ण वातावरण के साथ समायोजन कर सके। यही वास्तव में शिक्षा का वास्तविक अर्थ है। "Shiksha ka arth"


शिक्षा की प्रकृति (Nature of Education) 

    सामाजिक सम्बन्धों का जाल समाज है। ये सम्बन्ध सामाजिक क्रियाओं और प्रक्रियाओं से सम्बन्धित होते हैं। ये सामाजिक क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ संघटित और विघटित, दोनों रूपों में होती हैं। जब विभिन्न संस्थाएँ, संघ, समह और व्यक्ति अपने निर्धारित पद और कार्य के अनुसार काम करते तथा परिवर्तित दशाओं से युक्तिपूर्वक अनुकूलन करने में सफल होते हैं तो उस स्थिति को हम सामाजिक संघटन की संज्ञा देते हैं। इसके ठीक विपरीत जब व्यक्तियों, समूहों, संस्थाओं और समितियों के सम्बन्धों में सन्तुलन बिगड़ जाता है तो उस स्थिति को सामाजिक विघटन कहा जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सामाजिक संघटन और विघटन एक-दूसरे के विलोम हैं । व्यक्ति अथवा समूह सामाजिक नियन्त्रण के विभिन्न साधनों के माध्यम से अपने क्रियाकलापों को सन्तुलित कर सामाजिक संघटन की स्थिति पैदा करता है। समाज के विभिन्न अंगों के बीच अर्थपूर्ण अन्तःक्रिया तथा प्रकार्यात्मक एकता को भी सामाजिक संघटन कहा जाता है। सामाजिक संघटन एक सापेक्ष शब्द है। कोई ऐसा समाज नहीं पाया जाता है जो पूर्णत: संघटित अथवा विघटित हो। प्रत्येक समाज को दोनों ही परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। कोई समाज संघटित है अथवा नहीं, यह जानने के लिए हमें अन्य समाजों से उसकी तुलना अवश्य करनी चाहिए। कुल मिलाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इस सापेक्ष प्रकृति के कारण प्रत्येक समाज में संघटन और विघटन, दोनों ही होते हैं। "Shiksha ka arth"
    इसी के आधार पर "Shiksha" की विभिन्न धारणाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती

1. शिक्षा वातावरण से अनुकूलन करने की प्रक्रिया है (Education is a Process of Adjustment to Environment)-

मानव को अपने जीवन में अनेक प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यदि वह इन परिस्थितियों से अनुकूलन नहीं कर पायेगा तो वह आजीवन दुखी रहेगा। अन्य शब्दों में परिस्थितियों से अनुकूलन के अभाव में उसका जीवन तनावग्रस्त रहेगा। "Shiksha ka arth"

    वह जीवन का आनन्द नहीं उठा सकेगा। वस्तुतः एक सुखी और आनन्दमय जीवन के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति न केवल अपने वातावरण से सामन्जस्य स्थापित कर सके वरन् सामाजिक हित में एक नवीन वातावरण के निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वाह भी कर सके। "Shiksha" व्यक्ति को इस योग्य बनाती है कि वह अपने जीवन में विभिन्न परिस्थितियों का सम्यक् मूल्यांकन कर सके तथा उनसे अपना उचित सामन्जस्य स्थापित कर सके, इसके अतिरिक्त वह नवीन सामाजिक वातावरण के निर्माण में अपना योगदान दे सके।
"Shiksha ka arth"
 इस संदर्भ में निम्न विद्वानों के विचार माननीय हैं
"Shiksha ka arth"
बटलर के मतानुसार, “शिक्षा प्रजाति की आध्यात्मिक सम्पत्ति के साथ व्यक्ति का क्रमिक सामंजस्य है।"
"Education is gradual adjustment of the individual to the spiritual possession of the race,"-Butler 

बॉसिंग के अनुसार, "शिक्षा का कार्य व्यक्ति को वातावरण में उस सीमा तक व्यवस्थापित करना है, जिससे व्यक्ति और समाज, दोनों के लिये महान् सन्तोषजनक लाभ प्राप्त हो सके।"
"The function of Education is conceived to be the adjustment of man to his environment to the end that the most enduring satisfaction may accrue to the individual and to soceity. -Bossing 

जेम्स के कथनानुसार, "शिक्षा कार्य-सम्बन्धी अर्जित आदतों का संगठन है, जो व्यक्ति को उसके भौतिक और सामाजिक वातावरण में उचित स्थान देती हैं।"
"Education is the organization of acquired habits of such action as will fit the individual to his physical and social environment."  -James 
"Shiksha ka arth"

2. शिक्षा मानव का विकास है (Education is the Development of Man)-

अधिकांश विद्वानों ने "Shiksha" के इस पहलू पर सर्वाधिक जोर दिया है। जैसा कि पहले लिखा जा चुका है, जन्म के समय मानव में कोई समझ नहीं होती, वह नितान्त असहाय होता है। अपने व्यक्तित्व को पूर्ण बनाने में उसे आगे चलकर विकास की कई मंजिलें तय करनी पड़ती हैं। "Shiksha"व्यक्ति की इस रूप में सहायता करती है कि वह अपने व्यवहार को परिमार्जित कर सके, विद्यमान सामाजिक परिस्थितियों में सामन्जस्य स्थापित कर सके तथा अपने वातावरण को और उत्तम बना सके। "Shiksha" व्यक्ति में सोचने-समझने की शक्ति प्रदान करती है, उसे आलोचना करने, रचना करने एवम् सार्थक जीवन जीने की क्षमता प्रदान करती है। अरस्तू के शब्दों में, 'शिक्षा-मनुष्य की शक्ति का, विशेष रूप से मानसिक शक्ति का विकास करती है जिससे कि वह परम , सत्य, शिव और सुन्दरम् का चिन्तन करने के योग्य बन सके।' "Shiksha ka arth"

3. शिक्षा समूह में परिवर्तन करने की प्रक्रिया है (Education is the Process of Producing Change in the Group)-

समाजशास्त्रियों की दृष्टि से "Shiksha" आवश्यक रूप से एक सामाजिक प्रक्रिया है। "Shiksha" व्यक्ति को सामाजिक स्वरूप प्रदान करती है। वह व्यक्ति में उन आचरणों के विकास पर अत्यधिक बल देती है जो समाज द्वारा मान्य हों। प्रायः समूह के उद्देश्य आदर्श और मूल्य ही "Shiksha" के उद्देश्य, आदर्श और मूल्य होते हैं। "Shiksha" का पूर्ण प्रयत्न इसी दिशा में होता है कि व्यक्ति समाज का एक आदर्श अंग बने। लेकिन इसके साथ ही "Shiksha" के माध्यम से व्यक्ति समूह की रूढ़ियों पर विचार करने लगता है, मान्यताओं को परखने लगता है, आदर्शी के गुण-दोषों की समीक्षा करने लगता है, अतः वह समाज की उन्नति के लिये उन करीतियों को दूर करने का प्रयत्न करता है जो समूह के मार्ग में रोड़ा बन जाती हैं। इस संदर्भ में ब्राउन का कथन है कि ""Shiksha" चैतन्य रूप में एक नियन्त्रित प्रक्रिया है, जिसके नाग व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन किये जाते हैं तथा व्यक्ति के द्वारा समाज में।" "Shiksha ka arth"

'रिपोर्ट ऑफ दि कमीशन ऑन दि रि-आर्गनाइजेशन ऑफ दि सैकण्डरी स्कल' के अनुसार-'"Shiksha" का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के ज्ञान, रूचियों, आदर्शों, आदतों तथा शक्तियों का विकास करना है, जिसके द्वारा उसे अपना उचित स्थान प्राप्त हो सके तथा वह इस स्थान का सदुपयोग कर स्वयं तथा समाज को उच्च एवं पवित्र उद्देश्यों की ओर ले जाये।' "Shiksha ka arth"

4. शिक्षा अभिवृद्धि है (Education is Growth)-

अभिवृद्धि से आशय व्यक्ति के शारीरिक अंगों और मानसिक शक्तियों के विकास से है। प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रशिक्षण और वातावरण के अनुसार क्रिया एवं प्रतिक्रिया करता है। इसके परिणामस्वरूप वह अपनी बुद्धि एवं मानसिक शक्तियों का विकास करने में अधिक समर्थ होता है। वस्तुतः मानव में बुद्धि और विवेक का उदय उसके योग्य व्यक्तित्व का परिचायक हैं और "Shiksha" उसके इस विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। वैसे संतुलित अभिवृद्धि तभी सम्भव है जब बालक के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं जैसे शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, नैतिक, सौंदर्यात्मक एवं सामाजिक, सभी का समान रूप से सम्पूर्ण विकास किया जाये। यहाँ सम्पूर्ण विकास से आशय है-बालक के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का समान रूप से अधिकतम विकास। "Shiksha ka arth"

    वस्तुतः एक बालक जन्म के बाद से ही बढ़ता रहता है एवं उसका विकास होता रहता है। वह जब तक जीवित रहता है, विकसित होता ही रहता है। "Shiksha" उसके इस सतत् विकास में सहायक होती है। अतएव हम "Shiksha" का अर्थ इस प्रकार भी दे सकते हैं कि यह उन दशाओं को प्रदान करने वाला उद्योग है जो कि अभिवृद्धि अथवा जीवन की सम्पूर्णता का यकीन दिलाती है चाहे व्यक्ति किसी आयु का हो। "Shiksha ka arth"

शिक्षा की सही धारणा (True Concept of Education) 

"Shiksha"  मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के विकास एवं ज्ञान तथा कला कौशल में वृद्धि और व्यवहार में परिवर्तन करने वाली एक सामाजिक प्रक्रिया है। प्रक्रिया के रूप में भी इसे व्यापक अर्थ में स्वीकार करना चाहिए। "Shiksha" एक गतिशील प्रक्रिया है। समय-समय पर इसके अर्थ में परिवर्तन हुए हैं। विभिन्न शिक्षा-शास्त्रियों तथा दार्शनिकों 7 "Shiksha" के प्रति अलग-अलग विचार प्रकट किए हैं जिनकी विवेचना करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि "Shiksha"  न तो ज्ञान अथवा प्रशिक्षण का पर्याय है और न ही इसका प्रयोग ज्ञान की शाखा विशेष अथवा अनुशासन के लिए करना उचित है।
"Shiksha ka arth"
    एक बात और जिसको ध्यान में रखने की बड़ी आवश्यकता है वह यह है, कि संसार का प्रत्येक प्राणी अपनी जाति के प्राणियों के बीच रहकर, अनुकरण द्वारा उनके अनुसार चलना-फिरना, खाना-पीना और बोलना आदि सीखता है। पशु-पक्षियों के जीवन पर विचार कीजिए। ये जन्म के कुछ दिन पश्चात् ही अपनी जाति के प्राणियों की भांति खाने-पीने, चलने-फिरने और उड़ने के तरीके सीख जाते हैं। उनकी सीखने सिखाने की यह प्रक्रिया केवल परिस्थितियों के साथ समायोजन कर आत्मरक्षा के कार्यों तक ही सीमित रहती है। परन्तु मनुष्य की "Shiksha"  उसे केवल परिस्थितियों के साथ समायोजन करना ही नहीं सिखाती अपितु उसमें अपने अनुकूलन परिस्थितियों का निर्माण करने की क्षमता का विकास भी करती है। "Shiksha" के द्वारा मनुष्य के रहन-सहन, खान पान एवं विचारों और जीवन को सुखमय बनाने के लिए साधन तथा उपसाधनों के निर्माण में सदैव परिवर्तन होता रहता है। इस परिवर्तन का दूसरा नाम विकल्प है। विकास करना मनुष्य जाति का ही लक्षण है। इस प्रकार मनुष्य की "Shiksha" अन्य प्राणियों की "Shiksha" से भिन्न होती है और इस "Shiksha" प्रक्रिया के निम्नलिखित लक्षण होते हैं

1. शिक्षा आधुनिक युग की माँग है (Education is the inevitable need of modern society)-

हमारा समाज गत्यात्मक तथा प्रगतिशील है। आज हम विज्ञान के युग में रह रहे हैं। कोई भी व्यक्ति विज्ञान की उन्नति से अछूता नहीं है। राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास के लिए प्रौढ़ "Shiksha", जनसंख्या "Shiksha", समाज "Shiksha" आदि के प्रसार के लिए जो कि आधुनिक युग की मांग है, "Shiksha"  की आवश्यकता की अवहेलना नहीं की जा सकती।
"Shiksha ka arth"

2. शिक्षा प्रशिक्षण का कार्य करती है (Education is an act of training)-

"Shiksha"  व्यक्ति के लिए प्रशिक्षण का कार्य करती है ताकि वह समाज में अपनी योग्यता के अनुसार उचित स्थान प्राप्त कर सके। प्रत्येक मानव को अपनी भावनाओं, व्यवहार तथा अभिलाषाओं के सम्बन्ध में प्रशिक्षण की आवश्यकता है। ऐसा प्रशिक्षण प्राप्त करने पर ही वह समाज का उत्तरदायी सदस्य बन सकता है। उसका यह प्रशिक्षण "Shiksha"  द्वारा ही सम्भव है। इस प्रशिक्षण के बिना वह नैतिक तथा व्यवस्थित जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। "Shiksha" एक प्रकार से शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का प्रशिक्षण है।
"Shiksha ka arth"

3. शिक्षा त्रि-ध्रुवीय प्रक्रिया है (Education is tripolor process) 

विद्यार्थी, शिक्षक तथा सामाजिक वातावरण शैक्षिक प्रक्रिया के तीन खम्भे हैं। इस तथ्य को दृष्टि में रखकर "Shiksha" को त्रिमुखी प्रक्रिया को संज्ञा दी। उनके अनुसार कोई भी "Shiksha" तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि विद्यार्थी तथा अध्यापक के साथ साथ सामाजिक वातावरण को भी उचित स्थान दिया जाए। सामाजिक वातावरण को अध्यापक ध्यान में रखते हुए विद्यार्थी को निश्चित रूप से शिक्षित करने का प्रयास करे।
"Shiksha ka arth"

4. शिक्षा एक अविरत प्रक्रिया (Education as a continuous process)-

"Shiksha" एक सतत् प्रक्रिया है। जन्म से मरण तक हम एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और सदैव नए-नए अनुभव प्राप्त करते हैं और इस प्रकार सदैव कुछ न कछ नए अनुभव सीखते रहते हैं। अधिक विस्तृत दृष्टिकोण से देखें तो समाज के सदस्य तो समाप्त होते रहते हैं परन्तु उनकी "Shiksha" की प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। इस प्रकार निरन्तरता "Shiksha" का दूसरा लक्षण है।
"Shiksha ka arth"

5. शिक्षा सामाजिक प्रक्रिया है (Education is a social process) 

"Shiksha" एक सामाजिक प्रक्रिया है। मनुष्य कुछ शक्तियाँ लेकर पैदा होता है। प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण में उसकी इन शक्तियों का विकास होता है और उसके परिणाम स्वरूप ही मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन होता है।

6. शिक्षा मार्गदर्शन है (Education is direction)-

"Shiksha" का उद्देश्य बच्चों की योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों और शक्तियों को मार्गदर्शन देना है। "Shiksha" एक गतिशील प्रक्रिया है। समाज, स्थान तथा समाज की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार "Shiksha" व्यक्ति का मार्गदर्शन करती है। मार्गदर्शन करते समय शिक्षक को उसका ठीक प्रकार से ज्ञान होना चाहिए। बच्चों के ऊपर किसी भी प्रकार का अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए।
"Shiksha ka arth"

7. शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया (Education as a dynamic process)-

"Shiksha" के द्वारा ही मनुष्य अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में निरन्तर विकास करना चाहता है और करता रहता है। इस विकास के लिए उसकी एक पीढ़ी अपने ज्ञान एवं कौशल आदि को दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित करती है। इस हस्तान्तरण के लिए प्रत्येक समाज विद्यालयी "Shiksha" का आयोजन करता है। इसके लिए उपयुक्त नियोजन करता है। इसलिए समय विशेष में भी विद्यालयी "Shiksha" के उद्देश्य, पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ सब निश्चित प्रायः होते हैं। परन्तु जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन होते हैं, वैसे वैसे "Shiksha" उन परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ती है। इस प्रकार उसके उद्देश्य, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण-विधियों आदि में आवश्यकतानुसार परिवर्तन होता रहता है। यह उसकी गतिशीलता कहलाती है। यदि "Shiksha" गतिशील न होती तो हम कभी भी विकास पथ पर अग्रसर नहीं रह पाते।
"Shiksha ka arth"

शिक्षा के लक्ष्य एवं उद्देश्य (Aims and Objectives of Education) 

    जॉन डीवी के शब्दों में, "उद्देश्य एक पहले सोचा हुआ लक्ष्य है जो कुछ सरगर्मी या चालक व्यवहार को एक दिशा प्रदान करता है।"

    उनका मानना है कि "Shiksha" एक प्रक्रिया है जो किसी दिशा की ओर उन्मख हाती है। यह दिशा निर्धारण ही लक्ष्य निर्धारण है। जो कार्य लक्ष्य सामने रखकर किया जाता है वह सार्थक होता है, क्योंकि लक्ष्य सहित कार्य करना ही बुद्धिमानी है। लक्ष्य के अभाव में उद्देश्यों को निश्चित नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में कार्य करने का उत्साह भी नहीं रहता है।
"Shiksha ka arth"
    साध्य के अनुकूल साधन होने पर ही अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। कहा गया है लक्ष्य-विहीन जीवन कुत्सित है, उसी भाँति "Shiksha" के क्षेत्र में भी यही कहा जा सकता है कि लक्ष्य-विहीन "Shiksha" निष्प्रयोजन है-इस दृष्टि से लक्ष्य को परिभाषित करें तो कहा जा सकता है, लक्ष्य एक पूर्व दर्शित उद्देश्य है जो किसी क्रिया को संचालित करता है अर्थात् "Shiksha" के लक्ष्यों पर विचार किए बिना "Shiksha" की प्रक्रिया का सचाक संचालन असम्भव है क्योंकि लक्ष्य हमें संयुक्त कार्य करने की योग्यता प्रदान करता है। वैस्टर्स शब्दकोष में इस लक्ष्य को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- किसी उद्देश्य की ओर उन्मुख होना ही लक्ष्य है।

    लक्ष्य के संदर्भ में, "Shiksha" में दिशा प्रदान करने वाले लक्ष्य होते हैं। ये वे साध्य हैं जो क्रिया के लिए पथ प्रदर्शित करने का कार्य करते हैं यथा छात्र में वैज्ञानिक चिन्तन का विकास करना, "Shiksha" का एक लक्ष्य हो सकता है।

हॉर्न के अनुसार, ""Shiksha" का कोई अन्तिम लक्ष्य नहीं होता और ना होना चाहिए।"

"There is no one final aim of education sub-ordination the lesser aim." -Horne 

रिवलीन के अनुसार, ""Shiksha" सप्रयोजन और नैतिक क्रिया है, अतः लक्ष्यों रहित "Shiksha" विचारणीय नहीं है।" इसमें लक्ष्यों को आवश्यकता व महत्त्व को बताया गया है। लक्ष्यों को स्पष्ट करते हुए प्रो. आर.ए. शर्मा ने लिखा है-"शैक्षिक लक्ष्य सामान्य कथन होते हैं। इनकी प्रकृति दार्शनिक होती है, अत: इनका स्वरूप व्यापक होता है। यह शिक्षण को दिशा प्रदान करते हैं।"

अन्तर्राष्ट्रीय "Shiksha" परिभाषा कोश के अनुसार, "पाठ्यक्रम के विकास में, लक्ष्य उच्च स्तरीय सामान्यीकरण होते हैं।"
 “In curriculum development, goals are high level generalization i.e. aims." -International Dictionary of Education 

राष्ट्रीय "Shiksha" नीति (1986) में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ""Shiksha" सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है, यह हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर करती है, जिससे राष्ट्रीय एकता का विकास होता है, वैज्ञानिक सोच की प्राप्ति बढ़ जाती है, समझ और चिंतन में स्वतंत्रता आती है। धर्म निरपेक्षता और प्रजातंत्र के लक्ष्यों की प्राप्ति में अग्रसर होने में हमारी सहायता करती है।"
"Education has an acculturating role. It refines sensitivities and perceptions that contribute to natural cohesion, a scientific temper and independence of mind and spirit, thus furthering the goals of socialism, secularism and self reliance." . -National Policy of Education-1986
"Shiksha ka arth"

लक्ष्यों की आवश्यकता (Needs of Aims) 

1. लक्ष्यों के अभाव में उद्देश्य निश्चित नहीं किए जा सकते। अन्तिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अन्य तात्कालिक उद्देश्यों की प्राप्ति करना आवश्यक है। इनकी प्राप्ति के लिए कुछ विषयों के ज्ञान और क्रियाओं के प्रशिक्षण पर बल दिया जाता है-ये हमारी प्रक्रिया के उद्देश्य होते हैं।

2. लक्ष्यों का स्पष्टीकरण होने के बाद शिक्षक और "Shiksha"र्थी शिक्षण प्रक्रिया में नियंत्रित एवं व्यवस्थित रूप से भाग ले सकेंगे। यदि दशा निश्चित होगी तो समय और शक्ति का सदुपयोग होगा और अनावश्यक भटकाव भी नहीं होगा।

3. लक्ष्य निर्धारण के अनन्तर ही "Shiksha" के पाठ्यचर्या का निर्धारण होता है। पाठ्यचर्या को सम्पूर्ति हेतु शिक्षण विधियों का निर्माण किया जाता है। यदि लक्ष्य ही निश्चित नहीं होंगे तो उनके अभाव में पाठ्यचर्या एवं शिक्षण विधियों का निर्माण भी सम्भव न हो सकेगा।

4. प्रत्येक समाज का जीवन के प्रति निश्चित दृष्टिकोण होता है जिसके आधार पर ही मानव-जीवन के लक्ष्यों का निश्चय होता है। इनकी प्राप्ति के लिए "Shiksha" की आवश्यकता होती है। 

सारांशतः यह कहा जा सकता है कि लक्ष्यों के अभाव में उद्देश्यों का निश्चयन नहीं हो पाता और इससे कार्य करने का उत्साह भी नहीं रहता। उत्साह के अभाव में शिक्षण-प्रक्रिया भी सुव्यवस्थित, सुचारु रूप से सुविधाजनक नहीं हो पाती।
"Shiksha ka arth"
डी.वी. ने भी "Shiksha" के लक्ष्यों पर विचार करते समय लिखा है कि "Shiksha" का अपना कोई लक्ष्य नहीं होता। इसका अर्थ यही है कि "Shiksha" एक प्रक्रिया है जो किसी दिशा की ओर उन्मुख होती है। दिशा का निर्धारण ही लक्ष्य निर्धारण है।

शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Education) 

आधुनिक "Shiksha" के एनसाइक्लोपीडिया (Encyclopaedia of Modern Education) के अनुसार, ""Shiksha" एक मनोरथपूर्ण तथा नैतिक सरगर्मी है। अत: इसका उद्देश्यों के बिना विचार करना उचित नहीं है।" हम जीवन के किसी भी क्षेत्र में उद्देश्य के बिना नहीं चल सकते। जीवन की किसी भी सरगर्मी में सफलता प्राप्त करने के लिए स्पष्ट और सनिश्चित उद्देश्य का होना आवश्यक है। उद्देश्यों की जानकारी से वंचित एक अध्यापक उस नाविक की भान्ति होता है जिसे अपने इष्ट का पता नहीं होता। इसका अभिप्राय यह है कि वह "Shiksha"-प्रणाली, जिसे अपने उद्देश्यों का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं अथवा जिसके उद्देश्य अच्छे नहीं होते, अवश्य ही असफल रहेगी। उद्देश्य "Shiksha" नियोजक को दूरदर्शिता प्रदान करते हैं। हमारी सभी "Shiksha" विधियों, पाठ्यक्रम तथा मूल्यांकन की प्रणाली को "Shiksha" उद्देश्यों के अनुसार ढाला जाता है। ठीक उद्देश्य के अज्ञान के कारण हमारी "Shiksha" प्रणाली दूषित हो गई है। इसी अज्ञान ने इसकी विधियों तथा प्राप्तियों को दूषित किया है और इसके परिणामस्वरूप राष्ट्र में शारीरिक, बौद्धिक तथा नैतिक दुर्बलता आ गई है।

    "Shiksha" में उद्देश्यों की बहुत ही अधिक आवश्यकता है और इसके कारण इस प्रकार हैं

1. कोशिशों का निर्देशन (To direct efforts)-

यदि हमें उद्देश्यों का पता हो तो हम अपनी कोशिशों को इस ओर लगा सकते हैं। शिक्षा के उद्देश्य अध्यापक तथा विद्यार्थी को ठीक रास्ते पर चला सकते हैं।
"Shiksha ka arth"

2. अपव्यय को दूर करना (To avoid wastage)-

शिक्षा के उद्देश्य हमारे समय व शक्ति को नष्ट होने से बचाते हैं।
"Shiksha ka arth"

3. वर्तमान स्थितियों का मूल्यांकन करना (To evaluate the existing conditions)-

हम शिक्षकों के रूप में वर्तमान स्थितियों जैसे कि "Shiksha" के विषय, पढ़ाने की विधियों, अध्यापकों की कुशलता, पुस्तकालय का साज-सामान, पाठ्यक्रम तथा पाठ्य सम्बन्धी सरगर्मियों का उद्देश्यों की रोशनी में मूल्यांकन करते हैं तथा भविष्य के लिए योजना बनाते हैं। इसके अतिरिक्त वे "Shiksha" के विषय, अध्यापक, पाठ्यक्रम, "Shiksha" विधियों तथा पाठ्य से सम्बन्धित सरगर्मियों के आयोजन में हमारा पथ-प्रदर्शन करते हैं। अतः उद्देश्य "Shiksha" की प्रक्रिया में प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करते हैं। उचित उद्देश्य का अज्ञान सारी "Shiksha" प्रणाली को दूषित कर देगा।

उद्देश्य की परिभाषाओं का अवलोकन करने पर इनका स्पष्ट अर्थ ज्ञात किया जा सकता है।

आई.के. डेविस के मतानुसार, "सीखने के उद्देश्य से हमारा अभिप्राय व्यवहार परिवर्तन के कथन से है।"

रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, "सर्वोच्च "Shiksha" वह हे जो हमें केवल सूचनायें नहीं देती, अपितु हमारे जीवन और सम्पूर्ण सृष्टि में एक सरसता पैदा करती है।"

रॉबर्ट मेगर के अनुसार, "उद्देश्य वह मानदण्ड है जिसे छात्र द्वारा विद्यालय क्रिया को पूर्ण करके प्राप्त किया जाता है।"

बेंजामिन एस. ब्लूम के अनुसार, "ज्ञान भावना व क्रिया में परिवर्तन आना ही उद्देश्य का पूर्ण होना है। यह अलग-अलग भी हो सकता तथा किसी एक क्षेत्र में भी।"
"Shiksha ka arth"

शिक्षा के सामान्य उद्देश्य (General Objectives of Education) 

शिक्षा के कुछ ऐसे सामान्य उद्देश्य हैं जिन्हें सामान्य रूप से सभी देश और समाज स्वीकृति देते हैं। शिक्षा के ये सामान्य उद्देश्य अग्रलिखित हैं


1. ज्ञान का उद्देश्य

    'विद्या के लिए विद्या' (Knowledge for the sake of Knowledge) ज्ञान का यह उद्देश्य अति प्राचीन काल से है। इसका समर्थन सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, दांते, मलेनियस, बेकन आदि दार्शनिकों ने किया है।

कामेनियस के अनुसार, "वह शिक्षा व्यर्थ है जिसके द्वारा बालक ज्ञान का संचय नहीं करता।"

एक अन्य विद्वान ने लिखा है, "विद्या वह ज्ञान है जिसे केवल विद्वान ही जानते हैं।"

ज्ञान के उद्देश्य के पक्ष में तर्क हरबर्ट के अनुसार, "चरित्र एवं व्यक्तित्व विचारों द्वारा ही विकसित होते हैं।"

सुकरात के मतानुसार, "वह व्यक्ति जिसे सच्चा ज्ञान है सद्गुणी के अतिरिक्त दूसरा नहीं बन सकता।"

ज्ञान के उद्देश्य के विपक्ष तर्क

एडम्स के अनुसार, "ज्ञान पर अधिक जोर देने से विद्यालय ज्ञान की दुकान तथा शिक्षक सूचना विक्रेता बन जाता है।"

ली ने लिखा है, "ज्ञान समझदारी के बिना मूर्खता है, व्यवस्था के बिना व्यर्थ, दया के बिना दीवानापन, और धर्म के बिना मृत्यु है।"

रूसो के कथनानुसार, "सब प्रकार के ज्ञान में से कुछ झूठा, कुछ व्यर्थ है और कुछ अभिमान उत्पन्न करता है। इनमें से केवल वही थोड़ा-सा ज्ञान बुद्धिमान मनुष्य के अध्ययन के योग्य है, जो हमारे कल्याण के लिए उपयोगी है।"

जॉन डीवी के अनुसार, "केवल वह ज्ञान जो हमारे संस्कारों में संगठित हो गया जिससे कि हम वातावरण को अपनी इच्छाओं के अनुकूल बनने में समर्थ हो सकें एवं अपने आदर्शों एवं इच्छाओं को उस स्थिति के अनुकूल बना लें जिसमें कि हम रहते हैं, वही वास्तविक ज्ञान है।" 
"Shiksha ka arth"

2. शारीरिक विकास का उद्देश्य

विद्वानों ने "शारीरिक विकास के उद्देश्य" को "Shiksha" का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना है। "बालक का शरीर स्वस्थ, सुन्दर एवं बलवान बने" "Shiksha" का यह उद्देश्य सभी देशों एवं युगों में माना गया है।

कालीदास-
1."धर्म की साधना के लिए शरीर ही सब कुछ है।" 
2. "शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्।"

अरस्तू के कथनानुसार, "स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।"

प्राचीन यूनान एवं स्पार्टा राज्य में "शारीरिक विकास" "Shiksha" का मुख्य उद्देश्य था। आज भी प्रत्येक देश में वीरों की कहानियाँ बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। रूसो ने भी शारीरिक "Shiksha" पर बहुत जोर दिया। रेबेले के अनुसार, "स्वास्थ्य के बिना जीवन, जीवन नहीं है।" जिस राष्ट्र के नागरिक स्वस्थ होते हैं, वह समाज एवं राष्ट्र भी बलशाली होता है। शरीर से हष्ट-पुष्ट व्यक्ति ही दूसरों की सेवा कर सकता है। अस्वस्थ व्यक्ति को नो हम स्वयं सेवक की आवश्यकता पड़ती है। 
"Shiksha ka arth"

3. चारित्रिक विकास का उद्देश्य

    चरित्र का नुकसान होने से सब कुछ का नुकसान हो जाता है। मानव जीवन में चरित्र का महत्त्व सर्वोपरि है। अतः कुछ शिक्षा-शास्त्री "Shiksha" का उद्देश्य "चरित्र का विकास एवं निर्माण" ही चाहते हैं। इनके विचारों के अनुसार-मनुष्यों के सभी कष्टों और कठिनाइयों का कारण "चरित्रहीनता" है।

डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, "भारत सहित सारे संसार के कष्टों का कारण यह है कि "Shiksha" का सम्बन्ध नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति से न रह कर, केवल मस्तिष्क के विकास से रह गया है।"

गाँधी के मतानुसार, "चरित्र निर्माण ही "Shiksha" का मुख्य उद्देश्य है। मैं उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साहस, शक्ति, सद्गुण तथा अपने आपको भूल जाने की योग्यता का विकास करूँगा।"

हरबर्ट के अनुसार, "नैतिकता को मानव जाति और "Shiksha" का सामान्य रूप से सबसे श्रेष्ठ उद्देश्य माना गया है।"

    अतः "Shiksha" का उद्देश्य-बालक का सुन्दर तथा दृढ़ चरित्र निर्माण होना चाहिए ताकि वह देश तथा समाज का भली-भाँति कल्याण कर सके। चरित्रहीनता के कारण ही आज मानव को कष्ट तथा अभाव झेलने पड़ रहे हैं। 
"Shiksha ka arth"

4. सांस्कृतिक विकास का उद्देश्य

ई.बी. टायलर के अनुसार, "संस्कृति वह जटिल समग्रता है, जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, प्रथा तथा अन्य योग्यताएं और आदतें सम्मिलित होती हैं जिनको मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है।"

सदरलैण्ड और वुडवर्थ के मतानुसार, "संस्कृति में वह प्रत्येक वस्तु सम्मिलित है जो एक पीढ़ी में संक्रमित हो सकती है। किसी जन समुदाय की संस्कृति उनका ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिक, कानून तथा विचारने की पद्धति है।"

गाँधीजी के अनुसार, "संस्कृति ही मानव जीवन की आधारशिला और मुख्य वस्तु है। वह आपके आचरण और व्यक्तिगत व्यवहार की छोटी से छोटी बातों में व्यक्त होनी चाहिए।"

अतः स्पष्ट है कि संस्कृति की परिभाषा अति व्यापक है। संस्कृति मानव के भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों पक्षों से संबंधित है। संक्षिप्त में एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को "सामाजिक विरासत" का हस्तान्तरण ही संस्कृति है।
"Shiksha ka arth"

5. आध्यात्मिक विकास का उद्देश्य

आदर्शवादी विचारक "आध्यात्मिक विकास" के पक्षधर हैं। उनके मतानुसार शिक्षा का उद्देश्य-आध्यात्मिक विकास होना चाहिए ताकि वे भौतिकता के झंझटों में न फँसकर असीम आनन्द को प्राप्त करने का प्रयत्न करें।

डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, "शिक्षा का उद्देश्य न तो राष्ट्रीय कुशलता है और न अन्तर्राष्ट्रीय एकता है, वरन् व्यक्ति को यह अनुभव कराना है कि उसके भीतर बुद्धि . से भी अधिक गहराई में कोई तत्त्व है जिसे यदि आप चाहें तो आत्मा कह सकते हैं।"

महात्मा ईसा के मतानुसार, "सर्वप्रथम स्वर्ग के साम्राज्य की खोज करो फिर सब कुछ स्वतः प्राप्त हो जाएगा।" 

क्रम

लक्ष्य (Aims)

उद्देश्य (Objectives)

1

सैद्धान्तिक स्वरूप के होने के कारण लक्ष्यों का मापन कठिन एवं समय साध्य होता है ।

कार्य को आधार मानकर बनाये गये उद्देश्य सिद्धान्तों के साथ - साथ प्रयोगात्मक स्वरूप के भी होते हैं अतः इनका मापन करना अनिवार्य होता है ।

2

लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु पाठ्यक्रम निश्चित नहीं होता विधियों का स्वरूप भी अस्पष्ट होता है ।

निश्चित पाठ्यक्रम एवं शिक्षण की व्यूह रचनाओं के आधार पर उद्देश्यों को प्राप्त किया जाता है ।

3

शिक्षण व्यूह - रचना एवं मूल्यांकन के सम्बन्ध में अस्पष्ट है ।

शिक्षण व्यूह - रचना एवं मूल्यांकन प्रक्रिया को आधार प्रदान करता है ।

4

इनका निर्धारण दर्शन एवं समाज की आवश्यकता के अनुरूप किया जाता है ।

इन्हें शिक्षक कक्षा - कक्ष की अपेक्षा के अनुसार मनोवैज्ञानिक एवं शिक्षण तकनीकी आधारों का अनुसरण निर्धारित करता है ।

5

लक्ष्यों के निर्धारण में केन्द्रीय विचार सम्पूर्ण समाज का होता है ।

उद्देश्य छात्र को केन्द्र मानकर निर्धारित किये जाते हैं ।

6

सैद्धान्तिक स्वरूप के होने के कारण लक्ष्यों का मापन कठिन एवं समय साध्य होता है ।

कार्य को आधार मानकर बनाये गये उद्देश्य सिद्धान्तों के साथ - साथ प्रयोगात्मक स्वरूप के भी होते हैं अतः इनका मापन करना अनिवार्य होता है ।


    वस्तुतः लक्ष्य और उद्देश्यों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। फिर भी लक्ष्य प्रकृति से दार्शनिकता लिये हुये होते हैं और व्यापक होते हैं। उद्देश्य मनोवैज्ञानिक प्रकृति के होते हैं। लक्ष्य समाज के स्तरानुसार निर्मित होते हैं और उद्देश्य शिक्षण प्रक्रिया एवं कक्षा कक्ष से सम्बन्धित होते हैं, मापनीय होते हैं। जबकि लक्ष्यों को मापा नहीं जा सकता है। लक्ष्य तथा उद्देश्यों की विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में विशेष रूप से अन्तर पाया जाता है। वास्तव में लक्ष्य समाज के स्तर पर निर्धारित होते हैं। जैसा समाज होगा उसी के अनुसार उसके लक्ष्य होंगे, जबकि उद्देश्यों का सम्बन्ध शिक्षण प्रक्रिया और कक्षा-कक्ष से होता है। इसे हम निम्न उदाहरण से भी समझ सकते हैं प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण अर्थात् 14 वर्ष तक के बालकों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु अनेक योजनाएँ बनाई जा रही हैं और समय-समय पर इसका मूल्यांकन किया जा रहा है कि लक्षित उद्देश्यों की पर्ति किस स्तर पर हुई।
"Shiksha ka arth"

शिक्षा के अन्य उद्देश्य (Other Objectives of Education) 

मनुष्य को ज्ञानवान होने के लिये ज्ञान के साथ समझदारी एवं व्यावहारिकता का होना भी आवश्यक है जिसके अभाव में मनुष्य चेतन के स्थान पर जड़ बन सकता है। अतः शिक्षा समाज के कल्याण के लिये आवश्यक है। अतः बालक के सर्वांगीण विकास के लिये सामाजिक, वैयक्तिक जीवन व समाज के उद्देश्यों के अतिरिक्त कुछ अन्य उद्देश्य हैं जो उसके (बालक के) सर्वोत्तम विकास में सहयोग देते हैं, ये उद्देश्य है -

• ज्ञान का उद्देश्य (Objective of Knowledge)

• शारीरिक उद्देश्य (Objective of Physical Development)

• व्यावसायिक उद्देश्य (Objective of Vocational)

• चारित्रिक उद्देश्य (Objective of Character Development)

• सांस्कृतिक उद्देश्य (Objective of Cultural Development)

• नागरिकता का उद्देश्य (Objective of Citizenship)

• पूर्ण जीवन का उद्देश्य (Objective of Complete Living)

• समविकास का उद्देश्य (Objective of Harmonoius Development)

• अनुकूलन का उद्देश्य (Objective of Adjustment)

• अवकाशोपयोग का उद्देश्य (Objective of Leisure Utilization)

"Shiksha" का उद्देश्य विभिन्न कालों में और विभिन्न देशों में विभिन्न रहा है। बल्कि यों कहना अच्छा होगा कि प्रत्येक जाति और प्रत्येक कार्य ने विभिन्न कालों में "Shiksha" के साधन और उद्देश्य अलग-अलग रखे हैं। पुराने समय में भारत में "Shiksha" का उद्देश्य धार्मिक "Shiksha" देना था और अपने नवयुवकों को ब्रह्मचारी बनाना था ताकि वे अपने मन पर, अपने व्यक्तित्व पर अधिकार रख सकें। पुराने यूनान में नवयुवकों को "Shiksha" इसलिए दी जाती थी कि वे अपने चरित्र का सुन्दर आदर्श समाज के सामने उद्धृत कर सकें। हिटलर के समय में जर्मनी की "Shiksha" का उद्देश्य नाजी सिपाही पैदा करना और युद्ध-विद्या में निपुण बनाना था ताकि वह शान्ति को संसार से नष्ट कर दें, लोकतन्त्र की धज्जियाँ उड़ा दें और जर्मनी का आधिपत्य सारे संसार में स्थापित कर दें। इसके  प्रतिकूल अंग्रेजों की "Shiksha" यह रही है कि उनके नौजवान लोकतन्त्र और सच्चाई के पोषक और देश के गौरवपूर्ण भक्त बन सकें।
"Shiksha ka arth"

वैयक्तिक शिक्षा का उद्देश्य (Individual Aim of Education)-

विभिन्न "Shiksha" शास्त्रियों का विचार है कि "Shiksha" का मुख्य उद्देश्य मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास करना है। प्राचीनकाल में भारतीय "Shiksha" भी इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर प्रदान की जाती थी। भारतीय विचारक "Shiksha" का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को आत्मबोध कराना मानते थे। क्योंकि यदि उसको आत्मबोध हो जाएगा, तो वह सुगमतापूर्वक अपने को ईश्वर में आत्मसात् कर सकेगा। यूनान के सोफिस्ट भी "Shiksha" के वैयक्तिक उद्देश्य के समर्थक थे। वे "Shiksha" के माध्यम से व्यक्ति में सत्यं, शिवं और सुन्दरम् आदि गुणों का समावेश करना चाहते थे।
"Shiksha ka arth"
"Shiksha" शास्त्री सर डॉ. पी नन का कथन है कि "प्रत्येक स्त्री व पुरुष को स्वतंत्र क्रियाओं का सुअवसर दिए बिना मानव समाज में कोई सद्गुण पदार्पण नहीं कर सकता, अतएव "Shiksha" पद्धति का प्रतिपादन इस सत्य को सम्मुख रखकर ही करना चाहिए।'
"Shiksha ka arth"

शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य (Social Aim of Education)-

"Shiksha" के वैयक्तिक उद्देश्य के स्थान पर बहुत से विद्वान "Shiksha" के सामाजिक उद्देश्य को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हैं। "Shiksha" जगत में बहुत समय तक "Shiksha" के वैयक्तिक उद्देश्य का प्रभाव रहा था। वैयक्तिक उद्देश्य को प्रकृतिवादी विचारधारा एवं मनोवैज्ञानिक विचारधारा आदि से पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ था। परन्तु आधुनिक समय में होने वाले विभिन्न वैज्ञानिक अनुसन्धानों तथा बदलती हुई प्रजातन्त्रीय राजनैतिक परिस्थिति में वैयक्तिक उद्देश्य के स्थान पर सामाजिक उद्देश्य का समर्थन किया। "Shiksha" में समाजवादी विचारधारा के प्रादुर्भाव का प्रमुख श्रेय हरबर्ट स्पेंसर महोदय को है जिनके प्रयत्न से "Shiksha" में इस उद्देश्य का महत्त्व बढ़ने लगा। सामाजिक उद्देश्य के समर्थक विद्वानों का विचार है कि "Shiksha" के वैयक्तिक उद्देश्य से "Shiksha" का सामाजिक उद्देश्य अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज से पृथक् रहकर वह अपना विकास नहीं कर सकता है। व्यक्तित्व के विकास के लिए सभी आवश्यकताओं की पूर्ति समाज में रहकर ही होती है। समाज से पृथक् उसके अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं है।

इन लक्ष्यों/उद्देश्यों के अतिरिक्त कुछ लक्ष्य शिक्षा की विभिन्न समितियों व आयोगों द्वारा भी प्रस्तुत किये गये हैं। चयनित विवरण निम्नांकित हैं 
"Shiksha ka arth"

1. विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य (Aims of Education according to University Commission 1948-49)


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार का विशेष ध्यान विश्वविद्यालय "Shiksha" पर गया। जिसके आधार पर केन्द्रीय "Shiksha" सलाहकार बोर्ड और अन्तर्विश्वविद्यालय "Shiksha" परिदप की सिफारिशों को आधार बनाकर 1948 में डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय "Shiksha" आयोग का गठन किया गया। आयोग के विचारों से स्वतंत्र प्रजातंत्र का जीवन सामान्य व्यावसायिक और जीविकोपार्जन सम्बन्धी "Shiksha" के सर्वोच्च स्तर पर निर्भर है। अत: हमारे समाज की आवश्कताओं को पूरा करने के लिए विश्वविद्यालयों का कार्य होना चाहिए-विवेक का विस्तार, नये ज्ञान के लिए अधिक इच्छा, जीवन के अर्थ को जानने के लिए अधिक प्रयास और व्यावसायिक "Shiksha" की व्यवस्था। आयोग ने विश्वविद्यालय "Shiksha" के निम्न लक्ष्य बताये

(i) छात्रों में विश्व बन्धुत्व की भावना का विकास करना ।
(ii) विश्वविद्यालय "Shiksha" का उद्देश्य ऐसे विवेकी व्यक्तियों का निर्माण करना है जो प्रजातंत्र की सफलता के लिए "Shiksha" का प्रसार कर सकें।
(iii) ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना जो राजनैतिक, प्रशासकीय एवं व्यावसायिक क्षेत्रों में नेतृत्व कर सकें।
(iv) व्यक्तियों के जन्मजात गुणों की खोज एवं प्रशिक्षण द्वारा उनका विकास करना चाहिए।
(v) विश्वविद्यालयों को छात्रों का सर्वांगीण विकास करना चाहिए। 
(vi) छात्रों का चरित्र-निर्माण करना। 
(vii) सफल प्रजातंत्र के लिए योग्य नागरिकों का निर्माण करना।
(viii) दूरदर्शी; बुद्धिमान एवं साहसी नेताओं के निर्माण द्वारा समाज सुधार पर . बल दिया जाना चाहिए। 
"Shiksha ka arth"

2. माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य (Aims of Education according to Secondary Education Commission 1952-53)


 न केन्द्रीय "Shiksha" सलाहकार बोर्ड ने सरकार के समक्ष माध्यमिक "Shiksha" की जाँच ' करने के लिए एक आयोग के गठन का विचार रखा। फलस्वरूप सितम्बर 1952 को डॉ. ए. लक्ष्मण स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में 'माध्यमिक "Shiksha" आयोग' की नियुक्ति की गई। आयोग के अनुसार "Shiksha" के उद्देश्य निम्नांकित हैं

(i) देश-प्रेम की भावना का विकास। 
(ii) नेतृत्व के लिए "Shiksha"। 
(iii) व्यक्तित्व का विकास। 
(iv) प्रजातांत्रिक नागरिकता का विकास। 
(v) चरित्र का निर्माण।। 
(vi) व्यावसायिक कुशलता की उन्नति।
(vii) कुशल जीवनयापन की कला में दीक्षा। 

3. कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य (Aims of Education according to Kothari Commission Report 1964)

    भारत सरकार के समस्त स्तरों पर "Shiksha" के स्वरूप, सिद्धान्तों एवं नीतियों पर सलाह देने के लिए "Shiksha"-आयोग की नियुक्ति की। डॉ. डी.एस. कोठारी की अध्यक्षता "Shiksha" में कार्य करने के कारण यह आयोग भी कहलाया। 692 पृष्ठों की इक्कीस माह कार्य करने के बाद दी गई रिपोर्ट में बहुत विस्तार से "Shiksha" के उद्देश्य पर चर्चा की गई। आयोग के विचारों को संक्षिप्त रूप में देखें तो ज्ञात होता है कि "Shiksha" का उद्देश्य राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति है। राष्ट्र के पुनर्निर्माण हेतु "Shiksha" में परिवर्तन एवं निम्न समस्याओं का समाधान होना आवश्यक है
"Shiksha ka arth"
(i) राजैनतिक विकास। 
(ii) सामाजिक व राजनैतिक एकता। 
(iii) आर्थिक विकास व बेरोजगारी का अंत । 
(iv) खाद्य सामग्री में आत्म-निर्भरता।

इन समस्याओं के समाधान के लिए आयोग ने "Shiksha" को साधन बताया। आयोग के अनसार, "प्रजातंत्र में व्यक्ति स्वयं साध्य है और "Shiksha" का प्रमुख कार्य है-व्यक्ति को अपनी शक्तियों का पूर्ण विकास करने के लिए अधिक से अधिक अवसर प्रदान करना।"

संक्षेप में निम्नलिखित उद्देश्य बताये गये हैं 
(i) देश का आधुनिकीकरण करना। 
(ii) उत्पादन में वृद्धि करना। 
(iii) सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना। 
(iv) प्रजातंत्र को सुदृढ़ करना। 
(v) सामाजिक व राष्ट्रीय एकता का विकास ।

नई "Shiksha" नीति (1986) में निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखकर "Shiksha" को चुनौती का रूप मानकर कार्यक्रम नियोजित करने की बात कही गई है। वे बिन्दु निम्नलिखित

(i) जीवन जीने की योग्यता। 
(ii) नेतृत्व का विकास। 
(iii) अन्तर-सांस्कृतिक समझ।
(iv) व्यावसायिक कौशल का विकास।
(v) प्रजातांत्रिक नागरिक का विकास। 
(vi) अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का विकास। 
(vii) संवेगात्मक तथा राष्ट्रीय एकता का विकास। 
(viii) व्यक्तित्व का विकास।

नई "Shiksha" नीति के पुनरावलोकन एवं समालोचन हेतु भारत सरकार ने 7 मई 1990 को राष्ट्रीय "Shiksha" नीति समीक्षा समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष आचार्य राममूर्ति नियुक्त किये गए। इसी कारण इसे राममूर्ति समीक्षा समिति के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सामाजिक परिवर्तन को दिशा प्रदान करने एवं राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में "Shiksha" सहायक बने; इस दृष्टि से संवेदनशील व सुरक्षा प्रदान करने वाले समाज की रचना सर्वप्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्य है। "Shiksha" की भूमिका, लक्ष्य और मूल्यों को समझाते हुए व्याख्या की गई है। प्रमुख बिन्दु हैं
"Shiksha ka arth"
(i) "Shiksha" उन संभावनाओं को भी प्रशस्त करे जहाँ छात्र बहुत परिस्थितियों व प्रक्रियाओं में संलग्न होते हुए कौशल अर्जित कर सकें, जिसके आधार पर बालक आगे चलकर विशिष्ट व्यावसायिक नैपुण्य या व्यवसाय आधारित कौशल विकसित करने में सक्षम हो सके।

(ii) राष्ट्रीय समाकलन को एकता की प्राप्ति में "Shiksha" मध्यस्थ व उत्प्रेरक की भूमिका का निर्वाह करे और छात्रों को सामाजिक परिवर्तन के अभिकर्ता बनाने में सहायक हो।

(iii) "Shiksha" छात्र को ज्ञानात्मक आधार प्रदान करे जिससे शक्ति संचित कर वह आगे संवृद्धि कर सके।

(iv) "Shiksha" उन शाश्वत् मूल्यों के निर्माण में सहायक हो जो व्यक्ति के अपने चारित्रिक आधार हैं।

इस प्रकार विभिन्न आयोगों ने "Shiksha" के लक्ष्यों का निर्धारण अपने-अपने ढंग से किया है। आज भी लक्ष्यों को प्राप्त "Shiksha" के माध्यम से दिया जा रहा है।
"Shiksha ka arth"
-::धन्यवाद::-

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