रवीन्द्रनाथ टैगोर | जीवन परिचय | रचनाएँ | जीवन-दर्शन | शिक्षा-दर्शन

रवीन्द्रनाथ टैगोर

[RAVINDRA NATH TAGORE (1861-1941 ) ]

जीवन-परिचय

(LIFE-SKETCH)

भारत की महान् कवि परम्परा में कालिदास व तुलसीदास के बाद गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर एकमात्र ऐसे कवि जिन्होंने विश्व जनीन भावों को अपने काव्य के माध्यम से व्यक्त करके विश्वकवि का स्थान प्राप्त किया। वह भारतीय संस्कृति के महान् गायक, जिनके गीतों के स्वरों ने देश-काल की सीमाओं को तोड़कर अपनी व्यापकता, उदारता का परिचय संसार को दिया। इसीलिये परतन्त्रता के दिनों में भी उन्होंने भारतीय संस्कृति और आत्मा का संदेश सारे जगत् को दिया तथा देश के गौरव को पुनः स्थापित किया ।
रवीन्द्रनाथ टैगोर | जीवन परिचय | रचनाएँ | 

रवीन्द्रनाथ टैगोर | जीवन परिचय | रचनाएँ | जीवन-दर्शन | शिक्षा-दर्शन
रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा दर्शन

रवि ठाकुर का जन्म बंगाल के प्रसिद्ध ठाकुरवंश में सन् 1861 ई० में कोलकाता में हुआ था। उनकी शिक्षा का भार प्रायः उनके पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर के ऊपर ही रहा। टैगोर सपरिवार अपनी समृद्धि, कला, विद्या व संगीत के लिये सम्पूर्ण बंगाल में प्रसिद्ध था। टैगोर को अपने पिता से देश भक्ति, धर्मप्रियता, साधुता आदि गुण उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुए। वह अपने सभी भाई-बहिनों में सबसे छोटे थे। परन्तु उन्होंने अपने यश से न केवल टैगोर परिवार वरन् सम्पूर्ण देश को गौरव प्रदान किया। इनको सर्वप्रथम 'ओरिएण्टल सेमेनरी' स्कूल में दाखिला करवाया। परन्तु वहाँ उनका मन नहीं लगा। इस कारण उनको कुछ महीनों के बाद नार्मल स्कूल में भर्ती किया गया। इस काल में उन्हें कुछ कटु अनुभव प्राप्त हुए जिनके परिणामस्वरूप आगे चलकर उन्होंने आजीवन सुधार के लिये प्रयास किया और एक आदर्श शिक्षा संस्था के रूप में सन् 1901 ई० में 'शान्ति निकेतन' की स्थापना की जो कि वर्तमान में 'विश्वभारती' विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध है।
जीवन-दर्शन | शिक्षा-दर्शन | रबीन्द्रनाथ ठाकुर | 
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वास्तविक रूप में विद्यालय से अधिक घर पर हुई थी । सन् 1878 ई० में टैगोर अपने भाई के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु इंगलैण्ड गये। वहाँ उनको ब्राइटन स्कूल में दाखिला दिलाया गया। परन्तु यहाँ पर भी वह अधिक दिन तक न रहे। इस तरह सन् 1880 ई० में टैगोर स्वदेश लौटे। उनको विद्यालय की शिक्षा के नाम पर कुछ भी प्राप्त न हुआ। सन् 1881 ई० में टैगोर पुनः कानून की शिक्षा प्राप्त करने के ध्येय से इंग्लैण्ड गये । परन्तु विचार परिवर्तन के कारण फिर वापस लौट आये। सन् 1919 ई० तक टैगोर ने राजनीति के क्षेत्र में कार्य किया । परन्तु वे इस क्षेत्र में होते हुए भी साहित्य की सेवा अनवरत रूप से करते रहे। महान् कवि एवं साहित्यकार के रूप में उनकी ख्याति देश की सीमाओं को पार कर गई। सन् 1913 ई० में कवि को 'गीतांजलि' पर 'नोबेल पुरस्कार' प्राप्त हुआ। पुरस्कार का सारा धन टैगोर ने शान्ति निकेतन की उन्नति में लगा दिया तत्पश्चात् कलकत्ता विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट० की उपाधि तथा सन् 1914 ई० में भारत सरकार ने 'सर' की उपाधि से विभूषित किया। हालांकि कवि ने सन् 1919 ई० में यह उपाधि लौटा दी। सन् 1920 ई० से 1930 ई० तक टैगोर ने यूरोप, एशिया व अमेरिका के विभिन्न स्थानों की यात्रा की। उन्होंने वहाँ अनेक स्थानों पर भाषण भी दिये। टैगोर जीवन के अन्तिम दिनों में बीमार रहने लगे और अन्त में अगस्त सन् 1941 ई० को इस महान् कवि, साहित्यकार एवं शिक्षाशास्त्री ने इस संसार से महाप्रस्थान किया ।
रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा दर्शन | 

रचनाएँ -

 टैगोर चूँकि प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपनी लेखनी से साहित्य के विभिन्न अंगों की पुष्टि की और नवीन रचनाओं से साहित्य- कोष को सम्पन्न बनाया। अपने जीवन के अन्त तक कवि अपने कार्य में व्यस्त रहे। टैगोर के प्रसिद्ध प्रमुख ग्रन्थ- संध्या संगीत, प्रभात संगीत, प्रकृति प्रतिशोध, कल्पना, सिन्धु, सोनारतारी, मालिनी, गीतांजलि, लिपिका तथा मुकुटघर इत्यादि हैं।

जीवन-दर्शन

(PHILOSOPHY OF LIFE)

रवीन्द्रनाथ ठाकुर मूलतः कवि थे। उन्होंने कला के कुटीर में आत्म-प्रकाश का दर्शन किया और इस प्रकाश को अपनी वाणी के माध्यम से सारे विश्व में फैलाया । उन्होंने पाश्चात्य जगत् को भारत की आत्मा का संदेश दिया। इस दृष्टि से वह एशिया की आत्मा के सबसे बड़े संदेशवाहक थे। इसीलिये वह 'विश्व कवि और गुरु देव के नाम से संसार में पूज्य हुए।

टैगोर के जीवन-दर्शन पर उनके धार्मिक, दर्शनयुक्त व सुसंस्कृत परिवार का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने आदर्शवादी दर्शन को स्वीकार किया और सत्यं शिवं तथा सुन्दरं जैसे आध्यात्मिक मूल्यों में अटल विश्वास करते हुए आध्यात्मिकता को प्राप्त करना मानव जीवन का प्रमुख लक्ष्य माना। लेकिन यह ध्यान रहे कि आदर्शवादी होने के नाते टैगोर ईश्वर की सत्ता को अवश्य स्वीकार करते थे लेकिन उन्होंने ईश्वर को केवल सर्वोच्च मानव के रूप में स्वीकार किया तथा सृष्टि को उसकी अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण किया। वास्तव में टैगोर अद्वैतवादी थे। उन्होंने लिखा कि हमें ईश्वर को खोजते हुए उस सत्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये जो हमें इस संसार से मुक्ति दिला सकें तथा अपने प्रकाश से इस संसार को प्रकाशित कर सकें।

उपनिषद ब्रह्म के स्वरूप को तीन भागों में विभाजित करते हैं-'सत्यं', 'ज्ञानं और अनन्तं । इसी आधार पर टैगोर ने मानव आत्मा के भी तीन रूप निश्चित करते हैं- मैं हूँ', 'मैं जानता हूँ और "मैं व्यक्त करता हूँ । मनुष्य की यही तीन दिशाएँ हैं और इन तीनों को लेकर एक अखण्ड सत्य है। उनके विचार में सत्य के यही तीनों भाव मनुष्य को विविध प्रकार के क्रिया-कलापों की प्रेरणा प्रदान करते हैं। इन तीनों की प्रेरणाओं पर विचार करने से ज्ञात होता है कि 'मैं हूँ' अर्थात् मुझे अपने अस्तित्त्व की रक्षा करनी है। इस भावना से प्रेरित होकर ही मनुष्य अपने जीवन-यापन के साधनों को जुटाता है, व्यवसाय, नौकरी या अन्य कार्य करता है। मनुष्य की आत्मा का दूसरा रूप है मैं जानता हूँ। यही भाव मनुष्य को जिज्ञासु बनाता है, जिससे मनुष्य ज्ञान-विज्ञान की ओर उन्मुख होता है। इस जिज्ञासा का उपयोग केवल अपने अस्तित्व की रक्षा के साधनों के जानने के लिये ही नहीं होना चाहिए वरन् उस परम सत्य को जानने के लिये भी करना चाहिये। तीसरा भाव है- मैं व्यक्त करता हूँ। के अनन्त स्वरूप के अन्तर्गत माना है। इस प्रकार हम देखते हैं कि उन्होंने ब्रह्म के तीनों रूपों के साथ मानवात्मा के भावों को संयुक्त करके देखा है और इसीलिये इन्हें इतना महत्त्वपूर्ण माना है।

इसे टैगोर ने ब्रह्म टैगोर का विश्वास था कि ईश्वर एक है तथा उसने मनुष्य व प्रकृति की रचना की है। वे कहते हैं कि हम उसमें ( In Him) तथा उसके द्वारा ( Through Him), मनुष्य-मनुष्य के बीच तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच एकत्व (Unity) की स्पष्ट झलक देखते हैं। अतः उन्होंने मनुष्य व प्रकृति के बीच सामंजस्य पर बल दिया। इसके साथ ही वह मानवतावादी भी थे। उन्होंने मानव को ईश्वर का रूप माना है और उसकी विभिन्न शक्तियों के सामजंस्य पूर्ण विकास का समर्थन करते हुए मानव-मानव के बीच पाये जाने वाले विभाजन या मतभेद की निन्दा करते हुए आपसी एकता पर बल दिया। संक्षिप्त में टैगोर मानव को सम्मान तथा स्वतन्त्रता दिलाकर उसकी आत्मा को ऊँचा उठाना चाहते थे जिसके लिये मानसिक तथा नैतिक प्रगति आवश्यक है।

टैगोर केवल दार्शनिक व समाज सुधारक ही न थे परन्तु वे राष्ट्रवादी भी थे। वे भारत को राजनीतिक दृष्टि से स्वतन्त्र कराना चाहते थे। इसके लिये उन्होंने देश को सामाजिक व आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनाने, आपसी भेदभाव मिटाने तथा गरीबी एवं अस्पृश्यता को समाप्त करने पर बल दिया।
रवींद्रनाथ टैगोर का जीवन-दर्शन पर निबन्ध | 

शिक्षा-दर्शन

(PHILOSOPHY OF EDUCATION)

(1) शिक्षा का अर्थ (Meaning of Education)

टैगोर ने अपनी पुस्तक 'Personality' में शिक्षा शब्द को परिभाषित करते हुए लिखा है- 'सर्वोच्च शिक्षा वही है, जो सम्पूर्ण सृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है।"
("The highest education is that which makes our life in harmony with all existence").

टैगोर प्रचलित शिक्षा के घोर विरोधी थे क्योंकि वह शिक्षा बालक को समय से पहले ही प्रकृति की गोद से छीनकर उसे कक्षा की चहारदीवारी में तथा कुछ दिन पश्चात् दफ्तर या फैक्ट्री में बन्द कर देती थी। इसलिये उसका यह मानना था कि सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल सूचना तथा ज्ञान ही प्रदान नहीं करती अपितु हमारे जीवन का विश्व के समस्त जीवों के साथ मेल उत्पन्न करती है।

सम्पूर्ण सृष्टि से टैगोर का अभिप्राय यह है कि संसार की चर और अचर, जड़ और चेतन, सजीव व निर्जीव समस्त वस्तुएँ। इन वस्तुओं से हमारे जीवन का सामंजस्य तभी हो सकता है, जब हमारी सभी शक्तियाँ पूर्णरूप से विकसित होकर उच्चतम की ओर पहुँच जाएँ। इसी को टैगोर ने पूर्ण मनुष्यत्व (Complete manhood) कहा है। अतः शिक्षा का कार्य हमें इस स्थिति पर पहुँचाना। इस दृष्टि से टैगोर ने शिक्षा को विकास की प्रक्रिया माना है। वह मनुष्य का शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, व्यावसायिक, धार्मिक व आध्यात्मिक विकास करती हैं। इस तरह टैगोर के विचार में शिक्षा का रूप अत्यन्त विस्तृत एवं व्यापक है।
जानिए गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जीवनी | 

(2) शिक्षा के उद्देश्य (Aims of Education)

1. मनुष्य को मनुष्य बनाना - 

टैगोर के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य है-मनुष्य को मनुष्य बनाना। उनके अनुसार मनुष्य को जो जिस रूप में देखता है, वह उसी के अनुसार शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित करता है और लक्ष्य के अनुरूप ही समस्त शिक्षा की व्यवस्था करता है। मनुष्य को तीन रूपों में देखा जा सकता है - ( 1 ) वह एक जीव है; (2) वह एक सामाजिक जीव हैं; और (3) वह आत्मा है। भारतीय आदर्शवादी परम्परा के अनुसार मनुष्य के प्रथम दो रूपों की सार्थकता तीसरे रूप के अन्तर्गत रहने में ही है। मनुष्य का वास्तविक रूप आत्मा है। मनुष्य जीव ही नहीं वरन् सामाजिक जीव है। अतः वह केवल अपनी रक्षा न करके बल्कि वह समाज के प्रति भी अपने दायित्व को समझता है। इसीलिये वह पशु-पक्षियों से श्रेष्ठ है। लेकिन मनुष्य को केवल 'सामाजिक जीव' कह देने से भी उसके पूर्ण स्वरूप का परिचय नहीं मिलता वरन् उसका पूर्ण परिचय एवं उसके जीवन की समग्रता का बोध तभी प्राप्त हो सकता है जब हम उसे आत्मा के रूप में देखें। अतः टैगोर ने जीव धर्म व समाज-धर्म दोनों को 'आत्म-उपलब्धि प्राप्त करने की साधना को ही शिक्षा का महत्त्वपूर्ण लक्ष्य माना है ।

2. शारीरिक तथा मानसिक विकास का उद्देश्य- 

टैगोर का यह मानना था कि स्वस्थ मन के लिये स्वस्थ शरीर परम आवश्यक है। अतः उन्होंने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा का प्रथम उद्देश्य यही होना चाहिये। शारीरिक विकास के लिये टैगोर ने पेड़ों पर चढ़ने, तालाबों में गोता लगाने, फूलों को तोड़ने तथा प्रकृति के साथ अनेक प्रकार की शैतानियाँ करके खेलकूद तथा व्यायाम को आवश्यक बताते हुए पौष्टिक भोजन पर बल दिया।

जब बालक शारीरिक रूप से स्वस्थ होगा तो उसका मानसिक विकास भी सही ढंग से होगा। लेकिन इसके लिये रूसो की भाँति टैगोर ने पुस्तकों का विरोध किया। उनका यह मानना है कि पुस्तकों की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से जीवित व्यक्ति को जानने का प्रयास करना ही सच्ची शिक्षा है। इससे कुछ ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता अपितु जानने की शक्ति का इतना विकास हो जाता है जितना कक्षा में दिये जाने वाले व्याख्यानों द्वारा होना असम्भव है।

3. समस्त शक्तियों के विकास का उद्देश्य -

टैगोर व्यक्तिवाद का समर्थक था । इसलिये वे इस बात में विश्वास करते थे कि बालक की सभी सुषुप्त शक्तियों का विकास करना यह परम शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिये। उनका मानना था कि नियमों, पुस्तकों तथा शिक्षकों की अपेक्षा बालक का मूल्य कहीं अधिक है। उनकी स्वयं की समस्याओं को बल केवल व्यक्तिगत प्रयत्नों द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।

इसलिये टैगोर ने बालक को शिक्षा के परम्परागत नियमों के बीच कुचला जाने का विरोध किया तथा उसको प्रेमपूर्ण वातावरण में रखते हुए मस्तिष्क व आत्मा की स्वतन्त्रता प्रदान करने पर बल दिया।

4. नैतिक व आध्यात्मिक विकास का उद्देश्य-

आदर्शवादी होने के फलस्वरूप टैगोर ने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा का उद्देश्य नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास होना चाहिये। इसके लिये वे युवकों को तपस्या एवं दृढ़ भक्ति की भावना का विकास करने का परामर्श देते हैं। इस प्रकार की भावना तभी सम्भव है जबकि व्यक्ति आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास करें और अपनी आत्मा को सभी प्रकार की दासता से मुक्त करें।

5. अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास- 

टैगोर के अनुसार शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य बालक में अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण को विकसित करना है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि टैगोर व्यक्तिवादी थे परन्तु इस बात में भी दो मत नहीं हो सकते कि वे समाजवादी भी थे। वे जितना महत्त्व व्यक्ति तथा उसके व्यक्तित्त्व के विकास को देते थे उतना ही वे समाज तथा सामाजिक सेवा को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे। इसलिये उन्हें एक उच्चकोटि के अन्तर्राष्ट्रीयतावादी माना जाता है। उन्होंने पूर्व व पश्चिम का अभूतपूर्व समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया। उनके द्वारा स्थापित विश्व भारती सच्चे अर्थ में विश्वभारती हैं।

(3) पाठ्यक्रम (Curriculum)

टैगोर के शिक्षा दर्शन के सांकेतिक शब्द- सम्पूर्णता, सम्बद्धता व समन्वय हैं वह मनुष्य को पूर्ण मानव ( Whole man) के रूप में विकसित करना चाहते हैं। वह मानव जीवन के दो पक्षों को स्वीकार करते हैं- आन्तरिक (आध्यात्मिक) तथा बाहरी (सामाजिक) । पाठ्यक्रम में इन दोनों पक्षों का समावेश होना चाहिये। मनुष्य के आन्तरिक विकास में धर्म की साधना सहायक है और सामाजिक विकास में समाज सम्बन्धी विषय- कला व विज्ञान। अतः वह पाठ्यक्रम में दोनों प्रकार से सम्बन्धित विषयों का समावेश चाहते हैं। टैगोर का मानना है कि जीवन एक समन्वय है इसलिये इन सभी में सामंजस्य होना आवश्यक है।

टैगोर के जीवन दर्शन के सम्बन्ध में हमने यह स्पष्ट किया कि उपनिषद् में ब्रह्म के स्वरूप को तीन भागों में विभक्त किया गया है- सत्यं ज्ञानं और अनन्तं । ब्रह्म के इन्हीं तीनों रूपों के अनुरूप मानव-आत्मा की भी तीन दिशाएँ हैं- मैं हूँ, मैं जानता हूँ और मैं व्यक्त करता हूँ। यह तीनों रूप मिलकर मानव के पूरे रूप का परिचय देते हैं। यदि हम मानव-आत्मा की इन दिशाओं को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम को निर्धारित करें तब हम किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं। अतः पाठ्यक्रम का स्वरूप निम्नलिखित हो-

(1) सत्यं = मैं हूँ-यह ब्रह्म के सत्य स्वरूप के अन्तर्गत है, अतः ब्रह्म के इस रूप को जानने के लिये शारीरिक विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, समाजशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है।

(2) ज्ञानं = मैं जानता हूँ-यह ब्रह्म के ज्ञान स्वरूप के अन्तर्गत है, अतः ब्रह्म के इस रूप को जानने के लिये नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र, भाषा, इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान आदि का अध्ययन करना अनिवार्य है।

(3) अनन्तं=

मैं व्यक्त करता हूँ यह ब्रह्म के अनन्त स्वरूप के अन्तर्गत है । अतः इसके लिये कला, साहित्य, संगीत इत्यादि का अध्ययन अनिवार्य है।

अतः बालक के सम्पूर्ण विकास के लिये उसकी शिक्षा में इन तीनों पक्षों में से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये। पाठ्यक्रम को इतना व्यापक होना चाहिये कि बालक रुचि के अनुकूल विषयों का अध्ययन कर सकें। इन विषयों की सार्थकता बालक के सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के विकास में निहित हैं। यही कारण है कि टैगोर ने शान्ति निकेतन में 'सम्पूर्णता' के सिद्धान्त का प्रयोग किया।

(4) शिक्षण-पद्धति (Methods of Teaching )


टैगोर ने तत्कालीन नीरस व निष्क्रिय शिक्षा पद्धति की कृत्रिमता की आलोचना करते हुए इस बात पर बल दिया कि शिक्षा की प्रक्रिया जीवन से पूर्ण होनी चाहिये । उसे जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित होना चाहिये। अतः टैगोर ने बालक की शिक्षा के लिये निम्नलिखित विधियों को उपयुक्त माना-

(1) बालक की प्रकृति के अनुरूप टैगोर के अनुसार बालक की प्रकृति के अनुकूल ही शिक्षण-पद्धति की व्यवस्था होनी चाहिये। बालक को शिक्षित करने के लिये स्वविचार के साथ ही साथ स्वयं पहले बालक को ही अग्रसर होना चाहिये। अध्यापकों के विचार में बालक को शिक्षा देने का सर्वोत्तम साधन मन को एकाग्र करना है, किन्तु प्रकृति के अनुसार शिक्षा देने का सर्वोत्तम साधन मन को वितरित करना है। अतः बालकों को चाहिये कि वे तथ्यों को अपने आप सीखें। इससे उनके मस्तिष्क को पूर्ण गतिशीलता और खोज का आनन्द प्राप्त होगा ।

(2) खेल व काम का समन्वय टैगोर ने अपनी शिक्षण पद्धति में खेल को महत्त्व दिया है लेकिन उसने खेल व काम को विरोधी न मानकर दोनों में सामंजस्य स्थापित किया है। उनके अनुसार बालक की स्वाभाविक जिज्ञासा व सामाजिक प्रवृत्ति उसे इन क्रियाओं की ओर प्रवृत्त करती है जिन्हें हम लोग खेल कहते हैं। हालांकि हम लोग खेल को व्यर्थ का कार्य समझते हैं लेकिन खेल की इस प्रक्रिया में कल्पना, वास्तविकता का निर्माण आदि क्रियाएँ सम्मिलित हैं। धीरे-धीरे बालक की प्रवृत्ति खेल क्रियाओं की ओर से प्रयोजनपूर्ण क्रियाओं की ओर होती जाती हैं। टैगोर का यह मानना है कि खेल की इस शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक का दायित्व है कि वह खेल को उद्देश्यपूर्ण बनाये ।

( 3 ) भ्रमण के समय पढ़ाना-टैगोर का विश्वास है कि कक्षा में पढ़ाई जाने वाली शिक्षा का प्रभाव न तो बालक के मस्तिष्क पर ही पडता है और न ही उसके शरीर पर। अतः उनका यह मानना है कि भ्रमण के समय बालकों की मानसिक शक्तियाँ सतर्क रहती हैं। बालक अनेक विषयों को प्रत्यक्ष रूप से देखकर उनके विषय में ज्ञान को सरलता से प्राप्त कर लेते हैं। अतः टैगोर ने कहा कि- "भ्रमण के समय पढ़ाना शिक्षण की सर्वोत्तम विधि है। (Teaching while walking is the best method of teaching).

*(4) वाद-विवाद और प्रश्नोत्तर प्रविधि - टैगोर का यह मानना है कि वास्तविक शिक्षा केवल पुस्तकों के रट लेने तक ही सीमित नहीं होती अपितु वह जीवन तथा समाज के अध्ययन पर आधारित होती हैं। वे कहते थे कि बालकों को प्रश्नों तथा उत्तरों के द्वारा शिक्षा प्रदान करनी चाहिये। इनता ही नहीं उनके समक्ष अनेक प्रकार की समस्याओं को भी रखना चाहिये जिससे वे इन समस्याओं का हल वाद-विवाद द्वारा आसानी से निकाल सकें।

(5) क्रिया विधि- टैगोर ने 'क्रिया- सिद्धान्त' को विशेष महत्त्व प्रदान किया। उनका यह मानना था कि क्रिया शरीर व मस्तिष्क दोनों को शक्ति देती है। उनके अनुसार बालक को किसी हस्तकला में अवश्य प्रशिक्षित किया जाय। वे पेड़ पर चढ़ने कूदने दौड़ने, फल तोड़ने, हँसने, चिल्लाने अभिनय करने की शिक्षण की आवश्यक प्रविधि या युक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं।

(5) अध्यापक व शिष्य (Teacher and Student )

टैगोर का यह मानना है कि शिक्षा में अध्यापक का उत्तरदायित्त्व सबसे अधिक है। टैगोर ने लिखा कि- "शिक्षा केवल शिक्षक के द्वारा और शिक्षण विधि के द्वारा कदापि नहीं दी जा सकती है। मनुष्य केवल मनुष्य से ही सीख सकता है। इसीलिए उसने अध्यापक में निम्नलिखित गुणों की अपेक्षाएँ की हैं-

1. अध्यापक आत्मसंयमी व त्यागी होना चाहिए क्योंकि इन्हीं गुणों के द्वारा वह छात्रों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।

2. अध्यापक को पूर्वग्रही असहिष्णु, निम्न विचार वाला, अहंकारी व संकीर्ण स्वभाव का नहीं होना चाहिए।

3. उसे आलस्य और प्रमाद से दूर रहना चाहिए। उसे अपना आचरण शुद्ध रखना चाहिए। क्योंकि सात्विक आचरण द्वारा ही वह छात्रों पर शुभ प्रभाव डाल सकता है।

4. शिक्षक को बालकों पर अपने विचार लादना नहीं चाहिए। अतः बालक के स्वभाव और उसकी प्रवृत्तियों के अनुकूल शिक्षित करें।

5. वह अध्यापक सही रूप में शिक्षा नहीं दे सकता जो स्वयं भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील नहीं रहता है।

6. शिक्षक का छात्र के साथ सजीव सम्पर्क होना चाहिए। जब एक मन से दूसरे मन का सम्पर्क होता है, तभी आनन्द की उत्पत्ति होती है।

टैगोर ने न केवल शिक्षक गुणों की व्याख्या की है अपितु विद्यार्थी कैसा हो ? इस सन्दर्भ में उनका मानना है कि ब्रह्मचर्य का पालन विद्यार्थी के लिए अनिवार्य होना चाहिए। उनके अनुसार विद्यार्थी को संयमी, विलास से अलग, तथा पवित्र हृदय वाला होना चाहिए। उसमें अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा तथा गुरु के प्रति भक्ति होनी चाहिए। इन आदर्शों को अपने सम्मुख रखकर ही विद्यार्थी मानवता के साक्षात्कार की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं।

अतः टैगोर ने लिखा है कि "एक अध्यापक तब तक अपने विद्यार्थी को नहीं पढ़ा सकता जब तक कि स्वयं अध्ययनशील न हो। जैसे एक दीपक दूसरे दीपक की लौ को जब तक प्रज्ज्वलित नहीं कर सकता जब तक कि वह स्वयं की लौ को प्रज्जवलित नहीं रखता।
रवीन्द्रनाथ टैगोर | जीवन परिचय | रचनाएँ | 

(6) अनुशासन (Discipline )

टैगोर के अनुशासन सम्बन्धी विचार भी महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे आन्तरिक अनुशासन, स्वानुशासन या प्रभावोत्पादक अनुशासन की स्थापना करना चाहते थे। इसलिए गुरुदेव दण्ड व पुरस्कार दोनों के विरोधी हैं। उनका मत है कि ऐसा वातावरण बनाया जाय कि इन दोनों की आवश्यकता ही न रहे। अतः शिक्षा में बालकों को दण्ड देने की जो परिपाटी चली आ रही है, उन्होंने उसका सदैव विरोध किया। उन्होंने स्वयं अपने अनुभवों से सीखा था कि विद्यार्थी को दण्ड देना किसी भी दशा में उचित नहीं है। बच्चों के स्वतन्त्र विकास के पक्षपाती होने के कारण वह अपराध के लिए बालकों को दण्ड देने के पक्ष में नहीं है। उनका कथन है कि- "अपराध करना बालकों का काम है और क्षमा करना शिक्षकों का धर्म है।" इसलिए बालक को नियन्त्रण में नहीं रखा जाए तथा अधिकारी द्वारा बालक को दबाया नहीं जाए ।

उनका स्पष्टीकरण था कि मनुष्य स्वतन्त्र रहना चाहता है और अपने मार्ग में किसी भी बाधा को वह सहन नहीं करता है। उनका कहना है कि दण्ड व्यवस्था का दुष्परिणाम छात्रों के विराध व विद्रोह के रूप में देखने को मिलता है। उन्होंने जापानी समाज में प्रचलित अनुशासन की प्रशंसा की। अतः भारत में भी वह आत्मानुशासन के पक्ष में थे। इसके लिए अच्छे अध्यापक, सामाजिक वातावरण, प्रेम, सहयोग व सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, साहित्यिक व सांस्कृतिक क्रियाओं के आयोजन तथा कार्य करने की स्वतन्त्रता पर बल देते हैं। उनका कहना हैं कि उच्च सामाजिक वातावरण में ही मनुष्य को साधना करने का अवसर मिलता है तथा वह अनुशासन में रहना सीखता है। आत्मानुशासन से बालक में स्वावलम्बन, सहयोग, उत्तरदायित्त्व आदि नैतिक गुणों का विकास होगा।
जानिए गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जीवनी | 

(7) धार्मिक शिक्षा (Religious Education)

भारत के प्राचीन दार्शनिकों की भाँति टैगोर का विश्वास है कि अन्य विषयों की तरह धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती है। धर्म को नपे-तुले रूप में विद्यार्थियों को ग्रहण नहीं कराया जा सकता है। इसकी शिक्षा हेतु उपयुक्त वातावरण व धार्मिक जीवन के प्रकाश की अपेक्षा होती है। इसलिए इनका मत है कि 'God and Good' पढ़ाए नहीं जा सकते। जो धर्म की शिक्षा दे रहे हैं वे दुनिया को गुमराह बना रहे हैं। टैगोर ने धर्म को परिपूर्णता व सरलता का आदर्श माना है। लेकिन वर्तमान संसार में धर्म का प्रचलित रूप अत्यन्त जटिल हो गया है जिसके कारण संसार में शान्ति के स्थान पर अशांति धर्म के द्वारा फैल रही है। धर्म ने वर्तमान में जो विकृत रूप धारण कर रखा है उसका कारण है कि हमने धर्म को अपने अनुरूप बनाने का प्रयत्न किया है। जबकि धर्म किसी स्थान विशेष काल विशेष के अनुसार नहीं होता है। उसका रूप नहीं बदलता वरन् अमर व सनातन है और अपने इसी रूप में वह सदैव धारण करने योग्य है। अतः टैगोर का मानना है कि ब्रह्म की प्राप्ति के लिए किसी भी बाहरी आडम्बरों की जरूरत नहीं है, कोई विशेष मुहूर्त छाँटने की आवश्यकता नहीं है और न कही दूर जाने की आवश्यकता है जिस प्रकार दिन का प्रकाश देखने के लिए केवल आँख खोलने की आवश्यकता है उसी प्रकार ब्रह्म को पाने के लिए केवल हृदय में तीव्र इच्छा जाग्रत करने की आवश्यकता है। उनके विचार में धर्म के अन्तर्गत सम्पूर्ण मनुष्यता का समावेश है और धर्म जीवन के समस्त क्षेत्रों में समवन्य स्थापित करता है।

(8) शिक्षा का माध्यम (Medium of Education)

टैगोर का मानना है कि बालकों को पूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिये विदेशी भाषा उचित माध्यम नहीं है। विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने पर बालक अध्ययन से विरक्त होने लगते हैं। उनके विचार में अधिकांश छात्र स्वभावतः विदेशी भाषा सीखने में असमर्थ होते हैं। अंग्रेजी शिक्षा का परिणाम यह होता है कि हम अनिवार्य रूप से पश्चिम से प्रेरणा लेने को बाध्य होते हैं ।

अतः टैगोर ने कहा कि बालकों की शिक्षा उनकी मातृभाषा के माध्यम से होनी चाहिए। ऐसा होने पर ही बालक का पूर्ण विकास हो सकता है। टैगोर ने कहा कि "राष्ट्रीय शक्ति का यह कितना भयंकर अपव्यय है कि इस देश के हजारों विद्यार्थियों को ऊँची कक्षाओं में उस विदेशी भाषा का व्यवहार करना पड़ता है, जिसे सीखने की योग्यता उनमें नहीं है हालांकि उनमें सीखने की इच्छा है। मातृभाषा में शिक्षा पाने पर ही बालक का उचित विकास हो सकता है।
रबीन्द्रनाथ टैगोर का जीवन परिचय

(9) शान्ति निकेतन (Shanti Niketan )

टैगोर का शिक्षा जगत में ख्याति का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि इन्होंने केवल शिक्षा से सम्बन्धित सिद्धान्तों की ही चर्चा नहीं की है वरन् उन समस्त सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप देने हेतु इस संस्था की स्थापना की थी जिसे शांति निकेतन कहते हैं जो आज विश्वभारती के नाम से प्रसिद्ध है । शान्ति निकेतन कोलकाता से उत्तर-पश्चिम की ओर लगभग 100 मील दूर है। यह स्थान बर्दवान- साहबगंज लूप लाइन पर बोलपुर स्टेशन से डेढ़ मील दूर है। इसकी स्थापना टैगोर के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ ने की थी। क्योंकि वे अपनी साधना के लिए एक शान्त वातावरण की खोज में थे। चूँकि इस स्थान पर अपार शान्ति मिलती है इसीलिए इसका नाम शान्ति निकेतन रखा गया।

टैगोर जब 11 वर्ष के थे तो अपने पिता के साथ इस स्थान पर गये। अपनी इस प्रथम अनुभूति के बारे में लिखा कि 'यदि मुझे बाल्यकाल में यह अवसर नहीं मिलता तो मेरा जीवन नितान्त असम्पूर्ण रह जाता। टैगोर अपनी जमींदारी की देख-रेख हेतु गाँवों में जाते तो ग्रामीणों के दुःख दर्द सुनते और उनकी पीड़ा की स्वयं अनुभूति करते । अज्ञानता में जकड़ी हुई मानवता को देखकर टैगोर का हृदय विकल हो उठा। अतः सन् 1901 ई० में उन्होंने शान्ति निकेतन में एक विद्यालय की नींव रखी थी। उस समय केवल पाँच छात्र थे। उन्होंने अपने विद्यालय में विद्यार्थी को पूर्ण स्वतन्त्रता दी। उनका विचार था कि बालक को वही काम करने को कहा जाये जिससे उसे आनन्द आये। पाँच छात्रों से धीरे-धीरे संख्या में बढ़ोत्तरी होने लगी। परिणामस्वरूप आर्थिक समस्या भी धीरे-धीरे बढ़ती गई। नोबेल पुरस्कार की अपनी सारी धन राशि उन्होंने इसी में लगा दी।

टैगोर ने जीवन में विदेशों की यात्रा की व शान्ति निकेतन के प्रति समाज की सहानुभूति अर्जित की। अब उनका ध्यान उच्च शिक्षा की ओर गया। क्योंकि उच्च शिक्षा को वे आध्यात्मिक उन्नति का साधन मानते थे। वे विश्वविद्यालयों को ज्ञान का केन्द्र बनाना चाहते थे। अतः टैगोर ने सन् 1921 ई० को शान्ति निकेतन में ही विश्व भारती की स्थापना की थी। सन् 1951 ई० में संसद के एक विशिष्ट एक्ट द्वारा इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रूप में घोषित किया गया। तब से इसे केन्द्रीय सरकार संचालित कर रही है। सर्वप्रथम तत्कालीन प्रधानमन्त्री पण्डित नेहरू इस विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने ।

विश्वभारती स्थापना के उद्देश्य-

(1) पूर्व व पश्चिमी संस्कृति के बीच सामंजस्य स्थापित करके सम्पूर्ण मानवता को एकता के सत्य की अनुभूति कराना ।

(2) प्रकृति व मानव के बीच सम्बन्ध स्थापित कर मानव को पूर्णता की ओर अग्रसर करना ।

(3) विश्व बन्धुत्व की भावना जाग्रत कर विश्व शान्ति की स्थापना करना तथा संस्कृतियों के भ्रमात्मक मौलिक मतभेदों को दूर कर विश्व शान्ति का स्थायी वातावरण उत्पन्न करना ।

(4) विद्यार्थियों को स्वतन्त्रता, पारस्परिक विश्वास व उल्लास के साथ अध्ययन करने का अवसर प्रदान करना ।

(5) ग्रामीण पुनर्जागरण' की संस्था स्थापित करना ताकि ग्रामों में प्रसन्न व सन्तुष्ट मानव जीवन की नींव रखी जा सके।

इसकी विशेषताएँ-

1. विश्वभारती में अनेक विभाग हैं जिन्हें भवन कहा जाता है। ये भवन निम्नलिखित 10 हैं-

(1) पाठ भवन - स्कूल विभाग मैट्रिक तक की शिक्षा का प्रबन्ध है ।

(2) शिक्षा भवन - इण्टर तक शिक्षा ।

(3) विद्या भवन-बी० ए० आनर्स का तीन वर्षीय पाठ्यक्रम, दो वर्ष का एम०

ए० का पाठ्यक्रम और पी-एच० डी० हेतु शोध की व्यवस्था ।

(4) विनय भवन - अध्यापक प्रशिक्षण विभाग ।

(5) कला भवन - कला की शिक्षा ।

(6) संगीत - भवन - संगीत व नृत्य विभाग ।

( 7 ) चीन भवन- चीन के साहित्य एवं संस्कृति के अध्ययन हेतु ।

(8) हिन्दी भवन - हिन्दी भाषा व साहित्य के शिक्षण की व्यवस्था ।

(9) श्री निकेतन - यह 'ग्रामीण पुनर्निर्माण संस्था ग्रामीण समस्याओं के समाधान, कृषि सुधार, कुटीर धन्धे तथा स्वास्थ्य की शिक्षा हेतु स्थापित की गई।

(10) शिल्प-भवन - शिल्प में विभिन्न प्रकार के पाठ्यक्रम हैं (कुटीर उद्योग सम्बन्धी) ।

2. इस संस्था में प्रवेश लेने के पश्चात् किसी भी भवन में जाकर शिक्षा ग्रहण कर सकता है।

3. प्रवेश आकस्मिक व नियमित दोनों प्रकार से होता है।

4. शिक्षा की व्यवस्था अधिकांशतः खुले मैदान व पेड़ों के नीचे दी जाती है अर्थात् शिक्षा के लिये उपयुक्त वातावरण प्रस्तुत करना तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति एवं कार्यकलापों के लिये अवसर प्रदान करना।

5. विश्वभारती में सह-शिक्षा है। अतः यहाँ छोटे बच्चों, बड़े बच्चों, युवक छात्रों व शोध विभाग के छात्रों के लिये अलग-अलग छात्रावास की व्यवस्था है तथा महिलाओं के लिये अलग से छात्रावास की व्यवस्था है।

6. विश्वभारती में एक विशाल पुस्तकालय है जिसमें विभिन्न भाषाओं की हजारों की तादाद में पुस्तकें उपलब्ध हैं। टैगोर के जीवन तथा उनकी कृतियों के अध्ययन की सुविधा के लिये एक 'रवीन्द्र सदन' है जो टैगोर स्मारक संग्रहालय के रूप में है और इसमें टैगोर लिखित सभी पुस्तकें, सम्पादित पत्र-पत्रिकाएँ एवं अन्य सामग्री हैं।

7. यहाँ बालकों का स्वयं का दण्ड न्यायालय है जिसमें बालक स्वयं दण्ड की व्यवस्था करते हैं। लेकिन किसी भी प्रकार का आर्थिक दण्ड का प्रावधान नहीं है

8. इस संस्था का स्वयं का डेरी फार्म, अस्पताल एवं कृषिफार्म है।

9. संस्था का स्वयं का प्रेस व प्रकाशन विभाग है। जहाँ से विश्वभारती नामक पत्रिका निकलती है।

10. यहाँ का पाठ्यक्रम इतना व्यापक है कि उसमें बालक की विभिन्न रुचियों के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था की गई है। व्यक्तित्त्व विकास के लिये व्यक्तिगत व सामाजिक विकास दोनों का पूर्णरूप से ध्यान रखा जाता है।

11. यहाँ पर अध्यापकों व छात्रों के बीच मुधर सम्बन्ध स्थापित करने पर बल दिया जाता है। यहाँ अध्यापक एवं विद्यार्थी दोनों ही भारतीय व विश्व के अनेक देशों के लोग हैं अर्थात् यह एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था है।

12. इस संस्था में भारतीय संस्कृति अनुकूल प्रातः जल्दी उठना, प्रार्थना व प्रातःकालीन भ्रमण को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

इस प्रकार विश्वभारती को भारत में एक नये जीवन का प्रारम्भ करने वाली शिक्षा-संस्था के रूप में देखा जा सकता है जिसकी स्थापना में टैगोर के शिक्षा सम्बन्धी आदर्श साकार रूप प्राप्त कर सके हैं।

गाँधीजी ने लिखा है कि- "टैगोर ने विश्वभारती न केवल भारत के लिये वरन् विश्व के लिये एक वसीयत (Legacy) छोड़ दी है।"

एस० पी० चौबे ने यह कहा कि "टैगोर अब हमारे बीच में नहीं हैं, परन्तु उनका व्यक्तित्त्व हमेशा विश्वभारती में व्याप्त रहेगा।"

इस तरह टैगोर बीसवीं शताब्दी के एक महान दार्शनिक व शिक्षाशास्त्री थे । उनकी महानता इस बात में थी कि उन्होंने विदेशी राज्य द्वारा निर्धारित की हुई नीरस व निष्क्रिय शिक्षा के विरोध में एक ऐसे शिक्षा दर्शन का विकास किया जिसकी भारत को आवश्यकता थी तथा जिसके द्वारा सम्पूर्ण मानव का विकास हो सकता है। अतः मुकर्जी के शब्दों में- "टैगोर वर्तमान भारत के शैक्षिक पुनरुत्थान के सबसे बड़े पैगम्बर थे। उन्होने देश के सम्मुख शिक्षा के सर्वोच्च आदर्शों को स्थापित करने के लिये आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने अपनी शैक्षिक संस्थाओं में ऐसे प्रयोग किये जिन्होंने उन्हें आदर्श का सजीव प्रतीक बना दिया।"
रबीन्द्रनाथ टैगोर का जीवन परिचय
Kkr Kishan Regar

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