शिक्षण के चिन्तन स्तर

शिक्षण के चिन्तन स्तर 
चिन्तन स्तर के शिक्षण प्रतिमान 
शिक्षण के चिन्तन स्तर
शिक्षण के चिन्तन स्तर

शिक्षण के स्तर

    शिक्षाण, कक्षा में विभिन्न कायों को समापन करने की एका व्यवास्था है जिसका उद्देश्य छात्रों को सीखने के लिए प्रेरित करना है। शिक्षण के उद्देश्य अत्यन्त स्पष्ट होने चाहिए तभी शिक्षक प्रभावशाली साधनों का प्रयोग कर इसे अधिक शक्तिवान बना सकता है। शिक्षण प्रक्रिया के अन्तर्गत 'पाठ्य-वस्तु' एक महत्त्वपूर्ण उपागम है, जिसके बिना शिक्षण नहीं हो सकता। "एक ही पाठ्य-वस्तु को शिक्षण उपागम परिस्थितियाँ विचारहीन (Thoughtless) से लेकर विचारपूर्ण (Thoughtfull) स्थिति तक ले जा सकती है।" अतः शिक्षण की प्रक्रिया की परिस्थितियों को हम एक सतत क्रम (Continuum) पर विचारहीन क्रियाओं की अवस्थाओं या स्तरों में विभाजित किया जा सकता है

शिक्षण के स्तर

(1) स्मृति स्तर (Memory Level), 
(2) बोध स्तर (Understanding Level), 
(3) चिन्तन स्तर (Reflective Level)।

स्मृति स्तर -     बोध स्तर -     चिन्तर स्तर 
प्रारम्भ     शिक्षण प्रक्रिया     अन्त

1.स्मृति-स्तर का शिक्षण (Memory Level of Teaching)-
यह शिक्षण की प्रारम्भिक अवस्था होती है। इस स्तर के शिक्षण को सामान्य रूप से विचारहीन स्तर (Thoughtless Level) माना जाता है जिसमें कि तथ्यों (Facts) एवं सूचनाओं (Informa tions) के प्रस्तुतीकरण एवं रटने पर (rot memory) पर बल दिया जाता है। विषय-वस्तु के कण्ठस्थ कर लेने मात्र से ही शिक्षण की सफलता सिद्ध हो जाती है।
शिक्षण के स्तर

इस स्तर पर शिक्षण द्वारा छात्रों में बोध का सूझ विकसित नहीं होती है। अधिगम को विकसित करने के लिए इस स्तर के शिक्षण में प्रस्तुतीकरण,अभ्यास तथा पुनरावृत्ति को प्रमुख स्थान दिया जाता है। शिक्षण में तथ्यों के प्रस्तुतीकरण तथा उनके रटने पर विशेष बल दिया है। प्रस्तुतीकरण में विषयवस्तु को इतने सुव्यवस्थित ढंग से रखा जाता है कि वह छात्रों को अच्छी तरह स्मरण हो जाए। शिक्षण का एकमात्र उद्देश्य पाठ को याद करा देना होता है। इस स्तर पर अधिगम का बुद्धि से कोई धनात्मक सम्बन्ध नहीं होता है क्योंकि एक मन्दबुद्धि बालक की तथ्यों की रटने अथवा कण्ठस्थ करने की क्षमता एक तीव्रबुद्धि के बालक से अधिक अच्छी हो सकती है। शिक्षक बहुत सक्रिय तथा छात्र एक निष्क्रिय अधिगमकर्ता के रूप में रहता है। इसमें पुनः स्मरण (Recall) और प्रत्याभिज्ञान (Recognition) अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
शिक्षण के स्तर

2. बोध-स्तर का शिक्षण (Understanding Level of Teaching) 
यह शिक्षण की द्वितीय अवस्था है। इस शिक्षण के स्तर को सामान्य रूप में स्मृति स्तर के विचारहीन (Thoughtless) एवं चिन्तन स्तर के विचारयुक्त (Thoughtful) शिक्षण के मध्य का माना जाता है। बोध स्तर शिक्षण में शिक्षार्थियों को सामान्यीकरण, सिद्धान्तों तथा तथ्यों के सम्बन्ध का बोध (understanding) या प्रत्यक्षीकरण या अनुभूति करायी जाती है। स्मृति स्तर का शिक्षण इसकी प्रथम आवश्यकता है। इस स्तर के शिक्षण में शिक्षक शिक्षार्थियों के सम्मुख तथ्यों एवं सिद्धान्तों के सम्बन्ध तथा सामान्य सिद्धान्तों के वर्णन के माध्यम से बोध को प्रस्तुत करता है। शिक्षक अपने अनुदेशन (Instruction) को बोध स्तर पर लाने का प्रयास करता है। यदि वह बोध स्तर तक शिक्षण को लाने में सफल हो जाता है, उस स्थिति में शिक्षार्थी में नियमों को पहचानने, समझने, अनुभूति करने, तथ्यों में सम्बन्ध देखने तथा उनके प्रयोग करने की क्षमता का विकास हो जाता है जिससे शिक्षण की प्रक्रिया अर्थपूर्ण रूप ग्रहण कर लेती है।
शिक्षण के स्तर

    बोध-स्तर का शिक्षण छात्रों में विषय-वस्तु का बोध या समझ विकसित करने के लिए होता है। बोध के द्वारा ही अन्तर्दृष्टि (Insight) उत्पन्न होती है। बोध विकसित होने पर छात्र अपनी ज्ञानात्मक संरचना को पुनः संरचित कर सकते हैं तथा ज्ञान में अन्तर्निहित घटकों में नए नए सम्बन्ध देख सकते हैं। छात्र सीखी हुई सामग्री को नवीन परिस्थितियों में प्रयोग में ला सकता है। इस स्तर के शिक्षण का उद्देश्य छात्रों में नैपुण्य (Mastery) विकसित करना है, न कि उन्हें विषयवस्तु को कंठस्थ करा देना। शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों में एक विशेष प्रकार के व्यक्तित्व में अनुकूलन की ओर अधिक ध्यान दे क्योंकि अधिगम व्यक्तित्व में स्थायी परिवर्तन है।
शिक्षण के स्तर

3.चिन्तन/मनन-स्तर का शिक्षण (Reflective Level of Teaching)-चिन्तन स्तर का शिक्षण समस्या-केन्द्रित होता है। छात्र विषय-वस्तु के सम्बन्ध में आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं। छात्र सीखे हुए तथ्यों तथा सामान्यीकरणों की जाँच करता है और नवीन तथ्यों की खोज करता है । वस्तुत: यह शिक्षण स्तर अधिगम क्रिया का अन्तिम बिन्दु है। इसमें शिक्षार्थी मौलिक चिन्तन का प्रयास करता है, तथा शिक्षार्थी ज्ञात तथ्यों का मूल्यांकन करता है।
शिक्षण के स्तर

    चिन्तन/मनन-स्तर के शिक्षण में रटने या समझने तक ही सीमित नहीं रखा जाता अपितु इस बात की चेष्टा की जाती है कि जिज्ञासा,रुचि, अनुसन्धान, धैर्य आदि का भी विकास हो ताकि किसी समस्या को वैधानिक दृष्टि से समझा जा सके और तर्कपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सके। पाठ्यवस्तु की शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया विचारपूर्ण (Thoughtful) होती है। चिन्तन स्तर सर्वोच्य स्तर का शिक्षण है। चिंतन वस्तुतः एकात्मक मानसिक प्रक्रिया है इसमें ज्ञान की प्राप्ति, ज्ञान का विकास, परिवर्तन और उसका निष्कर्ष सन्निहित है। छात्रों में इस स्तर पर जिज्ञासा, रुचि, अन्वेषण और अध्यवसाय विकसित होता है। इस स्तर का शिक्षण 'समस्या-केन्द्रित' (Problem-centred) शिक्षण है। चिंतन-स्तर के शिक्षण की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं
शिक्षण के स्तर

(i) समस्या का प्रतिपादन (Problem Raising), 
(ii) समस्या का समाधान (Problem Solving)|

    इस प्रकार चिन्तन स्तर के शिक्षण में स्मृति तथा बोध स्तर का शिक्षण निहित होता है। इस स्तर के शिक्षण में छात्र अधिक क्रियाशील रहता है, कक्षा का वातवारण खुला हुआ होता है। शिक्षक का कार्य छात्रों के समक्ष समस्या प्रस्तुत करना है जिससे शिक्षार्थी में उद्दीपन (Stimulus) उत्पन्न हो सके और वह उन समस्याओं के लिए अपनी परिकल्पनाओं को प्रतिपादन करके उनका परीक्षण आरम्भ कर सकें। इस स्तर पर शिक्षण छात्रों के बौद्धिक व्यवहार के विकास के लिए अवसर प्रदान करता है और सृजनात्मक क्षमताओं (Creative talents) के विकास में सहायक होता है। इस स्तर पर कक्षा में शिक्षण या अधिगम के लिए छात्रों को बहुत-सी सक्रिय, आलोचनात्मक, कल्पनाशील और सृजनशील होना पड़ता है। शिक्षक और छात्र दोनों ही मिलकर प्रस्तुत समस्या का समाधान करने में लगे रहते हैं।
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