राजनीति शास्त्र का अर्थ एवं क्षेत्र

राजनीति शास्त्र का अर्थ एवं क्षेत्र

    आधुनिक समय में राजनीति विज्ञान ने वास्तविक तथा पंथ निरपेक्ष रूप अपना लिया। पूंजीवाद के प्रकट होने के परिणामस्वरूप औद्योगिक क्रांति आई तथा राज्य के कार्यों में परिवर्तन आया।
राजनीति शास्त्र का अर्थ एवं क्षेत्र
राजनीति शास्त्र का अर्थ एवं क्षेत्र


    राजनीति विज्ञान का विषय राज्य का एक विशेष विज्ञान बन गया। यह अनेकों प्रकार के सरकारों के बारे में तथा इसके अंग जैसे व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बारे बताया गया है।

लास्की का कहना है कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन संगठित राज्य से संबंधित पुरुष तथा स्त्री के जीवन से जुड़ा है।

    बीसवीं शताब्दी में व्यावहारिक उपागम का ध्यान राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन की तरफ से हटकर उनके कार्यों तथा राजनीतिक क्रियाकलापों के अध्ययन एवं महिलाओं तथा पुरुषों के व्यवहार के अध्ययन की तरफ चला गया।

    राजनीति विज्ञान के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत, राज्य के तथा सरकार के कार्यों का अध्ययन और नागरिकों के साथ उनके संघ आते हैं। ।

    राजनीति विज्ञान राजनीति से भिन्न है। राजनीति विज्ञान राजनीति के अध्ययन से सम्बद्ध है जबकि राजनीति महिला एवं पुरुष की समस्याओं तथा राजनीतिक गतिविधियों के साथ पारस्परिक क्रिया एवं संघर्ष से संबंधित है।

    दूसरों को नियंत्रित करने की योग्यता को सत्ता कहते है। यह वह क्षमता है जो दूसरों से अपनी इच्छानुसार कार्य कराती है। शक्ति तथा वैधता दोनों मिलकर सत्ता कहलाते हैं। 

    साधारणतया स्वत्रता का तात्पर्य व्यक्ति के व्यवहार पर किसी बाधा के नहीं होने से लिया जाता है।। परंतु सकारात्मक स्वतंत्रता का आर्थिक स्वयं अनुभूति से है अर्थात व्यक्ति उतना ही स्वतंत्र होना चाहिए, जिससे दूसरों की स्वतंत्रता में कमी न आए। कानून स्वतंत्रता की रक्षा करता है। प्रायः यह समझा जाता है कि समाज में न्याय तभी: हो सकता है जब लोगों को योग्यता के आधार पर तथा अभाव ग्रस्त की आवश्यकता का ध्यान दिए बगैर पुरस्कृत किया जाय। इसके अतिरिक्त स्वतंत्रता तथा समानता न्याय के बहुत महत्त्वपूर्ण स्तम्भ माने जाते हैं।

राजनीति विज्ञान का अर्थ

    राजनीति विज्ञान अथवा राजनीतिशास्त्र एक अति प्राचीन विषय है, किन्तु अतीत इसमें एक स्वतंत्र विषय (अनुशासन) के रूप में नहीं स्वीकारा जाता था। अर्थात् राजनीति विज्ञान का अध्ययन दर्शन शास्त्र, आचारशास्त्र, धर्मशास्त्र, इतिहास, विधि शास्त्र आदि की अवधारणाओं के आधार पर किये जाने की परम्परा थी। आधुनिक युग में राजनीति विज्ञान को न केवल एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकारा गया है, अपितु अन्य सामाजिक विज्ञानों के संदर्भ में इसका पर्याप्त विकास भी हुआ है।

    "राजनीति को अंग्रेजी में "पॉलिटिक्स" कहा जाता है। यह शब्द यूनानी भाषा के “पोलिस" शब्द से बना है, जिसका अर्थ उस भाषा में “नगर राज्य" होता था। शुरू में ये नगर-राज्य बहुत छोटे थे। धीरे-धीरे जनसंख्या की वृद्धि के कारण इन नगर-राज्यों के स्वरूप में परिवर्तन होता गया और इनका स्थान राष्ट्रीय राज्यों ने ले लिया। और यह इनसे संबंधित सभी पहलुओं का अध्ययन करने लगे। कालान्तर में राज्य से संबंधित अध्ययन करने वाले इस विषय को राजनीति शास्त्र अथवा राजनीति विज्ञान कहा जाने लगा। गार्नर के शब्दों में राजनीति शास्त्र का प्रारम्भ तथा अंत राज्य के साथ ही होता है।

गेटेल के शब्दों में राजनीति शास्त्र राज्य का विज्ञान है। '
केटलिन के अनुसार राजनीति विज्ञान शक्ति का विज्ञान है। 
लीकांक के मत में राजनीति विज्ञान सरकार से संबंधित विद्या है। 
डेविड ईस्टन के शब्दों में राजनीति विज्ञान सामाजिक मूल्यों के आधिकारिक निर्धारण का अध्ययन है। 


    संक्षेप में राजनीति विज्ञान को राज्य तथा सरकार का अध्ययन करने वाला विषय माना जाता है। राजनीति विज्ञान शब्द में राज्य विद्धान्त, सरकार, संविधान, शासन के स्वरूप प्रतिनिधित्व और मताधिकार, स्थानीय स्वशासन, नौकरशाही और राजनीतिक प्रक्रियाएँ जैसे सभी तत्त्व आ जाते हैं। विश्व के सभी देशों के विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान के नाम से ही राज्य सम्बन्धी अध्ययन के विभाग कार्य कर रहे हैं। अपने सर्वांगीण विकास के लिए मानव को राज्य या सरकार की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होती है। अतः राज्य राजनीति विज्ञान के अध्ययन का प्रमुख विषय है। | 
राजनीति विज्ञान के एक विषय के रूप में विकास पर टिप्पणी लिखिए।

राजनीति विज्ञान का एक विषय के रूप में विकास 

    राजनीति विज्ञान विषय की एक लम्बी परम्परा रही है। यूनानियों को इसके जनक होने का श्रेय दिया जाता है क्योंकि इस दिशा में उनका विशेष योगदान रहा है। इसके जन्म को प्लेटो के आर्दशवाद और अरस्तू के बुद्धिवाद से अभिसिंचित किया जाता है जो ज्ञान की दो ऐसी प्रमुख धाराएँ हैं जिनकी बाद में व्याख्या की गई और उन्हें तोडा मरोडा जाता रहा है। प्लेटो का उन्नत आर्शवाद और अरस्तू की वैज्ञानिक क्रमबद्धता राजनीतिक सिद्धांत के रचनाकारों को प्रेरित करती रही है और सदियों से उनके बीच वाद-विवाद का विषय बनी हुई है। यूनानी चिन्तकों के समय से लेकर आज तक विभिन्न चिन्तकों, सिद्धांत वेत्ताओं और विश्लेषकों के योगदानों से राजनीति विज्ञान के रूप व उसकी परम्पराएँ समय - समय पर बदलती रही हैं। मोटे रूप से राजनीति विज्ञान के दो रूप उभरकर सामने आये हैं।
(1) परम्परागत राजनीति विज्ञान 
(2) आधुनिक राजनीति विज्ञान। 
    19वीं शताब्दी के अन्तिम दशक और 20 वीं शताब्दी के प्रथम दशक में परम्परागत राजनीति विज्ञान संस्थात्मक विधिवादी परम्परा को छोडकर' सामाजिक-राजनितिक जीवन के विषय में एक नई दृष्टि अपनाताहै। इस नई दृष्टि के अनुसार हम समाज तथा सामाजिक समूहों । को एक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं।

    द्वितीय महायुद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिमी । जगत में राजनति विज्ञान की समग्र धारणा में ही क्रांतिकारी परिवर्तन " आया। प्रो. चार्ल्स ई. मेरियम ने अपनी कृति "न्यू आस्पेटर ऑफ पॉलिटिक्स' में बताया था कि राजनीति के अध्ययेता को एक नवीन मार्ग का अवलम्बन करना पड़ेगा क्योंकि राजनतिक सिद्धांत ऐसी शक्तियों के सम्पर्क में आ गया है कि कालान्त में वे इसकी प्रकृति को मूलतः संशोधित कर देगा।

    आधुनिक राजनीत विज्ञान के निर्माण में अमरीकी राजनीति वैज्ञानिकोकं का विशेष योगदान रहा है। शिकागो के राजनीति वैज्ञानिकों ने दार्शनिकों , ऐतिहासिक और सांस्स्थानिक दृष्टिकोणों से अपना सम्बन्ध तोडते हुए राजनीतिक प्राणी के रूप में मनुष्य के प्रेक्षात्मक आचरण पर सारा बल दिया। उन्होंने मानव-व्यवहार एवं समूहों के अध्ययन पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जिसमें व्यवहारवाद को अपना स्वाभाविक आरम्भ बिन्दु प्राप्त हुआ। व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने राजनीतिक संस्थाओं एवं ढाँचों की गतिविधियों की तरफ से अपना ध्यान हटाकर उनकी कार्यप्रणाली की ओर केन्द्रित किया। व्यवहारवादी स्वीकार करते हैं कि व्यवहार के माध्यम से जो राजनीतिक गतिविधियाँ स्पष्ट होती हैं वे ही राजनीतिक विज्ञान की विषय वस्तु है। राजनीति एक प्रक्रिया के रूप में स्रोतों को अधिकारपूर्ण निर्धारित करने का प्रयल करता है जिसे डेविड ईस्टन ने मूल्य कहा है।

    19वीं शताब्दी के जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स का मत है कि दो वर्गों के ऐसे झगडे म्किा समाधान नहीं हो कसता,उसका अध्ययन ही राजनीति है। जिनमें पहला वर्ग शोषक है तथा दूसरा शोषित वर्ग। माक्र्सवादी विचार धारा के विपरीत राजनीति का एक दूसरा अर्थ जो यह बताता है कि राजनीति न्याय दिलाती है तथा झगडों को समाप्त करने का प्रयास करती है। यह विचारधारा उदारवादी वर्गका प्रतिनिधित्व करती है। ... वर्तमान में पिनांक एवं स्मिथ के इस मत पर जोर दिया जाता । है कि क्या है (यर्थाथ) तथा क्या होना चाहिए (आदर्श) और इन दोनों के बीच यथासंभव समन्वय कैसे प्राप्त किया जाए इस दृष्टि से हम सरकार तथा राजनीतिक प्रक्रिया के व्यवस्थित अध्ययन को राजनीति विज्ञान कर सकते हैं।
राजनीति विज्ञान के कार्य-क्षेत्र को राज्य की भूमिका तथा सरकार के कार्यों के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।

राजनीति विज्ञान के कार्य-क्षेत्र 

राजनीति विज्ञान के कार्य-क्षेत्र  से तात्पर्य इस विषय के अन्तर्गत आने वाली विषय वस्तुं अथवा विषय सामग्री से लिया जाता है। ऐसा करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखा जाता है कि इसकी विषय वस्तु में किन-किन बातों को सम्मिलित किया जाय। आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार इटली के राजनीतिक चिंतक मैकियावलजी ने राज्य शब्द का पहली बार प्रयोग किया था। उस समय से हर राजनीतिज्ञ राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन करते समय राज्य का ही अध्ययन करता

1. राज्य की भूमिका- 

राजनीति विज्ञान के कार्य-क्षेत्र के अध्ययन का प्रमुख विषय स्वयं राज्य है। प्राचीनकाल से आधुनिक काल तक राज्य का विकास विभिन्न अवस्थाओं से गुजरा है और इस बात की पूरी सम्भावना है कि भविष्य में भी राज्य का विभिन्न रूपों से विकास होगा। गैटिल के अनुसार राजनीति विज्ञान 'राज्य कैसा है' की ऐतिहासिक गवेषणा राज्य कैसा कैसा है' का विश्लेषणात्मक अध्ययन और राज्य कैसा होना चाहिए की राजनीतिक व नैतिक परिकल्पना है। राजनीति विज्ञान अतीत में राज्य के संदर्भ में उत्पन्न विभिन्न राजनीतिक विचारों व धारणाओं का भी अध्ययन करता है। अधुनिक पश्चिमी उदारवादी विचार, 16वीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप में वाणिज्यिक क्रांति को बढावा दिया तथा 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के लिए मुख्य बन गया। इन क्रांतियों ने एक नई आर्थिक क्रांति पंजीवाद को जन्म दिया। पूंजीवाद और बाजार को एक ही सिक्के के दोनों पहल माना गया है। अतः राजनीति विज्ञान उन विचारधाराओं का अध्ययन करता है जो राज्य के वर्तमान स्वरूप, संगठन तथा कार्यों में परिवर्तन चाहती है। इस दृष्टि से राजनीति विज्ञान नवीन उदारवाद, बहलवाद. संवादवाद, साम्यवाद तथा अराजकतावाद आदि विचार धाराओं का अध्ययन करता है। 1930 के दशक में लोक कल्याणकारी राज्य का उदय हुआ जिसने अपने नागरिकों की भलाई विशेषकर गरीब, बेरोजगार तथा बूढे लोगों के हित का ज्यादा ध्यान रखा। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि लोक-कल्याणकारी राज्य ने आम लोगों के हितों को ज्यादा बढ़ावा दिया है।

2. सरकार की भूमिका- 

राजनीति विज्ञान के अध्ययन का एक प्रमुख विषय सराकार भी है। राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत सरकार के विगत एवं आधुनिक रूपों का अध्ययन किया जाता है। यह वर्तमान काल में विभिन्न देशों में मौजूद शासन-प्रणालियों का सरल व तुलनात्मक अध्ययन करता है। यह शासन के तीनों अंगों का अध्ययन करता है। वर्तमान काल में अधिकांश देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली प्रचलित है और इस दृष्टि से राजनीति विज्ञान चुनाव प्रणाली, प्रतिनिधित्व की समस्या लोक प्रशासन आदि का भी अध्ययन करताहै। सरकार के माध्यम से जनता के उपर नौकरशाही तथा विशाल सरकारी प्रशासन का भी अध्ययन किया जाता है।
राजनीति विज्ञान और राजनीति में अंतर स्पष्ट कीजिए।

राजनीति विज्ञान और राजनीति में अंतर

व्यक्ति एवं समाज के राजनीतिक जीवनप का अध्ययन करने वाले विषय को आधुनिक युग में राजनीति विज्ञान कहा जाता है। किन्तु परम्परा के आधार पर इस विषय के अनेक नाम आज भी प्रचलित हैं, जैसे-राजनीति, राज्य दर्शन राजनीतिक दर्शन तथा राजनीतिक सिद्धांत आदि। प्रायः राजनीनि विज्ञान तथा राजनीति को एक ही समझा जाता रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है, दोनों में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित है

1. अध्ययन क्षेत्र की दृष्टि से - 

आधुनिक काल में राजनीति' नाम का प्रयोग केवल सामयिक एवं प्रशासनिक समस्याओं के प्रसंग में किया जाता है और इससे राजनीति के सैद्धान्तिक पक्ष का बोध नहीं होता है अतःराजनीति नाम अनुपक्युत है, जबकि राजनीति विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र में हमारे विषय के सम्पूर्ण कलात्मक (सैद्धान्तिक एवं ज्ञानात्मक) पक्षों का शामिल किया गयाहै अतः यह हमारे विषय को उसकी सम्पूर्णता के साथ प्रकट करता है। .

2. प्राचीनता एवं नवीनता का अन्तर - 

हमारे विषय के लिए 'राजनीति' नाम प्राचीनकाल से इस्तेमाल किया जाता रहा है जबकि इस विषय के लिए 'राजनीत विज्ञान' एक नया और आधुनिक नाम है। सर्वप्रथम राजनीति नाम का प्रयोग प्राचीन यूनानी विद्वान अरस्तू ने किया था और लगभग द्वितीय विश्व युद्ध से पहले तक यह नाम प्रचलन में रहा है किन्तु राजनीतिक विज्ञान प्रथम विश्व युद्ध के बाद . प्रयोग में आया और द्वितीय विश्व यद्ध के बाद लोकप्रिय हुआ है।

3. विभिन्नता और एकता का अन्तर - 

'राजनीति' शब्द का प्रयोग किसी स्थान या समुदाय विशेष की राजनीतिक संस्थाओं के संबंध में किया जाताहै। जैसे- भारत राज्य की राजनीति, हरियाणा की राजनीति, ग्राम पंचायत की राजनीति तथा छात्र राजनीति आदि किन्त “राजनीति विज्ञान" में विषय के सैद्धांतिक पक्ष का अध्ययन किया जाता है तथा इसमे एकरूपता भी पायी जाती है। यद्यपि राजनीति विज्ञान में विषय के व्यावहारिक पक्ष का भी अध्ययन किया जाता है।

4. विषय-वस्तु की दृष्टि से अन्तर - 

“राजनीत विज्ञान" की विषयवस्तु के अंतर्गत राज्य के सिद्धान्त, संप्रभुता, शक्ति की अवधारणा, सरकारों का स्वरूप तथा कार्यप्रणाली, कानूनों के निर्माण तथा लागू करने की प्रक्रिया, चुनाव, राजनीतिक दल, नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्य, पुलिस की कार्यप्रणाली तथा राज्य एवं सरकार की कल्याणकारी गतिविधियाँ भी समाहित होती हैं, जबकि राजनीति' के अंतर्गत सरकार का गठन, सरकार की कार्यप्रणाली, प्रशासन कानून एवं विधायिका आते हैं। इसके अलावा व्यावहारिक राजनीति के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, विशेष मामले, युद्ध एवं शक्ति, अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तथा मानवाधिकार को रक्षा आदि राजनीति के अध्ययन की विषयवस्तु है।

5. अप्रतिष्ठित एवं प्रतिष्ठित नाम का अन्तर - 

वर्तमान समय ... में "राजनीति" नाम उचित नहीं माना जाता है क्योंकि यह एक अप्रतिष्ठित नाम हो चुका है।आजकल 'राजनीति' शब्द का प्रयोग छल, कपट, धूर्तता एवं स्वार्थ की नीति के लिए होता है। यह कहा जाने लगा है कि "राजनीति दुष्ट पुरुष का अन्तिम शरण-स्थल है।" किन्तु राजनीति-विज्ञान नाम के साथ यह संकट नहीं है अतः इसे प्रतिष्ठित शब्द माना जाता है।
व्यक्ति के अधिकारों एवं कर्तव्यों के उपर टिप्पणी लिखिए।

व्यक्ति के अधिकार एवं कर्तव्य

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज का सदस्य होने. के नाते उसके कुछ अधिकार एवं कर्तव्य भी होते हैं। बिना अधिकारएवं कर्तव्यों के व्यक्ति अपना जीवन यापन ठीक ढंग से नहीं कर पाता है। अधिकार और कर्तव्य एक सिक्के के पहलू है जिनको अलग नहीं किया जा सकता। लास्की के शब्दों मे अधिकार समाजिक जीवनकी वे परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता। व्यक्ति के अधिकारों को तीन भोगों में बांटा जा सकता है-1. नागरिक अधिकार, 2. राजनीतिक अधिकार एवं 3. सामाजिक अधिकार।

1. नागरिक अधिकार 

    से अभिप्राय व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता से है। जिसके अन्तर्गत जीवन जीने का अधिकार, वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति रखने का अधिकार, संघ एवं समुदाय । बनाने का अधिकार, कानून की दृष्टि में समानता का अधिकार तथा समझौता या कोई भी करोबार करने का अधिकार आदि आते हैं। है

2. राजनीतक अधिकार 

    से तात्पर्य व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से राजनीति में भाग लेने का पूर्ण अधिकार है। इसके अंतर्गत मत देने का अधिकार, निर्वाचित होनो का अधिकार, शासन में प्रत्यक्ष रूप से भाग ' लेने का अधिकार प्राप्त है। जिसमें किसी भी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार कोई भेदभाव नहीं किया जाता है।

3. सामाजिक अधिकार 

    उसे कहते हैं जिसमें व्यक्ति को समाज में स्वतंत्र रूप में जीने का अधिकार हो तथा सामाजिक गतिविधियों में उसका पूरा हक होता है। इस अधिकार के अंतर्गत आर्थिक कल्याण, सुरक्षा तथा समाज में उपस्थित सम्मान एवं इज्जत की जिंदगी जीने का अधिकार आदि आते हैं।

    अधिकारों के साथ-साथ व्यक्ति के कुछ कर्तव्य भी होते हैं । जिनका पालन करना आवश्यक होता है।

1. नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करें तथा सरकार को समय पर अपना कर अदा करें।

2. प्रत्येक नागरिक को कानून एवं नियम का पालन करते हुए सरकार के साथ सहयोग करना चाहिए।

3. नागरिकों को असाध्य बीमारियों को रोकने के लिए सरकार । के साथ प्रतिरक्षण में मदद करनी चाहिए। .

4. जनसंख्या विकास को रोकने के लिए छोटा परिवार की : पंरपरा को अपनाना चाहिए।

5. सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करनी चाहिए तथा हिंसा से : दूर रहें।

6. धर्म, जाति, भाषा, लिंग एवं नस्ल भेद के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं करना चाहिए तथा अपनी समस्याओं को समझौतों द्वारा हल कर लेना चाहिए।

7. देशं की रक्षा करें। आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की रक्षा करें।

8. व्यक्तिगत गरिमा तथा मानवीय गतिविधियों के प्रति सम्मान का भाव रखें।

9. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करें।

10. वैज्ञानिक उपलब्धियों एवं सामाजिक उत्कर्ष को बढाने का । प्रयास करें।

स्पष्ट है कि अधिकार एवं कर्तव्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिन्हें ।। अलग नहीं किया जा सकता। ये प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है।
स्वतंत्रता के नाकारात्मक एवं सकारात्मक पक्षों को. स्पष्ट कीजिए।

स्वतंत्रता के नाकारात्मक एवं सकारात्मक पक्ष

स्वतंत्रता मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए एक भावश्यक तत्त्व है। उसके अभाव में समाज और मनुष्य दोनों का विकास । भवरूद्ध हो जाता है। ब्राइस के शब्दों में "स्वतंत्रता मानव मात्र के स्वाभिमानी जीवन के लिए परम आवश्ययक है।'' यह उसके शुष्क और निस्सार जीवन को,प्राणवान बनाती है तथा मानव मस्तिष्क की चिन्तन प्रक्रिया को सजग करती है। स्वतंत्रता के दो अर्थ लगाए जाते है "- (1) नकारात्मक और 2 सकारात्मक।

(1) स्वतंत्रता की नकारात्मक अवधारणा - 

    स्वतंत्रता' जिसे अंग्रेजी में 'लिबर्टी' कहते हैं, लैटिन भाषा के 'लाइबर' शब्द. से बना है जिसका अर्थ उस भाषा में "बन्धनों का अभाव" होता है। इस धारणा के अन्तर्गत स्वतंत्रता का अर्थ है - प्रतिबन्धों का न होना अर्थात् व्यक्ति के कार्यों पर किसी भणे प्रकार का बन्धन न हो। सामाजिक समझौता सिद्धान्त के समर्थक हॉन्स और रूसों के मतानुसार प्राकृतिक अवस्था में इस प्रकार की स्वतंत्रता थी। मनुष्य पर किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं थी। रूसो की अमर कृति "सामाजिक समझौता' का पहला वाक्य ही यही है- "मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है।" इस प्रकार बन्धनों के पूर्ण अभाव में स्वतंत्रता स्वैच्छाचारिता या उच्छंछलता में बदल जाती है।

2. स्वतंत्रता की सकारात्मक अवधारणा - 

    सकारात्मक रूप में स्वतंत्रता का अर्थ है मनुष्य को अपनो व्यक्तित्व के विकास के लिए पर्याप्त सुअवसर या परिस्थितियाँ प्रदान करना। ये अवसर या सुविधाएं राज्य ही प्रदान कर सकता है। अतएव सकारात्मक स्वतंत्रता राज्य में ही सम्भव है। ऐसी स्वतंत्रता सीमित होती है, न कि असीमित। ऐसी स्वतंत्रता केवल वैयक्तिक नहीं, सामाजिक हित की दृष्टि से प्रदान की जाती है। ग्रीन के मतानुसार, "स्वतंत्रता उन कार्यों को करने अथवा उन वस्तुओं का उपभोग करने की शक्ति है जो करने अयवा उपभोग करने योग्य हैं" गाँधीजी के शब्दों में, "स्वतंत्रता का अर्थ नियन्त्रण का अभाव नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के विकास की अवस्थाओं की प्राप्ति है।" समाज में राज्य की ओर से ऐसी परिस्थितियाँ होनी चाहिए जिनमें व्यक्ति एक उन्मकुत ज़ीवन जी सके। उसका जीवन सुरक्षित हो, उसको आजीविका के अवसर प्राप्त हों, वह अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर सके तथा वह अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास कर सके। - दोनों अवधारणाओं के आधार पर स्वतंत्रता की परिभाषा हम इस प्रकार कर सकते हैं- स्वतंत्रता जीवन की ऐसी अवस्था का नाम है जिसमे व्यक्ति के जीवन पर न्यूनतम प्रतिबंध हो और उसके विकास के लिए अधिकतम साधन-सुविधाएं उपलब्ध हो। ..
अवसर की समानता का अर्थ क्या है?

अवसर की समानता का अर्थ

सकारात्मक दृष्टि से समानता का अर्थ बिना किसी . अवांछित और संकीर्ण भेदभावों के राज्य द्वारा अपने सभणे नागरिकों . के विकास के समान अवसर प्रदान किये जाने से है। प्रत्येक व्यक्ति को । सार्वजनिक पदों एवं कार्यालयों में एक समान प्रवेश मिलें। संघ लोक सेवा आयोग भारत में अवसर की समानता का सबसे अच्छा उदाहरणः है। इस प्रकार काले या सफेद, स्त्री या पुरुष तथा उच्च या निम्न वर्ग . के लोगों को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर उपलब्ध होना ही . “अवसर की समानता को प्रकट करता है। लास्की के मतानुसार "समानता मूल रूप से समाषीकरण की एक प्रक्रिया है। जिसमें समानता का पहला अर्थ विशेषाधिकारों के अभाव से है जबकि द्वितीय अर्थ में समानता का अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को विकास हेतु पर्याप्त अवसर उपलब्ध होने चाहिए।

    इस प्रकार अवसर की समानता विचार से संबंध शर्तों की समानता से हैं। इस दौड में प्रत्येक व्यक्ति को प्रारंभ में अवसर मिलना चाहिए और उसके बाद जीवन की दौड प्रारंभ हो जाती है। राजनीति विज्ञान में समानता का तात्पर्य ऐसी परिस्थतियों के अस्तित्व से होता है, जिसके कारण सब व्यक्तियों को व्यतिक्त्व विकास के समान अवसर प्राप्त हो सके, इस प्रकार उस असमानता का अन्त हो जाए, जिसका मल सामाजिक वैषम्य है। अतः अवसर की समानता से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक को इस बात का अवसर मिलना चाहिए कि वह अपनी योग्यता और प्रतिभा का अधिकाधिक बिना किसी भेदभाव के विकास कर सकें।
प्रश्न- 8 न्याय शब्द की व्याख्या कीजिए तथा इसके । विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालिए।

न्याय शब्द की व्याख्या

न्याय की अवधारणा प्राचीनतथा अर्वाचीन दोनों ही युगों में राजनीतिक चिंतन की एक प्रमुख अवधारणा रही है।
 न्याय शब्द की व्याख्या - न्याय शब्द अंग्रेजी के “जस्टिस" शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। "जस्टिस" शब्द लैटिन भाषा के शब्द "जस्टिशिया" से उत्पन्न हुआ है। इस शब्द का मूल भाव जोडने या धन से है। बार्कर के शब्दों में "न्याय का मुख्य कार्य मनुष्यों को संगठित सामाजिक व्यवस्था से जोडने का है।" मनुष्य को उसकी सामाजिक व्यवस्था से जोडने हेतु कुछ सामाजिक मूल्यों की आवश्यकता होती है। इन सामाजिक मूल्यों में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व या सहयोग की भावना प्रमुख है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि न्याय सामाकि मूल्यों का संश्लेषक या समन्वसयक है। मेरियम के अनुसार "न्याय उन मान्यताओं और प्रक्रियाओं का योग है जिसके माध्यम से प्रत्येक मनुष्य को वे सभी अधिकार और सुविधाएं प्रदान की जाती है जिन्हें समाज उचित मानता है।" न्याय स्वयं में पूर्ण धारणा नहीं है,बल्कि एक सापेक्ष धारणा है। समय तथा परिस्थितियों के बदलते ही न्याय की धारणा में भी परिवर्तन आता रहता है। न्याय का संबंध मूल्यों से है, औचित्य और आदर्शों से हैं। न्याय के अर्थ को दो भागों में बाँटा जाता है- (1) व्यापक अर्थ में न्याय को मानव तथा. समाज के समस्त आचरणों के संदर्भ में देखा जाता है। इस रूप में इसको सदाचार या अच्छाई के रूप में जाना जाता है।
(2) संकीर्ण अर्थ में न्याय को कानून के साथ जोड़कर देखा जाता है। यहां न्याय एक प्रक्रिया ... के रूप में दिखाई देती है।
    इस प्रकार न्याय का अभिप्राय सामाजिक जीवन की उस अवस्था से है जिसमें व्यक्ति के.आचारण का सामाजिक कल्याण के व्यापक हित में सामाजिक मूल्यों के साथ समन्वयक स्थापित किया जाता है।

न्याय के विभिन्न  पक्ष - 

न्याय एक समग्र विचार है लेकिन उसे सही रूप में समझने के लिए इसके विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है-

1. नैतिक न्याय - 

नैतिक न्याय की अवधारणा समाज की नैतिक मान्यताओं पर आधारति है जो परम्परागत है। सच बोलना, सभी जीवो के साथ करूणामय व्यवहार करना, वचन-पालन, दानशीलता, सदाचरण आदि कुछ ऐसे नैतिक नियम है जिनका पालन - नैतिक न्याय का परिचायक है। इनका पालन व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से अपनी नैतिकचेतना के अनुसार किया जाता है।

 2. कानूनी न्याय - 

कानूनी न्याय की अवधारणा एक सर्वमान्यअवधारणा है। इसके अन्तर्गत संवैधानिक विधि, नागरिक विधि तथा. अन्य विधियो जो नागरिकों के जीवन को नियंत्रित करती हैं, आती हैं. : तथा इन विधियों के प्रयोग हेतु निर्धारित प्रक्रिया भी शामिल होती है। वैधानिक दृष्टि से सम्पूर्ण कानूनी व्यवस्था कानूनी कानूनी न्याय के क्षेत्र के अन्तर्गत आती है, जिसका पालन अनिवार्य रूप से नागरिकों को करना पड़ता है। "कानून का शासन' कानूनी न्याय की सबसे सुन्दर : अभिव्यक्ति है।

3. राजनीतिक न्याय - 

राजनीतिक न्याय की अवधारणा का तात्पर्य राजनीतिक दृष्टि से ऐसी राज्य व्यवस्था की स्थापना से है जिसके संचालन में सभी नागरिक निर्बाध रूपस से भाग ले सकें ताकि सभी बिना किसी भेदभाव के उससे लाभान्वित हो सकें। इसमें वयस्क मताधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता, निर्वाचित होने का अधिकार तथा शासकीय पदं प्राप्त करने का अधिकार आदि आते हैं।

4. सामाजिक न्याय - 

समाज में धर्म, जाति, रंग लिंग, वंश आदि के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा न माना जाये तथा प्रत्येक नागरिक को समानताके आधारए पर योग्यतानासार अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए समान अवसर और साधन-सुविधाएं उपलब्ध हों। .

5. आर्थिक न्याय - 

आर्थिक न्याय का अर्थ आर्थिक दृष्टि से . एक ऐसी समाज व्यवस्था की स्थापना से है जो शोषण से मुक्त हो तथा जिसमें सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के जीवनयापन के इतने साधन उपलब्ध हो जिससे वे एक सुविधापूर्ण और सम्मानजनक जीवन जी सके । 

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