शिक्षा तकनीकी का प्रत्यय | शिक्षा तकनीकी का अर्थ, अवधारणायें, स्वरूप एवं उपयोग

नमस्कार प्रिय मित्रों, आज के इस लेख में हम आपको बताने जा रहे है शिक्षा तकनीकी का प्रत्यय क्या है ? शिक्षा तकनीकी का प्रत्यय, अर्थ, अवधारणायें, स्वरूप एवं उपयोग को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे|

शिक्षा तकनीकी का प्रत्यय

CONCEPT EDUCATIONAL TECHNOLOGY)

(अर्थ, अवधारणायें, स्वरूप एवं उपयोग)

    वैज्ञानिक आविष्कारों ने मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष एवं क्रिया को प्रभावित किया है। इससे हमारी शिक्षा भी अछूती नहीं रह सकी। शिक्षण की प्रक्रिया के शिक्षण में मशीनों, रेडियो, टेलीविजन, टेपरिकॉर्डर, ग्रामोफोन, कम्प्यूटर तथा भाषा प्रयोगशाला आदि का प्रयोग से शिक्षा प्रक्रिया का यन्त्रीकरण किया जा रहा है। ज्ञान के संचय, प्रसार तथा वृद्धि के लिये शिक्षण में सहायक सामग्री तथा मशीनों का प्रयोग किया जाने लगा है। इस प्रकार शिक्षण प्रक्रिया के यन्त्रीकरण के फलस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक तकनीकी के एक नवीन प्रत्यय तथा विचारधारा का विकास हुआ है।    'शिक्षा-तकनीकी शिक्षा मनोविज्ञान, शिक्षा-दर्शन, शिक्षा मापन एवं मूल्यांकन तथा शिक्षा समाजशास्त्र की भाँति शिक्षा विषय का एक नया क्षेत्र है। यह सीखने के साधनों की योजना तथा व्यवस्था के लिये एक आवश्यक आधार प्रदान करती है। इसकी उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् ने शिक्षा - तकनीकी का एक नया विभाग खोला है। और दृश्य-श्रव्य सहायक सामग्री विभाग को शिक्षा-तकनीकी विभाग में ही सम्मिलित कर दिया है। इस अध्याय में शिक्षा तकनीकी के 'अर्थ एवं क्षेत्र का उल्लेख किया गया है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा - तकनीकी का अर्थ

(Meaning of Educational Technology)

    शिक्षा - तकनीकी एक ऐसी प्रविधि का विज्ञान है जिसके द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इसका क्षेत्र केवल उद्देश्यों को निर्धारित करने तक ही सीमित नहीं है, अपितु यह उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप में परिभाषित करने में सहायक करता है। शिक्षा तकनीकी माण्टेसरी, किंडरगार्टन आदि शिक्षण पद्धतियों की भाँति कोई शिक्षण पद्धति नहीं है वरन् यह एक ऐसा विज्ञान है जिसके आधार पर शिक्षा के विशिष्ट उद्देश्यों की अधिकतम प्राप्ति के लिये विभिन्न आव्यूह का निर्धारण तथा विकास किया जा सकता है।

    शिक्षण-प्रक्रिया के अन्तर्गत अपेक्षिक क्रियाओं एवं साधानों की व्यवस्था करनी पड़ती है और सीखने के लिये समुचित परिस्थितियों की रूपरेखा बनानी पड़ती है। शिक्षण के उद्देश्यों का निर्धारण सामाजिक एवं राजनैतिक विचारकों एवे दार्शनिकों के द्वारासमाज के व्यापक पक्षों एवं मूल्यों को ध्यान में रखकर किया जाता है। शिक्षा के उद्देश्यों के निर्धारण के बाद शिक्षा तकनीकी इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये समूचित आव्यूह का चुनाव करती है, और उनका प्रयोग करती है। आव्यूह के प्रयोग करने के पश्चात् मूल्यांकन किया जाता है कि कहाँ तक इन उद्देश्यों की प्राप्ति हो सकी है। यदि नहीं हो सकी है तो किस प्रकार परिवर्तन किया जाये जिससे उद्देश्यों की अधिकतम प्राप्ति की जा सके। यह शिक्षा तकनीकी का एक पक्ष है जिसे हम अनुदेशन तकनीकी कह सकते हैं। 

शिक्षा तकनीकी का दूसरा अर्थ

(Second Meaning of Educational Technology)

    शिक्षा-तकनीकी का दूसरा अर्थ है- शिक्षण की क्रियाओं का यन्त्रिकरण करना । शिक्षण की प्रक्रिया में मशीनों का प्रयोग अधिक तेजी से बढ़ रहा है। यदि शिक्षा तकनीकी के आविर्भाव का इतिहास लिख जाये तो व्यक्तियों की धारणा है कि इसके इतिहास का प्रारम्भ छापने की मशीनों मुद्रण से मानना चाहिये ।

(1) ज्ञान को संचित करना,
(2) ज्ञान का प्रसार करना, तथा 
(3) ज्ञान का विकास करना ।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

(1) ज्ञान को संचित करना

     प्रथम पक्ष ज्ञान को संचित करना है छापने की मशीनों से पूर्व अधिकांश ज्ञान कंठस्थ ही किया जाता था और यह ज्ञान गुरू शिष्यों को प्रदान करते थे। परन्तु मशीनों के प्रयोग से ज्ञान को पुस्तक के यप में पुस्तकालयों में संचित किया जाने लगा। इतना ही नहीं टेपरिकार्डर, फिल्म आदि के प्रयोग में शिक्षक को समस्त रूप में (भाषा-शैली, पाठ्यवस्तु तथा उनके हाव-भाव आदि) संचित कर लेते हैं। शिक्षा-तकनीकी का अर्थ है शिक्षा का विस्तार करना। इस प्रकार शिक्षा-तकनीकी की सहायता से प्रभावशाली, शिक्षकों को मौलिक रूप से संचित किया जा सकता है। और उनके जीवन काल के बाद में भी नई पीढी उनसे शिक्षा ग्रहण कर सकती है, उन्हें देख सकती हैं, तथा सुन सकती है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

(2) ज्ञान का प्रसार करना

 मानवीय ज्ञान का द्वितीय पक्ष प्रसार करना है शिक्षक अपने शिष्यों को संचित किये गये ज्ञान को प्रदान करता है। एक शिक्ष सीमित छात्रों को अपने ज्ञान से लाभान्वित करा सकता है। परन्तु माइक, रेडियों, दूरदर्शन के प्रयोग से वह असंख्य छात्रों को अपना ज्ञान प्रदान कर सकता है। शिक्षा-तकनीकी के परिणामस्वरूप शिक्षा प्रक्रिया बदल चुकी है। अब तक छात्र विद्यालयों में तप अध्यापकों के यहाँ जाया करते थे परन्तु अब अध्यापक छात्रों के यहाँ रहा है। उदाहरण- स्वरूप अध्यापक रेडियों अथवा टेलीविजन पर अभिभाषण करता है तो देश तथा संसार का प्रत्येक छात्र अपने रेडियों पर उसका भाषा सुन सकता है। और उसका पूरा लाभ उठा सकता है। पत्राचार - पाठ्यक्रम खुले विश्वविद्यालय इसी की देन हैं। ज्ञान के प्रसार में व्यक्तिगत मित्रता की समस्या अतीतकाल से रही है। शिक्षा तकनीकी ने भाषा प्रयोगशाला, कम्प्यूटर पर आधारित अनुदेशन तथा शिक्षण मशीनों के प्रयोग से सभी छात्रों को अपने ढंग से सीखने का अवसर प्रदान किया है। इस प्रकार छात्रों की व्यक्तिगत मित्रता की समस्या का समाधान हो सका है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

(3) ज्ञान का विकास करना

मानव ज्ञान का तृतीय पक्ष है, ज्ञान में वृद्धि करना। शोध कार्यों के द्वारा ज्ञान में वृद्धि की जाती है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक शोध कार्यों की अधिक महत्व दिया जाता है। शोध कार्य में प्रदत्तों का संकलन करना तथा विश्लेषण करना प्रमुख कार्य है। इसके लिये कम्प्यूटर इलैक्ट्रॉनिक कैल्कुलेटर तथा बिजली की मशीनों का प्रयोग किया जाता है। शोध कार्य को कम्प्यूटर के प्रयोग ने अधिक सुगम बना दिया है। इस प्रकार शिक्षा के सभी पक्षों में मशीनों का प्रयोग किया जाने लगा है। जिससे शिक्षा प्रक्रिया का यन्त्रिकरण हुआ है। इसे हार्डवेयर तकनीकी कहा जाता है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा-तकनीकी का विकास

(Development of Educational Technology)

    शिक्षण में तकनीकी का उपयोग सर्वप्रथम (1926) में अमेरिका में सिडनी प्रेस्से ने ओहियों राज्य विश्वविद्यालय में शिक्षण मशीन के निर्माण द्वारा आरम्भ किया। यह मशीन एक शिक्षण युक्ति के रूप में जाँच हेतु तैयार की गई थी। इसके पश्चात (1930-40 ) के लगभग सम्सडेन तथा ग्लेसर आदि तकनीकी वेत्ताओं ने शिक्षण के यात्रीकरण करने का प्रयत्न किया। यह कार्य कुछ विशेष प्रकार की पुस्तकों कार्डो व बोर्डो के रूप में प्रस्तुत किया गया था। किन्तु शिक्षा तकनीकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य का श्रीगणेश सन् (1954) के लगभग श्री बी0 एफ० स्किनर के द्वारा किये गये प्रयोगों के फलस्वरूप हुआ। उसने जानवरों पर किये गये परीक्षणों का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में सीखने के लिये किया और इस प्रकार अभिक्रमित अधिगम का विकास हुआ जोकि शिक्षा-तकनीकी का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। इसी के अनुरूप श्री ब्राइनमोर ने इंगलैण्ड में सर्वप्रथम प्रयोग किया। इसके पश्चात् औद्योगिक क्रान्ति तथा अन्य क्षेत्रों में प्रगति के फलस्वरूप शिक्षा शास्त्रियों ने इसकी विसतार से व्याख्या की। अतः 1950 के बाद शैक्षिक-तकनीकी का विशेष रूप से विकास हुआ और शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान पर आधारित इस प्रत्यय का एक नवीन क्षेत्र विकसित होना आरम्भ हुआ ।

    अमेरिका तथा रूस  की औद्योगिक उन्नति के कारण अन्य देशों में भी शिक्षा-तकनीकी के क्षेत्र में 1960 के पश्चात् विशेष प्रगति हुई है। इस समय में अनेक प्रकार की तकनीकियों का जन्म हुआ जिनका प्रयोग सुरक्षा, उद्योग, वाणिज्य, स्वास्थ्य तक शिक्षा के क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से किया जाने लगा। यह सब दृश्य-श्रव्य साधनों, रेडियों, दूरदर्शन प्रोजेक्टर, टेपरिकॉर्डर, कम्प्यूटर तथा प्रणाली विश्लेषण आदि तकनीकी आविष्कारों से सम्भव हुआ। इन सब का प्रभाव शिक्षा पर भी पड़ और शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक-तकनीकी, व्यवहार तकनीकी तथा शिक्षा-तकनीकी आदि के क्षेत्र में शोध कार्यों के फलस्वरूप अनेक शिक्षण सिद्धान्तों, प्रतिमानों व डिजाइनों पका प्रतिपादन अमेरिकी तथा अन्य विकसित देशों में किया गया।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ
    सन् 1966 से अमेरिका में विश्वविद्यालयों के शिक्षा मनोविज्ञान एवं विज्ञान विभागों द्वारा शिक्षा-तकनीकी की एक राष्ट्रीय परिषद् की स्थापना की गई तथा बन्द सरकिट टेलीविजन व अन्य दृश्य-श्रव्य सामग्री का उपयोग किया गया। इस क्षेत्र में भाषा प्रयोगशाला की स्थापना शिक्षा-तकनीकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान था इसी प्रकार इलैक्ट्रॉनिक वीडियों टेप भी शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में एक नवीनतक प्रयोग माना जाता है। 1969 में कई अन्य वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में विकास के लिये सतत् प्रयत्न किये और सुरक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार व वाणिज्य आदि क्षेत्रों। में प्रशासन व इन्जीनियरिंग के विकास हेतु महत्वपूर्ण कार्य किये। चीनी तकनीकी. कागज तकनीकी तथा कपड़ा तकनीकी आदि अनेक प्रकार की तकनीकियों की खोज, शोध व विकास के द्वारा सम्भव हुई।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ
    व्यवहार तकनीकी के क्षेत्र में एमिडोन, फ्लैंडर्स तथा स्मिथ आदि शिक्षा शास्त्रियों ने अमेरिका में कक्षा शिक्षण अन्तः क्रिया (Interaction) को संख्यात्मक उपागम से शिक्षा के शाब्दिक (verbal) तथा अशाब्दिक व सांकेतिक कक्षा व्यवहार को मापने की खोज की और कई निरीक्षण विधियों का निर्माण किया जिनके द्वारा छात्र व अध्यापक के व्यवहार में अपेक्षित परितर्वन लाना सम्भव हो सका। इस प्रकार शिक्षा - तकनीकी का आरम्भ अमेरिका तथा रूस में हुआ है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ
    भारतवर्ष में विज्ञान तथा तकनीकी का उपयोग सर्वप्रथम सेना व सुरक्षा कार्यो के लिये किया गया। बाद में उसका क्षेत्र उद्योग, प्रबन्ध, स्वस्थ्य, व्यापार तथा शिक्षा हो गये। 1966 में भारत में सर्वप्रथम एक भारतीय अभिक्रमित अनुदेशन संगठन की [ स्थापना की गई जिसके माध्यम से शिक्षा तकनीकी के विकास के प्रयास विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में किये गये। सन् 1970 के लगभग तकनीकी के माध्यम से शिक्षा । के क्षेत्र में विशेष रूप से प्रयत्न किये गये और राष्ट्रीय अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद् तथा उच्च शिक्षा संस्थान, बड़ौदा, मेरठ व शिमला विश्वविद्यालयों व शिक्षा विभागों में । एम० एड० तथा पी-एच० डी० स्तर पर शोध कार्यों को बढ़ावा दिया गया। इसमें | अभिक्रमित अनुदेशन तथा शिक्षण तकनीकी के क्षेत्र में विशेष प्रगति सम्भव हुई । व्यवहार परिवर्तन के क्षेत्र में भी कुछ शोध कार्य सम्पन्न किये गये । राष्ट्रीय अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद् के अन्तर्गत एक शिक्षा तकनीकी केन्द्र स्थापित किया गया है। इस केन्द्र का कार्य शिक्षण- तकनीकी के ज्ञान का प्रसार करना तथा कार्यों द्वारा शिक्षण प्रक्रिया का विकास करना तथा प्रभावशाली बनाना है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ
    शिक्षा - तकनीकी की अनेक परिभाषायें दी गई हैं। परन्तु सभी में कुछ तत्व समान रूप से सम्मिलित किये गये हैं। शिक्षा तकनीकी के अर्थ को समझाने के लिये उनकी अवधारणाओं को समझना आवश्यक है। इन अवधारणाओं का वर्णन निम्न प्रकार किया गया है।

शिक्षा तकनीकी की बुनियादी अवधारणायें

(Basic Assumptions of Educational technology)

    शिक्षा तकनीकी की परिभाषा प्रस्तुत करने से पहले उसकी बुनियादी अवधारणाओं का उल्लेख करना आवश्यक होता है। मुख्य अवधारणायें अधोलिखित है-

(1) मनुष्य व्यवहार को समझने के लिये सम्प्रेषण ( Communication) का विषय-क्षेत्र जानना अत्यन्त आवश्यक है। वास्तव में मनुष्य सम्प्रेषण विधि की जैविकीय प्रणाली है।

(2) मनुष्य जब अपने सम्प्रेषण के विस्तार के लिये अपनी जैविकीय प्रणाली से मित्र बाहरी अन्य तत्वों या भौतिक वस्तुओं जैसे- दूरदर्शन, रेडियों, फिल्म, टेपरिकॉर्डर, कम्प्यूटर, लेसर किरणों, स्पूतनिक या अन्य युक्तियों आदि का उपयोग करता है। तब इन युक्तियों को 'सम्प्रेषण-माध्यम के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस प्रकार के माध्यम को प्रसारण माध्यम एवं व्यक्ति का विस्तार के रूप में जाना जाता है।

(3) यह अधिक नये इलैक्ट्रॉनिक माध्यम बुनियादी शिक्षा समस्याओं के समाधान  के लिये उपयोगी सिद्ध हुये हैं और इन्हें समस्याओं के लिये सभी का उपचार समझा जाता हैं | परन्तु इनके प्रयोग के फलस्वरूप जहाँ समस्याओं का समाधान होता है। वहाँ अन्य  समस्याओं का जन्म भी हो रहा है। अतएव यह तात्कालिक आवश्यकता कि इन नये शिक्षा  सम्प्रेषण के माध्यमों तथा विधियों का नियोजन, कार्यान्वयन, विश्लेषण और मूल्यांकन स ढंग से किया जाना है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा तकनीकी की परिभाषायें

(Definitions of Educational Technology)

    शिक्षा तकनीकी का अर्थ शिक्षा मशीन तथा अभिक्रमित अनुदेशन से ही लगते हैं। अन्य लोगों की धारणा है कि उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखना और उनकी प्राप्ति के लिये दृश्य-श्रवय सहायक सामग्री के प्रयोग करने को शिक्षा - तकनीकी कहते है। इस प्रकार शिक्षा तकनीकी की अनेक परिभाषायें दी गई हैं, उनके विश्लेषण से शिक्षा तकनीकी का अर्थ स्पष्ट किया जा सकता है। प्रमुख परिभाषायें निम्नलिखित हैं-

(1) 'लेथ महोदय ने 'शिक्षा तकनीकी की व्यापक परिभाषा दी है। उनके अनुसार-

"अधिगम तथा अधिगम की परिस्थितियों के वैज्ञानिक ज्ञान का प्रयोग जब शिक्षा तथा प्रशिक्षण के सुधारने तथा प्रभावशाली बनाने में किया जाता है, तब उ शिक्षा तकनीकी कहते हैं।*

"Educational Technology is the application of scientific knowledg about learning and the conditions of learning to improve the effectiveness teaching and training."

-G.O.M. Leit

(2) मैथिस शिक्षा तकनीकी उन क्रमबद्ध विधियो के विकास को तथा उस व्यावहारिक ज्ञान को कहते हैं जिनका उपयोग विद्यालय में शैक्षिक योजना, प्रक्रिया तथा प्रशिक्षण में किया जाता है।*

"Educational Technologuy refers to the development of a set of systematic methods practical knowledge for designing operating and testin in schools."

- B. C. Math

(3) रिचमण्ड- "शिक्षा तकनीकी सीखने की उन परिस्थितियों की समुचित व्यवस्था के प्रस्तुत करने से सम्बन्धित है जो शिक्षा एवं परीक्षण के लक्ष्यों को ध्या में रखकर अनुदेशन को सीखने का उत्तम साधन बनाती है।"

"Educational Technology is concerned to provide appropriately designing learning situations which holding in view the objectives of the teaching or training bring to bear the best means of instruction."

(4) कौक्स - मानव के सीखने की परिस्थितियों में वैज्ञानिक प्रक्रिया के प्रयोग को शैक्षिक तकनीकी अथवा अनुदेशन तकनीकी कहते हैं।"

"Educational Technology is the application of scientific-process to man's learning conditions what has come recently to be called Educational or Instructional Technology. "

- Robert A. Cox.

(5) तक्शी सेकमाटो- "शिक्षा तकनीकी को व्यवाहारिक अथवा प्रयोगात्मक अध्ययन माना जाता है जो शैक्षिक उद्देश्यों, पाठ्यवस्तु विधियों, शिक्षण सामग्री, वातावरण छात्रों का व्यवहार, अनुदेशन का व्यवहार तथा उनके पास्परिक सम्बनध को अधिक प्रभावशाली बनाता है।" इस परिभाषा के अन्तर्गत शैक्षिक तकनीकी के पक्षों का विस्तार में उल्लेख किया है। जिससे उसका क्षेत्र स्पष्ट हो जाता है ।

"Educational technology is an application of partical study which aims at maximising educational effect by controlling such relavant facts as eduicational purposes, educational content teching materiasl, educational methods, educational environment, conduct of students. behaviour of instructors and interrelations between students and instructors."

-Takshi Sakamato (1971)

( 6 ) हेडिन - शिक्षा तकनीकी, शैक्षिक सिद्धान्त एवं व्यवहार की वह शाखा है जो मुख्यतः सूचनाओं के उपयोग एवं योजनाओं से सम्बन्धित होती है और जो सीखने की प्रक्रिया पर नियन्त्रण रखती है । "

"Educational technology is that branch of educational theory and practice concerned primarily with the design and use of meassages which controll the learning process."

रॉबर्ट एम0 गेने- “शिक्षा - तकनीकी से तात्पर्य है कि व्यावहारिक ज्ञान की सहायता से सुनियोजित प्रविधियों का विकास करना, जिससे विद्यालयों की शैक्षिक प्रणाली के परीक्षण तथा शिक्षा कार्य की व्यवस्था की जा सके।"

"Edcuational technology can be understood as meaning the development of a set of systematic techniques, and accompanying parctical knowledge for designing, testing and operating schools as educational system." -Robert M. Gagne.

आई0 के डेवीज- "शिक्षा - तकनीकी का सम्बन्ध शिक्षा तथा प्रशिक्षण की समस्याओं से होता है। और अधिगम स्रोतों की व्यवस्था में क्रमबद्ध आयाम का अनुसरण किया जाता है।

"Educational technology is concerned with very problems in an education and training context, and it is characterised by the disciplined and systematic approach to the organization of resources for learning.

-I.K. Davies

(7) भारतीय शिक्षाविद् श्री एस० एस० कुलकर्णी ने भी शैक्षिक तकनीकी की परिभाषा प्रस्तुत की है वह इस प्रकार है-

"Educational Technology may be defined as the application of the laws as well as recent discoveries of Science and Technology to the process of Educational. "

S.S. Kulkarni. 

एस० के० मित्रा- शिक्षा-तकनीकी को उन पद्धतियों तथा प्रविधियों का विज्ञान माना जा सकता है जिसके द्वारा शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।

"Educational Technology can be concerved as a science of techniques and methods by which educational goals could be realized." - S. K. Mittra. 

    शिक्षा तकनीकी में अदा, प्रदा तथा प्रक्रिया शिक्षा के तीन पक्ष होते हैं। इसके अन्तर्गत उद्देश्यों के प्रतिपादन, शिक्षा-विधियों तथा मूल्यांकन विधियों के विकास पर अधिक बल दिया जाता है।

"Educational Technology consists of three aspects of education input. process and output. It stresses on the formulation of objectives and developing appropriate strategies of teaching and devices of evaluation.

इन परिभाषाओं का अध्ययन कराने से स्पष्ट होता है। कि शैक्षिक तकनीकी के अन्तर्गत अधोलिखत प्रत्यय सम्मिलित किये जाते हैं-

(1) शिक्षा तकनीकी में शिक्षा एवं प्रशिक्षण के व्यवाहारिक-पक्ष को महत्व दिया जाता है। वैज्ञानिक ज्ञान का शिक्षण तथा प्रशिक्षण में प्रयोग किया जाता है।

(2) मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा अन्य नियमों का शिक्षण में प्रयोग करना जिससे शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके।

(3) शिक्षा-तकनीकी में प्रणाली आयाम को प्रधानता दी जाती है। जिसमें सुनियोजित पद्धतियों तथा प्रविधियों का विकास किया जा सके ! 

(4) अधिगम के स्वरूपों तथा स्रोतों को अधिक महत्व दिया जाता है। 

(5) शिक्षा-तकनीकी में शिक्षण, प्रशिक्षण तथा अधिगम को प्रभावशाली बनाने के लिये व्यावहारिक ज्ञान की सहायता से प्रभावशाली पद्धतियों तथा प्रविधियों का विकास किया जाता है।

(6) कक्षा शिक्षण में सीखने के वैज्ञानिक ज्ञान का प्रयोग शिक्षा-तकनीकी कहलाता है, जिससे सीखने की अवस्थाओं में सुधार किया जा सकता है तथा शिक्षण एवं प्रशिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा तकनीकी के रूप

(Types of Educational Technology)

    सामान्यतः शिक्षा तकनीकी को लुम्सडेन ने तीन रूपों में विभाजित किया है। इन तीन रूपों में महत्वपूर्ण अन्तर है। इन विभिन्न रूपों को समझना आवश्यक है। शिक्षा-तकनीकी को निम्नांकित तीन रूपों में बांटा जा सकता है-

(1) शिक्षा - तकनीकी प्रथम ( Educational Technology-1) 
(2) शिक्षा - तकनीकी द्वितीय (Educational Technology-2)
(3) शिक्षा-तकनीकी तृतीय (Educational Technology-3) 
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा-तकनीकी प्रथम हार्डवेयर आयाम

(Hardware Approach or Educational Technology-1)

इस तकनीकी को हार्डवेयर आयाम तथा दृश्य-श्रव्य कहते हैं। इसका आविर्भाव भौतिक विज्ञान तथा अभियन्त्रण तकनीकी से हुआ है। शिक्षण में अभियन्त्रण की मशीनों के प्रयोग को ही शिक्षा तकनीकी प्रथम कहते हैं। तकनीकी की मशीनों का प्रयोगब शिक्षण व सीखने की क्रियाओं को प्रभावशाली बनाने के लिये किया जाता है जिससे शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति अधिकतम रूप में की जा सके। शिक्षण- मशीन ही एकमात्र यंत्रिक सहायक सामग्री है जिसका अविष्कार शिक्षण के लिये विशिष्ट रूप से किया गया है। सामान्यतः शिक्षण, प्रशिक्षण से सम्बन्धित अन्य दृश्य-श्रव्य सहायक सामग्री जैसे रेडियो, टेलीविजन, टेपरिकॉर्डर ग्रामोफोन तथा भाषा प्रयोगशाला आदि का आविष्कार और निर्माण शिक्षण में प्रयोग की अपेक्षा व्यापार के लिये अआ है। इस प्रकार शिक्षण की प्रक्रिया में मशीनों के प्रयोग से शिक्षा की प्रक्रिया का यन्त्रिकरण हुआ है। जिसे शिक्षा तकनीकी प्रथम अथवा हार्डवेयर आयाम कहते है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा-तकनीकी द्वितीय या साफ्टवेयर आयाम

(Software Approach or Education Technology-2)


    इस शिक्षा - तकनीकी को सोफ्टवेयर आयाम अथवा अनुदेशन तकनीकी, शिक्षण तकनीकी तथा व्यवहार तकनीकी भी कहते हैं। इसमें अभियन्त्रण की मशीनों का प्रयोग न करके शिक्षण सीखने के सिद्धान्तों का प्रयोग बालकों में अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाने के लिये किया जाता है। मशीनों का प्रयोग विशिष्ट रूप से पाठ्यगक्रवसतु के प्रस्तुतीकरण को प्रभावशी बनानके के लिये होता है। जबकि इस तकनीकी का सम्बन्ध शिक्षा के सिद्धान्तों, उद्देश्यों के व्यवहारिक रूप में लिखने, शिक्षण प्रविधियों, अनुदेशन प्रणाली के पुनर्बलन, पृष्ठ पोषण की उक्तियों तथा मूल्यांकन से होता है। इस प्रकार तकनीकी में अदा, प्रक्रिया तथा प्रदा तीनों पक्षों के विकास पर बल दिया जाता है।

    इन दोनों शिक्षा- तकनीकियों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है परन्तु प्रथम का तात्पर्य शिक्षा में मशीनों के प्रयोग से है जबकि द्वितीय का तात्पर्य सीखने तथा शिक्षण के सिद्धान्तों के आयामों से है ।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा-तकनीकी तृतीय या प्रणाली विश्लेषण

(Systems Analysis or Educational Technology-3)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक नवीन प्रबन्ध तकनीकी का विकास हुआ हैं जिसने प्रबन्ध, प्रशासन, व्यापार, उद्योग तथा सेना सम्बन्धी समस्याओं के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिये वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है। इस विचारधारा को शिक्षा तकनीकी तृतीय या प्रणाली विश्लेषण कहते हैं इसके अतिरिक्त इसे शैक्षिक प्रबन्ध से सम्बोधित करते हैं परन्तु प्रणाली - विश्लेषण सबसे अधिक उपयुक्त नाम है। गत वर्षो से शैक्षिक प्रशासन में इस तकनीकी को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इसके अन्तर्गत शैक्षिक प्रशासन एवं प्रबन्ध की समस्याओं का अध्ययन वैज्ञानिक तथा परिमाणात्मक ढंग से प्रदत्तों एवं प्रमाणों के आधार पर किया जाता हैं इस प्रकार जो तकनीकी शैक्षिक प्रशासन के विकास एवं परिपक्वता में तथा अनुदेशन की रूप-रेखा के निर्माण में अपना योगदान देता है उसे तकनीकी तृतीय कहते हैं ।

    यह प्रणाली विश्लेषण गणित पर आधारित है। इस तकनीकी ने शैक्षिक प्रशासन तथा प्रबन्ध को एक वैज्ञानिक तथ संख्यात्मक आयाम प्रदान किया है। जो अधिक वस्तुनिष्ठ, क्रमबद्ध तथा शुद्ध माना जाता है। इसकी सहायता से शिक्षा प्रणाली की समस्याओं का चयन किया जाता है और वैज्ञानिक विधियों की सहायता से उनका समाधान खोजा जाता है। इस तकनीकी के प्रयोग से शैक्षिक प्रणाली, शैक्षिक प्रशासन तथा प्रबन्ध को प्रभावशी एवं कम खचीला बना सकते है। आज कल इसे प्रशासन के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण समझा जाता हैं।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा-अधिगम तथा शिक्षा-तकनीकी

(Teaching - learning and Educational Technology)

शिक्षा प्रक्रिया पक्ष है-शिक्षण तथा अधिगम । मनोविज्ञान का सम्बन्ध अधिगम से होता है। और शिक्षा शास्त्र का सम्बन्ध शिक्षण से होता है। इस प्रकार मौलिक प्रश्न यह है कि शिक्षा तकनीकी का सम्बन्ध किस पक्षा से है जबकि दोनों की प्रकृति बिल्कुल भिन्न है-

(1) शिक्षण एक कला है। (Teaching is an Art )

(2) अधिगम एक विज्ञान है (Learning is a Science )

शिक्षा तकनीकी का प्रमुख कार्य-शिक्षाको कला तथा अधिगम के बिना दोनों पक्षों में मध्यस्थता करना है। शिक्षा तकनीकी कला तथा विज्ञान में समन्वय स्थापत करती है। बालकों के व्यवहार परिवर्तन में पुनर्बलन का विशेष महत्व है। बी० एफ० स्किनर का कथन है कि अधिकतम अधिगम के लिये कोई भी शिक्षक पुनर्बलन की अपेक्षित आवृति प्रदान नहीं कर सकता है। इसके लिये शिक्षक को शिक्षा मशीन की सहायता लेनी पड़ती हैं स्किनर भी इस विचार से सहमत है कि शिक्षण तकनीकी का र्का अधिगम तथा शिक्षा में समन्वय स्थापित करना है ।

    यदि शिक्षा तकनीकी शिक्षण की कला और अधिगम के विज्ञान में समन्वय स्थापित करती है, तब यह भी कहा जा सकता है कि शिक्षा का आधार वैज्ञानिक भी है। शिक्षण का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता हैं सिल्वर मेन (1968) ने इस विचारधारा को रचनात्मक शिक्षा तकनीकी की संज्ञा दी है। इसका सम्बन्ध मौलिक शैक्षिक प्रयोगों से होता है। इसके अनतर्गत अधोलिखित तीन काय्र सम्मिलित किये जाते हैं-

(1) अनुदेशन की समस्याओं का विश्लेषण करना ।
(2) अनुदेशन के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये प्रविधियों का चयन करना । 
(3) अनुदेशन के परिणामों के मूल्यांकन के लिच परीक्षा की रचना करना । 

    रचनात्मक शिक्षा तकनीकी में साधनों की अपेक्षा उद्देश्यों को महत्व दिया जाता है। इसके अन्तर्गत विश्लेषण, चयन तथा रचना पर अधिक बल दिया जाता है जिसकी सहायता से अधिकतम शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सके। इन कार्यों के लिये शिक्षक अपनी मौलिकता तथा सर्जनात्मक क्षमताओं का प्रयोग करता है।

    रचनात्मक शिक्षा तकनीकी का अभी पूर्ण रूप से विकास नहीं हो सका है। यह क्षेत्र है जो अधिगम के विज्ञान और शिक्षण की समस्याओं में समन्वय स्थापित करता है।

    सिल्वर मेन (1968) ने द्वितीय विचार से शिक्षा तकनीकी को सापेक्षिक शिक्षा तकनीकी कहा है इसका सम्बन्ध अन्य अनुशासनों तथा तकनीकी को शिक्षण की विधियों तथा प्रविधियों में प्रयोग करना है। यह शिक्षा तकनीकी स्वयं कुछ विकसित नहीं करती है अपितु अन्य क्षेत्रों से लेकर शिक्षा की क्रियाओं में प्रयुक्त करती है। जिसे शिक्षा तकनीकी प्रथम अथवा हार्डवेयर आयाम कहते हैं। शिक्षा की समस्याओं के समाधान के लिये अन्य अनुशासनों के सिद्धान्तों को भी प्रयुक्त किया जाता हैं। इस प्रकार की सभी पाठ्य-वस्तु की सम्बन्धित शिक्षा तकनीकी' की संज्ञा दी जाती है । 
    शिक्षा तकनीकी की पाठ्य-वस्तु अन्य विषयों तथा अभियन्त्रण की तकनीकी से सम्बन्धित होती है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षण का वैज्ञानिक विश्लेषण

(Scientific Analysis of Teaching)

शिक्षा तकनीकी शिक्षण की कला और अधिगम के विज्ञान में समनवय स्थापित करती है। इसलिये शिक्षा तकनीकी को स्पष्ट करने के लिये शिक्षा का वैज्ञानिक विश्लेषण करना अधिक उपयुक्त होगा। वैज्ञानिक विश्लेषण की निम्न लिखित विशेषतायें होती हैं-

(1) शिक्षण का अध्ययन वस्तुनिष्ठ ढंग से किया जाता है।
(2) शिक्षण का अध्ययन व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप में किया जाता है। 
(3) शिक्षण के स्वरूप का ढाँचा उसके अवयवों सहित प्रस्तुत किया जाता है। 
(4) शिक्षण के निर्धारणों में कार्य और कारण के सम्बन्ध को स्थापित किया जाता है।
(5) शिक्षण-प्रक्रिया में सप्रयोजन होती है जिससे शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।

शिक्षा-प्रक्रिया में उक्त सभी विशेषताओं को उपलब्ध किया जा कसता है। शिक्षण प्रक्रिया हो दो मुख्य अवयवों में विभाजित किया जाता है-

(1) विषय-वस्तु (Content) और

( 2 ) सम्प्रेषण ( Communication) |

(1) विषय-वस्तु (Content ) - 

विषय-वस्तु छात्रों के सम्मुख दो प्रकार से प्रस्तुत की जा सकती हैं एक अध्यापक द्वारा दूसरे अभिक्रमित अनुदेशन द्वारा विषय-वस्तु का भी अपना स्वरूप होता है। एक ही विषय-वस्तु को शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर पढ़ाया जाता है। उदाहरण स्वरूप तुलसीदास जी के दोहे प्राथमिक स्तर से लेकर विश्विविद्यालय स्तर तक पढ़ायें जाते हैं। पाठ्य-वस्तु को तीन प्रमुख स्तरों पर प्रस्तुत किया जा सकता है-

(1) स्मृति स्तर (Memory level)

(2) बोध सतर ( Understanding level).

( 3 ) चिन्तन स्तर (Reflective level) |

पाठ्यक्रम वस्तु को इन स्तरों पर प्रस्तुत करने के लिये जो अनुदेशन की व्यवस्था की जाती है, इनके उद्देश्य अलग-अलग होते हैं। प्रस्तुतीकरण की प्रविधियाँ भिन्न होती हैं तथा मूल्यांकन - विधि भी अलग-अलग होती है। इस समस्त ज्ञान को अनुदेशनात्कक तकनीकी कहते हैं। अनुदेशन को जब अध्यापक द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। तब इसे शिक्षण तकनीकी कहते हैं। जब छात्र इन अनुदेशन द्वारा ही सीखता है तब इसे अभिक्रमित अनुदेशन कहते हैं।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

( 2 ) सम्प्रेषण (Communication)- 

शिक्षण प्रक्रिया का दूसरा अवयव सम्प्रेषण है। शिक्षक अपने शाब्दिक तथा अशाब्दिक व्यवहार से पाठ्य-वस्तु को प्रस्तुत करता । जिसे शिक्षक का कक्षा-व्यवहार कहा जाता है। कक्षा-व्यवहार को दो पक्षों विभाजित कर सकते हैं- 
(1) शाब्दिक व्यवहार तथा 
(2) अशाब्दिक व्यवहार। इन व्यवहारों को मापन वसतुनिष्ठ रूप से किया जा सकता है। इनके मापन के लिये बाईस से अधिक कक्षा निरीक्षण प्रविधियों का विकास हुआ है। कक्षा में तीन सेकिण्ड में होने वाली क्रिया का भी आलेख तैयार कर लिया जाता है। कक्षा व्यवहार के विशिष्ट अवयवों का निरीक्षण, विश्लेषण तथा व्याख्या की जा सकती है। इस समस्त ज्ञान को व्यवहार तकनीकी कहा जाता है।

शिक्षा के तीन पक्ष माने जाते हैं- पूर्व अन्तःप्रक्रिया, अन्तःप्रक्रिया तथा अन्तिम प्रक्रिया पूर्व अन्तःप्रक्रिया तथा अन्तिम प्रक्रिया क्रियाओं की प्रकृति वैज्ञानिक होती है और प्रक्रिया की क्रियाओं की प्रकृति कलात्मक होती है। इसका विस्तृत वर्णन अगले अध्यायों में किया गया है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा-तकनीकी का स्वरूप

(Aspects of Educational Technology)

शिक्षा तकनीकी के तीन मुख्य पक्ष होते हैं-अदा प्रदा तथा प्रक्रिया

(अ) अदा (Input)

जिसमें छात्र का आरम्भिक व्यवहार ज्ञात किया जाता है-

(1) छात्रों के पूर्व ज्ञान में उनकी क्षमतायें, निष्पत्ति तथा अभिप्रेरणा स्तर को सम्मिलित किया जाता है।
(2) छात्रों के अनुदेशन की भाषा की बोधगम्यता को स्तर होता है। 
(3) शिक्षण की योग्यता तथा शिक्षा प्रशिक्षण विधि के प्रयोग का कौशल होता है।
(4) शिक्षण सहायक सामग्री की उपलब्धि तथा उनको प्रयोग करने का कौशल भी होता है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

(ब) शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया (Teaching Learning Process)

(1) पाठ्य-वस्तु को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने की परिस्थिति उत्पन्न करना । 
(2) समुचित शिक्षण व्यूह रचना तथा युक्तियों का चयन करना जिससे अपेक्षित अधिगम स्वरूपों को उत्पन्न किया जा सके।
(3) समुचित शिक्षण सहायक सामग्री का चयन करके प्रभावशाली ढंग से प्रयुक्त किया जाय जिससे व्यवहार पिरवर्तन में सहायक हो सकता है। 
(4) समुचित सम्प्रेषण प्रविधियों का चयन करना जिससे पाठ्य-वस्तु को बोधगम्य बनाने में सुगमता हो सके।
(5) छात्रों को एकाग्रचित तथा क्रियाशील रखने के लिये अभिप्रेरणा की समुचित प्रविधियों प्रयुक्त करना ।
(6) छात्र- शिक्षक का सम्बन्ध भी अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करता है। 
(7) छात्रों के आपसी सम्बन्ध तथा विद्यालय का वातावरण भी अनुदेशन प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

स) प्रदा (Output)

इस पक्षा को अन्तिम वयवहार भी कहते हैं-

(1) अधिगम की पाठ्य-वस्तु की विशेषताओं के अनुसार मूल्यांकन करना। 
(2) पाठ्य-वस्तु से प्राप्त उद्देश्यों को स्पष्ट तथा उनका मापन करने के लिये समुचित परिस्थितियाँ उत्पन्न करना ।
(3) प्रस्तुत किये जाने वाले उद्दीपनों के विश्लेषण के आधार पर मापन की विधियों का चयन करना ।
(4) छात्रों की अपेक्षित अनुक्रियाओं की विशेषताओं के आधार पर मानदण्ड परीक्षा की रचना करना ।

इन तीनों पक्षों का विस्तृत रूप ही शिक्षा तकनीकी है। इन पक्षों की यावहारिकता पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षण की क्रियाओं तथा उसके स्वरूप को निर्धारत किया जाता है।

शिक्षा - तकनीकी के सोपान

(Steps of Educational Technology)

शैक्षिक - तकनीकी में अधोलिखित चार सोपानों का अनुसरण किया जाता है-

(1) प्रथम सोपान - इसके अन्तर्गत शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया का व्यावहारिक वैश्लेशण किया जाता है तथा उन सभी तत्वों का निर्धारण किया जाता है जो उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये शिक्षण के आरम्भ में आवश्यक है ।

(2) द्वितीय सोपान - इसके अन्तर्गत उन क्रियाओं एवं तत्वों को ज्ञात किया जाता है जो दूसरे तत्वों से सम्बनध स्थापित करने में सहायक होते हैं तथा शिक्षण क्रिया में तत्वों की पुर्नरावृत्ति को कम करते हैं।

(3) तृतीय सोपान - इसके अन्तर्गत शिक्षण में दिये गये प्रयासों के प्रभाव का मूल्यांकन किया जाता है कि शिक्षण की विभिन्न क्रियाओं तथा तत्वों का या परिणाम हुआ ?

(4) चतुर्थ तथा अन्तिम सोपान- इसमें सभी परिणामों को शोध कार्य के निष्कर्षों 5 रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो शिक्षकों के लिय निर्देशन का कार्य करते हैं।

शैक्षिक-तकनीकी के प्रयोग के द्वारा शिक्षण, सीखना तथा परीक्षण की क्रियाओं । विकास एवं वृद्धि की जा सकती है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा-तकनीकी के उद्देश्य

(Objectives of Educational Technology)

शैक्षिक-तकनीकी के प्रमुख छः उद्देश्य माने जाते हैं जिनका उल्लेख इस प्रकार है।

(1) शिक्षण के उद्देश्यों का प्रतिपादन करना तथा उन्हें व्यावहारिक रूप लिखना- उद्देश्यों के निर्धारण में समाज, राष्ट्र तथा भौगोलिक परिस्थितियों का यान में रखा जाता है। इन उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखा जाता है जिस शिक्षण तथा परीक्षण में सुगमता होती है।

(2) छात्रों के गुणों का विश्लेषण करना-शिक्षा-तकनीकी में छात्रों के क्षमताओं, निष्पत्तियों तथा कौशल का विश्लेषण किया जाता है, क्योंकि अपेक्षि व्यवहार परिवर्तन के लिये पूर्व-व्यवहार की पूर्ति होना आवश्यक समझा जाता है शिक्षण-व्यवस्था के सम्बन्ध में सही निर्णय लिया जा सकता है कि कहाँ तक उद्देश की प्राप्ति में सफलता रही है।

(3) पाठ्यवस्तु की व्यवस्था करना- पाठ्य-वस्तु का विश्लेषण उसके तल के रूप में किया जाता है और उन तत्वों की क्रमबद्ध रूप में व्यवस्था की जान है। इनसे मानदण्ड परीक्षा की रचना में सहायता मिलती है और प्रस्तुतीकरण सु हो जाता है।

(4) पाठ्यवस्तु की व्यवस्था करना इसके लिये समुचित शिक्षण आव्यूहों युक्तिय शिक्षण सहायक सामग्री तथा पुनर्बलन प्रविधियों का चयन किया जाता है जिसन निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके।

(5) छात्रों की उपलब्धियों का मूल्यांकन करना- निर्धारित उद्देश्यों की प्रापि कहाँ तक हो सकी है, इसके लिये मानदण्ड परीक्षा की रचना की जाती है तथा उस प्रयोग से शिक्षण के सम्बन्ध में निर्णय लिया जाता है। मूल्यांकन के आधार शिक्षण में सुधार किया जाता है।

(6) पुनर्बलन की प्रतिधियों का चयन करना-शिक्षण की प्रक्रिया को आ बढ़ाने के लिये समुचित पूनर्बलन की प्रविधियों का चयन करके प्रयोग किया जा है। शैक्षिक-तकनीकी में इन उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। 
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा तकनीकी के रूप

(Forms of Educational Technology):

वैज्ञानिक आविष्कारों तथा तकनीकियों के विकास ने मानव जीवन के स पक्षों को प्रभावित किया है। उद्योग, वाणिज्य, सुरक्षा तथा प्रशासन आदि में यान्त्रीकर बड़ी तेजी से हुआ है। शिक्षा प्रक्रिया भी इनसे अछूती नहीं रही है और शिक्षा सभी पक्षों को प्रभावित किया है। फलस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र में अनेकों तकनीकिय का विकास हुआ हैं। इन तकनीकियों के क्षेत्र में कोई कठोर सीमा नहीं है, इसलि इनको समझने में अधिक भ्रम रहता है। प्रमुख तकनीकियों के अर्थ धारणाओं त क्षेत्र का विवेचन किया गया है-
(1) शिक्षण-तकनीकी (Teaching Technology) |
(2) अनुदेशात्मक-तकनीकी ( Instructional Technology) । 
(3) व्यावहारिक-तकनीकी (Behavioural Technology ) ।
(4) अनुदेशात्मक - प्रारूप ( Instructional Designs) ।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

(1) शिक्षण - तकनीकी

(Teaching Technology)

    शिक्षाशास्त्र की प्रमुख सामाजिक तथा व्यावसायिक क्रिया शिक्षण है। शिक्षण एक विकास की प्रमुख प्रक्रिया है जो छात्र- शिक्षक के अन्तः क्रिया द्वारा सम्पन्न होती है। सामाजिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा अधिनियमों को शिक्षण प्रक्रिया में किन्हीं विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के प्रयोग को शिक्षण-तकनीकी कहते हैं। शिक्षण एक सोद्देश्य प्रक्रिया है जिसका अन्तिम लक्ष्य बालक का पूर्ण विकास करना है। यदि किन्हीं सिद्धान्तों को शिक्षण में प्रयोग किया जाये और अपेक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके तब उस पाठ्य-वस्तु को शिक्षण- तकनीकी की संज्ञा दी जाती है।

    शिक्षण को एक कला के साथ एक विज्ञान भी मानने लगे हैं क्योंकि शिक्षण प्रक्रिया का विश्लेषण वस्तुनिष्ठ रूप में किया जा सकता है। शिक्षण का आधार वैज्ञानिक भी है। आई0 के0 डेवीज, गेज, गेनें ब्रूनर तथा ग्लेसर ने महत्वपूर्ण योगदान किया । सिलवर मेन ने शिक्षण-तकनीकी को रचनात्मक शैक्षिक-तकनीकी संज्ञा दी है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

अवधारणायें (Assumptions ) शिक्षण - तकनीकी की पाठ्य-वस्तु निम्न लिखित अवधारणाओं पर आधारित है-



1 शिक्षण एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके मुख्य तत्व पाठ्य-वस्तु तथा सम्प्रेषण हैं।
2 अधिगम के स्वरूपों के लिये शिक्षण द्वारा समुचित परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं।
3 शिक्षण तथा अधिगम में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। 
4 शिक्षण की क्रियाओं में विकास तथा सुधार किया जा सकता है।
5. शिक्षण की क्रियाओं द्वारा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है।

पाठ्य-वस्तु (Content )

शिक्षण- तकनीकी की पाठ्य-वस्तु को डेवीज तथा रॉबर्ट ग्लेसर ने चार तत्वों में विभाजित किया है। डेवीज के चार तत्व शिक्षण-तकनीकी के स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं-

1. शिक्षण नियोजन (Planning of Teaching)- इसके अन्तर्गत पाठ्य-वस्तु विश्लेषण, शिक्षण- उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखने आदि की क्रियायें की जाती हैं।

2. शिक्षण व्यवस्था ( Organisation of Teaching ) - इसमें उद्देश्या की प्राप्ति के लिये समुचित शिक्षण-आव्यूहों (Strategies) तथा प्रविधियों चयन करना, अनुदेशन के नियमों का निर्धारण करना आदि क्रियायें सम्मिलित की जाती हैं।

3. शिक्षण का अग्रसरण (Leading of Teaching)- इस सोपान के अन्तर्गत समुचित सम्प्रेषण विधियों तथा अभिप्रेरणा की प्रविधियों का चयन करके प्रयोग करन जिससे अपेक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। छात्र तथा शिक्षक से समुचित सम्बर सम्बन स्थापित करना आदि क्रियायें सम्पादित की जाती हैं।

4. शिक्षण का नियन्त्रण ( Controlling of Teaching)- इसका तात्पर्य मूल्याकन से है कि कहाँ तक अधिगम उद्देश्य की प्राप्ति हो सकी है। इसके लिये शिक्षक मानदण्ड परीक्षा का निर्माण करता है। छात्र निष्पत्तियाँ शिक्षक तथा छात्रों को पुनर्बलन में प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त शिक्षण सिद्धान्त, शिक्षण प्रतिमान, शिक्षण स्तर शिक्षण व्यूह-रचनायें तथा युक्तियाँ शिक्षण तकनीकी की प्रमुख पाठ्य-वस्तु समझी जाती हैं।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षण तकनीकी की विशेषतायें

(Characteristics of Teaching Teachnology)

शिक्षण- तकनीकी की अधोलिखित विशेषतायें हैं-

(1) शिक्षण-तकनीकी में ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक तीनों प्रकार ) के उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।

(2) शिक्षण - तकनीकी में पाठ्य वस्तु के स्वरूप तथा सम्प्रेषण के स्वरूप में समन्वय स्थापित किया जाता है।

(3) शिक्षण-तकनीकी में दार्शनिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक) सिद्धान्तों तथा अधिनियमों का प्रयोग किया जाता है।

(4) शिक्षण तकनीकी में स्मृति-स्तर से चिन्तन स्तर के शिक्षण की व्यवस्था की जाती है।

(5) शिक्षण-तकनीकी द्वारा शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली तथा सार्थक ) बनया जा सकता है।

(6) शिक्षण तकनीकी में शिक्षण सिद्धान्तों के प्रतिपादन का प्रयास किया जाता है।

(7) शिक्षण-तकनीकी के अध्ययन से छात्राध्यापक तथा सेवारत अध्यापक अपने शिक्षण में विकास तथा परिवर्तन कर सकते हैं और उसे प्रभावशाली बना सकते हैं।

(8) शिक्षण तकनीकी का सम्बन्ध अदा (Input) प्रक्रिया (Process) तथा प्रदा (Output) तीनों पक्षों में होता है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

(2) अनुदेशात्मक-तकनीकी


मानव-अधिगम में अनुदेशन का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि अधिकाँश मानव का अधिगम अनुदेशन द्वारा ही होता है। शिक्षण में अनुदेशन निहित होता है। अनुदेशन से तात्पर्य उन क्रियाओं से होता है जो अधिगम में सुविधा प्रदान करती है परन्तु छात्र तथा शिक्षक के मध्य अन्त क्रिया आवश्यक नहीं होती है।

अनुदेशनात्मक-तकनीकी से तात्पर्य उन विधियों तथा प्रविधियों की व्यवस्था से होता है जिनकी सहायता से सुनिश्चित अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। मनोवैज्ञानिक, सामाजिक तथा वैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा अधिनियमों को अनुदेशन में प्रयोग करके विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने की अनुदेशनात्मक-तकनीकी कहते हैं। बी0एफ0 स्किनर, रॉबर्ट ग्लेसर, नार्मन ए० क्राउडर तथा गिलबर्ट आदि का अनुदेशनात्मक तकनीकी में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अनुदेशनात्मक तकनीकी का मूल स्त्रोत मनोविज्ञान है। इसका प्रमुख उदाहरण अभिक्रमित अनुदेशन ( Programmod Instruction) है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

अवधारणायें (Assumptions ) – 

अनुदेशनात्मक तकनीकी का प्रत्यय अधोलिखित अवधारणाओं पर आधारित है-

1. पाठ्य-वस्तु को छोटे-छोटे तत्वों में विभाजित किया जा सकता है, तथा प्रत्येक का प्रस्तुतीकरण स्वतन्त्र रूप में किया जा सकता | 
2. पाठ्य-वस्तु के तत्वों की सहायता से समुचित अधिगम परिस्थितियाँ उत्पन्न की जा सकती है। अधिगम के विशिष्ट स्वरूप को भी उत्पन्न किया जा सकता है।
3. अनुदेशन की सहायता से छात्रों को अधिगम के लिये समुचित पुनर्बलन प्रदान किया जा सकता है।
4. अनुदेशन के द्वारा छात्रों को अपनी व्यक्तिगत भिन्नताओं के अनुसार सीखने का अवसर दिया जा सकता है।
5. अनुदेशनात्मक-तकनीकी की विधियों तथा प्रविधियों की सहायता से अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है।
6. शिक्षक की बिना उपस्थिति के भी छात्र स्वंय अध्यापन से भी सीख सकते हैं।

पाठ्य वस्तु (Content )

इस तकनीकी के अन्तर्गत कक्षा में अथवा कक्षा के बाहर पाठ्य-वस्तु को प्रस्तुत करने की व्यवस्था को सम्मिलित किया जाता है। अभिक्रमित- अनुदेशन के अध्ययन से छात्र स्वंय ही सीखते हैं। शिक्षण एक अनुदेशन है परन्तु अनुदेशन एक शिक्षण नहीं है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित पाठ्य वस्तु सम्मिलित की जाती है-
(1) अनुदेशनात्मक - तकनीकी का अर्थ तथा आविर्भाव, 
(2) अभिक्रमित अनुदेशन की परिभाषा तथा अधिनियम, 
(3) श्रृंखला-अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ, अवधारणायें, अधिनियम तथा स्वरू 
(4) शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ, अवधारणायें, अधिनियम त के स्वरूप,
( 5 ) मेथटीकल - अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ, अवधारणायें, अधिनियम तथ से स्वरूप,
( 6 ) कम्प्यूटर की सहायता द्वारा अनुदेशन
(7) अभिक्रमित - अनुदेशन की रचना
(अ) नियोजन करना ।
(ब) अनुदेशन लिखना ।
(स) मूल्यांकन करना ।
( 8 ) व्यक्तिगत भिन्नता के लिये समायोजन प्रविधियाँ,
( 9 ) नियम उदाहरण प्रणाली,
( 10 ) उभारक तथा अनुबोधक |

    इसके अतिरिक्त अनुदेशन के सिद्धान्त तथा अधिनियमों को भी सम्मिलि किया जाता है। अनुदेशनात्मक - तकनीकी में सक्रिय अनुबद्ध अनुक्रिया तथा पुनर्बत की प्रविधियों को भी सम्मिलित किया जाता है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

अनुदेशनात्मक-तकनीकी की विशेषतायें

(Charactersticis of Instructional Technology)

अनुदेशनात्मक - तकनीकी की निम्नलिखित विशेषतायें हैं-

(1) इस तकनीकी द्वारा ज्ञानात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है। 
(2) इसमें छात्रों को उनकी व्यक्तिगत भिन्नताओं के अनुसार सीखने अवसर दिया जाता है।
(3) छात्रों को सही अनुक्रियाओं की पुष्टि द्वारा निरन्तर पुनर्बलन दिया जाता
(4) अनुदेशनात्मक - शिक्षण तकनीकी मनोवैज्ञानिक तथा अधिगम के सिद्धा पर आधारित है। इसका मुख्य आधार वैज्ञानिक है, क्योंकि इसमें प पोषण प्रविधि को प्राथमिकता दी जाती है।
(5) अनुदेशनात्मक - तकनीकी के क्षेत्र में प्रयोगों तथा शोध कार्यों की सहाय से अनुदेशनात्मक - सिद्धान्तों का विकास किया जा सकता है।
(6) अनुदेशनात्मक-तकनीकी में पाठ्य-वस्तु के स्वरूप का विश्लेषण गहन से किया जाता है जिससे छात्राध्यापकों तथा शिक्षकों में पाठ्य-वस्तु प्रति सूझ का विकास होता है। शिक्षण का प्रस्तुतीकरण भी प्रभावशा हो जाता है।
(7) यह तकनीकी योग्य शिक्षकों के अभाव की पूर्ति कर सकती है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

(3) व्यावहारिक-तकनीकी (Behavioural Technology)

मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान कहते हैं, साधारणतः मनोवैज्ञानिक जीवों के व्यवहारों की प्रकृति तथा स्वरूप का अध्ययन करते हैं। अधिगम का तात्पर्य भी व्यवहार परिवर्तन से होता है। शिक्षा की समस्त प्रक्रियायें अपेक्षित व्यवहार परिवर्तनों से सम्बन्धित होती है। मनोविज्ञान में मानव के सभी प्रकार के व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है।

इस प्रकार व्यावहारिक तकनीकी का क्षेत्र शैक्षिक-तकनीकी से कहीं अधिक व्यापक है। इसमें कई तकनीकियों-औद्योगिक, सुरक्षा, वाणिज्य, सम्प्रेषण, प्रशासन, स्वास्थ्य, अभिप्रेरणा, प्रशिक्षण, शिक्षा, शिक्षण, अनुदेशन आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। इन सभी का सम्बन्ध विशिष्ट मानव-व्यवहारों से है। बी०एफ० स्किनर ने भी अपनी पुस्तक में व्यावहारिक- तकनीकी का उल्लेख किया है। शिक्षण तथा अनुदेशन की क्रियाओं का मुख्य लक्ष्य छात्रों में अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाना है जिससे निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। इस विचार से उपरोक्त दोनों तकनीकी व्यावहारिक तकनीकी के ही रूप हैं परन्तु यहां व्यावहारिक तकनीकी को एक विशिष्ट संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है। शिक्षक-व्यवहार के सुधार एवं परिवर्तन में प्रयोग ज्ञान को व्यावहारिक तकनीकी की संज्ञा दी गई है। इसे प्रशिक्षण - तकनीकी भी कहा जा सकता है ।

नैड ए0 फिलैण्डर, एमीडोन ओवर, स्किनर तथा एण्डरसन ने व्यवहार तकनीकी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसका सम्बन्ध शिक्षक-व्यवहार के अध्ययन तक ही सीमित है।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

अवधारणायें (Assumptions ) - 

व्यावहारिक-तकनीकी प्रत्यय निम्नलिखित अवधारणाओं पर आधारित है-

1. शिक्षक व्यवहार का निरीक्षण किया जा सकता है।
2.शिक्षक व्यवहार का मापन किया जा सकता है।
3शिक्षक व्यवहार सापेक्षिक होता है।
4. शिक्षक व्यवहार में सुधार किया जा सकता है।
5.शिक्षक व्यवहार में सुधार किया जा सकता है।

पाठ्य -वस्तु (Content )

व्यावहारिक-तकनीकी की पाठ्यवस्तु में डी० जी० रायन, फिलैण्डर, एलना तथा # एफ0 स्किनर ने महत्वपूर्ण योदान किया है। इसके अन्तर्गत कक्षा-व्यवहार सम्बन्धी बन को सम्मिलित किया है। व्यावहारिक-तकनीकी पाठ्य-वस्तु निम्नलिखित है-
1 शिक्षक-व्यवहार का अर्थ एवं परिभाषा.
2 शिक्षक व्यवहार की अवधारणायें तथा सिद्धान्त, 
3 शिक्षक-व्यवहार की निरीक्षण विधियाँ,
4. शिक्षक-व्यवहार का आलेखन तथा अर्थापन,
5 शिक्षक-व्यवहार का मूल्यांकन तथा मानक,
6 शिक्षक-व्यवहार के प्रतिमान,
7. सूक्ष्म-शिक्षण (Micro teaching),
8. अनुकरणीय शिक्षण (Simulated Social siall Training). 
9 प्रशिक्षण - समूह ( Team Teaching ) ।

व्यावहारिक-तकनीकी में कक्षा-व्यवहार का अध्ययन ही नहीं किया जा अपितु पुनर्बलन प्रविधियों के प्रयोग से अपेक्षित व्यवहार-परिवर्तन लाया जाता तथा प्रभावशाली शिक्षण तैयार किये जाते हैं। 
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

व्यावहारिक-तकनीकी की विशेषताये (Charactersticis Behaviour Technology)

1. व्यावहारिक तकनीकी का लक्ष्य क्रियात्मक पक्ष का विकास करना होता  है। शिक्षण के विशिष्ट कौशल का विकास किया जाता है। 
2. शिक्षक के कक्षा-व्यवहार स्वरूपों का अध्ययन किया जा सकता है, व्यवहार के सुधार के लिये सुझाव भी दिये जा सकते हैं। 
3. व्यावहारिक-तकनीकी के प्रयोग से प्रशिक्षण संस्थायें प्रभावशाली शिक्ष तैयार कर सकती है ।
4. छात्राध्यापकों को शिक्षण अभ्यास काल में पुनर्बलन भी दिया जाता है,
5. पाठ्य-वस्तु तथा सम्प्रेषण दोनों शिक्षण पक्षों में सुधार एवं परिवत लाया जा सकता है ।
6. छात्राध्यापकों के प्रशिक्षण के समय व्यक्तिगत क्षमताओं के अनुर कौशल के विकास के लिये अवसर दिया जाता है।
7. शिक्षण की निष्पत्तियों का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ रूप में किया जा सकता है. 
8. शिक्षण सिद्धान्तों के विकास में सहायक हो सकता है व्यवहार-तकनी के द्वारा शिक्षक के कक्षा-व्यवहार का अध्ययन ही नहीं किया जाता आ शिक्षक-व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन भी लाया जा सकता है। तकनीकी की यह धारणा है कि शिक्षक जन्मजात नहीं होते अपितु बनाया जा सकता है। इसलिये प्रशिक्षण संस्थाओं का अधिक उपयोग शिक्षण कौशल का विकास व्यवहार-तकनीकी द्वारा किया जा सकता
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

शिक्षा तकनीकी का महत्व

(Importance of Educational Technology)

शिक्षा-तकनीकी ने शिक्षा के क्षेत्र में अधिक क्रान्ति उत्पन्न कर दी इसने शिक्षण-प्रक्रिया को विशेष रूप से प्रभावित किया है। शिखा के अन्तर्गत सी के सिद्धान्तों (Learning Theories) की अधिक चर्चा की जाती रही है परन्तु ये सिद्ध शिक्षा की समस्याओं को हल नहीं कर सके और प्रशिक्षण मनोविज्ञान ने शिक्षा को महत्वपूर्ण मोड़ दिया है। अतः सीखने के सिद्धान्तों की अपेक्षा शिक्षण के सिद्धान्तों को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। शिक्षा - तकनीकी का महत्वपूर्ण योगदान शिक्षण के सिद्धान्तों के प्रतिपादन में माना जाता है। यद्यपि अभी तक किसी शिक्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं हो सका है और शिक्षण- सिद्धान्त अभी केवल शिक्षण प्रतिमान के रूप में ही आ सके हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा-तकनीकी की निम्नलिखित उपयोगितायें हैं-

(1) शिक्षण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली तथा सार्थक बनाया जा सकता है।
(2) आज जन-साधारण के पास रेडियो, ट्रांजिस्टर तथा टेलीविजन की सुविधायें सुलभ हैं। उनका उपयोग शिक्षा के लिये किया जा सकता है।
(3) पत्राचार पाठ्य-वस्तु को अभिक्रमित अनुदेशन तथा रेडियो, दूरदर्शन. टेपरिकॉर्डर के प्रयोग से अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। शिक्षा के स्तर को उठाया जा सकता है।
(4) भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों ने उच्च शिक्षा के लिये भी व्यक्तिगत परीक्षा की सुविधायें उपलब्ध कर दी है। उच्च शिक्षा के स्तर को बनाये रखने के लिये शिक्षा - तकनीकी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है; जैसे, अभिक्रमित अनुदेशन, रेडियो आदि के उपयोग द्वारा ।
(5) अध्यापक-प्रशिक्षण संस्थायें प्रभावशाली शिक्षक तैयार नहीं कर पा रही हैं। इसके लिये आवश्यक है कि प्रशिक्षण की नवीन प्रविधियों को प्रयुक्त किया जाय । शिक्षण कौशल के विकास के लिये पृष्ठ-पोषण की उक्तियों (Mechanism of feedback devices for the modification of teacher-behaviour) का प्रयोग किया जा सकता है; जैसे सूक्ष्म शिक्षण, अनुकरणीय प्रशिक्षण-समूह आदि का प्रयोग करना ।
(6) शैक्षिक - प्रशासन तथा प्रबन्ध की समस्याओं का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है और शैक्षिक प्रणाली का विकास किया जा सकता है। इसके लिये प्रणाली - विश्लेषण (System analysis) का विशेष महत्व है ।
(7) शिक्षा - तकनीकी के फलस्वरूप एक प्रभावशाली शिक्षक के ज्ञान और कौशल का सभी लाभ उठा सकते हैं चाहे वह नगर में रहता हो या गाँव में अथवा पहाड़ों पर रहता हो। उसके रेडियो तथा दूरदर्शन पर अभिभाषण को देश के प्रत्येक भाग में पहुंचाया जा सकता है।
(8) हार्डवेयर के उपयोग से शिक्षा तथा विद्वान के विचारों को मौलिक रूप में संचित किया जा सकता है। उसके बाद भी समाज उसके विचारों को मौलिक रूप से सुन सकता है तथा देख सकता है।
(9) शिक्षा-तकनीकी के प्रयोग की सहायता से शिक्षण के रूप को समझाया जा सकता है और शिक्षण के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जा सकता है। शिक्षण के नये प्रतिमान (Teaching Models) विकसित किये जा सकते हैं।
(10) शिक्षा के क्षेत्र में जो शोध कार्य किये जा रहे हैं उनका शिक्षा-प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं दिखलाई पड़ता है परन्तु शैक्षिक तकनीकी, शोध कार्य के लिये शिक्षा में नवीन प्रयोगों के लिये अवसर प्रदान करती है जिनका प्रभाव शिक्षण-प्रक्रिया पर प्रत्यक्ष दिखाई देता हैं।
शिक्षा तकनीकी का अर्थ

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