वेदान्त दर्शन | अद्वैत वेदान्त दर्शन और शिक्षा | वेदान्त का अर्थ | वेदान्त के सम्प्रदाय | वेदान्त दर्शन की तत्व मीमांसा

अद्वैत वेदान्त एवं शिक्षा

[ADVAIT VEDANT AND EDUCATION]

अद्वैत वेदान्त दर्शन और शिक्षा

(EDUCATION AND ADVAIT VEDANT PHILOSOPHY)

वेदान्त संसार के सबसे पुराने साहित्य में गिने जाते हैं । इस साहित्य के महत्व के बारे में भाषण देते हुए मैक्समूलर ने कहा था कि जिस तरह से हिमाचल की ऊँचाई को हम एवरेस्ट चोटी को नाप कर जानते हैं ठीक उसी प्रकार भारत के ज्ञान का सही माप वेदों के, कवियों, उपनिषद के ऋषियों की कविताओं की गहनता से आँका जाता है।
वेदान्त दर्शन | अद्वैत वेदान्त दर्शन और शिक्षा | वेदान्त का अर्थ | वेदान्त के सम्प्रदाय | वेदान्त दर्शन की तत्व मीमांसा
वेदान्त दर्शन


भारत में वेद को ईश्वरीय ज्ञान समझा जाता है। जहाँ तक वैदिक ऋषियों का सम्बन्ध है, वे वेदों को उच्चतम सत्य के रूप में देखते थे जिनका प्रकाश ईश्वर की ओर से विशुद्ध आत्माओं के अन्दर किया गया है। वैदिक सूक्तों के ऋषि अपने को उनका रचयिता न मानकर द्रष्टा कहते हैं। उनका कार्य उस सत्य को दूसरों तक पहुँचाना है जिसका उन्होंने दर्शन किया है।

वेदान्त का अर्थ

(MEANING OF VEDANT)

वेदान्त शब्द का यौगिक अर्थ है-वेद का अन्त अथवा वे सिद्धान्त जो वेदों के अंतिम अध्यायों में प्रतिपादित किए गए हैं और वे हैं उपनिषद । वेदों की रचना के बाद (वेदों के अंत में) वेदों पर आधारित साहित्य संहिता, आरण्यक, उपनिषद आदि यहाँ तक गीता और महाभारत को भी वेदान्त दर्शन का ही विस्तार कहा जाता है।

अनेक विद्वानों के अनुसार उपनिषदों को ही वेदान्त कहा जाता है क्यों ? (अ) उपनिषदों में ही वेदों का निचोड़ है और उसी से वेदान्त दर्शन का विकास हुआ है।

(ब) उपनिषद् वैदिक युग का अंतिम साहित्य है। इस युग में तीन प्रकार का साहित्य मिलता है- (1) वैदिक मंत्र, ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद ।

1. ब्राह्मण, 2. कर्मकाण्ड तथा 3. अंत में उपनिषद । इस अंतिम भाग में ही आध्यात्मिक विवेचन है।

(स) अध्ययन की दृष्टि से प्रथम (1) वैदिक संहिता द्वितीय क्रम में ब्राह्मण, तृतीय क्रम में आरण्यक तथा अन्त में चतुर्थ क्रम में उपनिषद पढ़े जाते हैं।

(द) वेदों का परिपक्व ज्ञान उपनिषदों में ही है, अतः वे ही वेदान्त कहाने योग्य हैं।


वेदान्त के सम्प्रदाय

(VARIOUS SECTS OF VEDANT)

वेदों की धारणा जिन भाष्यकारों ने की है उनके नाम पर वेदान्त के अनेक सम्प्रदाय विकसित हुए हैं। प्रायः यह अन्तर जीव तथा ब्रह्म की व्याख्या को लेकर है। इनमें से मुख्य सम्प्रदाय चार हैं-

(i) शंकर का अद्वैतवाद - 

इस सम्प्रदाय के प्रणेता शंकर के अनुसार अ + द्वैत नहीं हैं दो अर्थात् जीव तथा ब्रह्म दो नहीं, एक हैं। अंतिम सत्ता केवल ब्रह्म की ही है। 

(ii) रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद - 

रामानुजाचार्य जीव को ब्रह्म का एक विशेषण मानते हैं। वे मानते हैं कि जीव की उत्पत्ति में ब्रह्म दो नहीं एक हैं। अंतिम सत्ता केवल ब्रह्म की ही है।

(iii) माध्वाचार्य का द्वैतवाद 

माध्वाचार्य के अनुसार जीव तथा ब्रह्म दोनों का ही अस्तित्व है, दोनों ही सत्य हैं।

(iv) निम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैतवाद- 

इनके अनुसार किसी दृष्टि से सत्ता दो हैं और किसी दृष्टि से दो नहीं है, केवल एक ही सत्ता है।

शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त इन सभी दर्शनों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। डॉ० राधाकृष्णन् के अनुसार शंकर का अद्वैत वेदान्त दर्शन (अद्वैतवाद) एक महान कलात्मक, साहस, तार्किक सूक्ष्मता का दर्शन है। इसी दर्शन का अधिकाधिक प्रभाव भारतीय जनमानस में देखा जाता है और इस प्रकार भारतीय दर्शन को सार्वभौमिक पहचान के रूप में स्वीकार किया जाता है।

वेदान्त दर्शन की तत्व मीमांसा

(METAPHYSICS OF VEDANT PHILOSOPHY)

सत्ता एक है या अनेक हैं-वेदों या उपनिषदों को पढने पर प्रायः कभी यह भ्रम होता है सत्ता अनेक हैं, तो कभी सत्ता एक है। ऋग्वेद में मुख्यतः अग्नि, इन्द्र, वरुण, मरुत आदि देवताओं की स्तुति इस प्रकार की गई है कि यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि सत्ताएँ अनेक हैं। वस्तुतः ये प्रकृति की अधिष्ठात्री शक्तियाँ हैं। अतः वेदों में जब उनकी उपासना अलग-अलग से की जाती है। तो ऐसा लगना स्वाभाविक होता है कि वे सभी ही सर्वशक्तिमान हैं। अतः अनेकेश्वर वादी होने का भ्रम होता है। परन्तु ऋग्वेद का यह विचार कि "एक सद विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात् विद्वान लोगों ने एक ही सत्य को अनेक रूपों में कहा है, एकेश्वरवादी होने की पुष्टि करता है। वस्तुतः सभी देवता उसी एक ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किए गए हैं। आध्यात्मोपनिषद का यह विचार भी इसी की पुष्टि करता है कि- एक मेवा द्वितीय नेह नानास्ति किंचन । शंकर ने जगत को भ्रम व मिथ्या माना है। वस्तुतः इसी दृष्टिकोण की उन्होंने पुरजोर घोषणा की है- "ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या" और यही उद्घोषणा उनके अद्वैत दर्शन की मुख्य पहचान है।

ब्रह्म एवं आत्मा

काल का चक्र तीव्र गति से घूम रहा है, जीवन क्षणभंगुर है और सब कुछ परिवर्तन के अधीन है। कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है, सब कुछ प्रवाह रूप है। ऊपर की ओर उठने का संघर्ष, यथार्थ सत्ता की खोज, सत्य को जानने की चेष्टा, इस सबके जानने का आशय है कि यह प्रवाह रूप जीवन धारा की सब कुछ नहीं है। इस प्रवाह जगत से परे कोई महान सत्ता अवश्य है, यह आभास होता है। अतः हम एक निरपेक्ष यथार्थ सत्ता को मानने के लिए विवश है। यह वह यथार्थ सत्ता है जो प्रतीतरूप, दैशिक, भौतिक और चेतन जगत, सबसे भिन्न है। ब्रह्म वह है जिसके बारे में मान लिया जाता है कि वह मूलभूत है यद्यपि वह किसी भी अर्थ में द्रव्य नहीं है। इसके अस्तित्व के लिए किसी काल या स्थान की आवश्यकता नहीं है वरन् वह सर्वत्र विद्यमान है ।

शंकर भाष्य में शंकर लिखते हैं कि 'ब्रह्म की कोई जाति नहीं उसमें कोई गुण नहीं, वह कोई कर्म नहीं करता और किसी वस्तु के साथ वह सम्बद्ध नहीं है ।

आत्मा तथा ब्रह्म दोनों में सत् के सभी लक्षण तथा चैतन्य, सर्वव्यापकता और आनन्द एक समान पाए जाते हैं। आत्मा ब्रह्म स्वरूप है जो विशुद्ध विषयीरूप है वही विशुद्ध विषय रूप है। ब्रह्म केवल अमूर्तरूप सत प्रतीत होता है।

ब्रह्म एवं आत्मा अलग-अलग हैं अथवा एक हैं, के सम्बन्ध में शंकर का मानना है कि यह समग्र संसार ब्रह्ममय है । अस्तु आत्मा एवं ब्रह्म एक ही हैं। इस सन्दर्भ में उपनिषदों के निम्नलिखित उद्धरण प्रमाण रूप में दिए जा सकते हैं। यथा वृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है। अयं आत्मा ब्रह्म (वृहदारण्यक - 2/2/19) "अहं ब्रह्मस्मि मैं ही ब्रह्म हूँ, इसी तथ्य की पुष्टि व पुनरावृत्ति मात्र है। "ब्रह्म एवं इदं विश्वं" । यह विश्व ही ब्रह्म है, इसी तथ्य को और व्यापकता प्रदान करता है। इस प्रकार विषयी और विषय, ब्रह्म और आत्मा, विश्वीय एवं आत्मिक दोनों ही तत्व एकात्मक माने गए हैं। इसी प्रकार उच्चतम ब्रह्म जो आनन्द है, ठीक आत्मा का स्वरूप है। मुण्डक उपनिषद में इसकी एक सहज व्याख्या देखने को मिलती है यह वह है- समस्त उत्पन्न पदार्थों का अभ्यांतर आत्मा, अग्नि जिसका सिर है, सूर्य और चन्द्रमा जिसकी आँखें हैं, चारों दिशाएँ जिनके कान हैं, वेद जिसकी वाणी है और उन वेदों का प्रादुर्भाव भी उसी से हुआ है, वायु जिसका स्वक्षित है, समस्त विश्व ब्रह्माण्ड जिसका हृदय है और जिसके चरणों से पृथ्वी का प्रादुर्भाव हुआ है।

यही व्यापक दृष्टिकोण शंकर ने स्वीकार किया है और भारतीय जनमानस में भी यही व्याप्त है। कबीर ने भी यही कहा है "लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल । वस्तुतः उसी ब्रह्म की व्याप्ति सर्वत्र है।

वास्तविक सत्ता क्या है ? (What is Original Reality ? )

देश, काल तथा कारण-कार्यभाव से यह संसार अंतिम नहीं है किन्तु हमारे ज्ञान की श्रेणी से सम्बन्ध रखता है। इसका अस्तित्व हमारे आंशिक ज्ञान के कारण है और उस सीमा तक जहाँ तक हमारा ज्ञान आंशिक है, इसका विषय अमूर्त भावात्मक है। निम्न स्तर का ज्ञान (अपरा विद्या) माया रूप या भ्रमात्मक नहीं है, अपितु सापेक्ष है। अपरा का आधार ही हमें परा विद्या तक पहुँचाने में योग देता है।

शंकर के दर्शन में हमें तीन प्रकार के अस्तित्व मिलते हैं- (1) पारमार्थिक या परम यथार्थ सत्ता, (2) व्यावहारिक सत्ता तथा (3) प्रतिभासित या भ्रमात्मक सत्ता ।

इस प्रकार वेदान्त में तीन सत्ताओं को स्वीकार किया गया है-

(i) प्रतिभाषित / अभाषित सत्ता- 

यह सत्ता देश और काल से बद्ध होती है और आभास मात्र है. भ्रांति है और ईश्वर की छाया मात्र है। वास्तविक सत्ता के ज्ञान के लिए हमें इसका निषेध करना होगा।

(ii) व्यावहारिक सत्ता 

मात्र संसार में व्यवहार के लिए है जैसे- व्यक्तियों के नाम सांसारिक कार्यों के निष्पादन के लिए होते हैं। इस संसार में सभी कारण व कार्य में बद्ध हैं।

(iii) पारमार्थिक सत्ता-

 ब्रह्म ही एकमात्र यथार्थ सत्ता है। संसार का आधारभूत भी ब्रह्म में है और इसी दृष्टि से वह (संसार) भी उसी ब्रह्म का अंश रूप है। यह प्राण है, यह वाणी है, यह मानस है। विश्व में सब कुछ यही है। ब्रह्म नीचे से नीचे धूल कण में भी है। अस्तु, वेदान्त के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है। परन्तु ड्यूसन जैसे विद्वान नित्य रूप ब्रह्म, इन्द्रिय गम्य भौतिक जगत को एक दम असत और शून्यात्मक कहकर त्याज्य नहीं मानते। जगत के उच्च अनुभव, इन्द्रिय गम्य भौतिक जगत की वास्तविकता को नित्य सत्ता के अन्दर सांत की वास्तविकता को अनन्त के अंतर्गत विद्यमान एवं ईश्वर से उत्पन्न मानव की यथार्थता को स्वीकार करते हैं।

माया (Maya)

माया को शंकर ने ईश्वरीय शक्ति और संसार के सृजन का आधार माना है। यह अज्ञान है जिससे माया को पहचाना नहीं जा सकता। मनुष्य इसी के वशीभूत हो जाता है। अज्ञान के अनेक पर्दे आत्मा को जकड़े रहते हैं जिस कारण मनुष्य सत्य को नहीं देख पाता । भ्रम पूर्ण जगत इसी के कारण सत्य लगता है। इन माया के पर्दों का उल्लेख आगे लिखा जा रहा हैI

शंकर ने माया तथा अविद्या को एक ही माना है। इनके प्रयोग में कोई भेद नहीं किया है । परन्तु कुछ अद्वैतवादी दोनों के मध्य भेद करते हैं। माया एक ओर जहाँ ईश्वर की उपाधि (शक्ति है) वहीं अविद्या व्यक्ति का अज्ञान है। जगत का निर्माण भी उसी अविद्या के कारण है।

माया को ईश्वर की शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए तर्क दिया गया है कि जिस प्रकार अग्नि की दहकता अग्नि से परे नहीं हो सकती, उसी प्रकार माया भी ईश्वर से अभिन्न है। इसी माया की शक्ति से ही ईश्वर इस विचित्रपूर्ण सृष्टि का निर्माण करते हैं। अज्ञानी इसी माया की सृष्टि को सत्य समझ लेते हैं और ज्ञानी व तत्वदर्शी इसे ईश्वर की लीला मात्र जानकर इसमें ब्रह्म की शक्ति का दर्शन करते हैं। यह ठीक उसी प्रकार है कि जिस तरह एक जादूगर अनेक खेल दिखाकर व्यक्तियों को भ्रम में डाल देता है परन्तु बाजीगर स्वयं भ्रम में नहीं पड़ता । अतः यह भ्रम या माया अज्ञान के कारण ही है। शंकर जहाँ माया को ब्रह्म की शक्ति मानते हैं वहाँ इसे नित्य रूप नहीं मानते।

अद्वैत वेदान्त दर्शन के शैक्षिक निहितार्थ 

(Intrinsic Meaning of Advait Vedant Philosophy)

वेदान्त, जिसका मूल उपनिषद हैं, में वर्णित शिक्षा के स्वरूप के बारे में निर्णय करना आसान नहीं है। शंकर ने उपनिषदों, भगवद्गीता और वेदान्त सूत्रों पर लिखे गए अपने भाष्यों में अत्यन्त श्रम के साथ आध्यात्म विद्या के उच्च एवं अत्यन्त सूक्ष्म अद्वैत विषय की व्याख्या की है। अतः उन्हीं की व्याख्याओं के आधार पर जीवन के यथार्थ सत्य, लक्ष्य, ज्ञान और शिक्षा के निहितार्थों को खोजा जा सकता है।

शंकर अनुसार 'माया' अज्ञान है जिसके भ्रम में पड़कर मनुष्य इसके वशीभूत हो जाता है और इसके फैलाए गए अनेक जालों (पर्दो) में जकड़ जाता है। वह सत्य को नहीं पहचान पाता। यह भ्रमपूर्ण जगत भी इसी कारण सत्य लगता है। अतः शिक्षा का प्रमुख कार्य इस अज्ञान को दूर कर मनुष्य को सत्य तक पहुँचाना है। अज्ञान के अंधकार से सत्य ज्ञान का प्रकाश प्राप्त कराना है और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाकर अमृत प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करना है। यही बात वृहदारण्यक उपनिषद् के इस मंत्र में कही गई है।

"असतो मां सद्गमय, तमसोमा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय"
उपनिषदों में 'विद्या' का 'शिक्षा' के रूप में प्रयोग हुआ है। इनमें हमें विद्यया अमृतमश्नुते अर्थात् विद्या से अमरत्व मिलता है, 'सा विद्या या विमुक्तए' जैसे सूत्र मिलते हैं जिनका आशय यह निकलता है कि विद्या (शिक्षा) का लक्ष्य मुख्य रूप मृत्यु (जन्म-मरण) से मुक्ति प्राप्त कराना व आत्मा की वास्तविक प्रकृति की पहचान या आत्मानुभूति कराना है ताकि अमरत्व प्राप्त हो सके।

इस प्रकार आत्मानुभूति, वेदान्त दर्शन के अनुसार शिक्षा का लक्ष्य है। आत्मानुभूति ही आनन्द की प्राप्ति है। आत्मानुभूति के बारे में तैत्तरीयोपनिषद् में विस्तार से वर्णन मिलता है।

आनन्द से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, उसी के फलस्वरूप वे जीवित रहते हैं और मृत्यु के उपरान्त उसी में विलीन हो जाते हैं। जो व्यक्ति इस आनन्द को प्राप्त कर लेता है, वह वाणी और मन से अगम्य उस आनन्द को जान लेता है। उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहता। उसे सत्कार्य करने व पाप कर्म टालने वाले विचार पीड़ित नहीं करते। जो आनन्द को जान लेता है, वह पाप और पुण्य दोनों से ऊपर उठ जाता है।

वस्तुतः आनन्द, आत्मा का ही लक्षण है। यदि आनन्द आत्मा का लक्षण नहीं होता तो जीवन दुष्कर हो जाता है। हम आखिर जीवन क्यों चाहते हैं ? हमें अपने लोग, घर बार प्रिय क्यों होते हैं ? क्योंकि हमें इसमें अपनी आत्मा में निहित आनन्द की अनुभूति होती है। कठोपनिषद में मैत्रेयी को याज्ञवल्क्य द्वारा दिए गए प्रबोध में यही बात कही है-पति, पत्नी, पुत्र, धन, ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व, लोक, देव, प्राणी तथा सभी वस्तुएँ अपने आप में प्रिय नहीं होतीं अपितु हम उनमें अपने आप को देखते हैं।"

इसी आत्मा के वास्तविक स्वरूप जानने, आनन्द की प्राप्ति के लिए हमें विद्या की आवश्यकता है ताकि उनके माया के आवरणों (पर्दों) को अनावरण कर आत्मा की अनुभूति कर सकें। अस्तु आनन्द की अनुभूति के लिए, जिन आवरणों को अनावृत करना है, तैत्तरीयोपनिषद् में उनको अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष कहा गया है।

एल० के० ओड के अनुसार शिक्षा प्राप्ति के ये ही कोष प्रमुख सोपान स्वीकार किए जा सकते हैं। यही शैक्षिक उद्देश्यों का क्रम भी हो सकता है।

(i) अन्नमय कोष-

जीवन की प्राथमिक आवश्यकता अन्न ही है। अतः भौतिक दृष्टि से अन्न की आवश्यकता, आनन्द प्राप्ति का प्रथम आवश्यक चरण है। व्यक्ति को जीवित रहने के लिए पेट भरने की कला आनी ही चाहिए। अतः शिक्षा की प्राथमिक आवश्यकता भौतिक जीवन के लिए जीविकोपार्जन में छात्र को दक्ष करने की है।

भौतिक जीवन में आनन्द की प्राप्ति के दृष्टिकोण से भौतिक सम्पदाओं की जानकारी, विविध व्यवसायों की जानकारी, भौतिक पर्यावरण की जानकारी आवश्यक प्रतीत होती है।

परन्तु यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अन्न (भोजन) व अन्य भौतिक सुविधाएँ परम आनन्द की प्राप्ति का साधन हैं, साध्य नहीं हैं। सन्तुलित भोजन, जीवन के लिए आवश्यक है। भौतिक सुविधाएँ स्वस्थ और आनन्दपूर्ण जीवन के लिए होनी चाहिए। प्रायः होता यह है कि व्यक्ति इस रोटी व भौतिक सुविधाओं के जाल में इतना निबद्ध हो जाता है कि वह अपना चरम लक्ष्य छोड़ देता है। शिक्षा (विद्या) का कार्य यही है कि वह छात्र को यह ज्ञान दे कि भौतिक सम्पन्नता आवश्यक होते हुए भी जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। साधन है, साध्य नहीं है। वह उनमें लिप्त नहीं है। इसी ज्ञान के आधार पर माया के प्रथम पर्दे अथवा आवरण को अनावृत कर व्यक्ति आनन्द के द्वितीय सोपान की ओर अग्रसर हो सकता है।

(ii) प्राणमय कोष - 

भौतिक जगत से अधिक महत्वपूर्ण स्वयं प्राणी है। दूसरे शब्दों में भौतिक 'स्व' से ऊपर प्राणमय 'स्व' का स्थान है। व्यक्ति में यदि प्राण है तभी वह भौतिक आनन्द की प्राप्ति कर सकता है। प्राण ही वह शक्ति है जिसके द्वारा जीव जगत श्वास लेता है, रक्त संचार होता है, अस्थि निर्माण होता है, शरीर में शक्ति आती है। बिना स्वस्थ और शक्तिमान शरीर के आनन्द की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः यह ज्ञान विद्या के द्वारा दिया जाना आवश्यक है कि व्यक्ति किस प्रकार प्राणों की रक्षा कर सकता है ? कैसे स्वस्थ व निरोग रह सकता है ? इन्द्रियाँ जो विषयों की ओर व्यक्ति को प्रवृत्त करती हैं, उसके क्या दुष्परिणाम होते हैं ? वह किस प्रकार से विषयों से दूर रहकर चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रह सकता है ? कहा भी है कि शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम् धर्म साधना (आनन्द की प्राप्ति) का माध्यम यह शरीर ही है। अतः विद्या द्वारा यह ज्ञान दिया जाय ताकि व्यक्ति माया के दूसरे आवरण में ही बँधा न रहे और अपने जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति से वंचित न रहे । स्वस्थ शरीर या स्वास्थ्य शिक्षा, शिक्षा का द्वितीय लक्ष्य होना चाहिए।

(iii) मनोमय कोष-

प्राणमय कोष से आगे का कवच मनोमय कोष का है। प्राणी जगत में मनुष्य का स्थान श्रेष्ठ है क्योंकि उसका मन ( मस्तिष्क) काफी विकसित होता है। वह विचार कर सकता है, स्मरण कर सकता है, निर्णय ले सकता है। अपने ज्ञान का नई विविध परिस्थितियों में प्रयोग कर सकता है।

सच तो यह है कि यह मनस' ही है जो ज्ञानार्जन का आधार है। यही वह कारक है व्यक्ति के जीवन के मार्ग को नियंत्रित करता है। इन्द्रियों द्वारा ज्ञान भी मनस के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है। यह इन्द्रियों पर नियन्त्रण भी करता है।

इन्द्रियों का भटकाव इस मनस के द्वारा ही होता है, अतः विद्या के द्वारा मानसिक क्रियाओं पर नियन्त्रण का अभ्यास आवश्यक है। मानव का भटकाव का मूल कारण इन्द्रियाँ ही हैं। अतः मन ही बन्धन एवं मोक्ष का कारण है। इस दृष्टि से मनोनिग्रह करके विज्ञान एवं आनन्दमय कोषों की ओर अग्रसर होना चाहिए।

(iv) विज्ञानमय कोष-

ज्ञान से विज्ञान की स्थिति निश्चय ही श्रेष्ठ है। विविध इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान का विवेचन बुद्धि द्वारा किया जाता है तथा अच्छे व बुरे का निर्णय किया जाता है। इन्द्रियों द्वारा प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण उनकी आवश्यकता. अनावश्यकता, तर्कसंगतता का निश्चय, श्रेयस व प्रेयस का निश्चय इसी विश्लेषण के आधार पर बुद्धि द्वारा किया जाता है। अतः शिक्षा का महत्वपूर्ण लक्ष्य विशेषकर उच्च स्तर पर छात्रों को तर्कसंगत ढंग से स्वयं सही ज्ञान पर पहुँचने का अभ्यास होना चाहिए। मात्र पुस्तकीय ज्ञान को अथवा इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान को ही विद्वता का आधार मानना उचित नहीं होगा। वर्तमान समय में स्नातक एवं अधिस्नातक स्तर पर भी पुस्तकीय ज्ञान को विद्वत्ता या योग्यता का आधार मान लिया जाता है, जो कदाचित उचित नहीं है। नई शिक्षा नीति (1986) में इसी उपागम पर बल दिया गया हैं कि विभिन्न अधिगम संस्थितियों से छात्र स्वयं ज्ञान ग्रहण करें। ज्ञान को थोपा नहीं जाय ।

(v) आनन्दमय कोष -

यह स्थिति दार्शनिक गवेषणा की अंतिम स्थिति है। इस स्थिति में ज्ञाता, ज्ञान व श्रेय का अन्तर मिट जाता है। इस स्थिति पर पहुँचने वाला व्यक्ति जीवन मुक्ति की स्थिति में आ जाता है। जीवन की यही अंतिम स्थिति होनी चाहिए। अतः शिक्षा का भी यही चरम लक्ष्य है कि विद्यार्थी उपयुक्त कोषों (चरणों) को क्रमशः समझता हुआ अज्ञान को दूर करता हुआ अंतिम पर पहुँचे और मुक्तानन्द की स्थिति व्यतीत करे।

छात्र संकल्पना

(CONCEPT OF STUDENT )

वेदान्त के अनुसार बालक का निर्माण दो तत्वों से मिलकर हुआ है। ये तत्व हैं- 1. चित-जो आत्मा या परातत्व है तथा 2. अचित - जिससे इस भौतिक शरीर का निर्माण हुआ है। परा तत्व स्वयं ब्रह्मतत्व है अतः प्रत्येक छात्र स्वयं ब्रह्ममय है। ब्रह्ममय होने से उसमें असीम शक्ति एवं क्षमताएँ विद्यमान हैं। आवश्यकता छात्र में अंतर्निहित इन्हीं क्षमताओं के विकास की है। (आधुनिक विज्ञान भी इस तथ्य से सहमत है कि आज व्यक्ति अपनी बुद्धि का 1% भी काम नहीं ले पाता) अतः शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालकों में अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करना ही है।

'उचित' तत्व से इस भौतिक शरीर का निर्माण हुआ है। इस भौतिक शरीर में आत्मा विद्यमान है, अतः भौतिक शरीर की शुद्धता, स्वच्छता, पवित्रता ठीक उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार मन्दिर में विराजमान मूर्ति के लिए मन्दिर की स्वच्छता और पवित्रता की आवश्यकता है। सांसारिक व्याधियाँ या इन्द्रियजनित विकास इसी शरीर को प्रभावित करते हैं जैसे वर्षा, हवा, धूप मन्दिर को प्रभावित करती है, अतः शरीर की उचित देखभाल की आवश्यकता है।

एक और कारक बालक के संस्कारों से सम्बन्धित है। ये प्रभावित होते हैं व्यक्तियों के कर्मों से संस्कार तीन प्रकार के होते हैं-

(i) क्रियमाण (ii) संचित व (iii) प्रारब्ध ।

क्रियमाण-जो कर्म हम आज कर रहे हैं, वही कर्म संचित होकर प्रारब्ध बनते हैं। प्रारब्ध हमारे भावी जीवन को जहाँ प्रभावित करता है. वहीं वर्तमान जीवन भी इससे प्रभावित हुआ है। अतः बालकों को उचित एवं सतत् कर्म की शिक्षा तथा उचित संस्कारों के पोषण की आवश्यकता है।

ज्ञान प्राप्ति के लिए पात्रता की आवश्यकता है। केवल सुपात्र ही शिक्षा प्राप्ति के अधिकारी हैं। इस प्रकार सार्वभौमिक शिक्षा की बात नहीं की जा सकती है। ज्ञान प्राप्ति के लिए कोई उम्र का बन्धन नहीं है, परन्तु बिना सतगुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता ।

शिक्षक संकल्पना

(CONCEPT OF TEACHER )

तत्वज्ञानी, आत्मज्ञानी व्यक्ति ही शिक्षक बनने का पात्र हो सकता है। यही नहीं वह महाज्ञानी व छात्रों की शंकाओं का समाधान करने वाला होना चाहिए।

वेदान्त चिंतन के अनुरूप शिक्षक ऋषिकोटि का आचार्य होना चाहिए। उसके आचरण अनुकरणीय चरित्र से परिशुद्ध व आदर्श होने चाहिए ताकि वह दूसरों को प्रभावित कर सके

उपनिषदों में गुरु की महत्ता के अनेक उदाहरण हैं। बिना सच्चे गुरु के ज्ञान सम्भव ही नहीं है। सच्चा गुरु ही ब्रह्म को प्राप्त कराने में योग दे सकता है। अतः ब्रह्म से भी महत्वपूर्ण गुरु का स्थान है। परन्तु यह गुरु साधारण नहीं हो सकता। वह तो ऋषि और तत्व ज्ञानी ही हो सकता है। गुरु के अनुकरण से ही सच्चा ज्ञान हो सकता है। इस अनुकरण प्रक्रिया में प्रथम गुरु आदेश देता है। सर्व खलु इदं ब्रह्म । विद्यार्थी ब्रह्म के इस बाह्य स्वरूप का अध्ययन करता है तथा प्रत्येक जड़, जगत में ब्रह्म का आभास पाता है। तब गुरु कहता है 'तत्वमसि' तुम्ही ब्रह्म हो । स्वयं में छिपे आत्मरूप की प्राप्ति की साधना करता है और अन्त में 'सोऽहम' या 'अहं ब्रह्मस्मि की स्थिति तक पहुँचता है।

पाठ्यक्रम

(CURRICULUM)

किसी भी दर्शन के जीवन लक्ष्यों के अनुरूप ही पाठ्यक्रम का निर्माण हुआ करता है। अतः शंकर के अनुसार अज्ञान को दूर कर जीवन के सत ब्रह्म की प्रतीति कराना ही विद्या का परम लक्ष्य है। परन्तु इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उपनिषदों में वर्णित माया के पाँच कोषों का समझना आवश्यक होगा। अतः इन कोषों के अनुरूप-

1. अन्नमय कोष    -    

जीविकोपार्जन के लिए विविध कौशलों का पाठ्यक्रम में स्थान, भौतिक उत्पादन की शिक्षा ।

2. प्राणमय कोष    -    

जीवन को स्वस्थ तथा संयमित करने के लिए- स्वास्थ्य शिक्षा, योग, जीव व जगत की शिक्षा । 

3. मनोमय कोष    -   

 मानसिक विकास के लिए ज्ञानात्मक शिक्षा, जिसके अन्तर्गत विभिन्न सामाजिक विज्ञानों-समाजशास्त्र, इतिहास, नागरिकशास्त्र, भाषाओं का ज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायन शास्त्र, खगोल शास्त्र, गणित आदि विषयों का ज्ञान ।

4. विज्ञानमय कोष    -    

उच्च वैज्ञानिक विषयों-तत्सम्बन्धी अनुसन्धान। आत्मा को उन्नत बनाने वाला पाठ्यक्रम यथा दर्शन, धर्म तर्कशास्त्र, साधना आदि ।

5. आनन्दमय कोष    -    

ब्रह्म प्राप्ति के सम्बन्ध में आत्मोन्नति व आत्मानुभूति के लिए विभिन्न साधनों का ज्ञान-

(1) नित्यानित्य विवेक-अनित्य को छोड़कर नित्य को पहचान व निर्णय कर अनुसरण । 
(2) इहा मूनार्थ भोग विराग-तृष्णा, सांसारिक भोगों तथा सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य ।
(3) शमदमादि साधन संपद-कामनाओं, इन्द्रियों, क्रोध, अहंकार आदि पर नियन्त्रण ।
(4) मुमुक्षत्वं-मोक्ष प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प आते हैं।

वेदान्त विद्या

वेदान्त में दो प्रकार की विद्याओं का उल्लेख है -  (1) अपरा और (2) परा । 

(1) अपरा विद्या (सांसारिक विद्या) - 

अपरा विद्याओं के अन्तर्गत सभी सांसारिक विद्याएँ आती हैं जिसमें जीविकोपार्जन सम्बन्धी कौशल, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य विज्ञान, सामाजिक शास्त्र, विविध विज्ञान, खगोल शास्त्र, कला, साहित्य आदि ।

(2) परा विद्या (आध्यात्मिक विद्या) - 

आध्यात्मिक विद्याओं के अन्तर्गत आत्मोन्नति व आत्मानुभूति की शिक्षा, योग व साधना प्रमुख रूप से आती है। (दर्शन का यथेष्ठ ज्ञान)

शिक्षक विद्यार्थी सम्बन्ध

(STUDENT TEACHER RELATIONSHIP)

उपनिषदों में शिक्षक विद्यार्थी सम्बन्धों के अत्यन्त ही उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं। गुरु विद्यार्थी को प्रारम्भ में ही कह देता है कि- "यानि अस्माकं सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि नो इतराणि"

हमारे अच्छे चरित्र ( आचरणों) का ही अनुकरण करो, अन्य का नहीं। गुरु छात्र को जीवन की शिक्षा देता है। तैत्तिरीय उपनिषद में दीक्षांत भाषण का उद्धरण इसका उत्कृष्ट उदाहरण है-

सत्यं वदः, धर्मं चरः,
स्वाध्यायन्मा प्रभदः ।
मातृ देवो भव,
पितृ देवो भव,
आचार्य देवो भव ।
वस्तुतः गुरु के ये आदेश हैं और उपदेश भी कि उसका छात्र जीवन में सत्यवादी व धर्माचारी हो। सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए शिक्षक कोई शिक्षा या उपदेश की बात नहीं करता है।

ज्ञानार्जन के प्रमुख स्रोत 

(Main Sources of Enhancing Knowledge)

शंकर ने ज्ञान के तीन स्रोतों का उल्लेख किया है-प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शास्त्र प्रमाण प्रत्यक्ष ज्ञान वह है जो इन्द्रियों के सम्पर्क के द्वारा होता है। इन्द्रिय प्रत्यक्ष में ज्ञाता तथा प्रत्यक्ष विषयक पदार्थ में वास्तविक सम्पर्क से होता है।

अनुमान भिन्न-भिन्न प्रकार का माना गया है। इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष ज्ञान से वह प्रत्यक्ष ज्ञान भिन्न है, जो इन्द्रियजन्य नहीं हैं। इच्छा इत्यादि का जो आन्तरिक प्रत्यक्ष में आती हैं वे दूसरे प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान की कोटि में आती हैं। प्रत्यक्ष की व्याख्या के लक्षण की विशेषता ज्ञानेन्द्रिय की मध्यस्थता में नहीं अपितु पदार्थ सम्बन्धी विशिष्ट चेतनता तथा प्रमाण सम्बन्धी चेतनता के तादात्म्य में है ।

अनुमान की उत्पत्ति व्यक्ति ज्ञान के आधार पर होती है। व्याप्ति में हेतु तथा साध्य के मध्य निरन्तर साहचर्या में सम्पर्क रहता है तथा धुआँ निरन्तर आग के साथ रहता है अतः परिणामस्वरूप इस अनुमान की उत्पत्ति होती है कि जहाँ पर्वत पर धुआँ है, वहाँ आग है।

वेद ही नित्य ज्ञान है और सृष्टि के समस्त जीवों के लिए त्रिकाल बाधित नियमों का भण्डार है। वेद अपौरुषेय हैं और ईश्वर के विचारों को प्रकट करते हैं स्मृतियों को इस श्रेणी में नहीं रख सकते ।

ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में तीन और प्रमुख चरणों ( 1 ) श्रवण (2) मनन व निदिध्यासन का भी अत्यन्त महत्व है। इनमें वेदों का ज्ञान प्रमुख है जो ऋषियों द्वारा दिए गए उपदेशों के श्रवण से आता है। वेदों के अतिरिक्त अन्य ज्ञान जो सुनने में आता है, इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह सत्य ही हो। अतः तथ्यों का संचयन आवश्यक है। तत्पश्चात् मनन विचार की आवश्यकता है।

प्रयोग व परीक्षण पर यदि तथ्य खरा उतरता है, तभी निदिध्यासन (आत्मसात् ) करने की आवश्यकता है। अतः मनन के स्तर पर शंकाओं का समाधान किया जाता । मनन में चिन्तन, व्याख्या व तर्क का प्रमुख स्थान रहता हैं। निदिध्यासन के स्तर पर शंका नहीं रहती है। ज्ञान प्राप्ति के स्रोतों में (1) प्रत्यक्ष (2) श्रवण, (3) प्रमाण, (4) अनुमान व (5) समाधि का भी अत्यन्त महत्व है।

इन्द्रियों द्वारा प्राप्त व अनुभूत ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान की श्रेणी में आता है। वेदों, पुराणों, श्रुतियों आदि का ज्ञान श्रवण से ही सम्भव हो पाता है। ऋषियों द्वारा अनुभूत ज्ञान या वेदों में लिखा ज्ञान- प्रमाण कहा जा सकता है। अनुमान के आधार पर भी ज्ञान तक पहुँचा जा सकता है। यथा ठंडी हवाओं से पास में ही वर्षा होने का अनुमान । विभिन्न स्रोतों से ज्ञान को परखना, प्रयोग के बाद निष्कर्ष पर पहुँचना । तथा समाधि - गूढ़ प्रश्नों का समाधि लगाकर हल ढूँढ़ना ब्रह्मानुभूति की प्रक्रिया का एक श्रेष्ठ साधन है।

शिक्षण विधियाँ

(TEACHING METHODS)

वेदान्त दर्शन के अनुरूप निम्नलिखित शिक्षण विधियों का अनुमान लगाया जा सकता है-

(i) सूत्र विधि-

सूत्र के आधार पर विस्तार करना। समस्त वेद सूत्रों में ही हैं। इन सूत्रों के विस्तार ही आज टीकाओं के रूप में उपलब्ध हैं।

(ii) वाद-विवाद-

वाद-विवाद एक प्राचीन शिक्षण की परम्परा रही है। एक समस्या पर समूह द्वारा या अनेक विद्वानों द्वारा विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा करन इसके अन्तर्गत आता है।

(iii) पहेली - 

इस विधि में एक समस्या पहेली के रूप में प्रस्तुत कर समाधान खोजा जाता है। आज की 'खोज प्रशिक्षण मॉडल' उसी पहेली का ही विकसित रूप है।

(iv) कथा-प्रणाली- 

नैतिक उपदेश या शिक्षा के लिए इस प्रणाली का उपयोग किया जाता था।

(v) व्याख्यान-

ऋषियों के उपदेश, प्रश्नोत्तर, जटिल समस्याओं पर व्याख्यान इस दर्शन के अनुरूप हैं।

(vi) संश्लेषण प्रणाली -

समस्या के विभिन्न पक्षों पर पृथक्-पृथक् दृष्टियों से विचार करना इस विधि के अन्तर्गत आता है।

अनुशासन (DISCIPLINE)

वेदान्त के अनुसार आत्मानुशासन ही प्रमुख अनुशासन है। वस्तुतः कोई भी छात्र तब तक ज्ञान ग्रहण नहीं कर सकता जब तक स्वयं उसमें पात्रता न हो व स्वयं की जिज्ञासा न हो। ज्ञान प्राप्ति की उत्कृष्ट अभिलाषा वाला विद्यार्थी ही वेदों की शिक्षा ग्रहण कर सकता है। अतः ऐसा विद्यार्थी एक ओर जहाँ वेद की शिक्षा में रुचि लेता है, वहीं अनुशासित भी रहता है।

आत्म संयम्, उचित अनुचित का विचार, श्रेयस प्रेयस का विचार व उचित व श्रेयस का अनुसरण उनकी दैनिक नैतिक चर्चा में आता है। कदाचित ही इन्द्रियों के वशीभूत होने पर अनुचित आचरण पर ही अनुशासन की कोई बात आती है। इसे असामान्य ही माना जा सकता है।

वेदान्त के अनुसार शिक्षा व्यवस्था की आज भी देश की आवश्यकता है। भौतिक दौड़ में भ्रमित (माया के प्रभाव से) मानव को सही आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा से ही आनन्दमय जीवन की सही शिक्षा दी जा सकती है।

Kkr Kishan Regar

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