भारतीय संविधान : उद्देशिका, विशेषताएँ, नागरिकों के मूल अधिकार

भारतीय संविधान की उद्देशिका का विस्तार से वर्णन कीजिए। 

भारतीय संविधान की उद्देशिका

भारतीय संविधान की उद्देशिका में निम्नलिखित तथ्य सम्मिलित हैं- 
(1) हम भारत के लोग, भारत को भारत के संविधान का निर्माण और अधिनियम भारत के लोगों ने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से किया है न कि इसे किसी राजा या बाहरी व्यक्ति ने दिया है। संविधान का अंतिम स्रोत भारतीय जनता है। 
( 2 ) प्रभुत्व सम्पन्न – संविधान द्वारा भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र घोषित किया गया है । वह किसी दूसरे राष्ट्र के अधीन नहीं है वरन् अपने आन्तरिक और बाह्य मामलों में पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। 
( 3 ) धर्म निरपेक्ष- संविधान द्वारा भारत को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया है । नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने की पूर्ण स्वतंत्रता है। राज्य का अपना कोई 
राज्य धर्म नहीं है। राज्य की दृष्टि से सभी धर्म समान है। 
( 4 ) समाजवादी - समाज में सम्पदा सामूहिक रूप से पैदा होती है और समाज में उसका बँटवारा समानता के साथ होना चाहिए। सरकार जमीन और उद्योग-धंधों की हकदारी से कायदे-कानून इस तरह बनाए कि सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ कम हों ।  
( 5 ) लोकतंत्रात्मक लोकतंत्रात्मक से आशय सरकार का एक ऐसा स्वरूप जिसमें लोगों को समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। लोग अपने शासन का चुनाव करते हैं और उसे जवाबदेह बनाते हैं। यह सरकार कुछ बुनियादी नियमों के अनुरूप चलती है। 
( 6 ) गणराज्य शासन का प्रमुख, लोगों द्वारा चुना हुआ व्यक्ति होगा न कि किसी वंश या राज खानदान का । 
( 7 ) न्याय- नागरिकों के साथ उनकी जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। 
( 8 ) स्वतंत्रता - नागरिक कैसे सोचें, किस तरह अपने विचारों को अभिव्यक्त करें और अपने विचारों पर किस तरह अमल करें। इस पर अनुचित पाबंदी नहीं है। 
( 9 ) समता-कानून के समक्ष सभी लोग समान है। पहले से चली आ रही सामाजिक असमानाताओं को समाप्त करना होगा। सरकार हर नागरिक को समता का अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था करें। 
उद्देशिका,  विशेषताएँ, नागरिकों के मूल अधिकार


भारतीय संविधान की विशेषताएँ बतलाइए । 

भारतीय संविधान की विशेषताएँ

भारतीय संविधान एक उच्च कोटि की रचना है जिसे गहन चिन्तन के बाद तैयार किया गया। यह अपनी सामग्री तथा भावना की दृष्टि से अनोखा है। इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा आयरलैंड से भी कुछ विशेषताएं ग्रहण की हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- 

सम्पूर्ण सत्ता सम्पन्न लोकतन्त्रतात्मक गणराज्य - 

संविधान की प्रस्तावना में भारत के सम्पूर्ण सत्ता सम्पन्न गणराज्य होने की व्यवस्था की है। इसके सम्पूर्ण सत्ता सम्पन्न होने का अर्थ यह है कि भारत अब किसी साम्राज्य के अधीन नहीं है, और न किसी पर निर्भर है। भारत अब अन्य राज्यों की तरह पूर्ण स्वतंत्र एवं सत्ताधारी है। किसी बाहरी शक्ति को इसकी विदेश नीति पर नियन्त्रण रखने अथवा आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। 
भारत में लोकतंत्र भी है। इसकी राज्य सत्ता इनके नागरिकों में निहित है, जिनके द्वारा चुने हुए व्यक्ति उनके प्रतिनिधि बनकर शासन कार्य चलाते हैं। भारत के प्रत्येक नागरिक को, चाहे वह किसी भी धर्म, वर्ग तथा जाति का है, राज्य की ओर से समान अधिकार प्राप्त है। 
संविधान हमारे देश को एक गणराज्य घोषित करता है। हमारा देश गणराज्य इसलिए है कि देश का सर्वोच्च पदाधिकारी राष्ट्रपति जनता के प्रतिनिधियों द्वारा एक निश्चित समय के लिए चुना जाता है। 

पंथ निरपेक्ष राज्य की स्थापना - 

संविधान भारत में पंथ निरपेक्ष राज्य की स्थापना करता है। 42वें संशोधन द्वारा पंथ निरपेक्ष शब्द को जोड़ दिया है। संविधान नागरिकों के लिए विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखता है। यही भावना भारत को पंथ निरपेक्ष राज्य बनाती है। धर्म के आधार पर राज्य नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करता। राज्य धर्म के मामले में पूर्ण रूप से तटस्थ है। भारत के पंथ निरपेक्ष राज्य में रहने वाले सब व्यक्तियों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है। वे अपनी इच्छा से किसी धर्म को अपना सकते हैं या छोड़ सकते हैं। उन्हें अपने पंथ (धर्म) का पालन एवं प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता है । अत: भारत में धर्म (पंथ) मनुष्य का एक व्यक्तिगत मामला है। 

संसदीय शासन प्रणाली- 

भारतीय संविधान द्वारा हमारे देश में संसदीय शासन- प्रणाली की स्थापना की गई है। इसी कारण से राज्य तथा केन्द्र में इस शासन पद्धति के मूल सिद्धान्तों को अपनाया गया है। परिणामस्वरूप केन्द्र में राष्ट्रपति व राज्यों में राज्यपाल दोनों संवैधानिक प्रमुख हैं। उनके पास केवल नाम मात्र की शक्तियाँ हैं। शासन की वास्तविकता सत्ता मन्त्रि परिषद के पास है जो व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी है। मन्त्री परिषद केवल उसी समय तक शासन कार्य चलाती है, जब तक कि उसे व्यवस्थापिका में बहुमत रखने वाले दल का समर्थन प्राप्त होता है। 
कठोर एवं लचीला संविधान भारतीय संविधान में कठोर एवं लचीले दोनों संविधान की विशेषताएँ पाई जाती है। पूर्ण रूप से कठोर संविधान को अच्छा संविधान नहीं कहा जा सकता। एक अच्छे संविधान का यह गुण होता है कि उसमें इतनी कठोरता न हो कि उसे परिवर्तित न किया जा सकें। साथ ही इतना लचीला भी न हो कि सरलता से जब चाहे बदल दिया जाय। इसलिए संविधान निर्माताओं ने संविधान में कुछ धाराओं में परिवर्तन या संशोधन की प्रक्रिया को कठोर बनाया है। अन्य कुछ धाराएँ ऐसी हैं जिनमें साधारण रीति से अर्थात् दो तिहाई बहुमत से परिवर्तन किया जा सकता है। एक प्रगतिशील संविधान में संशोधन करने की गुंजाइश अवश्य रहनी चाहिए। 
एकल नागरिकता- भारत में संघीय व्यवस्था है। प्रायः संघ शासन में दो प्रकार की नागरिकता प्रदान की जाती है। एक तो उस राज्य की जहाँ व्यक्ति रहता है, दूसरी केन्द्र या संघ की नागरिकता। संघ शासन होते हुए भी भारत में संविधान द्वारा एक ही नागरिकता समस्त नागरिकों को प्रदान की गई है। वह है भारतीय नागरिकता। देश की एकता व अखण्डता के लिए यह आवश्यक है। 

संघात्मक तथा एकतात्मक शासन- 

भारत के संविधान में संघ एवं एकात्मक दोनों शासन की विशेषताएँ पाई जाती हैं। एक संघ शासन के लिए लिखित संविधान, केन्द्र एवं राज्यों में अधिकारों का विभाजन तथा स्वतंत्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है। ये तीनों ही संघात्मक तत्व हमारे संविधान में हैं। भारत का संविधान लिखित है। केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकारों का विभाजन तीन सूचियों के द्वारा किया गया है। इन 
कुछ अधिकारों के सम्बन्ध होने वाले विवादों से बचने के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है। अतः हमारे देश में संघीय शासन है। भारत के संविधान में एकात्मक शासन के लक्षण भी पाये गये हैं। भारत के राज्यों को संघ से पृथक होने का अधिकार नहीं है। संविधान एकल नागरिकता की व्यवस्था करता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पूरे देश में माने जाते हैं। संकटकाल में केन्द्र सरकार राज्यों के अधिकार छीन लेती है। राज्यों को केन्द्र के बराबर अधिकार भी नहीं दिये गये हैं। अन्य रीतियों से भी प्रशासकीय एकात्मकता लाने का भी प्रयास किया गया है। 
वयस्क मताधिकार हमारे संविधान में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई है। प्रारम्भ में इक्कीस वर्ष पूर्ण करने वाले व्यक्ति व्यस्क माना जाता था बाद में संशोधन करके यह आयु कम कर दी गई तथा अब हमारे संविधान में देश के प्रत्येक नागरिक को 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेने पर मत देने का अधिकार दिया है। इस अधिकार से देश के अधिक से अधिक नागरिक अपने प्रतिनिधियों को चुनने एवं शासन संचालन में अपना हाथ बँटाते हैं। देश के शासन की सहभागिता में यह विशेषता अधिक योगदान देती है। 

मौलिक अधिकार- 

हमारे संविधान में मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है। ये अधिकार नागरिकों के व्यक्तित्व के विकास के लिए परम आवश्यक हैं। संविधान निर्माताओं ने इन अधिकारों को साधारणतया सात भागों में बाँटा है- जैसे समानता का अधिकार, शिक्षा व संस्कृति का अधिकार, सम्पत्ति का अधिकार संवैधानिक उपचारों का अधिकार। इनमें से सम्पत्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है। कानून के सामने सभी नागरिकों को समान समझा गया है। भारतीय नागरिकों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है। संविधान में केवल अधिकारों की घोषणा ही नहीं की गई है, बल्कि उनको लागू करने की उचित व्यवस्था भी की गई है। प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय के पास अपील करने का अधिकार है। संकट काल में ये अधिकार समाप्त हो जाते हैं। 
राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त- भारतीय संविधान के भाग चार में कुछ ऐसे आदर्शों तथा उद्देश्यों का विवरण दिया गया है जो केन्द्र व राज्य सरकारों के लिए मार्ग दर्शन का काम करते हैं। ये सिद्धान्त देश की सरकारों तथा शासन नीतियों को निर्धारित करते समय सामने रखे जाते हैं। इनके लागू होने पर भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना होगी। ये सिद्धान्त समाजवादी, आर्थिक व गाँधीवादी विचारों के अनुकूल है। इन सिद्धान्तों ने लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण में भी सहायता की है। ये सिद्धान्त ही भारत में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना करते हैं। 

स्वतंत्र न्यायपालिका— 

भारतीय संविधान में स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की गई है। न्यायाधीशों की नियुक्ति उनके वेतन तथा कार्य काल के सम्बन्ध में ऐसे नियम बनाये हैं कि वे बिना किसी भय या पक्षपात के अपना कार्य कर सकते हैं क्योंकि उन्हें अपने पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यन्त कठिन है। न्यायाधीशों की शक्तियों तथा अधिकारों को संविधान में स्थान दिया गया है और भारतीय संसद उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकती। न्यायपालिका को व्यवस्थापिका द्वारा पारित विधेयकों व अध्यादेशों के पुनरावलोकन का अधिकार भी दिया गया है। 

लिखित एवं विशाल संविधान - 

हमारे मूल संविधान में 395 धाराएँ तथा 9 अनुसूचियाँ थी। इसमें पिछड़ी हुई जातियों, अल्पसंख्यक वर्गों के लिए संवैधानिक व्यवस्था की गई है। संघात्मक ढाँचे को स्पष्ट करने के लिए भी लिखित रूप दिया गया है। सभी उच्च पदाधिकारियों की शक्तियों को लिखित रूप दिया गया ताकि विवाद उत्पन्न नहीं हो सके। इसी कारण से संविधान को अच्छी तरह से समझने के लिए भी उसका लिखित रूप होना आवश्यक था। संसार के विभिन्न संविधानों की विशेषताओं को ग्रहण करने के कारण भी यह संविधान विशाल बन गया। इस विशाल संविधान को बनाने में 2 वर्ष 11 महीने तथा 18 दिन लगे। 

एक राष्ट्र भाषा - 

भारत के संविधान में जहाँ क्षेत्रीय भाषाओं के विकास की पूरी सुविधाएँ प्रदान की है, वहां राष्ट्रीय एकता और सम्पर्क भाषा के रूप में देवनागरी लिपि में हिन्दी को राष्ट्र भाषा घोषित किया है। संविधान हिन्दी भाषा के विकास के लिए भी विशेष निर्देश देता है। 

शान्ति का समर्थक 

भारत अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा का इच्छुक है। वह राष्ट्रों के बीच न्याय और सम्मानपूर्वक सम्बन्धों को स्थापित करना चाहता है तथा विवादों के निपटाने के लिए शान्तिमय साधनों पर बल देता है। वह किसी दूसरे देश की सीमाओं का अतिक्रमण करना नहीं चाहता है और न ही किसी देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहता है । 

नागरिकों के मूल अधिकारों का वर्णन कीजिए 

नागरिकों के मूल अधिकार

आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्यों का प्रमुख उद्देश्य राज्य का बहुमुखी विकास करना है। यह तभी संभव है जब नागरिकों को विकास के लिए अधिकार प्रदान किये जाये। अधिकार वे शर्तें हैं जिनके आधार पर नागरिक अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकें। मूल अधिकार वे अधिकार हैं जो नागरिकों को संविधान द्वारा प्राप्त होते हैं जिनकी रक्षा की गारन्टी संविधान देता है। ये अधिकार नागरिकों को बिना भेदभाव के दिये गये हैं। 
मूल अधिकार हमारे अन्य अधिकारों से भिन्न हैं । जहाँ साधारण कानूनी अधिकारों को सुरक्षा देने और लागू करने के लिए साधारण कानूनों का सहारा लिया जाता है, वहीं मौलिक अधिकारों की गारन्टी और उनकी सुरक्षा स्वयं संविधान करता है। सामान्य अधिकारों को संसद कानून बना कर परिवर्तित कर सकती है लेकिन मौलिक अधिकारों में परिवर्तन के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता है। इसके अलावा सरकार का कोई भी अंग मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर सकता। सरकार के कार्यों से मौलिक अधिकारों के हनन को रोकने की शक्ति और इसका उत्तरदायित्व न्यायपालिका के पास है। विधायिका या कार्यपालिका के किसी कार्य या निर्णय से यदि मौलिक अधिकारों का हनन होता है या उन पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाया जाता है तो न्यायपालिका उसे अवैध घोषित कर सकती है। लेकिन मौलिक अधिकार निरंकुश या असीमित अधिकार नहीं है। सरकार मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर औचित्यपूर्ण प्रतिबन्ध लगा सकती है। 
समानता का अधिकार समानता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ है संविधान में कहा गया है कि भारतीय राज्य क्षेत्र में हर व्यक्ति कानून के सामने समान समझा गया है। उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाता है। इसके अलावा सामाजिक समानता की भी स्थापना की गई है। इसीलिए ब्रिटिश राज द्वारा दी गई उपाधियों का अन्त किया गया तथा छूआछूत को भी समाप्त किया गया है। सरकारी सेवाओं में भी धर्म, मूल, वंश जाति व लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया गया है । 
समता के अधिकार से यह स्पष्ट है कि अधिकार बिना किसी भेदभाव के नागरिकों को प्राप्त हैं । 

स्वतंत्रता का अधिकार— 

समानता की भाँति स्वतंत्रता भी लोकतंत्र का आधार स्तम्भ है। संविधान में सात प्रकार की स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लेख किया गया है। नागरिकों को भाषण एवं लेखन तथा विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। शान्ति के समय तथा अस्त्र-शस्त्र रहित इकट्ठे होने की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। भारतीय नागरिकों को संस्था एवं संघ के रूप में संगठित होने की स्वतंत्रता है । भारतीय नागरिकों को भारत के किसी भी भाग में भ्रमण करने की स्वतंत्रता दी गई है। निवास की एवं सम्पत्ति उपार्जन की स्वतंत्रता दी गई है। लेकिन सार्वजनिक हित में राज्य इन पर प्रतिबन्ध लगा सकता है। 
शोषण के विरुद्ध अधिकार कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण नहीं करेगा। संविधान द्वारा स्त्रियों व बच्चों का क्रय-विक्रय करना, बेगार लेना अपराध माना गया है परन्तु राज्य सार्वजनिक हित में नागरिकों को किसी सेवा के लिए बाध्य कर सकता है। चौदह वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखाने, खानों अथवा संकटमय कार्यों में नहीं लगाया जायेगा। 

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार— 

इसके अनुसार प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म को अपनाने उसका पालन एवं प्रचार करने तथा समान रूप से अपने अन्तःकरण की स्वतंत्रता का उपभोग करने का अधिकार है। राज्य द्वारा किसी भी धार्मिक मामलों में 
हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। लेकिन राज्य द्वारा सदाचार, सार्वजनिक व्यवस्था तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से रोक लगाई जा सकती है। धार्मिक शिक्षा के संबंध में यह कहा गया है कि राजकीय शिक्षण संस्थाओं में किसी धर्म विशेष की शिक्षा नहीं दी जायेगी। 
शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार- हमारे संविधान के द्वारा भारतीय नागरिकों को संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार दिये गये हैं। नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को अपनी भाषा, लिपि व संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार दिया गया है। किसी भी राजकीय या सहायता प्राप्त शिक्षण संस्था में जाति, धर्म, वंश या भाषा के आधार पर प्रवेश में कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। सभी वर्ग व सम्प्रदाय अपनी रुचि के अनुसार निजी शिक्षण संस्थाएँ खोल सकते हैं, ऐसी शिक्षण संस्थाओं को राजकीय अनुदान देते समय राज्य, धर्म, भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। 
सम्पत्ति का अधिकार संविधान में सम्पत्ति के अधिकार की व्याख्या की गई है। इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जायेगा। उसकी चल व अचल सम्पत्ति पर सार्वजनिक अधिकार नहीं किया जायेगा जब तक सरकार द्वारा उचित मुआवजा नहीं दिया जाता। मुआवजे के सम्बन्ध में संसद का निर्णय अन्तिम होगा। 44वें संशोधन द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की श्रेणी से निकाल दिया । फलस्वरूप अब इसे मौलिक अधिकारों में नहीं गिना जाता । 

संवैधानिक उपचारों का अधिकार- 

इस प्रकार का अधिकार संसद के कानून द्वारा राज्यों के उच्च न्यायालयों को भी अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत प्रदान किया गया है। मूल अधिकारों की रक्षा हेतु सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय निम्न लेख जारी करने का अधिकार रखते हैं- 
( 1 ) बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख यह लेख उन परिस्थितियों में जारी किया जाता है जब न्यायालय के सम्मुख किसी को अवैद्य रूप से बन्दी बनाये जाने संबंधी याचिका प्रस्तुत की गई हो, 
( 2 ) परमादेश- इसका अर्थ है हम आज्ञा देते हैं - यह आदेश प्राय: सार्वजनिक कर्त्तव्यों को पूरा करने के लिए जारी किया जाता है। 
(3) प्रतिषेध लेख - इस लेख का प्रयोग ऊपरी न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालय को उनके अधिकार क्षेत्र अथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का उल्लंघन करने से रोकने के लिए किया जाता है । 
( 4 ) उत्प्रेषण लेख- इसका अर्थ है पूर्ण रूप से सूचित करना । यह लेख ऊपरी न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालयों को जारी किया जा सकता है। 
(5) अधिकार पृच्छा - इसका अर्थ है किस आज्ञा से । यह लेख जब जारी किया जाता है जब न्यायालय यह अनुभव करे कि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य कर रहा है जिसका उसे कानून की दृष्टि से करे का कोई अधिकार नहीं है। मौलिक अधिकारों में यह अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है। इसको हटा देने पर सभी अधिकारों का महत्व समाप्त हो जाता है। राष्ट्रपति द्वारा संकट की घोषणा किये जाने पर सभी प्रकार की स्वतंत्रताएँ समाप्त की जा सकती हैं तथा अधिकार भी स्थगित किये जा सकते हैं। 

समानता का संवैधानिक दृष्टिकोण क्या है?

समानता का संवैधानिक दृष्टिकोण

संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति विधि के समक्ष समान है। किसी व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान; जैसे- होटल, सिनेमाघर, कुआँ, पूजा स्थल, दुकान आदि के प्रयोग पर जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। अस्पृश्यता को गैर कानूनी माना गया है। 
संविधान के अनुसार सभी लोग चाहे वह कोई भी जाति, लिंग, रंग-रूप, उम्र के हो अपने वैयक्तित्व का विकास कर सकता है। अपने धर्म का प्रचार कर सकता है। अपने भाषा, संस्कृति के विकास के लिए वह पूरी तरह स्वतंत्र है। क्योंकि संवैधानिक दृष्टिकोण से भेदभाव को अवैध माना गया है तथा कानून के समक्ष सभी लोग समान है सबको समान अधिकार है। 
संवैधानिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण के मध्य अंतराल - संविधान एवं सामाजिक दृष्टिकोण के मध्य समानता के अधिकार में बहुत अंतर पाया जाता है इसको हम निम्न रूपों में देख सकते हैं- 
(1) राष्ट्रीयता - संविधान सभी वर्ग के लोगों को एक दृष्टि से देखता है लेकिन समाज में यह धारणा गलत है। समाज के लोग पहले समाज को देखते हैं फिर राष्ट्र को । 
( 2 ) वर्ग के आधार पर - संविधान के अनुसार सभी जाति, धर्म, भाषा के लोगों को समान अधिकार है लेकिन समाज के लोग अपने से निम्न वर्ग को हेय कि दृष्टि से देखते हैं और समाज में उनका अधिकार नीचे होता है उनको विकास का अवसर नहीं मिलता। 
(3) लड़के और लड़की में फर्क—संविधान में लड़का और लड़की एक समान है। सभी को शिक्षा, रोजगार में समान अवसर मिलते हैं लेकिन समाज में लड़की के प्रति गलत धारणा है कि लड़की शिक्षा प्राप्त करके क्या करेगी। लड़की का काम घर का कामकाज करना होता है। इसी के चलते लड़कियों को विकास का कम अवसर मिलता है। 
( 4 ) धर्म के आधार पर समाज में धर्म के आधार पर हुई गलत विचारधारा एवं षड्यंत्र होता है लेकिन संविधान में सभी धर्म को समान अधिकार है। सभी अपने धर्म का प्रचार कर सकता है। 
(5) जाति एवं भाषा-समाज में उच्च वर्ग के लोग अपने से निम्न जाति के लोगों को हेय की नजर से देखते हैं तथा भाषा के नाम पर लड़ाई-झगड़े करते हैं। लेकिन संविधान में जाति एवं भाषा के आधार पर सभी को समान दृष्टि से देखा जाता है। 
( 6 ) संसाधनों का निवेश / उपयोग संविधान के अनुसार राष्ट्रीय सामग्री एवं संसाधन पर सभी का अधिकार है लेकिन समाज में इसका उपयोग पूँजीपति एवं उच्च वर्ग के लोग कहते हैं। 
(7) अंधविश्वास समाज में अंधविश्वास व्यापक रूप में देखने को मिलता है; जैसे- लड़कियों की शिक्षा में कमी, महिलाओं का निम्न स्थान, धर्म के प्रति आडम्बर आदि लेकिन संविधान में सभी समान हैं। 

संवैधानिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण के मध्य संतुलन - 
संवैधानिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण के मध्य संतुलन बनाने के लिए निम्न उपाय कर सकते हैं – 
(1) संवैधानिक अधिकार के नियम को सुचारू रूप से चलाने के लिए कठोर कानून का प्रावधान होना चाहिए इसके विरुद्ध जाने वाले को कड़ी सजा हो।
(2) सभी गाँव एवं शहर के लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाना चाहिए कि सभी जाति, धर्म, रंग-रूप एक है। 
(3) सामाजिक अंधविश्वास को दूर करने के लिए अपने जाति-धर्म, कर्त्तव्य, अधिकार के बारे में समझाना चाहिए। 
(4) लड़का-लड़की को समान समझना चाहिए तथा लड़की की शिक्षा के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। 
(5) राष्ट्र के सम्पत्ति में सभी वर्ग, जाति, धर्म के लोगों को समान रूप से बाँटना चाहिए। 
(6) पिछड़े एवं निम्न जाति के लोगों के विकास के लिए सरकार द्वारा उनको छूट (आरक्षण) दे ताकि वे पूँजी की कमी महसूस न करते हुए शिक्षा ग्रहण करें एवं अपना विकास करें। 
(7) समाज के सभी वर्ग को विकास का समान अवसर प्रदान करना चाहिए। 

भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को कुछ मूलभूत अधिकार प्रदान किये हैं। वे मौलिक अधिकार के रूप में जाने जाते हैं। वे मूलभूत इसलिए हैं कि वे सभ्य मानव के अस्तित्व के लिये आवश्यक है । सभ्य मानव को तैयार विद्यालय में किया जाता है । अतः मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने में शिक्षा की भूमिका प्रधान होती है; जैसे 
(1) समता का अधिकार-समता का अधिकार के अन्तर्गत किसी व्यक्ति के साथ राज्य भेदभाव नहीं करेगा। यह राज्य को धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। यह रोजगार के अवसर प्रदान करने में समानता का निर्वाह करता है । इस समता का अधिकार का महत्त्व विद्यालय में सिखाया जाता है विद्यालय में प्रवेश के समय किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता। विद्यालय में रोजगार के अवसर प्रदान करने में समानता होती है, अतः शिक्षा इस मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करती है । 
( 2 ) स्वतंत्रता का अधिकार- शिक्षा प्राप्त करने के लिए देश के सभी व्यक्ति स्वतंत्र होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बोलने या अभिव्यक्त करने का अधिकार होता है। विद्यार्थी अपने विषय चुनने के लिये स्वतंत्र होते हैं। अतः स्वतंत्रता का अधिकार सभी को होता है यह शिक्षा हमें बताती है । 
( 3 ) शोषण के विरुद्ध अधिकार-शिक्षा प्राप्त करके ही व्यक्ति समझ पाता है कि उसका शोषण हो रहा है। अतः शिक्षित व्यक्ति को कोई शोषण नहीं कर सकता, वह दूसरों को भी शोषित होने से बचाता है । 
( 4 ) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार- विद्यालय में विद्यार्थी को सभी धर्मों पर आधारित त्यौहारों को मनाया जाता है। सभी शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षण के लिये किसी भी व्यक्ति को अनुमति नहीं होती परन्तु किसी भी धर्म को स्वीकारने, उसके अनुसार आचरण करने तथा उसे प्रसारित करने का अधिकार है। अतः शिक्षण संस्थानों में सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है। 
(5) सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार – शिक्षण संस्थाओं द्वारा नागरिकों के हर वर्ग की अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा तथा लिपि आदि की रक्षा हो रही है। धार्मिक तथा भाषिक रूप से अध्यापकों को अपनी पसन्द की शैक्षणिक संस्था को स्थापित करने तथा उसकी व्यवस्था करने का अधिकार होता है। शिक्षा द्वारा हमारी सांस्कृतिक धरोहर ही रखवाली तथा विकास किया जा रहा है। 

भारतीय संविधान की दक्षिणी अफ्रीका के संविधान से तुलना कीजिए। 

भारतीय संविधान की दक्षिणी अफ्रीका और भारत एक तुलना -

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् 26 जनवरी, 1950 से भारत का संविधान लागू किया गया। इसके अनुसार भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसके सर्वप्रथम राष्ट्रपति थे । भारतीय संविधान ने नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए। मौलिक अधिकार अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं । जहाँ साधारण कानूनों को लागू करने के लिए भी कानूनों का सहारा लिया जाता है। वहीं मौलिक अधिकारों की गारण्टी और उनकी सुरक्षा स्वयं संविधान करता है । सामान्य अधिकारों को संसद कानून बनाकर परिवर्तन कर सकती है, परन्तु मौलिक अधिकारों में परिवर्तन के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता है। इसके अलावा सरकार का कोई भी अंग मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर सकता । 
हमारे संविधान के आधार पर ही दक्षिणी अफ्रीका का संविधान तैयार किया गया जिसे दिसम्बर, 1996 में लागू किया। 

दक्षिण अफ्रीका के संविधान में अधिकारों का घोषणा-पत्र- 

दक्षिण अफ्रीका का संविधान दिसम्बर, 1996 में लागू हुआ। इसे तब बनाया और लागू किया गया जब रंगभेद वाली सरकार के हटने के बाद दक्षिण अफ्रीका गृहयुद्ध के खतरे से जूझ रहा था । दक्षिण अफ्रीका के संविधान के अनुसार 'उसके अधिकारों का घोषणापत्र दक्षिण अफ्रीका में प्रजातंत्र की आधारशिला है।' यह नस्ल, लिंग, गर्भधारण, वैवाहिक स्थिति, जातीय या सामाजिक मूल, रंग, आयु, अपंगता, धर्म, अन्तरात्मा, आस्था, संस्कृति, भाषा और जन्म के आधार पर भेदभाव वर्जित करता है। यह नागरिकों को सम्भवतः सबसे ज्यादा व्यापक अधिकार देता है। संवैधानिक अधिकारों को एक विशेष संवैधानिक न्यायालय लागू करता है। 
दक्षिण अफ्रीका के संविधान में सम्मिलित कुछ प्रमुख अधिकार निम्न हैं- 
1. गरिमा का अधिकार । 
2. निजता का अधिकार । 
3. श्रम सम्बन्धी समुचित व्यवहार का अधिकार । 
4. स्वास्थ्यप्रद पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण का अधिकार । 
5. समुचित आवास का अधिकार । 
6. स्वास्थ्य सुविधाएँ, भोजन, पानी और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार । 
7. बाल अधिकार । 
8. बुनियादी और उच्च शिक्षा का अधिकार 1. 
9. सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई समुदायों का अधिकार । 
10. सूचना प्राप्त करने का अधिकार । 
विश्व के सभी प्रजातान्त्रिक देशों के संविधान की तुलना में भारतीय संविधान सर्वश्रेष्ठ है। सभी देश अपने देश के संविधान में भारतीय संविधान की अच्छी बातों का समावेश करते हैं। 

नागरिकों के मूल कर्त्तव्य 

भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्त्तव्य भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्त्तव्यों का भी उल्लेख है। शासन से अपेक्षा है कि मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करें, उनके उल्लंघन होने पर कोई में भी न्यायालय में जा सकता है और न्यायालय शासन को इस सम्बन्ध में आदेश दे सकता है, लेकिन मौलिक कर्त्तव्य के सम्बन्ध में नागरिकों से केवल आग्रह है कि वे इनका पालन करें। अगर कोई नागरिक ऐसा नहीं करता है तो उस पर कोई कानून कार्रवाई नहीं की जा सकती है, लेकिन ये महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि इनमें हमारे संविधान में निहित कई मूल्यों को स्पष्ट किया गया है। 
अनुच्छेद 51 (क) मूल कर्त्तव्य- 
भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह 
(क) संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करें। 
(ख) संविधान के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करना वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें। 
(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण बनाए रखें। 
(घ) देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें। 
(ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर सभी लोगों सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं । 
(च) हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्त्व समझे और उसका परीक्षण करें। 
(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखें। (ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें। 
(झ) सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहे । (ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाईयों को छू लें। 
(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह से चौदह वर्ष की आयु वाले, अपने यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए, शिक्षा के अवसर प्रदान करें। 

भारत की संघीय व्यवस्था का वर्णन कीजिए। 
भारत में संघीय व्यवस्था - 

भारतीय संविधान ने मौलिक रूप से द्विस्तरीय शासन व्यवस्था का प्रावधान किया था— संघ सरकार या हम जिसे केन्द्र सरकार कहते हैं और राज्य सरकारें । केन्द्र सरकार को पूरे भारतीय संघ का प्रतिनिधित्व करना था और राज्य सरकारों को अपने-अपने राज्य का। बाद में पंचायतों और नगरपालिकाओं के रूप में संघीय शासन का एक तीसरा स्तर भी जोड़ा गया। किसी भी संघीय व्यवस्था की तरह अपने यहाँ भी तीनों स्तर की शासन व्यवस्थाओं 
के अपने अलग-अलग अधिकार क्षेत्र हैं। संविधान में स्पष्ट रूप से केंन्द्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी अधिकारों को तीन हिस्सों में बाँटा गया है। ये तीन सूचियाँ इस प्रकार हैं- 
संघ सूची- इस सूची में रक्षा, विदेशी मामले, बैंकिंग, संचार और मुद्रा जैसे राष्ट्रीय महत्त्व के विषय हैं। पूरे देश के लिए इन मामलों में एक तरह की नीतियों की जरूरत है। इसी कारण इन विषयों को संघ सूची में डाला गया है। संघ सूची में वर्णित विषयों के बारे में कानून बनाने का अधिकार सिर्फ केन्द्र सरकार को है। 
राज्य सूची - इस सूची में पुलिस, व्यापार, कृषि और सिंचाई जैसे प्रान्तीय और स्थानीय महत्त्व के विषय है। राज्य सूची में वर्णित विषयों के बार में सिर्फ राज्य सरकार ही कानून बना सकती है। 
समवर्ती सूची - इस सूची में शिक्षा, वन, मजदूर संघ, विवाह, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे विषय हैं। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार, दोनों को ही है लेकिन जब दोनों के कानूनों में टकराव हो तो केन्द्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है। 
अवशिष्ट शक्तियाँ – इनमें से सभी मामले शामिल हैं जिनका उल्लेख किसी भी सूची में नहीं हुआ है; जैसे— साइबर कानून, इन विषयों पर केवल केन्द्रीय विधायिका ही कानून बना सकती है। 

भारत की भाषायी विविधता स्पष्ट कीजिए । 

भारत की भाषायी विविधता - 

भारत में कितनी भाषाएँ हैं? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप भाषाओं की गिनती किस तरह करते हैं। इस बारे में अधिकृत सूचना सन् 1991 की जनगणना के आँकड़ों से हासिल होती है। इस जनगणना में लोगों ने 1500 से ज्यादा अलग-अलग भाषाओं को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराया था। इन भाषाओं को कुछ प्रमुख भाषाओं में जोड़ दिया जाता है; जैसे- भोजपुरी, मगधी, बुन्देलखण्डी, छत्तीसगढ़ी, शेखावटी, मेवाड़ी, वागड़ी, ढूँढारी, भीली और ऐसी ही दूसरी भाषाओं को हिन्दी के अन्दर जोड़ दिया गया है। 
इसी तरह जोड़ने के बाद भी जनगणना में 114 प्रमुख भाषाएँ पाई गई। इनमें 22 भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा गया है और इसी कारण इन्हें अनुसूचित भाषाएँ कहा जाता है। बाकी को गैर-अनुसूचित भाषा कहते हैं । भाषा के हिसाब से भारत दुनिया का सम्भवतः सबसे ज्यादा विविधता वाला देश है। 
अनुसूचित भाषाओं के बारे में संविधान विशेष कुछ नहीं कहता, लेकिन संविधान राज्य से आशा करता है कि वह इन भाषाओं को बढ़ावा दे और उनकी शब्द सम्पदा से हिन्दी को भी समृद्ध करें ( अनुच्छेद 351) । संविधान में यह आशा की गई है कि हिन्दी का विकास इस तरह से होगा कि वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकें। इसमें अपेक्षा यह है कि देश में बोली जाने वाली तमाम प्रादेशिक भाषाओं के महत्त्व को कामय रखते हुए और उनकी शैली, शब्द सम्पदा आदि को ग्रहण करते हुए हिन्दी विकसित हो और वह देश में संवाद का माध्यम बन सकें। भारत का कोई भी नागरिक केन्द्र और राज्य सरकारों से अनुसूची में शामिल किसी भी भाषा में पत्र व्यवहार कर सकता है। 
आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं का विकास करना देश की शैक्षिक और सांस्कृतिक प्रगति के लिए भी जरूरी है। अनुसूचित भाषाओं के विकास और प्रोत्साहन के लिए सरकारी और गैर सरकारी साहित्यिक संस्थान प्रयास करते हैं; जैसे— राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 24 भाषाओं को साहित्यिक भाषा मानती है, जबकि नेशनल बुक ट्रस्ट अनुसूचित भाषाओं और अंग्रेजी को भारत की मुख्य भाषाएँ मानता है और उन भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करता है। भारतीय ज्ञानपीठ केवल अनुसूचित भाषाओं में लिखे साहित्य को पुरस्कार प्रदान करता है। 
अनुसूचित भाषाओं में शिक्षण और शिक्षण सामग्री के विकास के लिए भारतीय भाषा संस्थान गैर सरकारी संगठनों को सहायता देता है। इसी प्रकार शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी भाषाओं के विकास और प्रसार के लिए सहयोग करता है। भारत सरकार द्वारा आयोजित राष्ट्रीय फिल्म उत्सव में अनुसूचित भाषाओं में बनने वाली फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है और अन्य पुरस्कारों के अलावा प्रत्येक अनुसूचित भाषा के लिए श्रेष्ठ निर्देशक व श्रेष्ठ निर्माता के पुरस्कार भी दिए जाते हैं। 

अधिकार और कर्त्तव्यों के सम्बन्ध की विवेचना कीजिए । 

अधिकार एवं कर्त्तव्यों का सम्बन्ध -

अधिकार एवं कर्त्तव्यों का पारस्परिक सम्बन्ध निम्नलिखित रूपों में व्यक्त किया जा सकता है— 
(1) अधिकार और कर्त्तव्य दोनों ही माँग हैं— अधिकार और कर्त्तव्य दोनों ही व्यक्ति और समाज की अनिवार्य माँगें हैं। यदि अधिकार व्यक्ति की माँग है, जिन्हें समाज स्वीकार कर लेता है तो कर्त्तव्य समाज की माँग है जिन्हें व्यक्ति सार्वजनिक हित में स्वीकार करता है । वाइल्ड के शब्दों में कहा जा सकता है कि " अधिकार का महत्त्व कर्त्तव्यों के संसार में ही है।" अधिकार और कर्त्तव्य दोनों ही सामाजिकता पर बल देते हुए डॉ. बेनी प्रसाद ने लिखा है कि "दोनों ही सामाजिक हैं और दोनों ही तत्वत: सही जीवन की शर्तें हैं जो समाज के सभी व्यक्तियों को प्राप्त होनी चाहिए।" 
(2) कर्त्तव्य पालन में ही अधिकारों की प्राप्ति सम्भव- नार्मन वाइल्ड ने उचित ही कहा है कि " अधिकारों का महत्व केवल मात्र कर्त्तव्यों के संसार में है।" यदि समाज के सभी व्यक्ति सहयोग करेंगे तभी अधिकारों का अस्तित्व रह पायेगा और जब सहयोग की भावना का विकास होता है तभी कर्त्तव्य आ जाते हैं। वास्तव में, कर्त्तव्यों के पालन करने में अधिकारों के उपभोग का रहस्य छिपा हुआ है। 
( 3 ) एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे का कर्त्तव्य है— समाज में एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे व्यक्तियों का कर्त्तव्य होता है, उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति के जीवन- रक्षा का अधिकार समाज के दूसरे व्यक्तियों को कर्त्तव्यों में आबद्ध कर देता है कि वे उस व्यक्ति के जीवन-रक्षा के अधिकार में बाधा उपस्थित न करें। हमारा स्वतन्त्रता का अधिकार समाज का कर्त्तव्य है कि समाज के व्यक्ति मेरे स्वतन्त्रता के अधिकार में बाधक न हों। व्यक्ति अपने अधिकारों का उपभोग तभी कर पाता है जब समाज के व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हैं। 
(4 ) एक व्यक्ति का अधिकार स्वयं उसका कर्त्तव्य है— समाज में प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार स्वयं उसका कर्त्तव्य है । यदि एक व्यक्ति चाहता है कि वह अपने अधिकारों का उपभोग बिना किसी बाधा के कर सके और समाज में लोग उसके अधिकार में बाधा उपस्थित न करें तो उसका कर्त्तव्य है कि वह उसी प्रकार के दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता प्रदान करें तथा उनके अधिकारों के उपभोग में बाधा उपस्थित न करे, उदाहरण के लिए, यदि हम अपने विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार को सुनिश्चित करना चाहते हैं तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम समाज के दूसरे व्यक्तियों की विचार-अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित न करें। इस प्रकार एक व्यक्ति का अधिकार स्वयं उसका कर्त्तव्य है। डॉ. बेनी प्रसाद ने ठीक ही कहा है कि “यदि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने अधिकार का ही ध्यान रखे तथा दूसरों के प्रति कर्त्तव्यों का पालन न करे तो शीघ्र ही किसी के लिए भी अधिकार नहीं रहेंगे।" 
(5) अधिकारों के प्राप्त होने पर ही कर्त्तव्य पालन सम्भव है— कुछ विचारकों का मत है कि राज्य में व्यक्ति के कर्त्तव्य ही होने चाहिए, अधिकार नहीं । यह धारणा गलत है। बिना अधिकारों के व्यक्ति कर्त्तव्य पालन के योग्य नहीं बन सकता। अधिकारों की प्राप्ति से व्यक्ति अपना विकास कर इस योग्य बनता है कि वह समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन सम्यक् रूप से कर सकता है। 
( 6 ) व्यक्ति का अधिकार समाज और राज्य का कर्त्तव्य है— व्यक्ति अपने अधिकारों का उपभोग तभी कर सकता है, जबकि समाज और राज्य अपने कर्त्तव्यों का पालन करें। अधिकारों का अस्तित्व समाज की स्वीकृति और राज्य के संरक्षण पर आधारित है। यदि राज्य अपने कानूनों के द्वारा नागरिकों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान न करे तो नागरिकों के अधिकार महत्वहीन हो जाते हैं। 
(7) नागरिकों के अधिकार राज्य के प्रति कर्त्तव्य उत्पन्न करते हैं— राज्य नागरिकों के विकास के लिए विविध सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों को प्रदान करता है । अत: नागरिकों का कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करें । राज्य के प्रति भक्ति भावना रखना, राज्य के कानूनों का पालन करना, राज्य द्वारा लगाये गये करों का भुगतान करना तथा संकट के समय राज्य के प्रति अपने को समर्पित करने का नागरिकों का पुनीत कर्त्तव्य है। नागरिकों के कर्त्तव्य पालन पर ही राज्य नागरिकों को अधिकतम के लिए सुविधाएँ प्रदान करने के लिए सक्षम होता है। 
उपर्युक्त के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिकार एवं कर्त्तव्य एक ही वस्तु अथवा सिक्के के दो रूप हैं। एक के हट जाने से दूसरे का भी महत्व समाप्त हो जाता है। अधिकार कर्त्तव्यों के संसार में ही उत्पन्न होते हैं। प्रत्येक अधिकार अपने साथ एक कर्त्तव्य लाता है तथा प्रत्येक कर्त्तव्य की पूर्ति हेतु अधिकार आवश्यक है। 

राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों का वर्णन कीजिए। 

राज्य की नीति के निर्देशक तत्व - 

राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों का संविधान के भाग चार में वर्णन किया गया है। ये तत्व हमारे संविधान के निर्माताओं ने आयरलैण्ड के संविधान से लिए हैं। भारत में इनकी स्थापना के लिए काफी प्रयत्न किये गये है। संविधान द्वारा राज्यों को यह आदेश प्रदान किया जाता है कि वे इन कार्यों के प्रति उदार नीति अपनाएँ। इन्हें राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त कहा जाता है। नीति निर्देशक तत्वों के उद्देश्यों का वर्णन संविधान में इस प्रकार किया गया है- " अधिक से अधिक सक्रिय रूप से एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना तथा उसकी सुरक्षा करना है, जिसमें आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय की प्राप्ति हो सके।" उनके पालन द्वारा देश का कल्याण होता है, लेकिन संविधान का कोई कानून इन्हें पालन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। डॉ. अम्बेडकर का कहना है कि ये हमारे आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के लक्ष्य की ओर इंगित करते रहते हैं। 
संविधान में वर्णित निर्देशक तत्वों को तीन भागों में विभक्त किया है— समाजवादी सिद्धान्त, गाँधीवादी सिद्धान्त तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा देने वाले सिद्धान्त । 
(i) समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार प्रत्येक राज्य लोक कल्याण राज्य स्थापित करने के लिए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनायेगा, जिसमें राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का संचार होगा। अतः राज्य सभी क्षेत्रों में न्याय एवं जन कल्याण को बढ़ावा देने का प्रयत्न करेगा। अनुच्छेद 39 में उन तरीकों का वर्णन किया है जिनके द्वारा भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना होगी। इसी प्रकार सभी स्त्री-पुरुषों को समान रूप से जीविका के साधन प्राप्त हो सकेंगे। देश के साधनों का बँटवारा लोक कल्याण की दृष्टि से हो। आर्थिक व्यवस्था में धन और उत्पादन के साधनों का उचित वितरण हो । स्त्री-पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले। श्रमिक पुरुषों, स्त्रियों और बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो। राज्य अपनी सामर्थ्य 
के अनुसार नागरिकों को शिक्षा का अधिकार प्रदान करें तथा बेरोजगारी, बुढ़ापे और अपाहिज की दशाओं में सहायता करें। राज्य काम के लिए न्यायपूर्ण दशाओं का प्रबन्ध करें। स्त्रियों की प्रसूति अवस्था में सहायता की जायेगी। राज्य का कर्त्तव्य है कि वह सभी श्रमिकों को कार्य निर्वाह योग्य मजदूरी, अच्छे जीवन की सामग्री, अवकाश के पूर्ण उपभोग तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर देने का भी यत्न करें। राज्य लोगों के भोजन और जीवन स्तर को ऊँचा करेगा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुधारेगा। 
(ii) गाँधीवादी सिद्धान्त के अनुसार भारत के हर राज्य को यह निर्देश दिया गया है कि वे राज्य के गाँवों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देगा। राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करेगा और उन्हें इतने अधिकार देगा कि वे स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें। राज्य पिछड़ी हुई और निर्बल जातियों की विशेष रूप से शिक्षा तथा आर्थिक हितों की उन्नति करेगा। राज्य नशीली वस्तुओं के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगायेगा। राज्य कृषि और पशु पालन का वैज्ञानिक ढंग से संचालन करेगा। दूध देने वाले पशुओं की रक्षा की जायेगी तथा पशुओं की नस्ल में सुधार किया जायेगा। राज्य राष्ट्रीय और ऐतिहासिक महत्व वाले स्मारकों और स्थानों की रक्षा करेगा। राज्य न्याय पालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए कदम उठायेगा। सारे देश के लिए एक समान दीवानी तथा फौजदारी कानून बनाने का प्रयत्न किया जायेगा। 
(iii) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा देने वाले सिद्धान्तों के अनुसार राज्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा को बढ़ावा देगा। राज्य राष्ट्रों के बीच न्याय और सम्मानपूर्वक सम्बन्धों को बनाये रखने का प्रयास करेगा। राज्य अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों तथा सन्धियों के प्रति आदर का भाव रखेगा। राज्य अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों का फैसला पंच निर्णय द्वारा करायेगा । 
नीति निर्देशक तत्व कोरे आदर्श नहीं हैं। राज्य ने इनका पालन करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कानून बनाये हैं। फिर भी राज्य के लिए बहुत कुछ करना शेष है। देश में बेकारी को दूर करना है, आत्म निर्भर बनाना है। देश में जब तक अशिक्षा तथा दरिद्रता का बोलबाला है, लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना नहीं हो सकती । 
निर्देशक तत्व प्रज्जवलित ज्योति के रूप में राज्य के सभी पदाधिकारियों का राष्ट्र निर्माण के प्रयासों में मार्ग दर्शन करेंगे, जिससे राष्ट्र समृद्धिशाली और शक्तिशाली बनेगा तथा संसार के अन्य राष्ट्रों में अपना उचित स्थान प्राप्त कर सकेगा। ये राज्यों के विकास के लिए दिग्दर्शक सूचक यन्त्र है, जिसमें उनकी उन्नति का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई देता है। यहाँ यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि प्रत्येक राज्य इन सिद्धान्तों का पालन अपने- अपने साधनों के अनुसार ही करेगा। किसी भी राज्य को इनका पालन करने के लिए मौलिक अधिकारों के पालन की भाँति न्यायालय द्वारा बाध्य नहीं किया जा सकेगा। 

संविधान के मूल में शिक्षा की व्यवस्था किस प्रकार की गई है? 

संविधान के मूल आदर्श और शिक्षा (Basic Features of Constitution and Education) —

 भारतीय संस्कृति के मूल लक्षणों-प्रजातन्त्र, स्वतन्त्रता, समानता और उत्तरदायित्व के सफल क्रियान्वयन के लिए शिक्षा की महती आवश्यकता है। शिक्षा ऐसे प्रजातांत्रिक समाज के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है जो स्वतन्त्रता, समानता और उत्तरदायित्व पर आधारित हो। इसके लिए शिक्षा में निम्न व्यवस्थाएँ की गयी हैं— 
1. शिक्षा का सार्वभौमीकरण - 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया गया है। 'सर्व शिक्षा अभियान', 'स्कूल चलो अभियान', 'मध्याहन भोजन की व्यवस्था' आदि कार्यक्रमों के द्वारा इस लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयत्न किये जा रहे हैं। 
2. शैक्षिक अवसरों की समानता- देश के सभी बालकों को शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध कराये जा रहे हैं। प्राथमिक स्तर पर तो ये अवसर सबको दिया ही जा रहा है, माध्यमिक और उच्च स्तरों पर भी विविधतापूर्ण पाठ्यक्रमों का प्रावधान करके बालकों की रुचि और योग्यता के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने के अवसर दिये जा रहे हैं। 
3. स्त्री शिक्षा - स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की शिक्षा के लिए विशेष सुविधायें दी जा रही हैं। उनका नामांकन बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न किये गये हैं। उनके लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों और पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं की व्यवस्था की जा रही है। 
4. प्रौढ़ शिक्षा- देश की निरक्षरता को दूर करने और लोगों में जाग्रति व चेतना पैदा करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा का व्यापक कार्यक्रम बनाया गया है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से देश के प्रौढ़ों को शिक्षित करने के सघन अभियान चलाये जा रहे हैं। 
5. विकलांगों के लिए शिक्षा - विकलांगों को हिम्मत और विश्वास के साथ जीवन व्यतीत करने के लिए शिक्षा की व्यवस्था की गयी है। भारत सरकार ने 1977-78 में इनके लिए समन्वित शिक्षा योजना आरम्भ की। देशभर के गूंगे, बहरे, नेत्रहीन और अन्य विकलांग बच्चों के लिए विशेष शिक्षण संस्थायें चलायी जा रही हैं। 
6. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बालकों के लिए शिक्षा - समानता और सामाजिक न्याय की व्यवस्था के अनुसार इन जातियों के बालकों के लिए संविधान द्वारा विशेष शैक्षिक सुविधायें प्रदान करने की बात कही गयी है। इसके अनुरूप इन जातियों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति योजना और अन्य योजनायें आरम्भ की गयी हैं। रहने के लिए छात्रावासों की व्यवस्था की गयी है. और शिक्षा व राजकीय सेवा के क्षेत्रों में आरक्षण की सुविधायें प्रदान की गयी हैं। 
7. पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा अन्य पिछड़े वर्गों के बालकों के लिए भी विशेष शैक्षिक सुविधायें प्रदान की गयी हैं और उनके लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। 
8. अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा- देश के अल्पसंख्यकों के कुछ वर्ग भी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए हैं। समानता और सामाजिक न्याय का तकाजा है कि ऐसे वर्गों के बालकों को भी शिक्षा की सुविधायें प्रदान की जायें, इसके लिए सरकार ने अनेक कार्यक्रम संचालित किये हैं। 
9. व्यावसायिक शिक्षा-समाज का उपयोगी सदस्य बनाने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा के पाठ्यक्रम में ऐसे विषय, कौशल और हस्त उद्योग हों जो व्यावसायिक क्षेत्र में सहायक हों। कोठारी आयोग, नयी शिक्षा नीति और संशोधित नयी शिक्षा नीति में शिक्षा के व्यावसायीकरण पर विशेष बल दिया गया है। 
10. नागरिकता की शिक्षा प्रजातन्त्र अच्छे नागरिकों पर ही निर्भर है। स्वतन्त्रता और समानता समाज में तभी सम्भव है जब अच्छे नागरिक हों। अच्छे नागरिक ही अपने उत्तरदायित्वों का भली प्रकार से निर्वहन कर सकते हैं। अतः शिक्षा के द्वारा ऐसे नागरिकों का निर्माण करने के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी है। इसके लिए पाठ्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन किये गये हैं । 
11. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की शिक्षा कहा जाता है कि अंधविश्वास, भाग्यवाद और अविवेकशील भय जैसी सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति में और आधुनिक समाज के भौतिक तथा सांस्कृतिक विकास के लिए आवश्यक विवेकशील मनःस्थिति तैयार करने में विज्ञान काफी सहायक सिद्ध हो सकता है। इसी प्रकार यदि प्रौद्योगिकी का उचित प्रयोग किया जाये तो इससे गरीबी और अस्वास्थ्य समाप्त हो सकेगा तथा लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने में मदद मिल सकेगी। अतः शिक्षा के सभी स्तरों पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के शिक्षण की व्यवस्था इस प्रकार से की जा रही है जिससे विवेकशील चिन्तन को बढ़ावा मिले। 
12. मूल्य शिक्षा- देश की सुरक्षा, शान्ति, विकास, खुशहाली और एकता व अखंडता के लिए मूल्य शिक्षा की आवश्यकता है। कोठारी आयोग ने कहा था कि आज के युवकों में सामाजिक व नैतिक मूल्यों के प्रति जो अवहेलनात्मक दृष्टिकोण है, उसके कारण ही सामाजिक व नैतिक संघर्ष उत्पन्न हो रहे हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था का मूल्यपरक बनायें। इसके लिए आवश्यक कदम उठाये जा रहे हैं। 
शिक्षा प्रजातन्त्र, स्वतन्त्रता, समानता और उत्तरदायित्व लाने का सशक्त साधन है। इनके मार्ग में आने वाली बाधाओं से शिक्षा के द्वारा ही लड़ा जा सकता है। इसके लिए जहाँ समुचित शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी वहीं देश के नागरिकों को भी इनमें अपनी गहन आस्था पैदा करनी होगी। 

"संविधान में भाषा एवं राजभाषा" पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 

संविधान में भाषा एवं राजभाषा - 

भारतीय संविधान ने हिन्दी को भारत की राष्ट्र भाषा स्वीकार की है। हिन्दी वैज्ञानिक सरलतम भाषा भारत के नौ राज्यों की मातृभाषा हिन्दी है । संस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री होने के कारण यह उत्तर भारतीय भाषाओं की बड़ी बहिन भी है। उत्तर भारतीय भाषाओं के अधिकांश शब्दों, भाषा तत्त्वों की इसमें कई तरह से समानता है । भारत में लगभग 80% भारतीयों द्वारा यह बोली व समझी जाने वाली भाषा है। यही कारण है कि इसको भारत की सम्पर्क भाषा भी माना गया है। केन्द्र की सरकारी काम-काज के लिए संविधान द्वारा हिन्दी को ही राजभाषा ( राज्य भाषा ) घोषित किया गया है। वर्तमान में राजभाषा के लिए सह भाषा के रूप में अंग्रेजी का भी प्रयोग हो रहा है। दक्षिण अहिन्दी भाषियों ने केन्द्र की राजभाषा हिन्दी का विरोध किया था। फलत: उनको राजी रखने के लिए राज्य कार्य अंग्रेजी में किया जा रहा है। फिर भी केन्द्र में 75% कार्य हिन्दी में किया जा रहा है। राजनीतिज्ञों के स्वार्थ के कारण हिन्दी अभी तक पूर्णत: राज्यभाषा के रूप में नहीं है। अभी तक अंग्रेजी की ही प्रमुखता है । यह सब दक्षिण के तमिल द्रविड़ों की हठधर्मी का ही प्रतिफल है। 
संविधान द्वारा 15 भाषाएँ राष्ट्रभाषा के लिए मान्य हैं। परन्तु विशाल शब्द भण्डार, वैज्ञानिक ध्वनियाँ, अधिकांश प्रान्तों की मातृभाषा और 75 प्रतिशत भारतीयों द्वारा प्रयुक्त होने के कारण हिन्दी केन्द्र की राजभाषा भी स्वीकृत है। 
राजभाषा — राजकार्य/शासन के कार्यों के लिए जिस भाषा का उपयोग किया जाता है, वह राजभाषा कहलाती है । राष्ट्रभाषा भी केन्द्र की, सम्पूर्ण देश की प्रशासनिक भाषा है । राजभाषा प्रान्तों की मातृभाषा में प्रान्तों के राजकार्य होते हैं । अतः प्रान्तों की राजभाषा वहाँ की मातृभाषा ही होती है; जैसे— गुजरात की राजभाषा व मातृभाषा गुजराती है। पंजाब की पंजाबी, तमिलनाडु की तमिल तथा हिन्दी भाषी प्रान्तों की राजभाषा व मातृभाषा हिन्दी है । परन्तु भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी और भारत के समस्त प्रशासनिक कार्यों की राजभाषा हिन्दी ही है । सारांश यह है कि भारत की राष्ट्रभाषा व राजभाषा हिन्दी है । प्रान्तों की मातृभाषा वहां की राजभाषा भी है। 
भारतीय संविधान द्वारा हिन्दी राष्ट्र भाषा स्वीकृत है। राजभाषा के रूप में हिन्दी केन्द्र में तथा हिन्दी भाषी प्रदेशों में मान्य है। प्रत्येक भारतीय बालक को तीन भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य है। उनमें एक भाषा मातृभाषा, दूसरी अंग्रेजी, तीसरी अन्य आधुनिक भारतीय भाषा, संस्कृत या अन्य अंग्रेजी भाषा । इस प्रकार हिन्दी भाषा प्रत्येक भारतीय बालक को पढ़ना अनिवार्य है। 

Kkr Kishan Regar

Dear friends, I am Kkr Kishan Regar, an enthusiast in the field of education and technology. I constantly explore numerous books and various websites to enhance my knowledge in these domains. Through this blog, I share informative posts on education, technological advancements, study materials, notes, and the latest news. I sincerely hope that you find my posts valuable and enjoyable. Best regards, Kkr Kishan Regar/ Education : B.A., B.Ed., M.A.Ed., M.S.W., M.A. in HINDI, P.G.D.C.A.

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