अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक 
अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

I. अधिगम प्रतिकारक एवं प्रभावक तत्व

 ( Learning : Factors and Influencing Factors ) 

विद्यालय में बालक कुछ न कुछ सीखता है । किसी भी क्रिया को विद्यालय में सीखने के लिए अनेक प्रतिकारक उत्तरदायी हैं । ये प्रतिकारक इस प्रकार हैं-
अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक
1. विद्यार्थी ( Learner ) - 
छात्र किसी भी क्रिया को सीखने का केन्द्र - बिन्दु हैं । शिक्षा का उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है । छात्रों की रुचि , योग्यता , क्षमता व्यक्तिगत भेद , बुद्धि के आधार पर सम्पन्न की गई क्रिया प्रभावशाली होती है । विद्यार्थी अधिगम का आधार है , उसके अभाव में किससे सिखाया जा सकता है । 

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक को विडियो के माध्यम से समझिए
 
2. अध्यापक ( Teacher ) - 
विद्यालय में किसी भी क्रिया के सीखने का दायित्व अध्यापक है । वह छात्रों में ज्ञान तथा क्रिया का अधिगम कराने के लिए उचित वातावरण की तैयारी करता है । 

3. पाठ्यक्रम ( Curriculum ) - 
छात्र तथा अध्यापक के होते हुए भी कोई क्रिया उस समय तक नहीं सिखाई जा सकती जब तक यह ज्ञान हो कि अध्यापक को क्या सिखाया है ? क्या सिखाया ही पाठ्यक्रम है । विद्यालय में जो सिखाया जाता है उसका माध्यम पाठ्यक्रम होता है पहले पाठ्यक्रम का अभिप्राय पुस्तकों से समझा जाता था ! अब खेलकूद , भ्रमण , सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि पाठ्यक्रम का अंग बन गये हैं । 

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4. अधिगम की परिस्थिति ( Learning Situation ) - 
अधिगम की परिस्थिति से तात्पर्य विद्यालय के वातावरण से है । विद्यालय तथा कक्षा का वातावरण यदि सुन्दर है तो वह अधिगम की प्रक्रिया को सरल बना देता है । कक्षा के छात्रों का योग भी इसमें निहित रहता है । 

5. अधिगम की प्रक्रिया ( Learning Process ) -
किसी भी क्रिया को किस प्रकार सम्पन्न किया जाता है , इसमें भी अधिगम प्रभावित होता है । यद्यपि मनोवैज्ञानिक अधिगम की प्रक्रिया के सम्पादन पर मतैक्य नहीं है । अधिगम की प्रक्रिया चाहे जिस ढंग से सम्पादित की जाये , परन्तु यह बात अपनी जगह सत्य है कि बालक किसी भी क्रिया को अपने ही ढंग से ग्रहण करता है । 

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

II.अधिगम : प्रभावक प्रतिकारक

( Learning : Influencing Factors ) 

अधिगम की क्रिया किसी प्रतिकारक के प्रभाव से संचालित नहीं होती । उसकी संचालन प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले अनेक प्रतिकारक होते हैं । किसी ज्ञान तथा क्रिया को सीखने के लिए प्रतिकारकों की उचित व्यवस्था आवश्क है ये प्रतिकारक इस प्रकार हैं 

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक
1. उचित वातावरण ( Proper Environment ) - 
अधिगम , वातावरण से प्रभावित होता है । वातावरण बाह हो या आन्तरिक घर का हो या समुदाय का , विद्यालय का हो या कक्षा का , अधिगम का वातावरण ठीक है तो क्रिया को सीखने में कठिनाई नहीं होगी । कक्षा में प्रकाश , वायु का प्रबन्ध , सफाई आदि बाह्य वातावरण की सृष्टि करते हैं । छात्रों को किसी भी क्रिया या ज्ञान के सीखने के लिए यह आवश्यक है कि वे मानसिक रूप से तैयार हों अर्थात् अध्यापक को चाहिए कि वह उनके लिए मनोवैज्ञानिक परिस्थिति उत्पन्न करें । 

2. शारीरिक तथा मानसिक सम्बन्ध ( Physical and Mental Health ) - 
प्रायः देखा जाता है कि शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ बालक ज्ञान तथा क्रिया को ग्रहण करने में कुशल होते हैं , जो बालक बीमार रहते हैं वे पढ़ने - लिखने में रुचि नहीं लेते । अध्यापक को अपना काम कराने के लिए इन छात्रों से जबरन काम लेना पड़ता है । फलतः वे बीमार तथा मन्दबुद्धि बालक अध्यापक , कक्षा तथा विद्यालय के प्रति पूर्वाग्रहों से पीड़ित हो जाते हैं । अध्यापक को चाएि कि वह पढ़ाते समय छात्रों के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें । उसी के अनुसार वह अपनी अध्यापन विधि का इस्तेमाल करे । 

3. अधिगम विधि ( Learning Method ) - 
अध्यापक किस प्रकार छात्रों को किसी ज्ञान को प्रदान करता है ? इस बात पर भी अधिगम निर्भर करता है । प्रत्येक छात्र एक ही विधि से प्रभावित नहीं होता है । यदि बालक को अवैज्ञानिक तथा अमनोवैज्ञानिक पद्धतियों में किसी बात को जबरन सिखाया जा रहा है तो बालक सीखने की उस क्रिया में तनिक भी रुचि नहीं लेता । आरम्भ की कक्षाओं में खेल विधि कार्य द्वारा सीखने आदि विधियों पर इसीलिए जोर दिया जाता है । उच्च कक्षाओं में फिल्मों के माध्यम से भी शिक्षण दिया जाता है । 

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4. अभिप्रेरणा ( Motivation ) - 
सीखने की क्रिया में प्रेरणा का मुख्य योग रहा है । बालक को यदि किसी कार्य के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है तो वह सीखने की क्रिया में रुचि नहीं लेगा । अध्यापक को चाहिए वह पाठ पढ़ाने से पूर्व छात्रों को उस विषय में प्रेरणा दे जिससे वह अधिक सफलता प्राप्त कर सकेगा । प्रेरणा से छात्रों में महत्त्वाकांक्षा उत्पन्न होता है । 

5. अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher ) - 
अधिगम उस समय तक प्रभावशाली ढंग से काम नहीं कर सकता जब तक कि अध्यापक अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह नहीं करता । शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण अनुसंधान हो रहे हैं । अध्यापक को चाहिए कि शिक्षा के नवीनतम अन्वेषणों के सम्पर्क में रह और शिक्षण की नवीनतम विधियों का उपयोग करे । ऐसी स्थिति में उसका प्रभाव अच्छा होगा । 

6. इच्छा शक्ति ( Will to Learn ) - 
अधिगम सीखने वालो की इच्छा शक्ति पर भी निर्भर करता है । यदि कोई बालक किसी ज्ञान को सीखना ही न चाहे तो उसके साथ जबरदस्ती नहीं की जा सकती । इसी प्रकार यदि अध्यापक ज्ञान तथा क्रिया को नहीं सीखाना चाहतो तो छात्र किस प्रकार सीख सकेंगे ? दोनों ही स्थिति में पहला कार्य अध्यापक का है । वह स्वयं में बालकों को ज्ञान देने की संकल्प शक्ति का निर्माण करे । इसी प्रकार वह बालकों में नवीन ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न करे । उनमें प्रेरणा भरे । 

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7. परिपक्वता ( Maturation ) - 
अधिगम की क्रिया में बालकों की शारीरिक तथा मानसिक परिपक्वता का योग विशेष रहता है । छोटी कक्षाओं में बालकों की मांसपेशियों को प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे वे इस योग्य हो जायें कि कलम , किताब , कापी आदि पकड़ सकें । बड़ी कक्षाओं में छात्रों की बुद्धि , योग्यता , क्षमता आदि को ध्यान में रखकर ही पाठ पढ़ाया जाता है । बालकों को सिखाई जाने वाली कियाएँ उनकी आयु तथा क्षमता के अनुकूल होनी चाहिए । कहने का तात्पर्य यह है कि मानसिक तथा शारीरिक परिपक्वता ही सीखने की क्रिया को सफलता प्रदान करती है ।

8. कार्य का समय और थकान ( Work Time of Fatigur ) 
प्रायः यह देखा जाता है कि अधिगम की क्रिया में उस समय अवरोध उत्पन्न होता है जब थकान आती है । थकान की परिस्थिति में अधिगम की क्रिया की सफलता संदिग्ध हो जाती है । काम का समय निर्धारण तथा समय पर विश्राम देने से अधिगम की क्रिया में सफलता मिलती है । समय विभाग चक्र बनाते समय अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिए । 

9. अभ्यास विभाजन ( Distribution of Practice ) - 
प्रायः देखा जाता है कि अधिगम की क्रिया में उन्नति उस समय होती है जब बालक को अभ्यास के लिए कार्य दिया जाता है । परन्तु यह भी देखा गया है कि विद्यालय में प्रत्येक विषय का अभ्यास कार्य इतना अधिक हो जाता है कि घर पर गर्दन ऊपर करने की फुर्सत नहीं मिलती । परिणामतः उसकी रुचि विद्यालय के कार्यो में कम होने लगती है । अत : आवश्यक है कि अभ्यास कार्य के उचित विभाजन से अधिगम में निश्चय ही प्रगति होती है ।

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